आयकर विभाग

वित्त मंत्रालय, भारत सरकार

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परिपत्र सं.

3/2008

परिपत्र की तिथि

12/03/2008

दस्तावेज़ अपलोड की तिथि

12/03/2008

 

सी0बी0डी0टी0 की अधिसूचनाओ,परिपत्रो और दिशानिर्देशो का संकलन

प्रेस विज्ञप्ति

आय कर अधिनियम

वित अधिनियम ,2007-प्रत्यक्ष करो से सम्बन्धित उपबन्धो पर व्याख्याकारी विवरण

परिपत्र सं03/2008,दिनांकित12-3-2008

संसोधन एक नजर मे

खण्ड/अनुसूची मदें
वित अधिनियम
2/प्रथम अनुसूची दर संरचना 3.1-3.3.10
आयकर अधिनियम
2(1ग),2(1घ),2(7क),2(9ख),120(4)(ख) करनिर्धारण अधिकारी की परिभाषा तथा कतिपय अन्य आयकर प्राधिकारियो की परिभाषा मे स्पष्टीकरणकारी संसोधन 4.1
2(14)(ii) पूजॅीगत परिसम्पत्त के दायरे का विस्तारण 5.1-5.2
2(25क) भारत की नयी परिभाषा 6.1-6.3
9,व्याख्या भारत मे प्रोदभूत अथवा उदभूत मानी गयी आय 7.1-7.5
10(10खग) किसी आपदा के कारण मुवाअजे के लिए छूट 8.1-8.4
10(15)(vii) राज्य पोषित वित्त संस्थाओ द्वारा जारी अधिसूचित बांडो पर ब्याज के लिए छूट 9.1-9.4
10(23खखघ) ए0एस0ओ0एस0ए0आर्इ0-सचिवालय की आय के लिए छूट10.1-10.3
10(23खखछ) केन्द्रिय विद्युत विनियामक आयोग की आय के लिए छूट 11.1-11.2
10(23ग)(iv),10(23ग)(v),10(23ग)दूसरा,नौवा,तेरहवां और सोलहवां परन्तुक 143(3).प्रथम परन्तुक 296 की उपधारा(ii) कतिपय धर्मस्व तथा धार्मिक संस्थाओं की अधिसूचन की शक्ति का आदेशित प्राधिकारी द्वारा अनुमोदन की शक्ति से प्रतिस्थापन 12.1-12.5
10(23झ्ग) कमोडिटी एक्सचेंजो द्वारा स्थापित निवेशक संरक्षा निधि की कतिपय आयो के लिए छूट 13.1-13.4
10(23चग),10(23चग) व्याख्या 1 की धारा(ग) उद्यम पूॅजी कम्पनी अथवा उद्यम पूॅजी निधि की कतिपय आयो के लिए छूट 14.1-14.3
10कक(4) एस0र्इ0जेड0 मे मात्र नर्इ इकाइयो के लिए करलाभ 15.1-15.6
12क(क),12क(कक),12क(1),12क(2),12कक(1),12कक(2) सृजन अथवा स्थापना के एक वर्ष के अन्दर धर्मार्थ या धार्मिक न्यासो या संस्थाओं के लिए पंजीकरण हेतु आवेदन करने की आवश्यकता का प्रतिस्थापन 16.1-16.7
13(1)(घ)(iii) कतिपय मामलो में अनुमतिप्राप्त निवेशविधि के रूप मे किसी न्यास अथवा संस्थान के लिए अंशो में निवेश की अनुमति 17.1-17.5
17(1)(ii),व्याख्या1, व्याख्या2, व्याख्या3, 17(1)(iii)परंतुक भाड़े के मामले में छूट के सम्बन्ध मे स्पष्टीकरण 18.1-18.12
35(2कख)(v) और पॉच वर्षो के लिए अनुमत खण्ड35 के उपखण्ड(2कख)की धारा(1) के अन्र्तगत भारित कटौती 19.1-19.4
36(1)(7क)(क),36(1)(7क) व्याख्या की धारा(ii), 10(15)(iv)(चक)व्याख्या खण्ड 36(1)(viiए) के अन्र्तगत सहकारी बैंको के मामले मे अनुमत किए जाने वाले किसी उपबन्ध के समबन्ध मे खराब अथवा संदिग्ध ऋणो के लिए कटौती 20.1-20.7
36(1)(viii) खण्ड 36(1)(viii)के अन्र्तगत विशेष संचय के सृजन तथा रखरखाव के सम्बंध मे कटौती से सम्बंधित उपबंधो का विवेकीकरण 21.1.-21.7
36(1)(x) विनिमय जोखिम प्रशासन निधि(र्इ आर ए एफ)के प्रति सार्वजनिक वित्तिय संस्थाओ द्वारा यागदान के सम्बंध मे खण्ड36(1)(x)के अन्र्तगत कटौती की निकासी 22-1-22.6
36(1)(xii) केन्द्रिय सरकार खण्ड 36(1)(xii)के अन्र्तगत कटौती के प्रयोजन के लिए एक निकाय निगम के लिए एक संवैधानिक निगम को अधिसूचित करने की शक्ति से युक्त 23.1-23.3
36(1)(xiv) लघु उद्योगो के लिए अधिसूचित साख प्रत्याभूति न्यास को सार्वजनिक वित्तिय संस्थान द्वारा अदा राशि की कटौती के लिए प्रावधान करना 24.1-24.3
40क(3) खण्ड 40क(3) के उपबन्धेा का दृढीकरण 25.1-25.7
72कख,44घख,49(2ड) स्हकारी बैंको के व्यवसाय पुर्नसंगठन से सम्बंधित उपबंध 26.1-26.12
2(24)(xiv) कतिपय आयो के लिए करारोपण से अपवाद को भूतलक्षी प्रभाव देना तथा कतिपय आयो को आय की परिभाषा मे सम्मिलित करना 27.1-27.6
54÷ग(1)परन्तुक, 54डग(3)व्याख्या की धारा(ख),54डग(3)व्याख्या की धारा(ख)का परन्तुक,54डग(3)(खक), खण्ड 54डग के अन्र्तगत ’’दीर्घकालिक विनिर्दिष्ट बन्धपत्रों’’मे निवेश के लिए शर्त प्रदान करर्ना 28.1-28.7
72ए(1) वायुयान के संचालन के व्यवसाय मे लगी हुर्इ सार्वजनिक क्षेत्रक कम्पनी अथवा सार्वजनिक क्षेत्रक कम्पनियो तक विस्तरित खण्ड 72क के उपबन्ध 29.1-29.3
80ग (2)(xxii) खण्ड 80ग के दायरे का विस्तारीकरण 30.1-30.2
7(iii),7(1)(viii),80सी0सी0डी0(1),80सी0सी0डी0(2), "अन्य नियोक्ताओ" के कर्मचारियो के लिए खण्ड 80गगघ के अन्र्तगत करलाभ का प्रसार 31.1-31.2
36(1)(iख),80घ(1),80घ(1)(i),80घ(1)(ii) ,80घ(1), परन्तुक स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम की कटौती से सम्बन्धित उपबन्धो का तार्किकीकरण 32.1-32.5
80ड(1),80ड(3)(क),80ड(3)(ड) किसी रिश्तेदार की उच्च शिक्षा हेतु लिए गए ऋण पर अदा ब्याज की राशि के लिए कटौती 33.1-33.3
80-झक व्याख्या खण्ड 80-झक के प्रयोजनो के लिए आधारिक संरचना सुविधा,औद्योगिक पार्क के संदर्भसहित विकासकर्ता के सम्बन्ध मे स्पष्टीकरण 34.1-34.4
80-झक(12क) 31-3-2007 के पश्चात समामेलन अथवा विलय की प्रकिया से गुजर रही भारतीय कम्पनियो के उपक्रम/उद्यम को खण्ड 80-झक के अन्र्तगत करलाभ उपलब्ध नहीं35.1-35.2
80-झक (4)(i) व्याख्या खण्ड 80-झक के अन्र्तगत करलाभ के प्रयोजनो के लिए आधारिक संरचना सुविधा के दायरे का प्रसार36.1-36.3
80-झक (4)(v)(बी) शक्ति जनन संयत्र के पुर्ननिर्माण अथवा पुर्नजीवन के लिए स्थापित किसी भारतीय कम्पनी के किसी उपक्रम द्वारा विद्युतशक्ति के जनन,अथवा पारेषण अथवा वितरण के लिए समयसीमा का विस्तार 37.1-37.3
80-झक (4)(vi),80-झक (2),80-झक (3) पूरे देश मे प्राकृतिक गैस वितरण संजाल डालने तथा संचालन करने वाले उपक्रम के मामले मे कटौती 38.1-38.6
80-झख(4)चौथा परंतुक खण्ड 80-झख (4) के अन्र्तगत करलाभ हेतु जम्मू काश्मीर राज्य मे औद्योगिक उपक्रम स्थापित करने के लिए समयसीमा का विस्तार 39.1-39.3
80-झघ विनिर्दिष्ट क्षेत्र मे हाटलो तथा सम्मेलन केन्द्रो के लिए करावकाश 40.1-40.6
80-झग(2)(क)(i),80-झग (2)(ख)(i),80-झड सिक्किम सहित उत्तर पूर्वीराज्यो मे स्थित उपक्रम के सम्बन्ध मे करावकाश के लाभ का विस्तार 41.1-41.7
80क(3),80कग खण्ड 80क तथा 80कग अनुवर्ती संसोधन 42.1-42.4
92गक(3क), 92गक(4),153(1)द्वितिय परतुक, 153(2),तृतिय परतुक, 153(2क)तृतिय परतुक, 153ख(1)तृतिय परतुक, 153ख(1)चतृर्थ परतुक निर्धारण करने के लिए वहॉ समयसीमा का विस्तार जहॉ संदर्भ का हस्तांतरण कीमतनिर्धारण अधिकारी को किया जाता है 43.1-43.5
115´ख व्याख्या की धारा(च), 115´ख व्याख्या की धारा (ii) टायकर अधिनियम के खण्ड 10क तथा 10ख के अन्र्तगत छूटप्राप्त आय को सम्मिलित करने के लिए न्युनतम वैकल्पिक कर के दायरे का विस्तारण 44.1-44.4
115-ण(1),115-द(2)(i)115-द(2)(ii)115-द(2)(iii), अध्याय xii-ड व्याख्या की धारा(घ), अध्याय xii-ड व्याख्या की धारा(ग), कतिपय मामलो मे वितरित मुनाफेा पर कर की दर मे वृद्धि 45.1-45.8
2(42क)व्याख्या 1 की धारा(i) की उपधारा(जख), 2(42क)व्याख्या 1, 49(2कख),115बख (1)(ख), 115बख (1)(ग),115बख (1)(घ)115बख (2)(v) , 115बख (2)(vii)115बग(1)(खक),115बटक सीमांत लाभ कर का तार्किकीकरण 46.1-46.16
115ब´(2)े, 115ब´(3),115ब´े(4),े115ब´(5)े सीमांत लाभो पर अग्रिम कर की भुगतान की देय तिथि का आय पर अग्रिम कर के साथ मिलान 47.1-47.11
139(9)परंतुक,139ग,139घ,295(2)(डडखख)295(2)(डडखख) अनुबद्ध रहित प्रतिदानो की सहूलियत के लिए नियम 48.1-48.7
142(2क)परंतुक, 142(2घ)परंतुक खण्ड 142(2क) के अन्र्तगत विशेष अंकेक्षण से सम्बन्धित उपबन्ध का तार्किकी करण 49.1-49.5
153घ छानबीन मामलो का मूल्यॉकन-संयुक्त आयुक्त के द्वारा अनुमोदित किए जाने वाले करनिर्धारण तथा पुर्नकरनिर्धारण के आदेश 50.1-50.3
172(4क) खण्ड 172 के अन्र्तगत आवेदित प्रतिदानो के लिए करनिर्धारण की पूर्णता के लिए समयसीमा का प्रावधान 51.1-51.4
193 परंतुक की धारा(iv)मे परंतुक 8% वचत(करयोग्य)बंधपत्र,2003 पर टीडीएस का प्रावधान करने के लिए आयकर अधिनियम 1961के खण्ड 193 का संसोधन 52.1-52.4
194क(3)(i),206क(1) खण्ड 194क के अन्र्तगत बैंकिग कम्पनी या सहकारी संस्था या अधिसूचित डाकखाना योजना मे किसी जमा पर देय ब्याज के सम्बन्ध मे आरंभसीमा की वृद्धि 53.1-53.5
194ग(1) खण्ड 194ग के उपबन्धो के दायरे का प्रसार 54.1-54.6
194ज,194ज तृतिय परंतुक खण्ड 194ज के अन्र्तगत टीडीएस की दर मे 10 प्रतिशत तक वृद्धि तथा भारत संचार निगम लिमटेड और महानगर दूरभाष निगम लिमिटेड द्वारा अपने पीसीओ फ्रंचाइजो को देय कमीशन से उक्त के अन्त्रगत टीडीएस से छूट 55.1-55.5
194-झ(क),194-झ(ख),194-झ(ग) खण्ड194-झ के अन्र्तगत किसी मशीनरी या संयंत्र या उपकरण के प्रयोग के लिए भाडे पर स्रोत पर कर की कटौती के लिए दर मे कमी 56.1-56.4
194(1) आयकर अधिनियम के खण्ड 194´ के अन्तर्गत  टीडीएस की दर की बढोतरी 57.1-57.4
197क(1ग) खण्ड 197क से विलोपित खण्ड 88ख के प्रति संदर्भ का विलोपन 58.1-58.3
132ख(4)(क),201(1क),245घ(6क),द्वितिय अनुसूची नियम 60(1)(क), द्वितिय अनुसूची नियम 68क(3) प्रति से प्रति माह तक आधार पर ब्याज के परिकलन की पद्धति का परिवर्तन 59.1-59.6
206ग(1ग)व्याख्या 1, 206ग(1ग)व्याख्या 2 आयकर अधिनियम 1961 के खण्ड 206ग के अन्र्तगत पद खनन व खुले खनन की परिभाषा 60.1-60.4
245क(ख),245क(छ),245ग(1),परंतुक ,245ग(1क),245ग(1ख),245ग(1ग)(ग) ,245ग(4)245घ(1),245घ(2क),245घ(2ख) 245घ(2ग),245घ(2घ),245घ(3),245घ(4),245घ(4क),245घघ(2) परंतुक,245ग द्वितिय परंतुक245च(2)प्रथम परंतुक,245च(2)द्वितिय परंतुक,245ज(1) द्वितिय परंतुक,245ज ,245जकक,245ट पुनरीक्षित निपटान योजना 61.1-61.17
246क(1)(जख)246क(1ख) खण्ड 206ग(क) के अन्र्तगत त्रुटिवश किसी व्यक्ति को करनिर्धारिती के रूप् मे धारणा वाले आदेश के विरूद्ध अपील करने के अधिकार के प्रावधान 62.1-62.5
248 कर कटौती करने की जिम्मंदारी अस्वीकार कर रहे व्यक्ति द्वारा अपील का प्रावधान 63.1-63.3
249(2)(क) अपील के ढ़ग तथा सीमाओ के लिए उपबंध: खण्ड 248 में किए गए संसोधन का अनुवर्ती 64.1-64.3
253(1)(ग) धर्मस्व संस्थानो तथा निधियो के अनुमोदन से सम्बन्धित उपबंध 65.1-65.3
254(2क)प्रथम परंतुक,254(2क)द्वितिय परंतुक, 254(2क)तृतिय परंतुक अपीलेट न्यायधिकरण द्वारा यथास्थिति के अनुदान के लिए समय सीमा का निर्धारण 66.1-66.6
271(1) व्याख्या 4, 271(1) व्याख्या 5,271(1) व्याख्या 5क, आय के छिपाव अथवा आय की गलत मदे प्रस्तुत करने के लिए शास्ती से सम्बन्धित उपबन्धो का तार्किकीकरण-67.1-67.8
246(1)(ञ)(ख),271ककक छानबीन तथा जब्ती मामले में छिपाव के लिए शास्ती हेतु उपबंध-68.1-68.5
292ग आय कर अधिनियम के अन्तर्गत जब्त खाता बहियो ,धन,स्वर्ण ,आभूषण या अन्य मूल्यावान सामग्री या चीज के तौर पर अन्य कार्य वाहियो से उपधारण के सम्बन्ध में स्पष्टीकरण -69.1-69.4
भाग क के नियम 3(1)का चतुर्थ अनुसूची प्रथम परंतुक, भाग क के नियम 3(1)का चतुर्थ अनुसूची द्वितिय परंतुक आय कर अधिनियम की चतुर्थ अनुसूची के भाग क के नियम 4की धारा ÷क में दी गर्इ शर्तो के ्र साथ अनुपालन के लिए नियम 3 में स्थापित समय सीमा का विस्तार -70.1-70.7
सम्पत्ति कर अधिनियम
2(गक) करनिर्धारण अधिकारी तथा कतिपय अन्य आयकर प्राधिकारियो की परिभाषा में स्पष्टीकरण कारी संसोधन-4.1
2(टक) भारत की नर्इ परिभाषा-6.1-6.3
22घ(6क) प्रतिवर्ष आधार से प्रतिमाह आधार पर ब्याज की गणना के लिए पद्वति का परिवर्तन-59.1-59.6
22क(ख) 22क(च), 22ग(1)परंतुक, 22ग(1क),22ग(1ख),22ग(´ग)(ग),22ग(4) ,22घ(1)22घ(2क)22घ(2ख),22घ(2ग)22घ(2घ) ,22घ(3)22घ(4)22घ(4क), 22घघ(2)परंतुक 22÷ द्वितिय परंतुक,22च(2)प्रथम परंतुक,22च(2)द्वितिय परंतुक,22ज(1)द्वितिय परंतुक, 22जक,22जकक,22ट पुनरीक्षित निपटान योजना -61.1-61.17
22क(ख) 22क(च), 22ग(1)परंतुक, 22ग(1क),22ग(1ख),22ग(´ग)(ग),22ग(4) ,22घ(1)22घ(2क)22घ(2ख),22घ(2ग)22घ(2घ) ,22घ(3)22घ(4)22घ(4क), 22घघ(2)परंतुक 22ड द्वितिय परंतुक,22च(2)प्रथम परंतुक,22च(2)द्वितिय परंतुक,22ज(1)द्वितिय परंतुक, 22जक,22जकक,22ट 42घ पुनरीक्षित निपटान योजना -61.1-61.17
  आय कर अधिनियम के अन्तर्गत जब्त खाता बहियो ,धन,स्वर्ण ,आभूषण या अन्य मूल्यावान सामग्री या चीज के तौर पर अन्य कार्य वाहियो से उपधारण के सम्बन्ध में स्पष्टीकरण -69.1-69.4
वित अधिनियम,2005

अध्याय 7 खण्ड 94(5)

अध्याय 7 खण्ड 94(8)(क),

अध्याय 7 खण्ड 94(8)(ख)(i)

केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार के कार्यालय अथवा संस्थापना का अपवर्जन तथा बैंकिग नकदी हस्तातरण कर के उपबन्धो की छूट सीमा का विस्तारण-71.1-71.4

1- परिचय

1.1- वित अधिनियम ,2007 ने (एतदपश्चात अधिनियम के रुप में उल्लखित )ज्ौसे संसद द्वारा पारित किया गया, राष्ट्रपति की अनुमति मर्इ 2007 के 11वे दिवस को प्राप्त किया और अधिनियम संख्या 2007 का 22वे रुप में अधिनियमित किया गया है। यह परिपत्र प्रत्यक्ष करो से सम्बन्धित अधिनियम के उपबन्धो के सारतत्व की व्याख्या करता है।

2- वित अधिनियम 2007 द्वारा किए गए परिवर्तन

2.1- वित अधिनियम 2007 '' इसमे एमदपश्चात अधिनियम के रुप में उल्लखित '' ने

i-करनिर्धारण वर्ष 2007-08 के लिए आयकर की दरो को तथा उस आयकर की दर का जिसके आधार पर कर कटौती किया जाना है तथा वित्तिय वर्ष 2007-08 के दौरान जिस अग्रिम कर का भुगतान किया जाना है का उल्लेख किया है।

ii-आयकर अधिनियम 1961 के संसोधित खण्ड2,7,10,10कक,12क,12कक,13,17,35,36,40क,47,49,54डग,56,72क, 80क,80कग,80ग,80गगघ,80ड, ,80-झक,80झख,80झग,92गक,115´ख,115ण,115आर,115बख,115बग,115बग,115ब´,120, 132ख,139,142,143,153,153ख,172,193,194क,194ग,194ज,194झ,194ञ,197क,201,206क, 206ग,245क,245ग,245घ, 245घघ,245÷,245च,245ज,246क,249,253,254,271,295,296;

iii- आयकर अधिनियम 1961 के प्रतिस्थापित खण्ड 245 व 248

iv- आयकर अधिनियम 1961 में अन्र्तस्थापित नए खण्ड 44घख,72कख,80झघ,80झड,115बटक, 139ग,139घ,153घ,245जक,271ककक,292ग

v- आयकर अधिनियम 1961 का संसोधित अध्याय 12E

vi- आयकर अधिनियम 1961 की द्वितिय अनुसूची का संसोधित नियम 60 व 68क

vii- आयकर अधिनियम 1961 की चतुर्थ अनुसूची के भाग ए का संसोधित कनयम 3 व 4

viii- संपत्ति कर अधिनियम 1957 के संसोधित खण्ड 2,22क,22ग,22घ,22घघ,22ड,22च,22ज

ix- संपत्ति कर अधिनियम 1957 का प्रतिस्थापित खण्ड 22ट

x-संपत्ति कर अधिनियम के 1957 के अन्र्तस्थापित नए खण्ड 22जक,22जकक,42घ

xi- वित (संख्या-2) अधिनियम 2004 का संसोधित खण्ड 93 व 94

xii- वित अधिनियम 2005 के अध्याय 7 का संसोधित खण्ड 94

3- दर संरचना

3.1- करनिर्धारण वर्ष 2007-08 के लिए करदायी आयो के सम्बन्ध में आयकर की दरे

3.1.1. करनिर्धारण वर्ष 2007-08 के लिए करदायी करदाताओ की सभी श्रेणी के सम्बन्ध मे आयकर की दरेइस अधिनियम की प्रथम अनुसूची के भाग आइ मे उल्लखित की गयी है। ये दरे अग्रिम कर की संगणना,वेतन से स्रोत पर कर की कटौती तथा वित्तिय वर्ष 2006-07 के दौरान कतिपय मामलो मे देय कर के आरोपण के प्रयोजन के लिए वित अधिनियम,2006 की प्रथम अनुसूची के भाग 3 मे दी गयी दरो के समान है।

3.1.2.उक्त भाग आइ मे विनिर्दिष्ट दरो की प्रमुख विशेषताएॅ निमनोक्त है:

3.1-3-एकल व्यक्ति,हिन्दू अविभाजित परिवार,लोगो के संघ,एकल व्यक्तियो के निकाय या कृत्रिम विधिक व्यक्ति: प्रथम अनुसूची के भाग आर्इ का पैराग्राफ ए प्रत्येक एकल व्यक्ति,हिन्दू अविभाजित परिवार,लोगो के संघ,एकल व्यक्तियो के निकाय या कृत्रिम विधिक व्यक्ति( सहकारी संस्था, फर्म,स्थानिय प्राधिकरण तथा कम्पनी से भिन्न) के मामले में आयकर की दरो का निम्नोक्त प्रकार से उल्लेख करता है।

