334 : परिपत्र: सं 334, 03-04-1982 दिनांकित
परिपत्र सं.
334
परिपत्र की तिथि
03/04/1982
दस्तावेज़ अपलोड की तिथि
03/04/1982
1211. मूल आकलन अलग सेट है जब उप - धारा के तहत ब्याज की लेवी (2) / रद्द
1संदेह अनुभाग 220 के तहत ब्याज प्रभार्य की मात्रा के रूप में उठाया गया है (2) आयकर अधिकारी द्वारा पारित मूल निर्धारण आदेश जब है,
(क) अनुभाग 146 के तहत उसके द्वारा रद्द कर दिया;
(ख) अलग सेट / एक अपीलीय / पुनरीक्षण प्राधिकरण और ऐसे अपीलीय / पुनरीक्षण आदेश अंतिम बन गया है द्वारा रद्द कर दिया; या
(ग) एक अपीलीय प्राधिकरण ने खारिज कर दिया लेकिन, आगे अपील, मूल्यांकन निवारक क्रम दूसरा अपीलीय प्राधिकार द्वारा विविध है और मांग अंत में निर्धारित हो जाता है.
प्र.20. इन मुद्दों पर व्यापक कानून और बोर्ड सलाह दी गई है मंत्रालय के साथ परामर्श में जांच की गई:
1एक आकलन के आदेश खंड 146 या / एक अपीलीय / पुनरीक्षण प्राधिकारी द्वारा अलग सेट रद्द कर दिया और रद्दीकरण के तहत रद्द कर दिया है जहां / निवारक अनुभाग 220 के तहत, कोई दिलचस्पी नहीं है (यानी, यह आगे अपील / संशोधन का एक परिणाम के रूप में विविध नहीं है) फाइनल हो जाता है (2) के अनुसार मूल मांग नोटिस करने का आरोप लगाया जा सकता है.इस स्थिति के लिए आवश्यक परिणाम मूल्यांकन reframed है, तब भी जब ब्याज ही इस तरह के ताजा आकलन आदेश के अनुसार मांग नोटिस की सेवा करने की तारीख से 35 दिनों की समाप्ति के बाद आरोप लगाया जा सकता है कि हो जाएगा.
प्र.20. आयकर अधिकारी द्वारा मूल रूप से किए गए मूल्यांकन विविध या यहां तक कि एक अपीलीय प्राधिकार द्वारा लेकिन आगे अपील पर अलग सेट या तो कहां, आयकर अधिकारी का मूल आदेश अनुभाग 220 के तहत हिस्से में या पूर्ण, ब्याज देय या तो बहाल है (2) मूल मांग नोटिस से और अंत में निर्धारित कर के संदर्भ में गिना नियत तारीख के संदर्भ में गणना की जाएगी. एक बीच की अवधि के दौरान, किसी भी सहकारी आदेश के तहत निर्धारिती द्वारा देय नहीं कर रहा था तथ्य यह है कि इस स्थिति को कोई फर्क नहीं होता.
(3)पूर्वगामी कानूनी स्थिति भी अन्य प्रत्यक्ष करों के तहत कार्यवाही करने के लिए यथोचित परिवर्तन सहित लागू होंगे.
परिपत्र: नहीं 334 [एफ सं 400/3/81-ITCC], 1982/03/04 दिनांकित.
न्यायिक विश्लेषण
विक्रांत टायर्स वी. में - में समझाया सबसे पहले आईटीओ [1993] 202 आईटीआर 454 (Kar.), ऊपर परिपत्र निम्नलिखित टिप्पणियों के साथ समझाया गया था:
"... बोर्ड के परिपत्र निर्धारिती पर बाध्यकारी नहीं किया जा सकता है और कानून के प्रावधान के interpetation सभी मामलों में बोर्ड द्वारा दिए गए अर्थ पर निर्भर नहीं रह सकते. परिपत्र के कानून के तहत अधिकारियों द्वारा अधिनियम की वजह से प्रशासन की सुविधा के लिए जारी किया गया है. परिपत्र जारी करते समय अनुभाग 220 का प्रभाव (2) विधिवत बोर्ड द्वारा स्पष्ट किया गया है. "(पी. 464)
केरल उच्च न्यायालय - में समझाया इतो वी. ए वी थॉमस एंड कंपनी [1983] 160 आईटीआर 816 इस परिपत्र जारी करने की निर्णायक नहीं है कि आयोजित उसमें विस्तार से बताया और कहा कि ब्याज अनुभाग 220 के तहत देय नहीं है (2) धारा 156 के अधीन किए गए मांग के साथ कोई गैर अनुपालन की गई है के रूप में.
में समझाया - ऊपर परिपत्र माधव एल्यूमीनियम कंडक्टर में भेजा गया था (पी)लिमिटेड वी. आईटीओ [1986] 15 निम्नलिखित टिप्पणियों के साथ आईटीडी 671 (Mad.),:
मूल आकलन अलग सेट है जब अनुभाग 220 के तहत ब्याज की 1982/03/04 लेवी दिनांक सीबीडीटी के सर्कुलर नं 334, के तहत (2) का हुक्म था कि तर्क का संबंध है, "जैसा कि हम केरल के निर्णय का हवाला देते हुए की तुलना में कोई बेहतर कर सकते हैं मलयाला मनोरमा और कंपनी लिमिटेड वी. सी आई टी में उच्च न्यायालय [: कहा परिपत्र के बारे में निम्नलिखित व्यक्त जो 1983] 143 आईटीआर 29
"... 'अदालत की परवाह किए बिना अधिकारियों के मार्गदर्शन के लिए विभाग और दिशाओं के अभ्यास के अधिनियम के प्रावधानों पर अपने स्वयं के निर्माण डाल दिया जाएगा. . . '(पी 29) "(पीपी 674-675)
में निर्दिष्ट - (ख) के ऊपर परिपत्र के पैरा 2 के संदर्भ का हवाला देते हुए यह एम.एन. जाधव वी. में मनाया गया चौथा आईटीओ [1986] 161 कि आईटीआर 275 (Kar.) "किसी भी शक के बिना, इस परिपत्र को सही ढंग से मैं स्वतंत्र रूप से पहुँच गए हैं जो कानूनी स्थिति expounds." (पी.278).
भारत संघ [1998] 99 चुंगी लगानेवाला 408 (म. प्र.) / श्रीमती वी. Pitambardas - में समझाया आर मणि गोयल वी. सीआईटी [1996] 217 आईटीआर 641 (All.): इस संबंध में केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड द्वारा जारी सर्कुलर अच्छी तरह से स्थापित हो गया लगता है.
में उद्धृत - पूर्वोक्त टिप्पणियों को भी उद्धृत किया गया और DCIT वी. हिंदुस्तान कंप्यूटर लिमिटेड में पर भरोसा [1995] 55 आईटीडी 153 (दिल्ली -. ट्राई बी).ट्रिब्यूनल ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के उक्त निर्णय के साथ ही मोहम्मद ईसा मूसा Sait में केरल उच्च न्यायालय के फैसले का पालन करते हुए मनाया जीटीओ वी. [1987] 167 परिपत्र द्वारा विचार तथ्यों squarely मौजूद हैं कि "आईटीआर 338, तत्काल मामले में और जो क्रम की शुरुआत में निर्धारित प्रासंगिक तारीखों और घटनाओं के संदर्भ द्वारा प्रकट हो गया. " (पी.157)