करारोप्य आय आयकर की दरे    
एकल व्यक्ति(एकल निवासी महिला तथा निवासी वरिष्ठ नागरिक से भिन्न)एचयूएफ,लोगो के संघ,एकल व्यक्तियो के निकाय तथा कृत्रिम विधिक व्यक्ति भारत मे एकल महिला निवासी व 65 वर्ष की आयु से कम भारत मे निवासी एकल वरिष्ठ नागरिक जो 65 वर्ष की आयु का या से अधिक है
रू100000 तक शून्य शून्य शून्य
रू100001-1,35,000 10 प्रतिशत़ शून्य शून्य
रू135,000-1,50,000 10 प्रतिशत़ 10 प्रतिशत़ शून्य
रू1,50,001-1,85,000 20 प्रतिशत़ 20 प्रतिशत़ शून्य
रू1,85,000-2,50,000 20 प्रतिशत़ 20 प्रतिशत़ 20 प्रतिशत़
रू2,50,000 से अधिक 30 प्रतिशत़ 20 प्रतिशत़ 30 प्रतिशत़

3.1-4-एकल व्यक्ति,हिन्दू अविभाजित परिवार,लोगो के संघ,एकल व्यक्तियो के निकाय या कृत्रिम विधिक व्यक्ति के मामले में अधिभार मात्र वही उदगृ्रहित किया जाएगा जहॉ कुल आय 1000000रू से अधिक होगी।इस प्रयोजन के लिए ऐसी आय पर आयकर अध्याय 8ए के अन्तर्गत संगणित आयकर की बट्टाराशि द्वारा घटाया जाएगा। इस प्रकार घटाया गया आयकर तत्पश्चात ऐसे आयकर के दस प्रतिशत की दर से संघ के प्रयोजनो के लिए एक अधिभार द्वारा बढाया जाएगा। यह सुनिश्चित करने के लिए सीमांत राहत उपलब्ध होगी कि अधिभार सहित 1000000रू से उपर आय के अतिरेक पर देय अधिभार सहित आयकर की अतिरिक्त राशि उस राशि क सीमित है जिसके द्वारा आय 1000000 रु0 से अधिक होती है। उदाहरण के लिए,विनिर्दिष्ट दरो पर परिकलित 10,20,000रू की कुल आय पर आयकर तथा अधिभार की राशि 2,81,000रू रही होगी अर्थात 2,56,000रू का आयकर तथा 25,600रू का अधिभार। इस पर भारित अतिरिक्त करदेयता उस व्यकित की तुलना मे जिसकी 1000000रू की कुल आय है,31000रू है।लेकिन, उस व्यकित की तुलना मे जिसकी 1000000रू की कुल आय है,अतिरिक्त आय मात्र 20000रू होती है।अत: इस मामले मे 11,600रू की सीमॉत राहत उपलब्ध होगी क्योंकि अतिरिक्त करदेयता अतिरिक्त आय से अधिक नही हो सकती है।

3.1-5 कृत्रिम विधिक व्यक्ति के मामले में अधिभार आय के सभी स्तरो पर देय आयकर के दस प्रेतशत की दर से उदगृ्रहीत किया जाएगा ।

3.1-6 शिक्षा उपकर- ''आयकर पर शिक्षा उपकर'' नामक एक अतिरिक्त अधिभार सभी मामलो में अधिभार सहित यदि कोर्इ है संगणित कर की राशि पर दो प्रतिशत की दर से उदगृ्रहीत किया जाएगा। उदाहरण के लिए,यदि संगणित आयकर 100000रू है और अधिभार 10000रू हे तो दो प्रतिशत का शिक्षा उपकर 110000रू पर संगणित किया जाना है जो 2200रू निकलेगा।कोर्इ सीमांत राहत नही उपलब्ध होगी।

:3.1-7 सहकारी संस्था- प्रत्येक सहकारी संस्था के मामले में निम्नोक्त प्रकार से इस अधिनियम की प्रथम अनुसूची के भाग आर्इ के पैराग्राफ बी में आयकर की दरो का उल्लेख किया गया है।

करारोप्य आय छर
रू10000 तक 10 प्रतिशत
रू10001-रू20000 20 प्रतिशत
20000 से अधिक 30 प्रतिशत

कोर्इ अधिभार नही उदग्रहीत किया जाएगा। संगणित कर की राशि पर दो प्रतिशत की दर से शिक्षा उपकर उदग्रहीत किया जाएगा।

3.1-8 फर्म- प्रत्येक फर्म के मामले में आयकर की दर का इस अधिनियम की प्रथम अनुसूची के भाग झ के पैराग्राफ ग में तीस प्रतिशत की दर से उल्लेख किया गया है।10 प्रतिशत की दर से अधिभार उदग्रहित किया जाएगा। शिक्षा उपकर संगणित कर, अधिभार सहित, की राशि पर दो प्रतिशत की दर से उदगृ्रहीत किया जाएगा।

3.1-9. स्थानिय प्राधिकरण: प्रत्येक स्थानिय प्राधिकरण के मामले में आयकर की दर का इस अधिनियम की प्रथम अनुसूची के भाग झ के पैराग्राफ घ में तीस प्रतिशत की दर से उल्लेख किया गया है। कोर्इ अधिभार नही उदग्रहीत किया जाएगा। संगणित कर की राशि पर दो प्रतिशत की दर से शिक्षा उपकर उदग्रहीत किया जाएगा।

3.1-10 कम्पनी- एक कम्पनी के मामले में आयकर की दर का इस अधिनियम की प्रथम अनुसूची के भाग झ कें पैराग्राफ ÷ में उल्लेख किया गया है। घरेलू कम्पनी के मामले में आयकर की दर कुल आय का 30 प्रतिशत है। संगणित आयकर की कुल राशि 10 प्रतिशत के एक अधिभार द्वारा बढ़ायी जाएगी। अधिभार सहित कर की राशि पर दो प्रतिशत की दर से शिक्षा उपकर उदगृ्रहीत किया जाएगा ।

घरेलू कम्पनी से भिन्न कम्पनी के मामले में 31-3-1961 के पश्चात किन्तु 1-4-1976 में पहले किये गये अनुमोदित समझौते के अन्तर्गत सरकार या भारतीय संस्था से प्राप्त रायल्टियॉ 50 प्रतिशत की दर से करारोपण योग्य है। इसी तरह 29-2-1964 के पश्चात लेकिन 1-4-1976 से पहले किए गए अनुमोदित समझौते के अन्तर्गत सरकार या भारतीय संस्था से ऐसी कम्पनी द्वारा प्राप्त तकनीकी सेवाओ के लिए शुल्क 50 प्रतिशत की दर से करयोग्य है। ऐसी कम्पनी की कुल आय के शेष पर यदि कोर्इ ह,ै कर दर चालीस प्रतिशत है। संगणित कर दो तथा डेढ़ प्रतिशत के एक अधिभार द्वारा बढ़ाया जाएगा । अधिभार सहित कर की राशि पर दो प्रतिशत की दर से शिक्षा उपकर उदग्रहीत किया जाएगा।

3.2.वितिय वर्ष 2007-08 के दौरान कतिपय आयो से स्रोत पर आयकर की कटौती की दरें:

3.2.1. अधिभार प्रत्येक मामले मे जिसम आयकर अधिनियम के खण्ड 193,194,194क,194,ा,194घ,तथा 195 के उपखण्डो के अन्र्तगत प्रभावाधीन दरो पर कर कटौती किया जाना है वितिय वर्ष 2007-08 के दौरान स्रोत पर आयकर की कटौती के लिए दरो का इस अधिनियम की प्रथम अनुसूची के भाग 2 मे उल्लेख किया गया है।वितिय वर्ष 2007-08 के दौरान स्रोत पर आयकर की कटौती के लिए ये दर जेसे वित अधिनियम 2006 के प्रथम अनुसूची के भाग 2 मे विनिर्दिष्ट है,जारी रहेंगी।

3.2.2. प्रत्येक मामले मे स्रोत पर काटा गया कर संघ कें प्रयोजन के लिए एक अधिभार द्वारा निम्नोक्त प्रकार से बढाया जाएगा

i.-एकल व्यक्ति,हिन्दू अविभाजित परिवार,लोगो के संघ,एकल व्यक्तियो के निकाय के मामले में ऐसे कर के दस प्रतिशत की दर से वहॉ बढाया जाएगा जहॉ अदा, अदायगी के लिए संभाव्य तथा कटौती के अधीन आय,या ऐसी आय का संयुक्त योग दस लाख रूपए से अधिक है।

ii.प्रत्येक कृत्रिम विधिक व्यक्ति के मामले में ऐसे कर के दस प्रतिशत की दर से।

3.2.3. प्रत्येक फर्म तथा कम्पनी के मामले में स्रोत पर काटा गया कर प्रत्येक मामले मे मात्र एक अधिभार द्वारा वहॉ बढाया जाएगा जहॉ अदा, अदायगी के लिए संभाव्य तथा कटौती के अधीन आय, या ऐसी आय का संयुक्त योग एक करोड रूपए से अधिक है।ऐसा अधिभार निम्नोक्त प्रकार से संगणित किया जाएगा।

i. प्रत्येक फर्म तथा घरेलू कम्पनी के मामले में ऐसी आय के दस प्रतिशत की दर से।

ii.घरेलू कम्पनी से भिन्न प्रत्येक कम्पनी के मामले म ेंऐसी आय के दो तथा डेढ प्रतिशत की दर से।

3.2.4 सहकारी संस्था तथा स्थनिय प्राधिकरण के मामले में काटे गये आयकर की राशि पर कोर्इ अधिभार नही उदग्रहीत किया जाएगा।

3.2-5 शिक्षा उपकर- '' आयकर शिक्षा उपकर '' नामक एक अतिरिक्त अतिभार सभी मामले में अधिभार सहित यदि कोर्इ कटौती किए गए कर की राशि पर दो प्रतिशत की दर से उग्रहीत किया जाएगा। उदाहरण के लिए ऐसा कर 100000 रु है और अधिभार 100000 रु है तो दो प्रतिशत का शिक्षा उपकर 1,10000 रु पर संगणित किया जाना है जो 2200 रु होगा।

इसके अतिरिक्त ,कटौती किए गए कर की राशि तथा अधिभार सभी मामलो में एक प्रतिशत दर से आयकर पर माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा उपकर नामक एक अतिरिक्त अधिभार द्वारा बढ़ाया जाएगा । इस तरह पूर्वोदाहरण में जहॉ कटौती किए गए कर की राशि 100000 रु0 है तथा अधिभार 100000रु0 तो दो प्रतिशत का शिक्षा उपकर 2200रु होता हैउक्त माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा उपकर 1,10000 रु पर संगठित किया जाएगा जो 1,100 3 होगा ।इसम ामले में कुल उपकर की राशि 3300रु होगी '' अर्थात 2200रु+1100रु ''

3.3-अग्रिम कर की संगणना के लिए दरे वेतन से स्रोत पर आयकर की कटौती तथा वित वर्ष 2007-08 के दौरान कतिपय मामलो में आयकर का आरोपण

3.3-1 वेतनो से स्रोत पर आयकर की कटौती करने के लिए तथा वित वर्ष 2006-07 के दौरान अग्रिम कर की गणना करने के लिए दरो का इस अधिनियम की प्रथम अनुसूची के भाग 3 में उल्लेख किया गया है। ये दरे उन मामले में भी जहॉ त्वरित करनिर्धारण किया जाना है उदाहरण के लिए वर्तमान आयो पर वित वर्ष 2007-08 के दौरान आयकर आरोपण करने के लिए लागू होने योग्य है अनिवासियो को भारत में उदभूत होने वाले नौवहन मुनाफो का अनुबंधिक कर निर्धारण उक्त वित वर्ष के दौरान भलार्इ के लिए भारत छोड़ रहे लोगो का मूल्यॉकन उन व्यक्तियो का मूल्यांकन जो करवंचन करने के लिए संपति हस्तातरित करने के लिए संभाब्य है लधु अवधियो के लिए गठित निकायो का मूल्यॉकन आदि । दरे निम्नोक्त हैं।

3.3-2 एकल व्यक्तियो के मामले में मूलभूत छूट सीमा को 100000 रु से 1,10000 रु तक बढ़ाया गया है। भारतउ में निवासी 65 वर्ष की आयु से कम की प्रत्येक महिला के लिए छूट सीमा 1,35000 रु से 145000रु तक बढ़ाया गया है। पुनश्च बीते वर्ष के दौर किसी भी समय वर्ष या उससे अधिक के भारत में निवासी प्रत्येक एकल व्यक्ति के लिए छूट सीमा को 185000रु से 195000रु तक बढ़ाया गया है।

उपरोल्लखित लोगो के मामले वित वर्ष 2007-08 के दौरान कर की दरे निम्नोक्त है।

करारोप्य आय आयकर की दरे
एकल व्यक्ति(एकल निवासी महिला तथा निवासी वरिष्ठ नागरिक से भिन्न)एचयूएफ,लोगो के संघ,एकल व्यक्तियो के निकाय तथा कृत्रिम विधिक व्यक्ति भारत मे एकल महिला निवासी व 65 वर्ष की आयु से कम भारत मे निवासी एकल वरिष्ठ नागरिक जो 65 वर्ष की आयु का या से अधिक है
रू1,10,000 तक शून्य शून्य शून्य
रू1,10,001-1,45,000 10 प्रतिशत़ शून्य शून्य
रू145,000-1,50,000 10 प्रतिशत़ 10 प्रतिशत़ शून्य
रू1,50,001-195,000 20 प्रतिशत़ 20 प्रतिशत़ शून्य
रू1,95,000-2,50,000 20 प्रतिशत़ 20 प्रतिशत़ 20 प्रतिशत़
रू2,50,000 से अधिक 30 प्रतिशत़ 20 प्रतिशत़ 30 प्रतिशत़

3.3.3. अधिभार प्रत्येक एकल व्यक्ति,हिन्दू अविभाजित परिवार,लोगो के संघ अथवा एकल व्यक्तियो के निकाय के मामले में अधिभार मात्र वही उदगृ्रहित किया जाएगा जहॉ कुल आय 1000000रू से अधिक होगी।इस प्रयोजन के लिए ऐसी आय पर आयकर अध्याय 8क के अन्तर्गत संगणित आयकर की बट्टाराशि द्वारा घटाया जाएगा। इस प्रकार घटाया गया आयकर तत्पश्चात ऐसे आयकर के दस प्रतिशत की दर से संघ के प्रयोजनो के लिए एक अधिभार द्वारा बढाया जाएगा। यह सुनिश्चित करने के लिए सीमांत राहत उपलब्ध होगी कि अधिभार सहित 1000000रू से उपर आय के अतिरेक पर देय अधिभार सहित आयकर की अतिरिक्त राशि उस राशि क सीमित है जिसके द्वारा आय 1000000 रु0 से अधिक होती है। जैसा कि पैरा 3.1-4 मे दर्शित है।

3.3.4. कृत्रिम विधिक व्यक्ति के मामले में अधिभार आय के सभी स्तरो पर देय आयकर के दस प्रेतशत की दर से उदगृ्रहीत किया जाएगा ।

3.3.5 आयकर अधिनियम के खण्ड 115बक के अन्तर्गत का भारित सीमांत लाभो के मामले में लोगो के प्रत्येक संगठन तथा व्यक्तियो के प्रत्येक निकाय के सम्बन्ध में अधिभार वहॉ 10 प्रतिशत की दर से उदग्रहित किया जाएगा जहॉ सीमांत लाभ 10 लाख रु0से अधिक होगा कृत्रिम विधिक व्यक्ति के मामले में अधिभार सीमांत लाभो की राशि से निरपेक्ष 10 प्रतिशत की दर से उदग्रहित किया जाएगा ।

3.3.6. शिक्षा उपकर- ''आयकर पर शिक्षा उपकर'' नामक एक अतिरिक्त अधिभार सभी मामलो में अधिभार सहित यदि कोर्इ है संगणित कर की राशि पर दो प्रतिशत की दर से उदगृ्रहीत किया जाना जारी रहेगा जैसा। कि पैरा 3.1-6 मे दर्शित है।

इसके अलावा , संगणित कर तथा अधिभार की राशि पर''आयकर पर माध्यमिक तथा उच्चशिक्षा उपकर'' नामक एक अतिरिक्त अधिभार द्वारा जैसा कि पैरा 3.2.5 मे दर्शित है ऐसे आयकर और अधिभार के एक प्रतिशत की दर से बढ़ायी जाएगी।कोर्इ सीमांत राहत नही उपलब्ध होगी।

3.3.7 सहकारी संस्था- प्रत्येक सहकारी संस्था के मामले में इस अधिनियम की प्रथम अनुसूची के भाग तीन के पैराग्राफ ख में आयकर की दरो का उल्लेख किया गया है। दरे निम्नोक्त है:

करारोप्य आय दरे
रू10000 तक 10 प्रतिशत
रू10001-रू20000 20 प्रतिशत
20000 से अधिक 30 प्रतिशत

कोर्इ अधिभार नही उदग्रहीत किया जाएगा। संगणित कर की राशि पर शिक्षा उपकर तथा आयकर पर माध्यमिक तथा उच्चशिक्षा उपकर क्रमश: दो प्रतिशत तथा एक प्रतिशत की दर से उदग्रहीत किया जाएगा।

3.3.8 फर्म- प्रत्येक फर्म के मामले में तीस प्रतिशत की आयकर की दर का इस अधिनियम की प्रथम अनुसूची के भाग 3 के पैराग्राफ ग में तीस प्रतिशत की दर से उल्लेख किया गया है।10 प्रतिशत की दर से अधिभार मात्र ऐसे मामलो मे उदग्रहित किया जाएगा जहॉ फर्म की कुल आय एक करोड रूप्ए से अधिक होती है शिक्षा उपकर संगणित कर, अधिभार सहित, की राशि पर दो प्रतिशत की दर से उदगृ्रहीत किया जाएगा।यह सुनिश्चित करने के लिए सीमांत राहत उपलब्ध होगी कि अधिभार सहित एक करोड रू से उपर आय के अतिरेक पर देय अधिभार सहित आयकर की अतिरिक्त राशि उस राशि क सीमित है जिसके द्वारा आय एक करोड रु0 से अधिक होती है।आयकर अधिनियम के खण्ड 115बक अन्र्तगत करारोप्य सीमांत लाभो के सम्बंध मे सीमांत लाभो से निरपेक्ष कर की राशि क 10 प्रतिशत की दर से अधिभार उदग्रहीत किया जाएगा।

आयकर पर शिक्षा उपकर '' नामक एक अतिरिक्त अधिभार सभी मामले में अधिभार सहित संगणित कर की राशि पर दो प्रतिशत की दर से उग्रहीत किया जाना जारी रहेगा। इसके अलावा कर और अधिभार की ऐसी राशि अधिभार सहित, संगणित कर की राशि के एक प्रतिशत की दर से संगणित ''आयकर पर माध्यमिक तथा उच्चशिक्षा उपकर'' नामक एक अतिरिक्त अधिभार द्वारा और बढ़ायी जाएगी। शिक्षा उपकर के सम्बंध मे कोर्इ सीमांत राहत नही उपलब्ध होगी।

3.3-9-स्थानीय प्रधिकरण-प्रत्येक स्थानिय प्राधिकरण के मामले में आयकर की दर का तीस प्रतिषत की दर से इस अधिनियम की प्रथम अनुसूची के भाग 3 के पैराग्राफ 1 में उल्लेख किया गया है । कोर्इ अधिभार नही उदगृहीत किया जायेगा फिर भी ''आयकर पर शिक्षा उपकर '' तथा ''आयकर पर माध्यमिक तथा उच्चशिक्षा उपकऱ'' की दर में संगणित कर की राशि पर क्रमश: दो तथा एक प्रतिशत वसूला जाएगा । शिक्षा उपकर के सम्बन्ध में कोर्इ सीमान्त राहत नही उपलब्ध होगी ।

3.3-10 कम्पनियॉ -एक कम्पनी के मामले में आयकर की दर का इस अधिनियम की प्रथम अनुसूची के भाग तीन के पैराग्राफ ड में उल्लेख किया गया है।

घरेलू कम्पनी के मामले में ,आयकर की दर कुल आय का तीस प्रतिशत है। संगणित कर मात्र दस प्रतिशत के अधिभार के साथ वहा बढ़ाया जाएगा जहॉ ऐसी घरेलू कम्पनी की आय एक करोड़ रु0 से अधिक होगी ।

घरेलू कम्पनी से भिन्न अन्य किसी कम्पनी के मामले में 31-3-1961 के बाद लेकिन 1-4-1996 से पहले किए गए अनुमोदित करारो के अन्तर्गत सरकार अथवा भारतीय संस्था से प्राप्त रायल्टियो पर पचास प्रतिशत की दर से कर आरोपित किया जाएगा । इसी प्रकार से 24-2-1964 के पश्चात लेकिन 1-4-1976 से पूर्व किए गए अनुमोदित करारो के अन्तर्गत, सरकार अथवा भारतीय संस्थाओ से ऐसी कम्पनियों द्वारा प्राप्त तकनीक सेवाओ के लिए शुल्क पर पचास प्रतिशत की दर से कर अरोपित किया जाएगा । ऐसी कम्पनी की कुल आय के अधिशेष पर कर की दर चालीस प्रतिशत होगी । संगणित कर मात्र ढार्इ प्रतिशत के अधिभार द्वारा वहॉ बढ़ाया जाएगा जहॉ ऐसी कम्पनीयो की कुल आय एक करोड़ रु0 से अधिक होगी।

तो भी यह सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक कम्पनी के मामले में सीमांत राहत अनुमन्य होगी कि एक करोड़ रु0 से उपर आय के आधिक्य पर अधिभार सहित भुगतान योग्य आयकर की अतिरिक्त राशि उस राशि तक सीमित है जिसके द्वारा आय एक करोड़ रु0 से अधिक होती है।ऐसी प्रत्येक कन्पनी के मामले मे जिसकी कुल आय,आयकर अधिनियम के खण्ड 115´ख के अन्र्तगत करारोपण योग्य है और जहॉ ऐसी आय एक करोड़ रु0 से अधिक होती है सीमांत राहत प्रदान की जाएगी ।

सीमांत लाभो के सम्बन्ध में,ऐसीे घरेलू कम्पनी के मामले म,ें सीमांत लाभो की राशि से निरपेक्ष कर की राशि पर दस प्रतिशत की दर से अधिभार उदगृहीत किया जाएगा , । घरेलू कम्पनी से भिन्न अन्य कम्पनी के मामले में, सीमांत लाभों के सम्बन्ध में ,सीमांत लाभों की राशि से निरपेक्ष ,कर की राशि पर दस प्रतिशत की दर अधिभार उदगृहीत किया जाएगा ।

प्रत्येक कम्पनी के मामले में अध्रिभार सहित संगणित आय की राशि पर दो प्रतिशत की दर से ''आयकर पर शिक्षा उपकर'' उदगृहीत किया जाना जारी रहेगा । ऐसी कर की राशि और अघिभार को, आयकर पर माध्यमिक और उच्च शिक्षा उपकर नामक एक अतिरक्त अधिभार्र द्वारा अधिभार सहित संगणित कर राशि के एक प्रतिशत की दर से और बढाया

(खण्ड 2 व प्रथम अनुसूची)

4. कर निर्धारण अधिकारी तथा कतिपय अन्य आयकर प्राधिकारियो की परिभाषा मे स्पष्टीकरणकारी संसोधन

4.1 खण्ड 2के प्रति धारा 7क के उपबन्धो के अनुसार अभिव्यक्ति''करनिर्धारण'' अधिकारी पद को सहायक आयुक्त या उपायुक्त या सहायक निदेशक या उपनिदेशक या ऐसे आय कर अधिकारी जो इस अधिनियम के खण्ड 120 के उपखण्ड 1 या उपखण्ड 2 या इस अधिनियम के किसी अन्य उपबन्ध के अन्तर्गत जारी निर्देशो अथवा आदेशो के द्वारा सम्बन्धित कार्याधिकारक्षेत्र से युक्त है को शामिल करते हुए परिभाषित किया गया है। संयुक्त आयुक्त अथवा संयुक्त निदेशक जो खण्ड 120 के उपखण्ड 4 की धारा ख के तहत निर्देशित है इस अधिनियम के अन्तर्गत एक करनिर्धारण अधिकारी को प्रदत्त अथवा आवंटित सभी अथवा किन्ही शक्तियो अथवा प्रकार्यो का उपभोग अथवा संपादन कर सकता है। आय कर प्राधिकारी अतिरिक्त आयुक्त और अतिरिक्त निदेशक- उक्त परिभाषा में विशिष्ट रुप से नही उल्लखित थे क्योंकि अतिरिक्त आयुक्त तथा अतिरिक्त निदेशक को खण्ड 2 के क्रमश: धारा 2 व 8घ के तहत क्रमश: संयुक्त आयुक्त तथा संयुक्त निदेशक की परिभाषा में शामिल किया गया था । लेकिन पद करनिर्धारण अधिकारी के अर्थ के सम्बन्ध में विधायन के आशय को और अधिक स्पष्ट करने के लिए निम्न ल्ििखत सशोधन वित्त अधिनियम 2007 के जरिए किए गए है।

i-खण्ड 2 की धारा 7क को उक्त धारा में अतिरिक्त आयुक्त को शामिल करने के लिए संसोधित किया गया हैं। यह संसोधन भूतलक्षी प्रभाव ग्रहण करेगा और यह 1 जून 1994 से प्रभावी होगा।

ii- खण्ड 2 की धारा 7ए को उक्त धारा मे अतिरिक्त निदेशक को शामिल करने के लिए संसोधित किया गया है। यह संसोधन भूतलक्षी प्रभाव ग्रहण करेगा तथा यह 1 जून 1999 से प्रभावी होगा ।

iii- खण्ड 2 मे यह प्रावधान करने के लिए धारा झग को अन्र्तस्थापित किया गया है कि ''अतिरिक्त आयुक्त'' का अर्थ खण्ड 117 के उपखण्ड 1 के अन्तर्गत अतिरिक्त आयुक्त,आयकर बनने के लिए नियुक्त व्यक्ति है।यह संसोधन भूतलक्षी प्रभाव ग्रहण करेगा और यह 1 जून 1994 से प्रभावी होगा।

iv- खण्ड 2 में यह प्रावधान करने के लिए धारा आइ0 डी0 को अन्तर्रस्थापित किया गया है कि ''अतिरिक्त निदेशक'' का अर्थ खण्ड 117 के उपखण्ड 1 के तहत अतिरिक्त निदेशक ,आयकर बनने के लिए नियुक्त व्यक्ति है।यह संसोधन भूतलक्षी प्रभाव ग्रहण करेगा अक्टूबर 1996 के प्रथम दिवस से प्रभावी होगा।

v- खण्डं 2 में यह प्रावधान करने के लिए धारा 9ख को अन्तर्रस्थापित किया गया है कि ''सहायक निदेशक'' का अर्थ खण्ड 117 के उपखण्ड 1 के तहत सहायक निदेशक बनने के लिए नियुक्त व्यक्ति है।यह संसोधन भूतलक्षी प्रभाव ग्रहण करेगा और 1 अप्रैल 1988 से प्रभावी होगा।

vi-ऐसे ही संसोधन संपत्ति कर अधिनियम मे यह प्रावधान करने के लिए किए गए हैें कि करनिर्धारण अधिकारी में अतिरिक्त आयुक्त तथा अतिरिक्त निदेशक सम्मिलत होंगे का ।

vii- खण्ड 120 के उपखण्ड 4 की धारा ख का संसोधन यह प्रवधान करने के लिए किया गया है कि करनिर्धारण अधिकारी को प्रदत्त अथवा आवंटित शक्तियो तथा प्रकार्यो का उपभोग तथा संपादन अतिरिक्त आयुक्त द्वारा किया जा सकता है। यह संसोधन का भूतलक्षी प्रभाव ग्रहण करेगा और 1 जून 1994 से प्रभावी होगा ।

viii- खण्ड 120 के उपखण्ड 4 की उपधारा ख का पुन: संसोधन यह प्रावधान करने के लिए किया गया है कि करनिर्धारण अधिकारी को प्रदत्त अथवा आंवटित शाक्तियो तथा प्रकार्यो का उपभोग अथवा संपादन अतिरिक्त निदेशक द्वारा किया जा सकता है।इस संसोधन का भूतलक्षी प्रभाव होगा और यह 1 अक्टूबर 1996 से प्रभावी होगा ।

खण्ड 3, 42 व 83

5. पूॅजीगत परिसम्पतियो के क्षेत्र का विस्तारण

5.1- खण्ड 2 की उपधारा 14 के उपबन्धो के तहत, पूॅजीगत परिसम्पत्त को एक कर निर्धारिती द्वारा धारित ,किसी भी प्रकार की सम्पति चाहे उसके व्यवसाय से, सम्बन्धित हो अथवा नही के अर्थ में परिभाषित किया गया हैं। करनिर्धारिति द्वारा निजी उपयोग के लिए धारित अथवा उस पर निर्भर उसके परिवार के किसी सदस्य द्वारा धारित निजि प्रभाव पूॅजीगत परिसम्पत की परिभाषा के दायरे से बाहर है। वर्तमान में आभूषण एक मात्र ऐसी परिसम्पत हैजो निजि प्रभाव की प्रकृति का है लेकिन पूॅजीगत परिसम्पत की पिभाषा में शामिल है।

5.2- पूूॅजीगत परिसम्पत के क्षेत्रो को विस्तृत करने की दृष्टि से उक्त उपधारा को ऐसी पसिम्पत्तिया जेसे पुरातात्विक संग्रहण, पेटिन्गस, ड्राइंग्स मूर्तियो अथवा पूॅजीगत परिसम्पत में परिभाषित किर्सी कलाकृति को सम्मिलित करने के लिए संसोधित किया गया हे। ये पूॅजीगत परिसम्पतियॉ करनिर्धा्ररण वर्ष 2008-09 से पॅूजीगत लाभ कर आकर्षित करेंगी ।

6- भारत की नयी परिभाषा

6.1- आयकर अिधानियम 1961 के खण्ड 2 (25क) मे भारत की परिभाषा प्रदान की गयी है।इस परिभाषा के अन्र्तगत भारत को खण्ड 6 के प्रयोजन के लिए किसी अवधि के सम्बन्ध में तथा 1-4-1963 में शुरु होने वाले कर निर्धारण वर्ष के लिए कोर्इ कर निर्धारण करने के प्रयोजन से बीते वर्ष मे शामिल किसी अवधि के सम्बन्ध मे अथवा किसी आगामी कर निर्धारण वर्ष के लिए केन्द्रशासित प्रदेशों दादर और नागरहवेली,गोवा,दमन और दीव तथा पांडिचेरी को सम्मिलत करते हुए माना गया है। सम्पति कर अधिनियम 1957 के खण्ड 2 की धारा (टक) मे भारत के लिए ऐसी ही परिभाषा का प्रदान करती हैे।

6.2- भारत द्वारा किए गए दोहरे कर परिहार करार डी0टी0ए0ए0 आयकर अधिनियम 1961 के सापेक्षं भारत की व्यापक परिभाषा प्रदान करता है। अत: भारत की सर्वग्राही परिभाषा प्रदान करने की दृष्टि से वर्तमान परिभाषा ,एक नर्इ परिभाषा द्वारा प्रतिस्थापित की गयी है।जिसके अनुसारं'भारत' का अर्थ भारत का अधिक्षेत्र जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 1 में उल्लखित है,इसका प्रादेशिक जलक्षेत्र ऐसे जल क्षेत्र का निमग्न समुद्रतल तथा उपभूमि ,महाद्वीपीय निमग्न तट,अनन्य अर्थिक परिक्षेत्र और प्रादेशिक जलक्षेत्र,महाद्वीपीय निमग्न तट, विशेष अर्थिक परिक्षेत्र तथा अन्य समुद्री परिक्षेत्र अधिनियम 1976 में उल्लखित अन्य कोर्इ समुद्री परिक्षेत्र और इसके प्रदेश और प्रादेशिक जलक्षेत्र के उपर का वायुक्षेत्र है। भारत की ऐसी ही व्यापक सर्वग्राही परिभाषा सम्पति कर अधिनियम के प्रयोजनो के लिए उक्त अधिनियम के खण्ड 2 की धारा(टक) में संसोधन करके प्रदान की गयी है।

6.3- प्रभावशीलता -ये संसोधन अगस्त 1976 के 25वे दिवस से भूतलक्षी प्रभाव ग्रहण करेगे

खण्ड 3और 83

7- भारत में प्रोदभूत या उदभूत मानी गयी आय

7.1- खण्ड 9 भारत में भारत में प्रोदभूत या उदभूत मानी गयी आय से सम्बन्धित है। करारोपण के स्रोत नियम के तहत देश मे आय पर वही करारोपण किया जाता है जहॉ यह अर्जित की जाती है।देखे वित्त अधिनियम 1976, तकनीकी सेवाओ के लिए क्रमश: व्याज ,रायल्टी और शुल्को से होने वाली आय के सम्बन्ध में उपधाराओ v , vi और vii के अन्र्तस्थापन के जरिए स्रोत नियम को खण्ड 9 में समाविष्ट किया गया ।अन्य बातो के साथ-साथ यह प्रावधान किया गया ,कि जहॉ तकनीकी सेवाओ के लिए ब्याज ,रायल्टी अथवा शुल्को के रुप में राशि एक निवासी भारतीय द्वारा एक अनिवासी को प्रदाय है ऐसी आय को भारत में प्रोदभूत या उदभूत माना जाएगा सिवाय जहॉ तकनीकी सेवाओ के लिए ब्याज ,रायल्टी अथवा शुल्क भारत से बाहर निवासी प्रदायक द्वारा संचालित किसी कारोबार आथवा पेशे से सम्बन्धित है अथवा भारत से बाहर किसी स्रोत से किसी आय के निर्माण अथवा अर्जन के प्रयोजन के लिए है ।

7.2- इस प्रकार ,एक वैधानिक परिकल्पना का सृजन किया गया जिसके द्वारा करारोपण के स्रोत नियम के आधार पर तकनीकी सेवाओ के लिए ब्याज ,रायल्टी ,और शुल्को को करदायरे में लाया गया । अत: ,सेवाओ के स्थान से निरपेक्ष ,कराधिकार क्षेत्र को प्रदायक के स्थान अथवा सेवाओ के उपभोग स्थल के अनुसार निर्धारित किया जाएगा । उक्त उपबन्धो के अर्थ में भारत में प्रोदभूत या उदभूत मानी जाने वाली आय को वास्तव में भारत में प्रोदभूत या उदभूत होना नही है। भारत के दोहरे करारोपण परिहार करारो में भी स्रोत नियम को मान्यता प्रदान किया गया है। पुन: ,खण्ड 5, जो कुल आय का दायरे को परिभाषित करता हैं वो इस अधिनियम के खण्ड 9 सहित अन्य उपबंधो के अधीन है तथा खण्ड 9 के अर्थो में प्रोदभूत या उदभूत मानी गयी आय खण्ड 5 के अन्र्तगत अच्छादित हो जाती है।

7.3-हालिया न्यायिक मत ने धारित किया है कि उक्त सेक्सन में कल्पित परिकल्पना के बावजूद ऐसी किसी कल्पित आय के भारत में कारदायी होने के लिए ,ऐसी आय और भारत के प्रदेश के बीच पर्याप्त प्रादेशिक सम्पर्क होना जरुरी है। यह धारित किया गया है कि जहॉ कोर्इ राशि एक निवासी द्वारा एक अनिवासी को प्रदाय है उक्त खण्ड 9 का कल्पित प्रभावक्षेत्र भारत के बाहर अर्पित सेवाओ के लिए भारतीय संस्था से भारत से बाहर प्राप्त एक अनिवासी की किसी आय को करदायरे में नही ला सकता है। तकनीकी सेवाओ के लिए शुल्कों के सम्बन्ध में ,यह विशेष रुप से धारित किया गया है कि भारत में करयोग्य शुल्कों के लिए सेवाओं का भारत में किसी कारोबार में उपयोग होना ही आवश्यक नही है बल्कि भारत में अर्पित होना भी आवश्यक है।

7.4. उपरोक्त न्यायिक मत के आलोक में , उक्त धाराओ के समावेशन के सम्बन्ध मे विधायिका के आशय को एक बार और दोहराने की आवश्यकता महसूस की गयी । तदनुसार , खण्ड 9 मे यह स्पष्ट करने के लिए एक व्याख्या को अन्र्तस्थापित किया गया है कि जहॉ खण्ड 9 के उपखण्ड 1 की धारा 5, 6 और 7 के तहत आय को भारत मे प्रोदभूत तथा उदभूतं होने वाला माना जाता है वहॉ ऐसी आय को अनिवासी की कुल आय मे सम्मिलित किया जाएगा,चाहे भले ही अनिवासी का भारत में आवास अथवा व्यवसायिक स्थल अथवा व्यायवसायिक सम्पर्क ह।ैअत: ऐसे मामलों में ,उक्त धाराओ के अन्तर्गत अनिवासी को प्रोदभूत तथा उदभूतं मानी गयी आय तथा भारत के प्रदेश के बीचर् प्रादेशिक सम्पर्क स्थापित करने की कोर्इ आवश्यकता नही होगी ।

7.5. प्रभावशीलता-यह संसोधन का 1 जून 1976 से भूतकालिक प्रभाव ग्रहण करेगा।

खण्ड 5

8. किसी आपदा के कारण क्षतिपूर्ति के लिए छूट

8.1-हाल के वर्षों मे भारत अनेक प्राकृतिक तथा मानव निर्मित आपदाओ की बाढ से प्रभावित हुआ है। ऐसी आपदाओं के अनुसरण में पीड़ितो और उनके परिवारों को केन्द्रीय और राज्य सरकारो तथा स्थानीय प्राधिकरणों द्वारा मुआवजा अनुदत्त किया गया है।

8.2 अनुदान ग्राहको को प्राप्त ऐसी क्षतिपूर्ति राशियों की करदायकता के सम्बन्ध मे वर्तमान विधियों के अन्तर्गत अस्पष्टता बनी हुर्इ है। ऐसी अस्पष्टता का निवारण करने के लिए तथा ऐसे मुआवजे को आयकर से वर्गीय आधार पर मुक्त करने के लिए एक नर्इ धारा 10 खग को खण्ड 10 में अन्तर्रस्थापित किया गया है।यह धारा प्रावधान करती है कि किसी आपदा के कारण क्षतिपूर्ति के रूप मे किसी व्यक्ति अथवा उसके वैधानिक उत्तरािधाकारी द्वारा केन्द्र सरकार अथवा राज्य सरकार अथवा स्थानिय प्राधिकरण से प्राप्त प्राप्य कोर्इ राशि कर मुक्त होगी । किन्तु यह किसी व्यक्ति अथवा उसके वैधानिक उत्तराधिकारी द्वारा प्राप्त अथवा प्राप्य राशि जिसमे आयकर अधिनियम के अन्तर्गत ऐसी आपदा द्वारा कारित नुकसान अथवा क्षति के कारण कटौती की अनुमति प्रदान किया गया है,अपवर्जित करता है।

8.3- इस हेतु पद '' आपदा '' का वही अर्थ होगा जैसा कि इसे आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 -2005 का 53 वॉ- के खण्ड 2 की धारा घ के अन्तर्गत प्रदान किया गया है। उक्त धारा घ के तहत ''आपदा'' का अर्थ प्राकृतिक अथवा मानव निर्मित कारणों अथवा दुर्घटना या उपेक्षा से उत्पन्न कोर्इ विभीषिका,अनिष्ट,दैविय आपदा अथवा किसी क्षेत्र में गंभीर घटना है जिसका परिणाम मानव जीवन की गंभीर क्षति अथवा मानव पीड़ा, अथवा संपत्ति की क्षति और विनाश अथवा पर्यावरण का हृास या क्षति होता है और ऐसी प्रकृति अथवा आयाम की होती है कि इसका सामना करना प्रभावित क्षेत्र के समुदाय की क्षमता से परे होता है।

8.4- प्रभावशीलता - यह संसोधन अप्रैल 2005 के प्रथम दिवस से भूतकालिक प्रभाव ग्रहण करेगा और तदनुसार करनिर्धारण वर्ष 2005-06 तथा आगामी कर निर्धारण वर्षो के संबन्ध में लागू होगा ।

खण्ड 6

9- राज्य पोषित वित्तय संस्थाओ द्वरा जारी अधिसूचित बंधपत्रो पर व्याज के लिए छूट

9.1- खण्ड 10 की धारा 15 की उपधारा vii के वर्तमान उपबन्धो के अन्तर्गत स्थानीय प्राधिकरण द्वारा जारी और केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिकारिक गजट में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट बंधपत्रो पर व्याज आयकर से मुक्त है।

9.2- राज्य पोषित वित्त संस्थाओ को नगर विकास मंत्रालय द्वारा अधिसूचित मार्गदश्र्ाी सिद्धांतो के अनुसार पोषित वित्त विकास योजना के लिए नगरीय स्थानीय निकायो की ओर से ऋण पत्र जारी करने के लिए स्थापित किया गया है।

9.3- ऐसे बंधपत्रों पर ब्याज आयकर अधिनियम के अन्तर्गत कर मुक्त नही है। पोषित वित्त प्रणाली के जरिए नगरीय आधार संरचना में पूॅजीगत निवेश के निमित्त निधियां उगाहने हेतु नगरीय स्थानीय निकायो को सक्षम बनाने के लिए,खण्ड 10 की धारा 15 की उपधारा vii मे यह प्रावधान करने के लिए संसोधन किया गया है कि एक राज्य पोषित वित्त संस्था द्वारा जारी तथा केन्द्रिय सरकार द्वारा अधिकारिक गजट में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट बंधपत्रो पर ब्याज आयकर से मुक्त होगी । उक्त उपधारा में एक व्याख्या के रुप में राज्य पोषित वित्त संस्था का ऐसी संस्था के अर्थ मे परिभाषित किया गया है जो नगर विकास मे केन्द्र सरकार द्वारा अधिसूचित मार्गदश्र्ाी सिद्धांतो के अनुसरण में पोषित वित्त विकास योजना के लिए स्थापित है।

9.4-प्रभावशीलता- यह संसोधन अप्रैल 2008 के प्रथम दिवस से भूतलक्षी प्रभाव ग्रहण करेगा और तदनुसार करनिर्धारण वर्ष 2008 तथा आगामी कर निर्धारण वर्षो के सम्बन्ध में लागू होगा ।

खण्ड 6

10- ए0एस0ओ0एस0ए0आर्इ0-सचिवालय की आय के लिए छूट

10.1- खण्ड 10 की धारा 23खखघ के तहत सोसाइटीज पंजीकरण अधिनियम 1860 के अन्र्तगत ए0एस0ओ0एस0ए0आर्इ0-सचिवालय के रुप में पंजीकृत सर्वोच्च अंकेक्षण संस्थाओ के एशियार्इ संगठन कोर्इ आय अप्रैल 2001 के प्रथम दिवस से प्रांरभ और मार्च 2008 के 31 वे दिवस को समाप्त होने वाले कर निर्धारण वर्ष से संगत पिछले सात वर्षो के लिए कर मुक्त है।

10.2- इस प्रतिष्ठित निकाय के अध्यक्ष के रुप में भारत के अर्थ को तीन वर्षो तक के लिए विस्तारित किया गया है। इसी के आलोक मे तीन कर निर्धारण वर्षो की आगामी अवधि के लिए ंऐसीे छूट को विस्तारित करने के निमित्त उक्त धारा का संसोधन किया गया है। तदनुसार , ऐसी छूट अब अप्रैल 2001 के प्रथम दिवस से प्रारम्भ और मार्च 2011 के 31 वे दिवस को समाप्त होने वाले कर निर्धारण वर्षो से संगत पिछले दस वर्षो की अवधि के लिए उपलब्ध होगी ।

10.3-प्रभावशीलता-यह संसोधन अप्रैल 2008 के प्रथम दिवस से प्रभावी होगा और तदनुसार कर निर्धारण वर्ष 2008-09 और 2010 -11 के सम्बन्ध में लागू होगा।

खण्ड 6

11- केद्रिय विद्युत नियामक आयोग की आय के लिए छूट

11.1- खण्ड 10 में एक नर्इ धारा 23खखछ यह प्रावधान करने के लिए अन्र्तस्थापित की गर्इ है कि विद्युत अधिनियम 2003 के खण्ड 76 के उपखण्ड 1 के तहत गठित केन्द्रीय विद्युत नियामक आयोग को कोर्इ आय करमुक्त होगी ।

11.2- प्रभावशीलता- यह संसोधन अप्रैल 2008 के प्रथम दिवस से प्रभाव ग्रहण करेगा और तदनुसार करनिर्धारण वर्ष 2008-09 और आगामी कर निर्धारण वर्षो के सम्बन्ध में लागू होगा।

खण्ड 6

12- आदेशित प्राधिकरण द्वारा अनुमोदन की शक्ति से कतिपय धर्मार्थ या धार्मिक न्यासों या संस्थाओ की अधिसूचना की शक्ति का प्रतिस्थापन

12.1- खण्ड 10 की धारा 23ग की उपधारा iv और v के अन्तर्गत उल्लखित निधियो ,न्यासों और संस्थाओं की आय कर से मुक्त है यदि वे केन्द्र सरकार द्वारा अधिसूचित है।उपधारा 4 चैरिटेबल प्रयोजनो के लिए स्थापित किन्ही निधियो अथवा संस्थानो से सम्बिन्ध्त है जिनका सारे भारत मे या किसी राज्य या राज्यो मे प्रभाव है।उपधारा v पूर्णतया सावर््रजनिक धार्मिक प्रयोजनो के लिए अथवा पूर्णतया सावर््रजनिक धार्मिक तथा धर्मार्थ प्रयोजनो के लिए किसी निधि(किसी अन्य वैधानिक आवश्यकता सहित) अथवा संस्थान से सम्बन्धित है।

12.2- क्योंकि छूट का दावा करने के प्रयोजन के लिए केन्द्रसरकार द्वारा केन्द्रीकृत अधिसूचना की वर्तमान प्रणाली को समय नष्ट करने वाला और बोझिल पाया गया अत: ऐसी प्रकिया को सूचारू बनाने की आवश्यकता को महसूस किया जाने लगा। आदेशित प्राधिकारी द्वारा अनुमोदन की एक नइर््र प्रणाली से केन्द्रसरकार द्वारा अधिसूचना की ऐसी प्रणाली को प्रतिस्थापित करने के लिए तदनुसार उक्त उपधाराओं को संसोधित किया गया है। आदेशित प्राधिकारी, केन्द्रिय परिषद,प्रत्यक्षकर द्वारा इस प्रयोजन के लिए पदासीन मुख्य आयुक्त आयकर अथवा महानिदेशक आयकर होगा। स्थानीय प्राधिकारीयों को केन्द्रसरकार की शक्तियो के इस विकेन्द्रीकरण के साथ उक्त धाराओ के अन्र्तगत छूट के लिए कोर्इ ्रअधिसूचना केन्द्र सरकार द्वारा 01-07-2007 को अथवा उसके पश्चात नही जारी की जाएगी।

12.3 खण्ड 143 के उपखण्ड 3 के प्रथम परन्तुक के उपखन्ड ii मे खण्ड 10 की धारा 23 ग के दूसरे परन्तुक,नौवे परन्तुक तथा तेरहवें परन्तुक मे अनुवर्ती संसोधन किए गए है।इन संसोधनो के जरिए आदेशित प्राधिकारी द्वारा अनुमोदन का एक संदर्भ उक्त उपधाराओ के अन्तर्गत जारी अधिसूचनां के अतिरिक्त सम्मिलत किया गया है। पूर्वोेक्त संसोधन को प्रभावी बनाने के लिए एक नये परन्तुक को 15 वे परन्तुक के बाद अन्र्तस्थापित किया गया है जो यह प्रवधान करता है कि 1 -7-2007 के प्रथम दिवस से पूर्व उक्त उपधाराओ iv अथवा v के अन्तर्गत जिसके सम्बन्ध मे कोर्इ अधिसूचना नही जारी की गयी है वे उस दिन से आदेशित प्राधिकारी को हस्तान्तरित रहेंगे और आदेशित प्राधिकारी ऐसे अवेदनो के साथ उस चरण से जिस पर वे उस दिन थे उन उपधाराओ के अन्तर्गत आगे बढ़ सकता है। देखे अधिसूचना एस0 ओ0 850÷ दिनांकित 30 मर्इ 2007, आयकर अधिनियम 1962 का सम्बधिंत नियम 2सी0 को प्रक्रिया में उपरोक्त परिवर्तन को प्रतिबिम्बत करने के लिए संसाेिधत किया गया।पुन:श्च, अवलोकन करे अधिसूचना एस0 ओ0 851ड दिनांकित 31 मर्इ 2007, कतिपय मुख्य आयुक्तो तथा महानिदेशको को केन्द्रिय परिषद,प्रत्यक्षकर द्वारा 1-6-2007 से प्रभावशीलता के साथ खण्ड 10 की धारा 23ग की उपधारा iv और v के प्रयोजनो के लिए आदेशित प्राधिकारी के रुप में कार्य करने के लिए प्राधिकृत किया गया ।

12.4- खण्ड 296 में यह प्रावधान करने के लिए अनुवर्ती संसोधन किया गया है कि खण्ड 10 की धारा 23ग की उपधारा iv के अन्तर्गत जून 2007 के प्रथम दिवस से पूर्व जारी प्रत्येक अधिसूचना विनिर्दिष्ट अवधी के अन्दर संसद प्रत्येंक सदन के सामने रखी जाएगी ।

12.5- प्रभावशीलता ये संसोधन जून 2007 के प्रथम दिवस से प्रभावी होगे।

खण्ड 6और 47 और 83

13- कमोडिटी एक्सचेंजो द्वारा स्थापित निवेशक संरक्षा निधियो की कतिपय आयो के लिए छूट

13.1- खण्ड 10 की धारा 23 डक के अन्तर्गत भारत में मान्यता प्राप्त स्टाक एक्सेंजो द्वारा संयुक्त अथवा पृथक रुप से स्थापित अधिसूचित निवेशक संरक्षा निधियो के सदस्यों तथा मान्यता प्राप्त स्टाक एक्सचेंजो से प्राप्त सहयोग राशियों के रुप में कोर्इ आय आयकर से मुक्त है ।

13.2- आयकर अधिनियम के अन्तर्गत कमोडिटी एक्सचेंजो की निवेशक संरक्षा निधियॉ यद्यपि वे एक समान रखे जाते है ऐसी छूटों का भोग नही कर पाते है इसलिए वर्तमान में मान्यता प्राप्त स्टाक एक्सचेंजो द्वारा स्थापित निवेशक संरक्षा निधियों को प्राप्त छूटो की तरह कमोडिटी एक्सचेंजो द्वारा स्थापित निवेशक संरक्षा निधियो को छूट प्रदान करने की आवश्यकता अनुभव की गयी। तदनुसार खण्ड 10 में एक नयी धरा 23 डक को भारत में संयुक्त अथवा पृथक रुप से कमोडिटी एक्सचेंजो द्वारा ऐसे निवेशक संरक्षा निधियो के सदस्यो तथा कमोडिटी एक्सचेंजो से प्राप्त सहयेाग राशियो के रुप में किसी आय के लिए जैसा की केन्द्रीय सरकार अधिकारीक गजट में अधिसूचना द्वारा इस सम्बन्ध में उल्लेख कर सकती है अन्र्तस्थापित की गया है यह संसोधन कमोडिटी एक्सचेंजो के निवेशक संरक्षा निधियों को निवेशको के कल्याण से सम्बन्धित गतिविधिया चलाने के लिए पर्याप्त निधियो का प्रबन्ध करने के लिए सक्षम बनाएगा ।

13.3 - पुनश्च जैसा की धारा 23 ड क ेमे अनुबन्धित है नर्इ धारा मे यह प्रावधान किया गया है कि जहॉ कोर्इ राशि उक्त निधी के ़ऋण के रुप में तथा किसी बीते वर्ष में आयकर से भारित नही है कोर्इ पूर्णतया या आशिक रुप से एक कमोडिटी एक्सचेंज के साथ साझी है इस तरह से साझा की गयी सम्पूर्ण राशि पिछले वर्ष की आय के रुप में मानी जाएगी जिसमें यह राशि इस प्रकार से साझी की गयी और तदनुसार आयकर द्वारा ्रभारित होगी । कमोडिटी एक्सचेंज को व्याख्या मे एक पंजीकृत संगठन का अर्थ प्रदान करने के लिए परिभाषित किया गया है जैसे कि अग्रिम संविदा विनियमन अधिनियम 1952? के खण्ड 2 की धारा ञञ में परिभाषित है।

13.4- प्रभावशीलता यह संसोधन अप्रैल 2008 के प्रथम दिवस से प्रभावी होगा और तदनुसार कर निर्धारण वर्ष 2008-09 तथा आगामी करनिर्धारण वर्षो के सम्बन्ध में लागू होगा ।

खण्ड 6

14 - उद्यम पूॅजी कम्पनी अथवा उद्यम पूॅजी फंड की कतिपय आय के लिए छूट ।

14.1- खण्ड 10 की धारा 23चख उद्यम पूॅजी में निवेश हेतु फंड उगाहने के लिए स्थापित उद्यम पूॅजी कम्पनी अथवा उद्यम पूॅजी निधि की किसी आय के सम्बन्ध मे छूट का प्रावधान करती है। ऐसे उद्यम पूॅजी उपक्रम को धारा 23चख की व्याख्या 1 की धारा ग में सिक्योरिटीज एन्ड एक्सचेंज बोर्ड आफ इन्डिया अधिनियम 1992 के अन्तर्गत किए गए तथा इस धारा के प्रयोजनो के लिए बोर्ड द्वारा अधिकारिक गजट में इस प्रकार अधिसूचित तथा सिक्योरिटीज एन्ड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इन्डिया ''उद्यम पूॅजी निधियॉ '' विनियमन 1996 में उल्लखित उद्यम पूॅजी उपक्रम का अर्थ प्रदान करने के लिए परिभाषित किया गया है।

14.2- कर लाभ को और अधिक लक्ष्यकेन्द्रित बनाने की दृष्टि से तथा आधारिक जोखिम पूर्ण क्षेत्रो में वर्तमान तथा भावी निवेशो को और अधिक मोडने के लिए धारा 23 चख को संसोधित किया गया है जिसके अनुसार ऐसी छूट केवल अब उद्यम पूॅजी उपक्रम में निवेश से उद्यम पॅूजी कम्पनी अथवा उद्यम पॅूजी निधि की आय के सम्बन्ध मे उपलब्ध होगी।इस प्रयोजन के लिए व्याख्या 1 की उक्त धारा मे उद्यम पूॅजी उपक्रम को ऐसी घरेलू कम्पनी के रूप मे परिभाषित किया गया है जिसके शेयर भारत मे किसी मान्यता प्रान्त स्टॅाक एक्सचज मे अनुसूचित नही है तथा जो निम्नलिखित कें व्यवसाय मे संलग्न है

i व्यवसाय मे

अ- नैनो तकनीक

ब- हार्डवेयर और साफटवेयर विकास से सम्बन्धित सूचना तकनीक

स- बीज शोध एवं विकास

द- जैव तकनीक

र्इ- औषध निर्माण क्षेत्रक में नए रसायनिक पदार्थो का शोध एवं विकास

फ- जैव र्इधन का उत्पादन

ग- सुसंहत होटल -सह-सम्मेलन केन्द्र जिसमे तीन हजार से ज्यादा लोगो के बैठने की व्यवस्था हो का निर्माण तथा संचालन

छ- खण्ड 80-झक के उपखण्ड 4 की धारा 1 की व्याख्या में परिभाषित किसी आधारिक संरचना का

विकास या संचालन तथा देखभाल अथवा विकास, संचालन तथा देखभाल

अथवा

ii- डेरी या कुक्कुट पालन उद्योग

14.3- प्रभावशीलता यह संसोधन अप्रैल 2008 के प्रथम दिवस से प्रभावी होगा तथा तदनुसार करनिर्धारण वर्ष 2008-09 तथा आगामी कर निर्धारण वर्षो के सम्बन्ध में लागू होगा।

खण्ड 6

15. विशेष आर्थिक परिक्षेत्र में मात्र नर्इ इकाइयो के लिए कर लाभ।

15.1-आयकर अधिनियम का खण्ड 10कक प्रावधान करता है कि विशेष आर्थिक परिक्षेत्र में स्थित र्इकार्इ से

होने वाली किसी उद्यमी की कुल आय की संगणना में निम्न लिखित कटौतियॉ अनुमत होगी ।

i- उस वर्ष से प्रारम्भ करके जिसमे ऐसा व्यवसाय शुरु हुआ पॉच क्रमिक कर निर्धारण वर्षो की अवधि के लिए पात्र व्यवसाय में किए गए निर्यातो से उत्पन्न लाभ तथा प्राप्तियो का सौ प्रतिशत।

ii- आगामी पॉच कर निर्धारण वर्षो के लिए ऐसे लाभो तथा प्राप्तियो का पचास प्रतिशत।

iii- बीते वर्ष के लाभ -हानि खाते से निकाली गर्इ राशि लाभ के 50 प्रतिशत से अधिक नही जिसके सम्बन्ध में कटौती को अनुमत किया जाना है तथा अगले पॉच क्रामिक करनिर्धारण वर्षो के लिए व्यवसाय के प्रयोजनो के लिए विनिर्दिष्ट तरीके से सृजित और प्रयोज्य किए जाने के लिए आरक्षित खाते में जमा किया जाना है।

15.2- उक्त खण्ड के उपखण्ड 4 में शामिल वर्तमान उपबन्धों के अन्तर्गत प्रावधान किया जाता है कि खण्ड 10 कक किसी भी उपक्रम पर चाहे वह र्इकार्इ हो लागू होने योग्य है जिसने या जो किसी एस0 इ0 जैड0 में अप्रैल 2006 के प्रथम दिवस से अथवा बाद में शुरु होने वाले कर निर्धारण वर्ष से सन्गत बीते वर्ष के दौरान सामग्री या वस्तुओ का विनिर्माण या उत्पादन अथवा सेवाएॅ प्रदान करना शुरु किया है या शुरु करती है।

15.3- इस तथ्य पर विचार करके कि विशेष आर्थिक क्षेत्रो का उददेश्य नए उद्योगो तथा नए निवेशो को बढ़ावा देना है न कि कर रियायतो का फायदा उठाने के लिए वर्तमान उद्योगो के प्रव्रजन की सुविधा प्रदान करना ,खण्ड 10 कक के उपखण्ड 4 को यह प्रावधान करने के लिए प्रतिस्थापित कर दिया गया हैं कि खण्ड 10कक किसी भी उपक्रम पर लागू होने योग्य है भले ही वह कोर्इ र्इकार्इ हो जो निम्नलिखित सभी शर्तो को पूरा करता है। नामत:

i-जो किसी एस0इ0जैड0 में अप्रैल 2006 के प्रथम दिवस से अथवा बाद में शुरु होने वाले कर निर्धारण वर्ष से सम्बन्धित बीते वर्ष के दौरान सामग्री या वस्तुओं का विनिर्माण या उत्पादन करना अथवा सेवाएं प्रदान करना शुरु कर चुकी है या करती है।

ii- जो पहले से ही वर्तमान किसी व्यवसाय से पृथक्क करके अथवा पुर्नगठन द्वारा गठित नही है तथा

iii- जो किसी प्रयोजन के लिए पहले से प्रयुक्त मशीनरी या प्लांट के एक नए व्यवसाय को हस्तारण से नही बनी है।

15.4- ii में दी गर्इ शर्ते ऐसे किसी उपक्रम चाहे वह र्इकार्इ हो के सम्बन्ध में नही लागू होगी जो ऐसे किसी उपक्रम जैसा कि खण्ड 33ख में उन परिस्थितियो तथा उस खण्ड में विनिर्दिष्ट अवधि के अन्दर उल्लखित है, के व्यवसाय के करनिर्धारिती द्वारा पुर्नस्थापन, पुर्नगठन अथवा पुर्नजीवन के परिणाम स्वरुप बनी है

15.5- iii में दी गयी शर्तो की तंष्टि सुनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए खण्ड 80झक के उपखण्ड 3 की व्याख्या 1 तथा व्याख्या 2 लागू होगी।

15.6-प्रभावशीलता- यह संसोधन फरवरी 2006 के 10 वें दिवस से भूतलक्षी प्रभाव ग्रहण करेगा।

खण्ड 7

16- सृजन अथवा स्थापना के एक वर्ष के अन्दर धर्मार्थ या धार्मिक न्यासो या संस्थाओं के लिए पंजीकरण हेतु आवेदन करने की आवश्यकता का प्रतिस्थापन

16.1-खण्ड 11 और 12 धर्मार्थ या धार्मिक न्यासो या संस्थाओं की आय के सम्बन्ध में छूट अनुदत्त करते हैं। ऐसी छूट का दावा करने के लिए,अन्य बातो के साथ-साथ न्यास अथवा संस्थान को अपने सृजन अथवा स्थापना की तिथि से एक वर्ष के अन्दर पंजीकरण के लिए आयुक्त को निर्धारित प्ररूप में तथा निर्धारित ढ़ग से खण्ड 12क की धारा ''क'' के अन्तर्गत आवेदन करने की आवश्यता है और ऐसे न्यास अथवा संस्थान के लिए खण्ड 12कक के अन्तर्गत पंजीकृत होना भी जरुरी है

16.2- जहॉ ऐसा आवेदन एक वर्ष के पश्चात किया जाता है आयुक्त के पास ऐसी देरी को नजरअंदाज करने की शक्ति है यदि उसे संतुष्ट किया जाता है कि न्यास अथवा संस्था को पर्याप्त कारणो से विनिर्दिष्ट समय सीमा के अन्दर आवेदन करने से रोका गया । यदि आयुक्त को इस प्रकार संतुष्ट किया जाता है तो खण्ड 11 व 12 के अन्तर्गत ऐसे न्यास अथवा संस्थान के लिए न्यास के सृजन अथवा संस्थान की स्थापना की तिथि से छूट लागू होगी। लेकिन जहॉ आयुक्त इस प्रकार नही संतुष्ट होता है, वहॉ छूट मात्र उस वित्तिय वर्ष के प्रथम दिवस से लागू होगी जिसमे आवेदन किया जाता है।

16.3-धर्मार्थ या धार्मिक न्यासो अथवा संस्थानो के पंजीकरण के सम्बन्ध में प्रकिया को सुचारु बनाने की जरुरत को महसूस किया गया ह।ै ऐसे इरादे के साथ विषय में उपरोक्त धारा क को 1-6-2007 से पूर्व किए गए आवेदनो के सम्बन्ध में इसकी प्रभावशीलता को निषिद्व करके खत्म कर दिया गया है यह प्रावधान करने के लिए खण्ड 12क में एक नयी धारा कक के अन्तर्रस्थापित किया गया है कि खण्ड 11 या 12 के उपबन्ध न्यास अथवा संस्थान के सम्बन्ध में तब तक नही लागू होगे जब तक आय ग्राही व्यक्ति ने जून 2007 के प्रथम दिवस को अथवा बाद में निर्धारित प्रपत्र तथा निर्धारित ढंग सें पंजीकरण के लिए आयुक्त को आवेदन न किया हो और ऐसे न्यास अथवा संस्थान खण्ड 12कक के अन्तर्गत पंजीकृत न हो।

16.4- इसके अतिरिक्त खण्ड 12क को खण्ड 12क के उपखण्ड 1 के रूप में पुर्नांकित किया गया है और नया उपखण्ड 2 खण्ड 12क में यह प्रावधान करने के लिए अन्र्तस्थापित किया गया है कि जहॉ कोर्इ आवेदन जून 2007 के प्रथम दिवस को अथवा बाद में किया जाता है। वहॉ खण्ड 11 व 12 के उपबन्ध ऐसे न्यास अथवा संस्थान की आय के सम्बन्ध में उस वित्तिय वर्ष जिसमें ऐसा आवेदन किया जाता है कि तत्काल बाद के कर निर्धारण वर्ष से लागू होगे।

16.5- उपरोक्त संसोधनो के साथ ,किसी न्यास अथवा संस्थान को इसके सृजन अथवा स्थापना की तिथि से एक वर्ष के अन्दर पंजीकरण हेतु आवेदन करने के लिए बाध्य नही किया जाएगा । इस प्रकार , जहॉ कोर्इ आवेदन जून 2007 के प्रथम दिवस को अथवा बाद में किया जाता है वहॉ खण्ड 11 व 12 के उपबन्ध के अन्तर्गत छूट सम्भावी आधार पर उपलब्ध होगी। तदनुसार, वर्तमान में आयुक्त में निहित उस अवधि को निर्धारित करने का विवेकाधिकार जहॉ से छुट लागू होगी और पिछले वर्षो के लिए देरी को नजरंदाज करने की अनुवर्ती शक्ति प्रतिस्थापित रहेगे।

16.6- खण्ड 12कक के उपखण्ड 1 व 2 में खण्ड 12क की नवअन्र्तस्थापित धारा कक के अन्तर्गत किये गए न्यास अथवा संस्थान के पंजीकरण के लिए आवेदन का एक संदर्भ शामिल करने के लिए अनुवर्ती संसोधन किए गए है।

16.7- प्रभावशीलता - ये संसोधन जून 2007 के प्रथम दिवस से प्रभावी होगे।

खण्ड 8 और 9

17- कतिपय मामलो में किसी न्यास अथवा संस्थान के लिए अनुमतिप्राप्त निवेशविधि के रूप में अंशो में निवेश की अनुमति

17.1- इस अधिनियम का खण्ड 11(5) छूटो का लाभ उठाने के प्रयोजनो के लिए किसी न्यास अथवा संस्थान केी निधियो का निवेश अथवा जमा करने के अनेक अनुमतिप्राप्त प्रारुपो तथा विधियो का उल्लेख करता है। खण्ड 11(5) की अवशिष्ट धारा xii किसी अन्य प्रारुप अथवा विधि जैसा कि आयकर अधिनियम 1962 के नियम 17 में निर्धारित किया जा सकता है कि अनुमति देता है। नियम 17ग की उपधाराओ iv व v के तहत कतिपय संस्थानो द्वारा कतिपय कम्पनियों के समता अंश पूॅजी में निवेश की अनुमति प्रदान की गर्इ है।

17.2- तो भी खण्ड 13 के उपखण्ड 1 की धारा क की उपधारा iii के अन्तर्गत खण्ड ध अथवा खण्ड 12 के उपबन्धो के तहत छूट किसी न्यास अथवा संस्थान के आय के सम्बन्ध में अनुमत नही है यदि 30-11-1983 के बाद बीते वर्षो के दौरान किसी अवधि के लिए इसके द्वारा किन्ही अंशो को धारित किया जाता है। एक मात्र छूट जो प्रदान की गयी है, वह मात्र सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी में न्यास अथवा संस्थान द्वारा धारित अंशो के लिए है।

17.3- इसकी परिणति एक असमान्य स्थिति मे हुर्इ जहॉ अंशो में निवेश नियम 17 के साथ पठित खण्ड 11 (5)(xii) के अन्तर्गत अनुमति प्राप्त प्रारुप अथवा विधि में अनुमत है जबकि अंशो में ऐसा निवेश खण्ड 13(1)(डी)(iii) के अन्तर्गत निषिद्व है।

17.4- खण्ड 13(1)(डी)(ii) के उपबन्धों का खण्ड 11(5)(xii) के उपबन्धों के साथ सामंजस्य स्थापित करने के दृष्टि से खण्ड 13 के उपखण्ड 1 की धारा घ की उपधारा iii को एक नए उपखण्ड सें प्रतिस्थापित किया गया ह।ै यह उपधारा प्रावधान करती है कि खण्ड 11 व खण्ड 12 के उपबन्ध किसी धर्मार्थ या धार्मिक न्यास अथवा संस्थान की किसी आय के सम्बन्ध में नही लागू होगे यदि बीते वर्ष के दौरान किसी अवधि के लिए नवंबर 1983 के 30 वे दिवस के बाद किसी कम्पनी में किन्ही अंशो को न्यास अथवा संस्थान द्वारा धारित किया जाता है सिवाए

क- सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी में अंश ;

ख - अंश जो खण्ड 11 के उपखण्ड (5) की धारा 12 के अन्तर्गत निवेश के प्ररुप अथवा विधि में निर्धारित है।

17.5 प्रभावशीलता यह संसोधन अप्रैल 1999 के प्रथम दिवस से भूतलक्षी प्रभाव ग्रहण करेगा तथा तदनुसार करनिर्धारण वर्ष 1999-2000 तथा आगामी करनिर्धारण वर्षो के सम्बन्ध में लागू होगा।

खण्ड 10

18- भाड़े के मामले में छूट के सम्बन्ध मे स्पष्टीकरण

18.1-आयकर अधिनियम का खण्ड 15 प्रावधान करता है कि किसी नियोक्ता या पूर्व नियोक्ता द्वारा बीते वर्ष मे कर्मचारी को देय या अदा या अनुमत कोर्इ वेतन या अदा या अनुमत वेतन का कोर्इ बकाया शीर्षक ''वेतनो '' के अन्तर्गत कर दायी है। शब्द 'वेतन' आयकर अधिनियम के खण्ड 17 में परिभाषित किया गया है और इसमे किसी वेतन या पारिश्रमिक के स्थान पर या के अतिरिक्त अनुलाभ या मुनाफे शामिल है। पद''अनुलाभ'' जैसा कि आयकर अधिनियम 1961 के खण्ड 17 के उपखण्ड 2 में परिभाषित है अन्य बातो के साथ-साथ निम्न को सम्मिलित करता है-

i-कर निर्धारिती को अपनी नियोक्ता द्वारा प्रदत्त किराया मुक्त आवास का मूल्य।

ii- कर निर्धारिती को अपनी नियोक्ता द्वारा प्रदत्त किसी आवास से सम्बन्धित किराए के सम्बन्ध में किसी छूट का मूल्य ।

18.2- आयकर विनियमं 1962 का नियम 3 आइ0टी0 अधिनियम के खण्ड 295 द्वारा प्रदत्त शक्तियों के उपभोग में सूत्रबद्ध किया गया है।अन्य बातो के साथ-साथ यह कर्मचारी को नियोक्ता द्वारा प्रदत्त रिहायसी आवास के मूल्यनिर्धारण के लिए पद्धति का प्रावधान करता है। शुरू-शुरू मे नियम 3 का विवेकाधीन पद्धति द्वारा अनुलाभ,रिहायसी आवास की प्रकृति का, के मुल्यॉकन के लिए प्रावधान किया गया थां जो वेतन का निश्चित प्रतिशत होता या उचित बाजार भाड़ा जो भी कम होता। इस पद्वति को बोझिल पाया गया क्योंकि उचित भाडे का आकलन अनेक स्तरो पर मुकदमेबाजी की विषय वस्तु रही थी। तदनुसार अनुलाभमूल्य का निर्धारण करने की प्रक्रिया का 2001 में पूर्वानुमानित पद्धति को अपनाकर सरलीकृत किया गया जिसने प्रावधान किया कि रिहायसी आवास का अनुलाभमूल्य निम्नलिखित तरीके से निर्धारित किया जएगा।

i- केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के कर्मचारियो के लिए अनुलाभ मूल्य कर्मचारियो द्वारा देय लाइसेन्स शुल्क के बराबर होगा।

ii- अन्य कर्मचारियो के मामले में अनुलाभ मूल्य वेतन के दस प्रतिशत के बराबर होगा यदि आवास ऐसे शहर में स्थित है जिसके आवादी 1991 की जनगणना के आधार पर 4 लाख से अधिक है तथा अन्य शहरो के लिए 7.5 प्रतिशत है।

18.3- इस तरह से निर्धारित अनुलाभ मूल्य को कर्मचारी से प्राप्त या कर्मचारी द्वारा अदा राशि यदि कोर्इ हो द्वारा घटाया जाना था। 10 प्रतिशत की दर को 20 प्रतिशत तथा 7.5 प्रतिशत को 15 प्रतिशत बढ़ाकर करने के लिए 2005 में नियम 3 को पुंन: संसोधित किया गया ।पुनश्च: जनसंख्या के आधार को 2001 की जनगणना के अनुसार बदल दिया गया।

18.4- रिहायशी आवास के अनुलाभ मूल्य से सम्बन्धित नियम 3 एस0ओ0 क्र0940(÷) दिनांकित 25-9-2001 द्वारा संसोधित रुप में की संवैधानिक वैधता को अनेक उच्च न्यायालयो के सामने तथा उच्चतम न्यायालय के सामने चुनौती दिया गया।

18.ड माननीय उच्च न्यायालय, झारखण्ड ने टाटा वर्कर्स यूनियन बनाम भारत संध(256 आर्इ0टी0आर0) के वाद में यह धारणा करके कि विरोधित अधिसूचना किसी मनमानी से ग्रस्त नही है क्योंकि हमारे सुविचारित मत में प्रक्रिया को तर्कपूर्ण तथा सरलीकृत करने के लिए परिषद विरोधित अधिसूचना लायी अन्यथा पुराने नियम के अनुसार बोझिल प्रक्रिया के कारण अनेक कठिनार्इयो का सामना करना पड़ रहा था नियम 3 अधिसूचना एस0ओ0 क्र0940(ड) दिनांकित 25-9-2001 द्वारा संसोधित, की वैधता को धारित किया है।

18.6-माननीय सर्वाच्च न्यायालय ने अरुण कुमार बनाम यू0ओ0आइ0 (2006-119-एस0सी0)¿2003 की अपील (दिवानी) 3270À के वाद मे धारित किया कि विनियमो के नियम 3 को मनमाने,भेदभाव पूर्ण तरीके से या पितृ अधिनियम के खण्ड 17(2)(ii) से असंगत नही संविधान के अनुच्छेद 14 के अतिरूप मे यद्यपि धारित नहीं किया जा सकता है तो भी यह उपबन्ध के प्रकृति की है और मात्र नियोक्ता द्वारा अपने कर्मचारी को प्रदत्त किसी आवास से सम्बन्धित भाड़े से छूट के विषय में लागू होती है । चाहे संसद ने वैधानिक शक्ति का उपभोग करते हुए कतिपय परिस्थितियो में(जिसके लिए हम कोर्इ अंतिम मत व्यक्त नही करते है) भाड़े के संबंध में छूट के तौर पर किसी कल्पित परिकलपना का सृजन किया हो या नही, ऐसा कोर्इ कल्पित उपबंध इस अधिनियम में नही पाया जाता है। अत: यह करनिर्धारिती को संतुष्ट करने के लिए काफी है कि कर्मचारियो को नियोक्ता द्वारा प्रदत्त आवास के संबंध में कोर्इ छूट नही उपलब्ध है और यह वाद इस अधिनियम के खण्ड 17(2)(ii) द्वारा अच्छादित नही है।

18.7- इस प्रकार , माननीय उच्चतम न्यायालय ने नियम 3 की वैधता के उपधारण के दौरान , धारित किया है कि 15 प्रतिशत अथवा 20 प्रतिशत की दर को उस मामले में लागू किया जाता है से पहले किसी छूट का तथ्य प्रत्येक मामले में सिद्व किया जाना होगा । उच्चतम न्यायालय का निर्णय सरकार के निर्णय के विपरीत नही था और वास्तव में इसने संकेत किया कि उपाय एक उपबन्ध को अन्र्तस्थापित करना होगा। यदि इस निर्णय को प्रत्येक मामले में लागू किया जाता , तो इसकी परिणती करनिर्धारिती के लिए गंभीर असुविधाओं के रूप मे होती और भाड़े के विषय में छूट के तथ्य के रुप में लंबी खिचाउ कार्यवाहियों का प्रत्येक वाद में विवेकाधीन आधार पर परीक्षण करवाया जाना होता ।

18.8- अत: वित अधिनियम 2007 ने 1-4-2002 अर्थात करनिर्धारण वर्ष 2002-03 तथा आगामी वर्षो से भूतलक्षी प्रभाव के साथ किराए के संबंध में छूट किससे गठित है को परिभाषित करते हुए एक कल्पित उपबन्ध का अन्र्तस्थापन किया। पुनश्च: वेतन भोगी कर्मचारियों को राहत प्रदान करने के लिए ,छूटप्राप्त किराए वाले आवास का मूल्यांकन करने के लिए दर को 1-4-2006 अर्थात कर निर्धारण वर्ष 2006-07 तथा आगामी वर्षो से भूतलक्षी प्रभाव के साथ घटाया गया।

18.9- अब यह प्रावधान किया गया है कि नियोक्ता द्वारा स्वामित्वाधाीन तथा प्रदत्त आवास से संबधिंतं किराए के विषय में छूट को प्रदत्त किया माना जाएगा यदि कर्मचारी से पुन: प्राप्त किराया निम्नलिखित के अन्तर्गत निर्धारित मूल्य की तुलना में कम है-

♦ 25 लाख से ज्यादा आवादी वाले शहरो में स्थित तथा केन्द्रीय सरकार अथवा राज्य सरकार से भिन्न किसी नियोक्ता द्वारा प्रदत्त असुसज्जित आवास के लिए-मूल्यांकन वेतन का 15 प्रतिशत होगा ।

♦ 10 लाख सें अधिक किन्तु 25 लाख से कम आवादी वाले शहरो में स्थित तथा केन्द्रीय सरकार अथवा राज्य सारकार से भिन्न किसी नियोक्ता द्वारा प्रदत्त असुसज्जित आवास के लिए - मूल्यांकन वेतन का 10 प्रतिशत होगा।

♦ किसी अन्य क्षेत्र मे स्थित असुसज्जित आवासो के लिए तथा जो केन्द्रीय सरकार अथवा राज्य सरकार से भिन्न किसी अन्य नियोक्ता द्वारा प्रदान किया जाता है-मूल्यांकन वेतन का 7.5 प्रतिशत होगा।

♦ केन्द्रीय सरकार अथवा राज्य सरकार द्वारा प्रदत्त असुसज्जित आवास के लिए -मूल्यॉकन लाइसेन्स शुल्क होगा ।

♦ असुसज्जित पटटा सम्पत्ति के मामले में मूल्यांकन वेतन का 15 प्रतिशत अथवा पटटा भाडा होगा जो भी कम हो।

♦ यदि फर्नीचर उपलब्ध कराया जाता है, तो वास्तविक भाड़ा शुल्क (यदि फर्नीचर को तृतीय पक्ष से किराए पर लिया जाता है,) अथवा फर्नीचर की लागत कीमत का 10 प्रतिशत (यदि फर्नीचर नियोक्ता के स्वामित्वाधीन है)। जोड़ा जाना है।

♦ यदि किराए का कोर्इ भाग कर्मचारी से पुर्नप्राप्त अथवा कर्मचारी द्वारा अदा किया जा रहा है तो उपरागत मूल्याकंन को उस राशि द्वारा घटाया जाएगा।

♦ जनसंख्या 2001 की जनगणना के अनुसार होगी।

18.10- नियम 3 को तदनुसार संसोधित तथा अधिसूचित किया गया है। देखे एस0 ओ0 1896 दिनांकित 1 नवम्बर 2007।विवेकाधीन पद्वति की तुलना में 2001 में अनुमाानित पद्वति को वरीयता देने के लिए विधायन का कारण कर निर्धारक अधिकारी की विवेकाधिकारी शक्तियों का उन्मूलन करना था। प्रत्येक मामले में उचित बाजार किराया निर्धारित करने की 2001 से पूर्व की प्रणाली कर दाताओ को अत्यधिक असुविधा कारित करते हुए दीर्घकालीक कानूनी लड़ार्इ की ओर ले जाती थी। भूतलक्षी प्रभाव के साथ व्याख्या के अन्र्तस्थापन का उददेश्य ऐसे इरादे का स्पष्टी करण करना था। भूतलक्षी प्रभाव के साथ मूल्यांकन दर को कम करने का उददेश्य कर दाताओ को राहत प्रदान करना है।

18.11 यह अनुभव किया गया ह इस संसोधन के भूतलक्षी प्रभाव के कारण शायद करदाता ले करप्रत्यर्पण के हकदार हो जाएॅगे क्योकि उनके मामले मे किरायामुक्त या रियायती किराया आवास के रूप मे अनुलाभ पर कर, जो कर निर्धारण वर्ष 2006-07 तथा 2007-08 के लिए अभी विधिकृत किया गया ही उसकी तुलना मे उच्चतर दर से काटा गया होगा।इन वषोर््र के लिए वे करदाता जो इन वर्षो के लिए अपने कर प्रतिदान को पहल ही सौंप चुके थे आयकर अधिनियम के खण्ड 154 के अन्र्तगत एक परिशोधन आवेदन दायर करके प्रत्यर्पण का दावा कर सकते है।इस आवेदन मे उस नियोकता को प्रदत्त किरायामुक्त या रियायती किराया आवास से सम्बंिधत निर्धारित अनुलाभ के वर्षवार मूल्य तथा इस पर काटे गए तथा केन्द्र सरकार को अदा कर को प्रमाणित करते हुए नियोक्ता से एक प्रमाणपत्र संलग्न होना चाहिए

18.12. नियम (3) का संशोधन करते समय, उप-नियमों 2, 6, 7(ii), (iv), (v) और (vi) को दोबारा शामिल किया गया। इन उप-नियमों को वित्त-नियम, 2005 में शाामिल नहीं किया गया था, जब अनुशंगी कर-लाभ को लाया गया ताकि उन लाभों पर दोहरा-कर न देना पड़े जिनको अनुशंगी-लाभ के तौर पर लाया जा रहा था। लेकिन आयकर नियम के अध्याय XII-H, जो अनुशंगी कर-लाभ से सम्बन्धित है, जैसे वित्त नियम, 2005, में प्रावधानित है, सभी कर्मचारियों पर लागू नहीं होता। उदाहरण के लिये, व्यक्तिगत, HUF, छूट-प्राप्त ट्रस्ट, सरकारी वगैरह, कर्मचारियों के कुछ उदाहरण हैं, जिन पर अनुशंगी कर लागू नहीं होता। इसके अनुसार, उन उप-नियमों को दोबारा लाया गया है ताकि कर्मचारियों को उन अनुलब्धियों का मूल्यांकन हो सके जो उन्हें उस उपयुक्ता की नियुक्ति के अन्तर्गत मिलती है, जिन पर अनुशंगी लाभ-कर नहीं लागू होता। उप-नियम 7(ix) को अन्तरस्थापित किया गया है ताकि उन मामलों का मूल्यांकन हो सके जहां उपयुक्ता से सम्बन्धित बचे-खुचे मामले हैं, किसी अन्य सुविधा या लाभ से सम्बन्धित। यह उप-नियम 1 अप्रैल, 2008 से लागू होंगे, और इस प्रकार निर्धारण वर्ष 2008-09 और उसके बाद आने वाले वर्षों से लागू होंगे।

(धारा 11)

19. धारा 35 की उप-धारा (2कख) के खण्ड (1) के अन्तर्गत जो भारित कटौती है, उसे पांच वर्षों तक आगे बढ़ाया जाये।

19.1. धारा (35) की उप-धारा (2कख) के खण्ड (1) के वर्तमान प्रावधानों के अनुसार वह कम्पनी जो जैव प्रौद्योगिकी, ड्रग्स के उत्पादन, दवाओं, इलैक्ट्रॉनिक यन्त्र, कम्प्यूटर, दूरसंचार यन्त्र, रसायन या ऐसी कोर्इ वस्तु के उत्पाद से जुड़ी थी जो बोर्ड द्वारा अधिसूचित हो, तो वैज्ञानिक अनुसन्धान पर आय-व्यय (खर्च) की डेढ़-गुना राशि कटौती के रूप में मानी जायेगी, बशर्ते कि जो व्यय है वह भूमि का या इमारत (बिल्डिंग) का व्यय न हो। और यह राशि आन्तरिक अनुसन्धान और विकास सुविधा के रूप में उपयोग होगी जैसा प्राधिकरण द्वारा अनुमोदित हो।

19.2. वर्तमान प्रावधान उस व्यय पर लागू नहीं होते थे जो कम्पनी द्वारा 31 मार्च, 2007 को व्यय किया गया और इस तारीख के बाद अर्जित व्यय पर किसी भी प्रकार की भारित कटौती की अनुमति नहीं थी।

19.3. इस बात को अहसास करते हुये कि शोध और अनुसन्धान को कुछ और सालों के लिये सहायता की आवश्यकता है, वित्त-नियम, 2007 ने कथित उप-धारा के खण्ड (5) में संशोधन करा है, जिससे भारित कटौती (जिसे खण्ड (l) में सन्दर्भित किया गया है) को पांच वर्षों का बढ़ावा मिल गया है, उस व्यय के सन्दर्भ में जो 31 मार्च, 2012 तक किया गया।

19.4. प्रासंगिकता - यह संशोधन 01.04.2008 से लागू होगा और इस प्रकार निर्धारण वर्ष 2008-09 और निर्धारण वष 2012-13 के प्रसंग में लागू होगा।

(धारा 12)

20. अशोध्य और शंकित कर्ज के प्रावधानों के अन्तर्गत कटौती की अनुमति सहकारी बैंकों हेतु, धारा 35(1)(viiक) के अन्तर्गत।

20.1. धारा 36 की उप-धारा (1) के खण्ड (vii) के वर्तमान प्रावधानों के अनुसार, कुल आय की अधिकतम 7.5 प्रतिशत कटौती की राशि (जिसका मूल्यांकन अध्याय vi- के कथित खण्ड के अन्तर्गत कटौती करने से पहले किया गया है) और अनुसूचित व गैर-अनुसूचित बैंकों की ग्रामीण शाखाओं द्वारा किये गए समुचित औसत-अग्रिम राशि का अधिकतम 10 प्रतिशत, कटौती के तौर पर अनुमित था, इन बैंकों की आय का मूल्यांकन करने हेतु। ''अनुसूचित बैंक'' में जैसा कि धारा 36 की उप-धारा (1) के खण्ड (vii) की व्याख्या में परिभाषित है, सहकारी बैंक शामिल नहीं किया जाता था।

20.2. एक सहकारी समिति जो बैंकिंग के कारोबार (सहकारी बैंक) में लगी है, उसके मामले में धारा 80 के अन्तर्गत पहले जो कटौती अनुमित थी, उसे निर्धारण वर्ष 2007-08 से हटा लिया गया है, इन मामलों को छोड़ कर जो प्राथमिक ऋण समिति या प्राथमिक सहकारी कृषि और ग्रामीण विकास बैंक हो।

20.3. क्योंकि धारा 80 के हटाये जाने के बाद सहकारी बैंकों के मुनाफे कर-योग्य हो गये हैं, वित्त-नियम, 2007 ने धारा 36 की उप-धारा (1) खण्ड (vii) के उप-खण्ड () में संशोधन करा है ताकि उस सम्बन्ध में कटौती दी जा सके जहां सहकारी बैंकों हेतु अशोध और शंकित कर्ज का प्रावधान है, प्राथमिक ऋण समिति या प्राथमिक सहकारी बैंक व ग्रामीण विकास बैंक को छोड़ कर।

20.4. अनुसूचित बैंक की परिभाषा, जो खण्ड (ii) के कथित खण्ड (vii) की व्याख्या में दी गर्इ है, उसमें भी संशोधन किया गया है ताकि उस परिभाषा में अनुसूचित बैंकों को शामिल किया जा सके।

20.5. धारा 10 के खण्ड (15) के उप-खण्ड (vi) की विषय-वस्तु (चक) की जो व्याख्या है, उसके अन्तर्गत ''अनुसूचित बैंक'' को इस प्रकार से परिभाषित किया गया था कि उसे वह अर्थ जो धारा 36 की उप-धारा (1) के खण्ड (vii) की व्याख्या जो खण्ड (ii) में है, प्रदान हो, जिसमें अन्य विषयों के साथ, सहकारी बैंक शामिल नहीं हैं। अनुसूचित बैंक की वह निर्दिष्ट परिभाषा जो विषय-वस्तु ( चक ) की व्याख्या में थी, ब्याज पर छूट की अनुमति प्रदान नहीं कर रही थी जो सहकारी बैंक द्वारा अनिवासी या साधारण रूप से जो निवासी नहीं है, उसे दी जाती है। इस स्थिति के अनुकूल चलने के लिए, ''अनुसूचित बैंक'' की जो परिभाषा संशोधन से पूर्व, धारा 36 की उप-धारा (1) के खण्ड (vii) की व्याख्या जो खण्ड (ii) में है, में थी, उसे उल्लिखित विषय-वस्तु ( चक ) की वर्तमान व्याख्या से स्थानापन्न किया जा रहा है, ताकि उल्लिखित विषय-वस्तु ( चक ) के अन्तर्गत कटौती की सीमा को बदला ना जाये।

20.6. ''अनुसूचित बैंकों'' की परिभाषा में जो संशोधन करा गया है, जैसा कि धारा 36 की उप-धारा (1) के खण्ड (vii) में दिखता है, से यह प्रभाव पड़ेगा कि धारा 43 में जो प्रावधान है वह अनुसूचित सहकारी बैंकों पर भी लागू होंगे।

20.7. प्रासंगिकता - यह संशोधन, पूर्वव्यापी रूप से 1 अप्रैल, 2007 से लागू होंगे और इस प्रकार निर्धारण वर्ष 2007-08 और इसके बाद आने वाले निर्धारण वर्षों के सम्बन्ध में लागू होंगे।

(धारा 6 और 13)

21. इन प्रावधानों का परिमयकरण जो धारा 36(1)(viii) के अन्तर्गत विशेष संचय को बनाने और उसे बनाये रखने से सम्बन्धित कटौती के सम्बन्ध में है।

21.1. आयकर नियम, 1961 की धारा 36 की उप-धारा (1) के खण्ड (viii) के वर्तमान प्रावधानों के अनुसार किसी भी विशेष संचय के सम्बन्ध में कटौती की अनुमति थी यदि वह इन उद्देश्यों से बनाये और पोषित किये जा रहे हैं :-

i) एक वित्त-निगम जो औद्योगिक या कृषि विकास या भारत में मूल-भूत सेवाओं के विकास हेतु दीघ्रकालीन वित्त प्रदान कर रहा हो, या

ii) एक सार्वजनिक कम्पनी जो भारत में बनार्इ और रजिस्ट्रीकृत करी गर्इ, जिसका मुख्य उद्देश्य हो कि वह आवास के उद्देश्य से भारत में मकान-निर्माण या उसकी खरीदारी को दीघ्रकालीन वित्त प्रदान करने के कारोबार में हो।

उपर्युक्त खण्ड के अन्तर्गत जो अधिकतम कटौती अनुमित थी, वह उन मुनाफों का 40 प्रतिशत जो दीघ्रकालीन वित्त प्रदान करने के कारोबार से व्युत्पन्न हो रहे थे।

21.2. इस विशेष कटौती के सम्बन्ध में जो प्रावधान थे वह आयकर नियम, 1922 में भी विद्यमान थे और आयकर नियम, 1961 में भी रखे गये। इस कटौती का उद्देश्य था देश में औद्योगिक-विकास को बढ़ावा देना। बाद में वित्त-नियम, 1971 के द्वारा कथित खण्ड के प्रावधानों को बढ़ाया गया, ताकि वह अनुमोदित वित्त-नियम भी इसके दायरे में आ जायें जो भारत में कृषि-विकास को दीघ्रकालीन वित्त प्रदान करने के कार्य में जुटे थे। कथित खण्ड के प्रावधानों में जो उद्देश्य अन्तनिहित था, जैसा पूर्वउल्लिखित विधेयक के प्रावधानों की व्याख्या के ज्ञापन-पत्र में व्याख्यित किया गया है, वह था कि यह वित्त-निगम अपने आन्तरिक संसाधनों को तेज गति जो संचित कर सके और अपनी गतिविधियों की वित्त सहायता के लिये सरकारी अनुदानों से स्वतन्त्र हो जायें।

21.3. इस विशेष कटौती को लाने के बाद और इसका दायरा बढ़ाने के बाद, कम्पनियों पर उच्च कर की घटानाओं में बहुत कमी आ गर्इ है। इस कटौती के लाभ का एक उद्देश्य यह भी था कि वित्त निगम अपनी कम शेयर पूंजि को बढ़ा सके जो पूंजि बाजार में सीमित पहुंच के कारण अभी तक कम थी। उदारीकरण के परिणामस्वरूप, नब्बे के दशक की शुरूआत से, पूंजि-बाजारों में काफी विस्तार और गहरार्इ आर्इ है। पूंजि-बाजारों तक पहुंच में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।

21.4. इस तरह वित्त-नियम, 2007 ने दीघ्रकालीन वित्त प्रदान कराने के कारोबार से जो मुनाफा कमाया जाता है, उप पर कटौती की सीमा 20 प्रतिशती रखी है। यह ध्यान में रखते हुये कि कटौती की जो ऊपरी सीमा का प्रावधान है वह सामान्य संचय और भुगतानित शेयर-पूंजि का दुगना है, कटौती में कमी के स्तर को 20 प्रतिशत करने का प्रभाव यह होगा कि वह लाभ-प्राप्त विशिष्ट कम्पनियों जिस समय अवधि में कटौती का दावा कर सकते हैं, उसमें बढ़ोत्तरी हो जायेगी। इस तरह लम्बे समय में विशिष्ट कम्पनियों पर कृप्रभाव नहीं पड़ेगा।

21.5. विभिन्न-वर्ग की कम्पनियों के लिये इस प्रावधान का पुनर्गठन किया गया है (अब इनमें सहकारी बैंक भी शामिल हैं) और उनकी सम्बन्धित गतिविधियों (कार्यों) में भी जिससे वह कटौती के योग्य बनें। कथित खण्ड के अन्तर्गत कटौती का दावा करने हेतु i) कम्पनी नियम की धारा 4 के अन्तर्गत जो वित्त निगम निर्धारित है या वह वित्त निगम जो एक सार्वजनिक कम्पनी है या बैंकिंग कम्पनी या बैंक है (प्राथमिक कृषि ऋण समिति या प्राथमिक सहकारी कृषि और ग्रामीण विकास बैंक के अलावा) उसे उस कारोबार में लगा होना चाहिये जो भारत में औद्योगिक या कृषि विकास या मूल-भूत सुविधा के विकास के लिये दीघ्रकालीन वित्त प्रदान करती है, ii) एक ऐसी आवास सम्बन्धी वित्त कम्पनी जो आवास के उद्देश्य से भारत में आवास स्थानों के निर्माण या खरीदारी के कारोबार में लगी हो और iii) कोर्इ अन्य वित्त-निगम, सार्वजनिक कम्पनी समेत, जो भारत में मूल-भूत सुविधा के लिये दीघ्रकालीन वित्त प्रदान करने के कार्य में व्यस्त है। यह बात स्पष्ट करी जाती है कि कम्पनी नियम की धारा 4 में जो वित्त निगम निर्धारित है, उसमें कम्पनी नियम की धारा 4 की उप-धारा (2) और उप-धारा (1) के अन्तर्गत जो वित्त-नियम निर्धारित हैं, वह भी शामिल होंगे।

21.6. वित्त नियम, 2007 के द्वारा जो संशोधन करा गया, उसमें इन सभी वाक्यांशों की परिभाषाऐं भी दी गर्इ हैं - ''बैंकिंग कम्पनी'', ''सहकारी बैंक'', ''प्राथमिक कृषि ऋण समिति'', ''प्राथमिक सहकारी कृषि व ग्रामीण विकास बैंक'', ''आवास-वित्त कम्पनी'', ''सार्वजनिक कम्पनी'', ''मूलभूत-सुविधा'' और ''दीघ्रकालीन ऋण''।

21.7. प्रासंगिकता - यह संशोधन 01.04.2008 से लागू होगा और इस प्रकार निर्धारण वर्ष 2008-09 और इसके बाद आने वाले निर्धारण वर्षों के सम्बन्ध में लागू होगा।

22. धारा 36(1)(x) के तहत कटौती लौटाना, सार्वजनिक वित्तीय संस्थाओं द्वारा र्इ0आर0ए0एफ0 को किया गया अंशदान के एवज में।

22.1. धारा 36 की उप-धारा(1), खण्ड(x) के वर्तमान प्रावधानों के अनुसार, किसी भी सार्वजनिक वित्तीय संस्था द्वारा र्इ0आर0ए0एफ0 को किया गया अंशदान, कटौती के रूप में अनुमति प्राप्त था, जब उस संस्था के 'कर' का आंकलन किया जा रहा था।

22.2. र्इ0आर0ए0एफ0 एक ऐसी प्रणाली के अंतर्गत स्ािापित किये गए जिसे र्इ0आर0ए0एस0 के नाम से जाना जाता है। इसके तहत कवच का जो लाभ मिलता है वह उन कर्जदारों के लिए उपलब्ध था जो विदेशी मुद्रा के ऋण संस्थानों से लेते हैं जो अपनी बाहरी व्यापारिक कर्जों के माध्यम से देती हैं।

22.3. पहले यही छूट धारा 10 के खण्ड (23ड.) के तहत दी जाती थी अगर र्इ0आर0ए0एफ0 द्वारा स्ािापित किसी भी सार्वजनिक वित्तीय संस्था के तहत कोर्इ आय होती थी। यह प्रावधान वित्त नियम, 1989 के अंतर्गत था। धारा 10, खण्ड (14) के नाते, वह आय जो एक्सचेंज रिस्क प्रीमियम के तहत सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों द्वारा कर्जदार से प्राप्त होती है और उसके बाद र्इ0आर0ए0एफ0 को आंकलित कर दी जाती है, वह भी 'कर-मुक्त' होती है। र्इ0आर0ए0एफ0 को जो छूट प्राप्त थी धारा 10 (23ड.) के तहत वह वित्त नियम, 2002 के द्वारा वापस ले ली गर्इ, वर्ष 2003-04 से, इसका आधार यह था कि इस कोष की कार्य-विधि व्यापारिक तौर पर की थी, जहाँ वह ऐसा 'एक्सचेंज रिस्क प्रीमियम' अर्जित कर रहे थे जो विदेशी-मुद्रा के कर्जदारों से लिया जा रहा था ताकि वह उन घाटों को पूरा कर पाऐं, जो एक्सचेंज के उतार-चढ़ाव के कारण होता है।

22.4. जब से भारत में र्इ0आर0ए0एस0 की स्थापना हुर्इ है तबसे भारत में विदेशी मुद्रा के क्षेत्र में बहुत बदलाव आया है। बाजार में कर्जदार के लिए बहुत से विकल्प उपलब्ध हैं जिससे वह अपनी विदेशी-मुद्रा का बचाव कर सकते हैं। बदले हुए बाजार के जगत विज्ञान के अनुसार र्इ0आर0ए0एफ0 को भारत के औद्योगिक और विकास बैंक (IDBI), विद्युत-वित्त निगम (PEC) और भारतीय नवीकरणीय विकास ऐजेंसी ने बन्द कर दिया है। इसलिए धारा 36 की उपधारा(1) के खण्ड(x) ने अपनी उपयोगिता से अधिक समय निकाल दिया।

22.5. इसके अनुरूप् वित्त नियम, 2007 ने उपर्युक्त उपधारा से खण्ड(x) को हटा दिया है।

22.6. प्रासंगिकता - यह संशोधन 01.04.2008 से लागू होगा और इसके अनुरूप् निर्धारण वर्ष 2008-09 और उसके बाद आने वाले वर्षों में लागू होगा।

23. केन्द्रीय सरकार में वह शक्तियां निहित हैं कि वह एक संवैधानिक निगम था कम्पनी निकाय की अधिसूचना जारी करके धारा 36(1)(xii) के तहत कटौती निर्धारित कर सकें।

23.1. धारा 36 की उप-धारा (1) के खण्ड (xii) के वर्तमान प्रावधानों के अनुसार, कोर्इ भी व्यय (पूंजीगत व्यय को छोड़कर), जो एक कम्पनी निकाय का होता है, जो भी उसका नाम हो और केन्द्र, राज्य या क्षेत्र नियम के अंतर्गत स्ािापित हो, उसे अपनी आय का आंकलन करते समय कटौती की अनुमति थी।

23.2. बताए गए नियमों में जो अभिप्राय और उद्देश्य हैं, किसी भी प्रकार का व्यय अनुमित कर सकते हैं, और वर्तमान प्रावधानों के अंतर्गत जिनकी अनुमति पर प्रश्न नहीं लगाया जा सकता था। इसलिए वित्त नियम, 2007 ने यह खण्ड (xii) को स्ािानापन्न कर दिया है ताकि इस कटौती की अनुमति मिल सके अगर कम्पनी निकाय केन्द्रीय सरकार द्वारा, सरकारी राजपत्र में अधिसूचित करा गया है, बशर्ते कि केन्द्रीय, राज्य या क्षेत्रीय नियम के अभिप्रायों और उद्देश्यों का पालन हो रहा हो।

23.3. प्रासंगिकता - यह संशोधन 01.04.2008 से प्रभाव रखेगा और इस कारण निर्धारण वर्ष 2008-09 और इसके बाद आने वाले वर्षों से लागू होगा।

[धारा 13]

24. सार्वजनिक वित्तीय संस्था द्वारा जो राशि एक अधिसूचित ऋण गारंटी ट्रस्ट को दी जाती है लघु उद्योगों हेतु, उसके लिए कटौती प्रदान करना।

24.1. वित्त नियम, 2007 ने आयकर नियम, 1961 की धारा 36 की उप-धारा (1) में एक नया खण्ड जोड़ा, खण्ड (xiv), ताकि वह उस राशि पर कटौती की अनुमति दे सके जो राशि एक सार्वजनिक वित्तीय संस्था अंशदान के रूप में किसी ऋण-गारंटी कोष ट्रस्ट के लघु-उद्योग हेतु प्रदान करती है, उस तरह जिस तरह केन्द्रीय सरकार इस बारे में सरकारी राजपत्र में अधिसूचना जारी करती है।

24.2. प्रासंगिकता - यह संशोधन 01.04.2008 से लागू होगा और इस कारण निर्धारण वर्ष 2008-09 और इसके बाद आने वाले वर्षों से लागू होगा।

24.3. उपरोक्त संशोधन के अनुरूप, सूक्ष्म और लघु उद्योगों के लिए ऋण गारंटी कोष ट्रस्ट ( सी.जी.टी.एम.एस.र्इ.), जो भारत सरकार और भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (एस.आर्इ.डी.सी.ओ.) द्वारा स्ािापित है, को आयकर नियम, 1961, धारा (36), उप-धारा (1), खण्ड (xiv) के तहत अधिसूचित किया गया है, देखिए अधिसूचना संख्या एस.ओ 1569(ड.), दिनांक 18 सितम्बर, 2007.

25. धारा 40क(3) के प्रावधानों का सशक्तिकरण

25.1. धारा 40 की उप-धारा (3) के वर्तमान प्रावधानों के अनुसार जो व्यय अर्जित होता है, उस कुल पर 20 प्रतिशत तक छूट नहीं मिलेगी। अगर यह राशि 20,000 रूपये से ज्यादा है तो वह 'अदाता खाता चैक' या 'अदाता खाता बैंक' ड्राफ्ट द्वारा बैंक के नाम आहरित होगी।

25.2. उपरोक्त उप-धारा वित्त नियम, 1968 द्वारा जोड़ी गर्इ, यह अर्जित व्यय पर 100 प्रतिशत तक छूट नहीं देती थी, यदि भुगतान इसके प्रावधानों का उल्लघंन करते हुए किया जाए। बाद में, वित्त नियम, 1995 ने इस उप-धारा का संशोधन करा, जो 1 अप्रैल, 1996 से लागू हुआ ताकि छूट नहीं दिये जाने की सीमा को 20 प्रतिशत तक रखा जाए, जिसके प्रावधानों का उल्लघंन करते हुए भुगतान होता है।

25.3. उपर्युक्त उप-धारा के प्रावधानों को गैर-बचाव कार्यवाही के रूप में कार्य करना था। यह देखने में आया है कि पहले जो 100 प्रतिशत कटौती थी उसमें 20 प्रतिशत की कमी लाने के कारण, प्रावधानों की निवारण शक्ति का असर कम हो जाता है। इसलिए, इस निवारण-शक्ति को पुन: शक्तिशाली बनाने के लिये वित्त-नियम, 2007 ने 40 की उप-धारा (3) में एक बदलाव किया है जिससे उन भुगतानों में 100 प्रतिशत कटौती की अनुमति मिलें जहाँ यह भुगतान प्रावधानों के उल्लघंन में करे जा रहे हैं।

25.4. कभी-कभी ऐसे अवसर आते थे कि व्यय पर कटौती का दावा एक वर्ष में होता था और इस व्यय के विरूद्ध भुगतान किसी अन्य आने वाले वर्ष में किया जाता था, जो उप-धारा के प्रावधानों का उल्लंघन है। ऐसे मामलों में उप-धारा के वर्तमान परंतु क के अनुसार पिछले वर्ष की कुल आय का पुन: आंकलन हो सकता था, उस वर्ष में जिसमें व्यय अर्जित किया गया और देनदारी ली गर्इ। ऐसे पुन: आंकलन की अनुमति धारा 154 के प्रावधानों के अंतर्गत दी गर्इ और यह अनुमान लगाया गया कि यह पुन: आंकलन निर्धारण-वर्ष के चार वर्षों बाद तक सीमित किया जाए। निर्धारण वर्ष वह माना जायेगा, जो उस वर्ष के बाद आया, जिसमें धारा 40 की उप-धारा (3) का उल्लंघन करते हुए भुगतान किया गया। बहुत मामलों में यह देखा गया कि चार वर्ष की अवधि के बाद उल्लंघन हुआ है जबकि कोर्इ भी उपाय उपलब्ध नहीं था। पिछले निर्धारण को सुधारने से निर्धारिती को असुविधा हो रही थी और विभाग का काम बढ़ रहा था। इस तरह वित्त नियम, 2007 ने वर्तमान में प्रचलित छूट न देने की प्रणाली को एक ऐसी सरल प्रणाली से स्ािानापन्न किया है जो समकालीन छूट प्रदान करती है, यह तय करते हुए कि पहले वर्ष में जो भुगतान करे गये, कानून के विरूद्ध जाकर, वह व्यापार के मुनाफे और फायदे के रूप में माने जायेंगे, उस वर्ष के लिये, जिस वर्ष में कानून का उल्लंघन करते हुए भुगतान किया गया। यह प्रणाली जिसमें आय को भुगतान का रूप दिया गया, निर्धारिती पर यह दायित्व डालता है कि वह इस आय को घोषित करें, वर्तमान जरूरतों के अनुसार और कानून के अंतर्गत, कि उसकी कुल घोषित आय और आय की वापसी संबंधित जितने भी विवरण हैं, वह सही और सच्चे हैं।

25.5. वित्त नियम, 2007 ने आगे यह प्रावधान करे हैं कि कोर्इ भी गैर-अनुज्ञा नहीं दी जायेगी, न ही भुगतान को व्यापार या व्यवसाय का मुनाफा या फायदा माना जायेगा, यदि भुगतान 20,000 रूपये से अधिक है और निर्धारित साधनों के अलावा किया जाता है, ऐसे मामलों में और निर्धारित परिस्थितियों में जिनका सम्बन्ध इनसे है। (1) किस तरह की और कितनी व्याप्त बैंक सुविधा उपलब्ध है। (2) व्यापार - योग्यता और (3) अन्य सम्बन्धित कारण।

25.6. उपर्युक्त का संशोधन का अनुसरण करते हुये, बोड व अधिसूचना संख्या एस.ओ 1044(ड.), दिनांक 27 जून, 2007 जारी करी, जिसमें आयकर नियम 6घघ, 1962 को स्थानापन्न किया गया, जिसमें धारा 40 की उप-धारा (3) के प्रावधानों के अपवाद हैं। नये अधिसूचित नियम 6घघ, में जो अपवाद हैं उनमें यह भी शामिल है - भुगतान के लिये इलैक्ट्रॉनिक - निकासी प्रणाली का उपयोग, बैंक खाते के द्वारा, क्रडिट-कार्ड या डेबिट-कार्ड द्वारा। अपवाद में यह भी शामिल है कि 50,000 रूपये तक का भुगतान सेवा निवृत्ति लाभ हेतु किया जाये बिना किसी आय सीमा के। देश भर में बैंकिंग सेवाओं को देखते हुये, पूर्व में जो अपवाद प्रदान किये गए थे - जो राज्य स्तर के ओद्यौगिक निगमों और राष्ट्रीय उद्योग विकास निगम को भुगतान हेतु दिये गए थे, वह नये नियमानुसार वापस ले लिये गए हैं। नया नियम निर्धारण-वर्ष 2008-09 से प्रभावित होंगे।

25.7. प्रसांगिकता - यह संशोधन 01.04.2008 से लागू होगा और इस कारण निर्धारण वर्ष 2008-09 और इसके बाद आने वाले वर्षों से प्रभाव में आएगा।

(धारा 14)

26. सहकारी बैंकों के व्यापारिक पुनर्गठन सम्बन्धी प्रावधान

26.1. सहकारी बैंकों के कारोबार-सम्बन्धी पुनर्गठन में जो अर्जित घाटे और अग्रहित अवमूल्यन को आगे ले जाने के लिये एक नर्इ धारा 72कख् डाली गर्इ है। यह प्रावधान एक निर्धारिती पर लागू होते हैं, जो सहकारी बैंक का उत्तराधिकारी होता है, उस मामले में जहां पिछले सम्बन्धित वर्ष में समावेलन हुआ हो। उपर्युक्त उत्तराधिकारी सहकारी बैंक को यह हक प्राप्त होगा कि वह अर्जित घाटे की क्षतिपूर्ति करे और यदि अग्रहित अवमूल्यन है, उसकी भी, जो उससे पहले आने वाले सहकारी बैंक की, या होती यदि समावेलन नहीं किया गया होता। इस नियम के अन्य प्रावधान जो घाटे की क्षतिपूर्ति और अवमूल्यन को आगे ले जाने से सम्बन्धित है, वह नियमानुसार लागू होंगे।

26.2. सहकारी बैंकों के सम्बन्ध में, व्यापार के पुनर्गठन से यह अभिप्राय है कि सहकारी बैंक के समावेलन या विभाजन से सम्बन्धित व्यापार का पुनर्गठन। सहकारी बैंक परिसम्पत्तियों का अधिग्रहण करे या उसके किसी उपक्रम का।

26.3. यदि समावेलन को आगे परिभाषित करते हैं (सरकारी बैंक के सन्दर्भ में) तो इसका अभिप्राय होता है कि एक सहकारी बैंक या बैंकों का एक अन्य सहकारी बैंक से इस तरह समावेलन करना कि -

i समावेलन करने वाला बैंक या बैंकों की सभी परिसम्पत्तियां और देनदारियां (हस्तांतरित परिसम्पत्तियों के अलावा जो बिक्री, आबंटन या ठप्प हो जाने के कारण बैंक को मिल जाती है) समावेलित बैंक की सम्पत्तियां और देनदारियां बन जाती हैं।

ii समावेलनकर्ता बैंक के सदस्य जो 75 प्रतिशत या उससे अधिक मताधिकार रखते हैं, समावेलित बैंक के सदस्य हो जाते हैं।

iii समावेलनकर्ता बैंक के ऐसे अंशधारी जो 75 प्रतिशत से अधिक मूल्य के अंश (शेयर) के मालिक हैं (समावेलित बैंक या उसके द्वारा नामित व्यक्ति या उसके अनुषंगी, समावेलन से पहले), व समावेलित बैंक के अंशधारी हो जायेंगे।

26.4. सहकारी बैंक के सम्बन्ध में 'डीमर्जड' की परिभाषा यह दी गर्इ है कि एक डीमर्जड सहकारी बैंक का अपनी एक या उससे अधिक उपक्रमों का अन्य सहकारी बैंक में हस्तांतरण, इस प्रकार से ताकि-

i हस्तांतरण के ठीक पहले सरकारी बैंक की जो परिसम्पत्तियां और देनदारियां है वह परिणामी सहकारी बैंक की परिसम्पत्तियां और देनदारियां बन जायें।

ii परिसम्पत्तियों और देनदारियों का परिणामी सहकारी बैंक में उस मूल्य का हस्तांतरण हो, जिस तरह वह हस्तांतरण से पूर्व बैंक के खातों में दिखते थे (उस बदलाव को छोड़कर जो परिसम्पत्तियों के पुन: आंकलन के बाद आया)

iii परिणामी सहकारी बैंक, हस्तांतरण को ध्यान में रखते हुये, अपने बैंक की सदस्यता 'डिमर्जड सहकारी बैंक' के सदस्यों को प्रदान करें, अनुपात के आधार पर।

iv वह अंशधारी जो 75 प्रतिशत या उससे अधिक मूल्य के अंश के मालिक हैं, डिमर्जड सहकारी बैंक में (उन अंशों को छोड़कर जो पहले से ही परिणामी बैंक या उसके अनुशंगी या उसके नामित के पास हैं, हस्तांतरण से ठीक पहले) परिणामी सहकारी बैंक के अंशधारी बन जाते हैं, बजाये इसके कि वह तब अंशधारी बनें जब 'डिमर्जड ..........

26.5. उत्तराधिकारी और पूर्वाधिकारी सहकारी बैंक, दोनों ही मामलों में एक स्थितियों का दस्ता प्रदान किया जाता है, जिन्हें पूरा करना आवश्यक है यदि आप उन प्रावधानों को प्राप्त करना चाहते हैं जिनका इस भाग में उल्लेख किया गया है।

क. पूर्वाधिकारी सहकारी बैंक के लिये निम्नलिखित शर्तें निर्धारित करी गर्इ हैं :-

i कथित सहकारी बैंक बैंकिंग के व्यवसाय में 3 या अधिक वर्षों से कार्यरत है।

ii व्यापार के पुनर्गठन की तारीख पर कथित सहकारी बैंक के पास अचल सम्पत्तियों की अंकित मूल्य का कम से कम तीन-चौथा भाग है, निरन्तर 2 वर्षों तक, व्यापार के पुनर्गठन की तारीख से।

ख. उत्तराधिकारी बैंकों के लिये निम्नलिखित शर्तें निर्धारित करी गर्इ हैं

i कथित सरकारी बैंक पूर्वाधिकारी सहकारी बैंक की अचल सम्पत्तियों के अंकित-मूल्य का कम से कम तीन-चौथार्इ भाग रखता है जो इसने व्यापार के पुनर्गठन द्वारा प्राप्त किया है, निरन्तरण 5 वर्ष की अवधि के लिये व्यापार के पुनर्गठन की तारीख के ठीक बाद।

ii कथित सरकारी बैंक पूर्वाधिकारी सहकारी बैंक का व्यापार जारी रखता है कम से कम 5 वर्ष तक उस तारीख से जिससे व्यापार का पुनर्गठन किया गया।

iii कथित सहकारी बैंक अन्य सभी शर्तें पूरी करता है जो निर्धारित करी गर्इ हैं जिससे पूर्वाधिकारी बैंक का पुन: प्रवर्तन हो और यह सुनिश्चित हो कि व्यापार का पुनर्गठन सच्चे/असली व्यापार उद्देश्य के लिये हो रहा है। इसके अलावा, केन्द्र सरकार इस भाग हेतु, सरकारी पत्रिका में अधिसूचना के जरिये, अन्य शर्तें निर्धारित कर सकती है, जैसा वह आवश्यक समझे, उसके अलावा जो निर्धारित करी गर्इ हैं कि व्यापार का पुनर्गठन, व्यापारिक उद्देश्यों से करा जा रहा है।

26.6. संचित हानि और अग्रहित अवमूल्यन की राशि, जिसे अनुमति प्राप्त है कि वह परिणामी सहकारी बैंक की आय से प्रतिधारित हो सके वह हैं :-

i 'डीमर्जड' या अविलयित सहकारी बैंक की संचित हानि या अग्रहित अवमूल्यन, यदि यह हानि और अवमूल्यन की पूर्ण राशि उन उपक्रमों से सम्बन्ध रखती है जो परिणामी सहकारी बैंक को हस्तांतरित करे गये हैं।

ii वह राशि जो 'डीमर्जड' या अविलयित सहकारी बैंक की संचित हानि और अग्रहित अवमूल्यन का कुल योग है, उसका जो अनुपात उस उपक्रम की परिसम्पत्तियों से है जो परिणामी सहकारी बैंक में हस्तांतरित हो गया है, वही अनुपात का उस राशि का उससे होना चाहिये जो 'डीमर्जड' या अविलयित सहकारी बैंक की परिसम्पत्तियां हैं, यदि यह संचित हानि या अग्रहित अवमूल्यन का सीधा सम्बन्ध उन उपक्रमों से नहीं है जो परिणामी सहकारी बैंक में हस्तांतरित हुये हैं।

26.7. संचित हानि और अग्रहित अवमूल्यन को आगे इस तरह परिभाषित किया गया है :-

क. संचित हानि से अभिप्राय है समावेलनकर्ता बैंक की इतनी हानि, या 'डीमर्जड' या अविलयित बैंक की इतनी हानि, जैसा भी है ''व्यापार या व्यवसाय के मुनाफे और फायदे'' के शीर्षक के अंतर्गत (चिन्तन व्यापार में ली गर्इ हानि के अलावा) जो समावेलनकर्ता बैंक या 'डीमर्जड' बैंक को हक होता है कि वह उसे आगे ले जाये और प्रावधानों के अन्तर्गत प्रतिभारित कर दे, यह मानते हुये कि व्यापार का पुनर्गठन हुआ ही नहीं।

ख. अग्रहित अवमूल्यन से अभिप्राय है कि समावेलनकर्ता बैंक या डीमर्जड सहकारी बैंक, जो भी हो को अवमूल्यन की इतनी छूट दी जाये जो शेष अनुमेयित है और जिसकी अनुमति प्राप्त होती यदि व्यापार का पुनर्गठन नहीं हुआ होता।

26.8. इस बात को ध्यान में रखते हुये कि इस बात का स्पष्टीकरण हो सके कि कितने वर्ष बचे हैं प्रतिभारित करने में और हानि को आगे ले जाने में और अवमूल्यन छूट देने में, यह प्रावधान किये गये हैं :-

i पिछले वर्ष की शुरूआत से जो अवधि है उससे लेकर जिस तारीख को कारोबार का पुनर्गठन किया गया उससे ठीक 1 दिन पहले।

ii वह अवधि जो उस तारीख से शुरू हो रही है जिस दिन व्यापार का पुनर्गठन हुआ और समाप्त हो रही है उसके पिछले वर्ष, को दो अलग पूर्व-वर्ष माना जायेगा यदि हमारा उद्देश्य है कि हम प्रतिभार और हानि को आगे ले जाने और अवमूल्यन में छूट की दृष्टि से देखें।

26.9. यह भी प्रावधान किया गया है कि उन मामलों में जहाँ उप-धारा (2) या उप-धारा (4) के अंतर्गत जो शर्तें निर्धारित हैं, उनका पालन नहीं हो रहा तो, संचित घाटे या अग्रहित अवमूल्यन, जो उत्तराधिकारी सहकारी बैंक को पिछले वर्ष हुआ हो, उसकी क्षतिपूर्ति को माना जायेगा कि वह उत्तराधिकारी सरकारी बैंक की आय है जो उस वर्ष के कर योग्य होगी, जिस वर्ष शर्तों का पालन नहीं किया गया।

26.10. इसके आगे एक नर्इ धारा 44घख बीच में डाली गर्इ है ताकि उन मामलों में कटौतियों का आंकलन हो सके जहां सहकारी बैंको के व्यापार का पुनर्गठन हुआ है। इस तरह कटौती करने के लिये, एकीकरण होने से पहले और एकीकरण होने के बाद दिनों की संख्या में जो अनुपातिक कमी है, कुछ प्रारंभिक खर्चों में परिशोधन, एकीकरण सम्बन्धित खर्चे (व्यय), और 'स्वैच्छिक सेवा निवृत योजना' (वी.आर.एस.) के तहत जो परिषोधन का खर्च है, वह पूर्वाधिकारी और उत्तराधिकारी सहकारी बैंक को अनुमित है, 'एकीकरण' और 'डीमर्जर' योजना के तहत।

26.11. एकीकृत सहकारी बैंक, एकीकृत करने वाला सहकारी बैंक, एकीकरण, व्यापार पुनर्गठन, सहकारी बैंक, डिमर्जड सहकारी बैंक, पूर्वाधिकारी सहकारी बैंक, उत्तराधिकारी सहकारी बैंक और परिणामी सहकारी बैंक, इन सभी पदों को भाग 44घख और 72कख् में इसी तरह परिभाषित किया गया है।

26.12. प्रसांगिकता - यह संशोधन 01.04.2008 से लागू होगा और इस कारण निर्धारण वर्ष 2008-09 और इसके बाद आने वाले वर्षों में प्रयोग किया जायेगा।

[धाराए 15 & 21]

27. कुछ आय को कर से मुक्त करना और कुछ अन्य आय को आय की परिभाषा में लेने को पूर्वव्यापी रूप से प्रभावित करना।

27.1. देखिये वित्त (नंबर 2) नियम, 2004, खण्ड (v) को उप-धारा (2) धारा (56) में डाला गया, 01.04.2005 से। वर्तमान में यह खण्ड इस बात का प्रावधान करता है कि यदि कुल 25,000 रूपयों से अधिक धनराशि बिना मुआवजा ली जाती है एक व्यक्ति या एक हिन्दू अविभाजित परिवार द्वारा, किसी अन्य व्यक्ति से, 11 सितम्बर, 2004 के बाद, परन्तु 1 अप्रैल, 2006, से पहले, तो यह कुल धनराशि कर-योग्य होगी, 'अन्य स्त्रोतों से आय', शीर्षक के तहत। इस परन्तु क के तहत, कुछ अपवाद प्रदान किये गए हैं, उस धनराशि हेतु जो कुछ निर्धारित व्यक्तियों और कुछ निर्धारित परिस्थितियों के तहत।

27.2. देखिये, कर कानून (संशोधन) नियम, 2006 खण्ड ( ड.), () और () उपर्युक्त परन्तु क में डाले गए, जो 13.07.2006 प्रभावी हुए ताकि और अपवाद प्रदान कर पायें, उन मामलों में जब किसी स्थानीय अधिकरण या धारा 10 के खण्ड (27 ) में किसी संस्था के सम्बन्ध में या धारा 12कक के तहत किसी पंजीकृत संस्था या ट्रस्ट द्वारा राशि प्राप्त हो रही हो।

27.3. धारा 56(2) का उपर्युक्त खण्ड (v) 01.04.2005 से प्रभावी हुआ। परन्त क के उपर्युक्त खण्डों ( ड.), () और () में भी यही तारीख दी गर्इ है, उन्हें प्रभावी करने के लिये। यह संशोधन निर्धारण वर्ष 2005-06 और 2006-07 से प्रभावी होगी।

27.4. आगे, देखिये कर कानून (संशोधन) नियम, 2006, धारा 56 में एक नया खण्ड (vi) डाला गया, जो अन्य विषयों के साथ, यह प्रावधान करता है कि 50,000 से अधिक धनराशि का समुचित मूल्य, यदि कोर्इ व्यक्ति या हिन्दू अविभाजित परिवार बिना मुआवजे के ग्रहण करता है, पिछले वर्ष में, किसी व्यक्ति या व्यक्तियों से 1 अप्रैल, 2006 को या उसके बाद, तो वह धनराशि 'कर' के योग्य होगी, उस शीर्षक के तहत जिसे 'अन्य स्त्रोतों से आय', के नाम से जाना जाता है।

27.5. धारा 2(24) जो आय की परिभाषा से सम्बन्धित है, इस बात का कोर्इ सन्दर्भ नहीं देती जो राशि उपर्युक्त खण्ड (vi) में सन्दर्भित है। इस उद्देश्य से कि उपर्युक्त खण्ड को आय की परिभाषा से सन्दर्भित किया जाए, एक नया खण्ड (xiv), धारा 2(24) में डाल दिया गया है, यह बताने के लिए कि आय में वह राशि भी शामिल करी जायेगी जो कि धारा 56 की उप-धारा (2) के खण्ड (vi) में सन्दर्भित है।

27.6. क्योंकि धारा 56 की उप-धारा (2) का खण्ड (vi) 01.04.2007 से प्रभाव में आया, उपर्युक्त खण्ड (xiv) भी उसी तारीख, यानि, 01.04.2007 से प्रभाव में आया। यह संशोधन पूर्वव्यापी रूप से 1 अप्रैल, 2007 से प्रभाव में आयेगा और इस कारण निर्धारण वर्ष 2007-08 और इसके बाद के वर्षों से लागू होगा।

(धारा 3 और 19)

28. धारा 54ड.ग के तहत दीघ्रकालीन विशेषप्रतिज्ञा पत्रों में (बॉण्ड) में निवेश करने हेतु शर्तें प्रदान करना।

28.1. धारा 54ड.ग उस पूंजीगत लाभ पर कर मुक्ति प्रदान करती है जो दीघ्रकालीन पूंजीगत परिसम्पत्तियों के हस्तांतरण से उत्पन्न होता है, बशर्तें यह पूंजीगत लाभ दीघ्रकालीन स्पष्ट परिसम्पत्तियों में निवेशित किये जाऐं, हस्तांतरण से 6 महीने की अवधि के बीच। वित्त नियम, 2006 ने दीघ्रकालीन स्पष्ट परिसम्पत्ति की परिभाषा में संशोधन करा ताकि उसका आशय हो कोर्इ भी ऐसा प्रतिज्ञा-पत्र (बॉण्ड) जो तीन साल के बाद प्रतिदेयित हो जाये और 1 अप्रैल, 2006 को या उसके बाद जारी किया गया हो, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एन.एच.ए.आर्इ.) और ग्रामीण विद्युतीकरण निगम लिमिटेड (आर.र्इ.सी.) द्वारा। ऐसे प्रतिज्ञा-पत्रों (बॉण्डों) को केन्द्रीय सरकार की सरकारी राजपत्र में अभिसूचित करना अनिवार्य था।

28.2. क्योंकि (एन.एच.ए.आर्इ.) और (आर.र्इ.सी.) द्वारा जारी बॉण्डों की संख्या सीमित थी यह सुनिश्चित करना अनिवार्य हो गया कि निवेशकों को मिले। इस उद्देश्य से, यह सनिश्चित करना अनिवार्य था कि अंशदान हेतु जितने भी बॉण्ड हैं वह छोटे निवेशकों को भी उपलब्ध हों। इसलिये, यह ध्यान में रखते हुये कि सभी भावी निवेशकों को बराबर लाभ दिया जाये, सरकार ने निश्चय किया कि ऐसे बॉण्डों में निवेश की संख्या पर सीमा लगार्इ जाये। इसके अनुरूप उपर्युक्त धारा में संशोधन किया गया ताकि ऐसे बॉण्डों में निर्धारिती पर सीमा लगार्इ जाये। यदि वह दीघ्रकालीन स्पष्ट परिसम्पत्तियों में निवेश करते हैं। धारा 54ड.ग के तहत ऐसी स्पष्ट परिसम्पत्तियों में, 1 अप्रैल, 2007 के बाद या उस दिन से उस वित्त वर्ष में, 50,000 रूपयों से अधिक निवेश नहीं किया जा सकेगा।

28.3. प्रासंगिकता - यह धारा 1 अप्रैल, 2007 से पूर्वव्यापी रूप से प्रभाव में आयेगी और इस कारण निर्धारण वर्ष 2007-08 और उसके बाद आने वाले वर्षों पर लागू होगी।

28.4. उपर्युक्त धारा में आगे संशोधन किया गया है, वर्तमान खण्ड () जो उपर्युक्त धारा की व्याख्या करता है, उसे स्थानापन्न करके, ताकि केन्द्रीय सरकार ऐसे बॉण्डों को सरकारी राजपत्र में अधिसूचित करते हुए ऐसी शर्तें रख सके, जिनमें शामिल है वह शर्त की निर्धारिती द्वारा निवेश की राशि पर सीमा लग सके, जैसा वह ठीक समझे।

28.5. प्रासंगिकता - यह संशोधन पूर्वव्यापी रूप से 1 अप्रैल, 2006 से लागू होगा।

28.6. इसके आगे उपर्युक्त खण्ड () में एक खण्ड डाला गया है, जो ऐसे स्थानापन्न किया गया है कि जहां भी बॉण्ड 1 अप्रैल, 2007 से पहले जारी हुआ है, उस अधिसूचना के तहत जो केन्द्रीय सरकार ने सरकारी राजपत्र द्वारा जारी किया गया है, उन प्रावधानों के अंतर्गत जैसे वह वित्त नियम, 2007 के संशोधन से पहले थे, तो ऐसे बॉण्ड को यह माना जायेगा कि वह बाण्ड है जो नये खण्ड () के प्रावधानों के अंतर्गत आयेगा। इस तरह, अधिसूचना एस.ओ. 2146(ड.), दिनांक 22 दिसम्बर, 2006, अपनी शर्तों सहित, को माना जायेगा कि वह उपर्युक्त खण्ड () के परन्त क के अन्तर्गत जारी हुआ, जिसका स्थानापन्न किया गया।

28.7. उपर्युक्त परन्तु क जो डाला गया, 1 अप्रैल, 2006 से प्रयोग में आयेगा।

(धारा 18)

29. धारा 72क के प्रावधान सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी या कम्पनियों तक बढ़ा दिये गए हैं, वह कम्पनियां जो वायुयान चलाने के कारोबार में हैं।

29.1. धारा 72 के वर्तमान प्रावधानों के अनुसार एकीकरण कर रही कम्पनी या कम्पनियों की संचित हानि और अग्रहित अवमूल्यन को एकीकृत कम्पनी के मुनाफे के विरूद्ध प्रतिभारित कर दिया जायेगा। वर्तमान में, यह लाभ तब प्राप्त होता है जब एकीकृत होने वाली कम्पनी किसी औद्योगिक उपक्रम या पानी-जहाज या होटल की मालिक है और दूसरी कम्पनी से एकीकृत हो रही हो। यह लाभ तब भी उपलब्ध है जब एक बैंकिंग कम्पनी का एकीकरण हो रहा हो (जैसा कि धारा 5 खण्ड (), बैंकिंग विनियम, 1949 में सन्दर्भित है) किसी विशेष बैंक से।

29.2. उपर्युक्त धारा में संशोधन किया गया है ताकि आगे ले जाने और प्रतिभारित करने के लाभ जो धारा 72 के अन्तर्गत दिये गए हैं, वह उन सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी या कम्पनियों को भी मिले जो वायुयान चलाने के कारोबार में और वह एकीकरण चाहती हो किसी अन्य सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी से जो मिलते-जुलते कारोबार में हों।

29.3. प्रासंगिकता - यह संशोधन 01.04.2008 से लागू होगा और इस कारण निर्धारण वर्ष 2008-09 और इसके बाद आने वाले वर्षों में लागू होगा।

(धारा 20)

30. धारा 80-ग को बड़ा करने की गुंजार्इश

30.1. धारा 80- की उप-धारा (2) में एक नया खण्ड (xxii) डाला गया है, जिससे उसका कार्य क्षेत्र बढ़ जाता है, इसके द्वारा राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) के किसी भी सूचित बॉण्डों में अभिदान की गर्इ राशि कटौती के योग्य होगी, बशर्ते यह राशि 1,00,000 से अधिक ना हो।

30.2. प्रासंगिकता - यह संशोधन 1 अप्रैल, 2008 से प्रयोग में आयेगा और इस कारण निर्धारण वर्ष 2008-09 और इसके बाद आने वाले वर्षों पर लागू होगा।

31. धारा 80 गगघ के अन्तर्गत कर लाभ का बढ़ावा 'अन्य नियोक्ताओं के कर्मचारियों' को।

31.1. धारा 80गगघ के अन्तर्गत, एक व्यक्तिगत कर्मचारी जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नियोजित है, 1 जनवरी, 2004, या उसके बाद से तो उसका अपने खाते में योगदान (आय का अधिकतम 10 प्रतिशत) या उसके नियोक्ता का उसके खाते में योगदान (आय का अधिकतम 10 प्रतिशत) केन्द्रीय-सरकार के अधिसूचित पैंशन-फण्ड के अन्तर्गत कटौती के योग्य होगा। वित्त नियम, 2007 के जरिये इस धारा को संशोधित किया गया है ताकि लाभ उन व्यक्तियों तक भी पहुंचे जो अन्य नियोक्ताओं द्वारा 1 जनवरी, 2004 को या उसके बाद नियुक्त हैं। फलस्वरूप धारा 7 और धारा 17 में संशोधन करे गए यह प्रावधान देने के लिए कि पिछले साल में अन्य नियोक्ता द्वारा किया गया योगदान जो पैंशन योजना के अन्तर्गत कर्मचारी के खाते में किया जाता है, जो धारा 80गगघ में सन्दर्भित है, उसे माना जायेगा कि वह भारत में प्राप्त आय है (धारा 7) और उसे आय शीर्षक के अन्तर्गत कर (टैक्स) किया जायेगा।

(धारा 17)

31.2. प्रासंगिकता - यह संशोधन 01.04.2004 से पूर्वव्यापी होगा और इस कारण निर्धारण वर्ष 2004-05 और इसके बाद आने वाले वर्षों के सम्बन्ध में लागू होगा।

[धाराए 4, 11 & 25]

32. स्वास्थ्य-बीमा प्रीमियम की कटौती से जुड़े प्रावधानों का परिमेयकरण।

32.1. आयकर नियम की धारा 80 के अनुसार एक निर्धारिती की कुल आय का आंकलन करने हेतु, जब यह निर्धारिती एक व्यक्तिगत इन्सान है या हिन्दू अविभाजित परिवार है, तब चैक द्वारा अदा करी गर्इ रकम, ताकि निर्धारिती या उसके परिवार के कोर्इ भी सदस्य के स्वास्थ्य का बीमा जारी रहे, कटौती के रूप में मानी जायेगी। यह राशि अधिकतम 10,000 रूपये तक हो सकती है। वरिष्ठ नागरिकों के मामले में, कटौती की अधिकतम राशि 15,000 रूपये होगी।

32.2. इसी तरह धारा 36 की उप-धारा (1) का खण्ड (झख) यह प्रावधान करता है कि किसी निर्धारिती द्वारा दिया गया प्रीमियम का चैक कटौती के योग्य होगा, एक नियोक्ता के नाते कि वह अपने कर्मचारियों के स्वास्थ्य के बीमा को जारी रखे, उस योजना के अन्तर्गत जो सार्वजनिक बीमा कम्पनी द्वारा गठित करी गर्इ। यह सार्वजनिक बीमा कारोबार (राष्ट्रीयकरण) नियम, 1972, केन्द्रीय सरकार या अन्य किसी बीमा कम्पनी द्वारा अनुमोदित है, और बीमा विनियम और विकास अधिकरण नियम, 1999 की धारा 3, उप-धारा (1) द्वारा स्थापित बीमा विनियम और विकास अधिकारी ( आर्इ.आर.डी.ए.) ) द्वारा अनुमोदित है।

32.3. यह ध्यान में रखते हुये कि उन भुगतानों में कटौती प्रदान करी जा सके जो इलैक्ट्रॉनिक तरीकों, क्रेडिट-कार्ड, वगैरह से हो रहे हों, धारा 36 की उप-धारा (1) के खण्ड (झख) और धारा 80 के प्रावधानों में संशोधन करा गया ताकि नकद के अलावा प्रीमियम का जो भुगतान हो रहा है वह भी इन धाराओं के अन्तर्गत कटौती के योग्य हो।

32.4. धारा 80 के अन्तर्गत जो कटौती की अधिकतम राशि थी, उसे 15,000 से बढ़ाकर 20,000 रूपये कर दिया गया है, वरिष्ठ नागरिकों के लिये और अन्य सभी मामलों में 10,000 से बढ़ाकर 15,000 रूपये।

32.5. प्रासंगिकता - यह संशोधन 1 अप्रैल, 2008 से प्रयोग में आयेंगे और इस कारण निर्धारण वर्ष 2008-09 और आगे के वर्षों से लागू होंगे।

(धारा 13 और 26)

33. किसी सम्बन्धी की उच्च शिक्षा हेतु लोन (ऋण) पर जो ब्याज की रकम दी, उस पर कटौती।

33.1. आयकर नियम की धारा 80ड. के अन्तर्गत, किसी भी व्यक्ति को कटौती प्राप्त होती है, उस राशि पर जो राशि वह अपनी कर योग्य आय पर पिछले वर्ष में देता है, यह मानते हुए कि यह उसके द्वारा किसी भी वित्तीय संस्था या अनुमोदित परोपकारी संस्था से लिया गया वह ऋण है जो उसने उच्च-शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्य से लिया है। यह कर लाभ इसलिए लाया गया कि मानव-संसाधन के उच्च गुणों का देश में विकास करा जाए और प्रतिभाशाली व्यक्तियों को उच्च श़िक्षा की प्रेरणा दी जा सके। साधनों के अभाव के बावजूद। निर्धारण वर्ष 2007-08 तक यह सुविधा केवल व्यक्ति की निजी शिक्षा तक सीमित थी। वित्त नियम, 2007, धारा 80ड. के संशोधन से यह कटौती उस व्यक्ति के सम्बन्धियों की उच्च शिक्षा (यानि पति/पत्नी और बच्चों) तक बढ़ा दी गर्इ है।

33.2. धारा 80ड. की उप-धारा (3) के खण्ड () में भी संशोधन करा गया है जिससे 'अनुमोदित परोपकारी संस्था' की परिभाषा में बदलाव आता है। धारा 10 के खण्ड (23 ) में जो निर्धारित अधिकारी के अनुमोदन की आवश्यकता थी, उसे केन्द्रीय सरकार की अधिसूचना से स्थानापन्न किया गया है। यह एक परिणामी संशोधन है जो अनुमोदन की कार्य प्रणाली से बदलकर केन्द्रीय सरकार की अधिसूचना के रूप में सामने आया है, धारा 10 के खण्ड (23 ) के अन्तर्गत।

33.3. प्रासंगिकता - यह संशोधन 01.04.2008 से प्रभाव में आयेंगे और इस कारण निर्धारण वर्ष 2008-09 और इसके बाद आने वाले वर्षों के सम्बन्ध में लागू होंगे।

(धारा 27)

34. विकासक सम्बन्धी स्पष्टीकरण, आधारभूत सुविधाओं, औद्योगिक-उद्यान, वगैरह के सन्दर्भ में, धारा 80झक के उद्देश्य हेतु।

34.1. धारा 80झक के अन्तर्गत किसी ऐसे उद्यम या उपक्रम को 10-वर्ष का कर-लाभ दिया जाता है यदि वह आधारभूत सुविधाओं का विकास या संचालन और रख-रखाव या विकास, संचालन और रखरखाव से जुड़ा है, दूरसंचार सेवाओं प्रदान करने, ऊर्जा उत्पादन या ऊर्जा उत्पादन और वितरण या औद्योगिक उद्यानों या विशेष आर्थिक क्षेत्रों के विकास से जुड़ा है।

34.2. कर-लाभ की सुविधा इसलिये आरम्भ करी गर्इ क्योंकि उद्योगों के नवीनीकरण में भारी मात्रा में आधारभूत सुविधाओं को बढ़ाना पड़ता है और उनमें सुधार लाना पड़ता है (जैसे चौड़े-रास्ते (एक्सप्रेसवे) राज्य-मार्ग, हावार्इ-अड्डे, बन्दरगाह और तीव्र गति की रेल प्रणालियां) जिनका हमारे देश में अभाव था। कर-लाभ की सुविधा का हमेशा से यह उद्देश्य था कि निजी-क्षेत्र को भाग लेने के लिए बढ़ावा दिया जाए, बतौर वह आधारभूत सुविधाओं के क्षेत्र के विकास में निवेश करें, केवल उन लोगों के लिये नहीं जो सिविल-निर्माण कार्य करते हैं या अन्य ठेकेदारी के कार्य। प्रेरणा हमेशा विकासकों को लाभ पहुंचाने की थी जो उद्मर्ता और निवेश का खतरा लेते हैं, ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने का उद्देश्य नहीं था, जो केवल कारोबारी खतरा उठाते हैं।

34.3. इसी अनुसार, एक व्याख्या के माध्यम से यह स्पष्ट कर दिया गया है कि धारा 80झक के प्रावधान उस व्यक्ति पर लागू नहीं होंगे जो एक कार्य का निष्पादन करता है, ऐसे उपक्रम के अन्तर्गत जिसका कथित धारा से सम्बन्ध है। इस तरह, जब कोर्इ व्यक्ति स्वयं निवेश करके, विकास कार्य स्वयं निष्पादित करता है, यानि सिविल-निर्माण का कार्य करता है, वह धारा 80झक के अन्तर्गत कर-लाभ के योग्य होगा। इसके विपरीत एक व्यक्ति जो दूसरे व्यक्ति के साथ अनुबन्ध करता है (सरकार समेत या कोर्इ ऐसा उपक्रम या उद्यम जो धारा 80झक में सन्दर्भित है) ताकि वह ठेके का कार्य कर सके, तो उसे धारा 80झक के अन्तर्गत कर-लाभ प्राप्त नहीं होगा।

34.4. प्रासंगिकता - यह संशोधन 1 अप्रैल, 2000 से प्रभाव में आयेगा और इस कारण निर्धारण वर्ष 2000-01 और इसके बाद आने वाले वर्षों के सम्बन्ध में लागू होगा।

35. धारा 80झक के अन्तर्गत किसी भी उपक्रम/उद्यम जो भारतीय कम्पनियों का है, जिनका एकीकरण या 'डिमर्जर' 31.03.2007 के बाद हुआ, उन्हें कर का लाभ उपलब्ध नहीं होगा।

35.1. धारा 80झक की उप-धारा (12) यह प्रावधान करती है कि यदि किसी भारतीय कम्पनी जो कटौती की हकदार है, उसके उपक्रम का स्थानान्तरण अवधि की समाप्ति से पहले, किसी अन्य भारतीय कम्पनी को एकीकरण या डिमर्जर की योजना के अन्तर्गत हो जाता है, तो यह धारा 80झक के प्रावधान एकीकृत या परिणामी कम्पनी पर लागू होंगे जैसे कि वह तब लागू होते यदि एकीकरण करने वाली कम्पनी या डिमर्जड कम्पनी का एकीकरण या 'डिमर्जर' नहीं हुआ होता। धारा 80झक के अन्तर्गत लाभ प्रदान करने का मुख्य उद्देश्य था कि उन्हें बढ़ावा दिया जाये जिन्होंने शुरूआती निवेश किया और उद्यमी खतरा उठाया। इसलिये यह तय किया गया कि उन व्यक्तियों को लाभ उपलब्ध कराने का औचित्य नहीं बनता जिन्होंने यह खतरा नहीं उठाया और योग्य उपक्रम तभी हासिल किया जब खतरा कम हो गया था। इसलिये धारा 80झक में एक नर्इ उप-धारा (12) डाली गर्इ है ताकि यह प्रावधान हो कि उप-धारा (12) के प्रावधान किसी ऐसे उपक्रम या उद्यम पर लागू नहीं होंगे जो 31.03.2007 के बाद एकीकरण या डिमर्जर की योजना में स्थानान्तरित किया गया। इस तरह यदि कोर्इ उपक्रम या उद्यम 31.03.2007 के बाद एकीकरण या डिमर्जर की योजना में हस्तांतरित किया गया, तो धारा 80झक के अन्तर्गत कटौती का लाभ ऐसे एकीकृत या डिमर्जड उपक्रम या उद्यम को प्राप्त नहीं होगा। इस परिपत्र के विषय-वस्तु किसी भी विपरीत बात के ऊपर रहेंगे जो किसी अन्य परिपत्र में इस विषय से सम्बन्ध रखते हैं, जो पहले प्रत्यक्ष कर केन्द्रीय बोर्ड (सी.बी.डी.टी.) द्वारा जारी किया गया हो।

35.2. प्रासंगिकता - यह संशोधन 01.04.2008 से प्रभाव में आयेगा और इस कारण निर्धारण वर्ष 2008-09 और इसके बाद आने वाले वर्षों पर लागू होगा।

(धारा 28)

36. धारा 80झक के अन्तर्गत कर-लाभ के उद्देश्य से आधारभूत सुविधा को बढ़ावा देने की गुजांर्इश।

36.1. धारा 80झक की उप-धारा (4) के खण्ड (1) की व्याख्या, 'आधारभूत सुविधा' को इस तरह परिभाषित करती है कि उसका अभिप्राय होता है सड़क या पथ-कर (टोल रोड) बनाना, पुल या रेलगाड़ी प्रणाली बनाना, राज्य मार्ग योजना बनाना जिसमें आवास भी शामिल हों या अन्य योजनायें शामिल हों, जल आपूर्ति योजना, जल प्रबन्धन संयत्र, सिंचार्इ योजना, साफ-सफार्इ और नालियों की प्रणाली या गैस-मल प्रबन्धन प्रणाली, बन्दरगाह, हवार्इअड्डा, अन्र्तेदेशीय जल-मार्ग या अन्र्तेदेशी बन्दरगाह।

36.2. इस तथ्य को दृष्टि में रखते हुए कि समुन्द्र में नौसंचालन चैनल एक अत्याधिक खतरे की योजना है (जिसमें अत्याधिक पूंजि निवेश की आवश्यकता है) और लम्बी निर्माणपूर्व अवधि, आधारभूत सुविधा की गुंजार्इश बढ़ा दी गर्इ है ताकि समुन्द्र में नौसंचालन चैनल सम्मिलित हों ताकि 10 वष्र्ाीय कर सुविधा, धारा 80झक के अन्तर्गत मिल सके।

36.3. प्रासंगिकता - यह संशोधन 1 अप्रैल, 2008 से लागू होगा, और इस कारण निर्धारण वर्ष 2008-09 और इसके बाद आने वाले वर्षों के सम्बन्ध में लागू होगा।

37. विद्युत-उत्पादन संयत्र के पुननिर्माण या पुनरूत्थान हेतु किसी भारतीय कम्पनी के उपक्रम की विद्युत उत्पादन या वितरण हेतु समय-सीमा बढ़ाना।

37.1. धारा 80झक की उप-धारा (4) के खण्ड (v) के वर्तमान प्रावधानों के अनुसार, एक भारतीय कम्पनी के प्रभुत्व में लगाया गया एक उपक्रम जो विद्युत-उत्पादन संयत्र के निर्माण या पुनरूत्थान के लिये स्थापित किया जाता है, वह 10 वर्ष की कर छूट के योग्य है, यदि वह नीचे दी गर्इ शर्तें पूरी करता है-

a) यह कम्पनी 30.11.2005 से पहले बनार्इ गर्इ और इसमें सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों का बहुमत साम्य योगदान है ताकि जो इसके ऋणदाता हैं उनका इस कम्पनी में सूद की सुरक्षा बनी रहे, जो कम्पनी विद्युत-उत्पादन संयत्र की मालिक है।

b) यह भारतीय कम्पनी 31.12.2005 से पहले केन्द्रीय-सरकार द्वारा अधिसूचित करी गर्इ हो।

c) यह उपक्रम 31 मार्च, 2007 से पहले बिजली उत्पादन या पहुंचाने या वितरण करने का कार्य शुरू कर दे।

37.2. यह बात ध्यान में रखते हुये कि विद्युत उत्पादन संयत्र के पुनरूत्थान के लिये पर्याप्त समय दिया जा रहा है, बिजली उत्पादन या उसके वितरण की समय-सीमा एक वर्ष से बढ़ा दी गर्इ है, यानि इस उपक्रम को बिजल उत्पादन या उसके वितरण का कार्य 31 मार्च, 2008 तक पूरा कर लेना चाहिये।

37.3. प्रासंगिकता - यह संशोधन 1 अप्रैल, 2008 से लागू होगा, इस कारण निर्धारण वर्ष 2008-09 और इसके बाद आने वाले वर्षों के सम्बन्ध में लागू होगा।

[धारा 28]

38. देश-भर में प्राकृति गैस वितरण-प्रणाली लगाने और संचालित करने वाले उपक्रम के मामले में कटौती।

38.1. धारा 80झक की उप-धाराओं (4) और (5) वह गतिविधियों को उल्लिखित करती हैं जो इन धाराओं के अन्तर्गत कटौती के योग्य हैं। यह बात ध्यान में रखते हुये कि गैस की पार्इप लार्इन को कर-रियायत देने से वर्तमान में एल.पी.जी. को मिल रही रियायत से बदला जा सकेगा, एक नया खण्ड (vi), धारा 80झक की उप-धारा (4) में डाला गया है ताकि यह सुविधा प्रदान करी जायेगी कोर्इ भी उपक्रम जो देश भर में प्राकृति गैस की पार्इप लार्इन लगाने और संचालित करके गैस का वितरण कर रहा है, जिसमें पार्इप-लार्इन और भण्डारण सुविधा प्रणाली का अभिन्न अंग है, वह इस धारा के अन्तर्गत कटौती के योग्य होगा, बशर्ते :-

♦ यह उपक्रम भारत की किसी पंजीकृत कम्पनी द्वारा अधिकृत है या ऐसी कम्पनियों के संकाय द्वारा या फिर केन्द्रीय या राज्य नियम द्वारा गठित या स्थापित ऐसा अधिकरण या बोर्ड या निगम।

♦ इसे पैट्रोलियम और प्राकृतिक गैस नियंत्रण बोर्ड, जो धारा 3 की उप-धारा (1) के अन्तर्गत स्थापित है (पैट्रोलियम और प्राकृतिक गैस नियंत्रण बोर्ड नियम, 2006) और केन्द्रीय सरकार के सरकारी राजपत्र में अधिसूचित है, उसका अनुमोदन प्राप्त है।

♦ पार्इप-लार्इन की कुल क्षमता का एक तिहार्इ भाग सामूहिक वाहक के आधार पर उपयोग के लिये उपलब्ध है, किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा जो निर्धारिती नहीं है या उससे जुड़ा कोर्इ व्यक्ति नहीं है।

♦ कि यह 1 अप्रैल, 2007 से कार्य करना शुरू कर दे।

♦ कि यह वह शर्तें पूरी करे जो प्रावधानिक हैं।

38.2. खण्ड (vi) के उद्देश्य से वाक्यांश 'सम्बन्धित व्यक्ति' की परिभाषा से आशय है कोर्इ ऐसा व्यक्ति जो-

♦ जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से या एक या उससे अधिक मध्यस्थकों द्वारा निर्धारिती की पूंजि का प्रबन्धन या उसका नियन्त्रण करता है।

♦ जो संचालन बोर्ड के आधे से ज्यादा निदेशक मण्डल या सदस्यों की नियुक्ति करता है, या निर्धारिती के संचालन बोर्ड के एक या एक से अधिक कार्यकारी निदेशकों या कार्यकारी सदस्यों की नियुक्ति करता है, या

♦ यह सुनिश्चित करता है कि वह निर्धारिती की कुल उधार राशि का कम से कम 10 प्रतिशत का जिम्मेदार है।

38.3. यह भी प्रावधान किया गया है कि उन 15 सालों में से, जो शुरू होते हैं उस वर्ष से जिस वर्ष उपक्रम ने देश-भर में प्राकृतिक गैस की वितरण प्रणाली लगार्इ और उसका संचालन किया, लगातार 10 निर्धारण-वर्षों में कटौती दी जायेगी।

38.4. यह भी प्रावधान किया गया है कि यदि कोर्इ उपक्रम पुराने संयत्र और मशीनों के पुननिर्माण, टूटने या नये कारोबार में स्थानान्तरण होने से बनता है (कुछ अपवादों को छोड़ कर) तो वह धारा 80झक के अन्तर्गत उपर्युक्त कटौती के योग्य नहीं होगा।

38.5. धारा 80झक की उप-धाराओं (2) और (3) में परिणामी संशोधन कर दिये गए हैं।

38.6. प्रासंगिकता - यह संशोधन 1 अप्रैल, 2008 से प्रभाव में आयेंगे और इस कारण निर्धारण वर्ष 2008-09 और इसके बाद आने वाले वर्षों के सम्बन्ध में लागू होंगे।

(धारा 28)

39. धारा 80झख(4) के अन्तर्गत कर-लाभ देने के उद्देश्य से उन औद्योगिक उपक्रमों समय-सीमा बढ़ाना जो जम्मू और कश्मीर राज्य में लगने हैं।

39.1. धारा 80झख की उप-धारा (4) के अन्तर्गत जो वर्तमान प्रावधान हैं, उनके अनुसार वह औद्योगिक उपक्रम जो शीतागार संयत्र में उत्पादित वस्तुऐं या सामान बनाते हैं और जिसकी स्थापना 1 अप्रैल, 1993 और 31 मार्च, 2007 के बीच करी गर्इ, जम्मू और कश्मीर राज्य में, वह मुनाफे पर 100 प्रतिशत कटौती के योग्य हैं, निरन्तर 5 निर्धारण वर्षों की अवधि के लिए व इसके बाद के 5 निर्धारण वर्षों में 25 प्रतिशत की कटौती के योग्य (कम्पनी के मामले में 30 प्रतिशत)। कटौती की सूची में कुछ नकारात्मक वस्तुऐं या सामान नहीं आता जो आयकर नियम की तेरवीं सूची के खण्ड- में उल्लिखित हैं, जिन वस्तुओं का ऐसे औद्योगिक उपक्रमों द्वारा निर्माण या उत्पादन नहीं करा जाना चाहिये।

39.2. जम्मू व कश्मीर राज्य के औद्योगिक विकास को ध्यान में रखते हुए, राज्य में औद्योगिक उपक्रमों और योग्य कारोबार को स्थापित करने की अन्तिम तिथि 5 वर्षों से बढ़ा दी गर्इ है, यानि 31.03.2007 से यह 31.03.2012 हो गर्इ है।

39.3. प्रासंगिकता - यह प्रावधान 1 अप्रैल, 2008 से प्रभाव में आयेगा और इस कारण निर्धारण वर्ष 2008-09 और इसके बाद आने वाले वर्षों से लागू होगा।

(धारा 29)

40. विशेष क्षेत्रों में होटलों और सम्मेलन केन्द्रों के लिये करावकाश।

40.1. 2010 में जो कॉमनवैल्थ खेल होंगे उनमें भारत मेज़बान देश होगा। जो दर्शक उन्हें देखने आयेंगे उनको ठहराने के लिये पर्याप्त संख्या में होटल के कमरे उपलब्ध कराना और सम्मेलन केन्द्रों की संख्या बढ़ाने के लिये, एक नर्इ धारा 80झख डाली गर्इ है ताकि इन क्षेत्रों में होटलों और सम्मेलन केन्द्रों के कारोबार से जो मुनाफा हो उससे सम्बन्धित कटौती का प्रावधान दिया जाए।

40.2. यह प्रावधान किया गया है कि यदि निर्धारिती की कुल आय में वह मुनाफे और फायदे शामिल हैं जो किसी ऐसे उपक्रम से हुए हैं जो होटल के कारोबार या सम्मेलन केन्द्र के निर्माण मालिक होने या संचालन से सम्बन्धित हैं तो उनमें 100 प्रतिशत कटौती की अनुमति होगी, निरन्तर 5 निर्धारण वर्षों तक पहले निर्धारण वर्ष से शुरू करके। पहले निर्धारण वर्ष को ऐसे परिभाषित किया गया है-

- होटल का करोबार शुरू होने से पहले का वर्ष (होटल के मामले में), और

- निर्धारण का वह वर्ष जो उस वर्ष से सम्बन्धित है जिस वर्ष सम्मेलन केन्द्र ने व्यवसायिक आधार पर कार्य करना शुरू किया (सम्मेलन केन्द्र के मामले में)।

40.3. यह नर्इ धारा उस उपक्रम पर लागू होती है जो -

- होटल के कारोबार में है और विशिष्ट क्षेत्र में स्थित है, यदि इस होटल का निर्माण 1 अप्रैल, 2007 और 31 मार्च, 2010 के बीच शुरू होगा या हुआ, या

- सम्मेलन केन्द्र के निर्माण, मालिक होने या संचालन के कारोबार में है, विशिष्ट क्षेत्र में स्थित है, यदि यह सम्मेलन केन्द्र का निर्माण 1 अप्रैल, 2007 और 31 मार्च, 2010 के बीच हुआ।

40.4. नये रूप से डाली गर्इ धारा में यह शर्तें भी निर्धारित हैं :-

♦ योग्य कारोबार का निर्माण पहले से चल रहे कारोबार को तोड़ कर या उसका पुननिर्माण करके नहीं होना चाहिये।

♦ योग्य कारोबार का निर्माण नये कारोबार में हस्तांतरण करके नहीं होना चाहिये, एक ऐसी इमारत में जो पहले होटल या सम्मेलन केन्द्र के तौर पर उपयोग करी जा रही थी।

♦ योग्य कारोबार का निर्माण उन मशीनों या संयत्र का हस्तांतरण नये कारोबार में करके नहीं होना चाहिये जो पहले किसी अन्य उद्देश्य से उपयोग हो रहा था। धारा 80झक की उप-धारा (3) की व्याख्या 1 और 2 के प्रावधान इस शर्त पर भी लागू होंगे।

♦ निर्धारिती को आय-विवरण के साथ रिपोर्ट और लेखा ऐसे रूप और में प्रस्तुत करने चाहिये जैसे विवरण निर्धारित है, विधिवत हस्ताक्षरित एक लेखाकार द्वारा प्रमाणित हों कि कटौती का दावा सही है।

♦ निर्धारिती की कुल आय आंकलित करते समय, अध्याय vi- या धारा 10 कक की किसी अन्य धारा के अन्तर्गत कटौती की अनुमति नहीं होगी, उपक्रम के मुनाफे और फायदे के सम्बन्ध में।

♦ धारा 80झक की उप-धारा (5) और उप-धारायें (8) से (11) में जो प्रावधान हैं, जहां तक होगा इन धाराओं के अन्तर्गत योग्य व्यापार पर लागू होंगे, और

♦ इस धारा हेतु, होटल से अभिप्राय होगा 2-सितारा, 3-सितारा और 4-सितारा होटलों का जो केन्द्र सरकार द्वारा वर्गीकृत होते हैं और विशिष्ट क्षेत्र से अभिप्राय होगा दिल्ली का राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और फरीदाबाद, गुड़गांव, गौतम-बुद्ध नगर और गाजियाबाद जिले।

40.5. केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सी.बी.डी.टी.) ने नियम 18घड. अधिसूचित किया और फॉर्म 10सी.सी.डी.ए. देखिये अधिसूचना संख्या एस.ओ. 1989(ड.), दिनांक 27 नवम्बर, 2007, जिसमें सम्मेलन केन्द्रों का क्षेत्र, क्षेत्रफल, संख्या व अन्य शर्तें निर्धारित हैं और होटलों और सम्मेलन केन्द्रों, दोनों ही की लेखा-रिपोर्ट के उद्देश्य से फार्म भी जारी किया है।

40.6. प्रासंगिकता - यह संशोधन 1 अप्रैल, 2008 से प्रयोग में आयेंगे और इस कारण निर्धारण वर्ष 2008-09 और इसके बाद आने वाले वर्षों के सम्बन्ध में लागू होंगे।

(धारा 31)

41. उन उपक्रमों के लिये करावकाश के लाभ का बढ़ावा, जो उत्तर पूर्वी राज्यों (सिक्किम समेत) में स्थित हैं।

41.1. धारा 80झग के अन्तर्गत करावकाश का लाभ उस उपक्रम को उपलब्ध है जो उत्तर-पूर्वी राज्य में स्थित है, बशर्तें वह संवैधानिक शर्तें पूरी करें। लेकिन धारा 80झग के अन्तर्गत यह लाभ तब नहीं दिया जायेगा जब कोर्इ उपक्रम 31 मार्च, 2007 के बाद कोर्इ वस्तु या सामान का निर्माण करे या ठोस बढ़ावा करे। लेकिन, सिक्किम के मामले में, अन्तिम तारीख 31 मार्च, 2012 थी। यह अन्तिम तिथि भी संशोधन करके 31 मार्च, 2007 कर दी गर्इ है, वित्त नियम, 2007 के द्वारा।

41.2. एक नर्इ धारा 80झड. डाल दी गर्इ है ताकि उस उपक्रम को कर-लाभ दिये जा सकें जो उत्तर-पूर्व के किसी भी स्थान में स्थित है (सिक्किम समेत), और 1 अप्रैल, 2007 से लेकर 31 मार्च, 2017 के बीच की अवधि में, शुरू किया है या शुरू करेगा-

♦ कोर्इ योग्य वस्तु या सामान का निर्माण या उत्पादन।

♦ कोर्इ योग्य वस्तु या सामान के निर्माण या उत्पादन के कार्य को ................

♦ कोर्इ भी योग्य कारोबार करना।

41.3. योग्य वस्तु या सामान की परिभाषा है वह वस्तु या सामान जो इनमें से नहीं है :-

♦ केन्द्रीय राज्य-कर शुल्क नियम, 1985 (1985 का 5) की पहली अनुसूचि के अध्याय 24 के अन्तर्गत जो वस्तुऐं आती हैं जो तम्बाकू और तम्बाकू के स्थान पर निर्मित वस्तुऐं।

♦ केन्द्रीय राज्यकर शुल्क नियम, 1985 (1986 का 6) की पहली अनुसूचि के अध्याय 21 के अन्तर्गत आने वाला पान-मसाला।

♦ पर्यावरण और वानिकी मन्त्रालय द्वारा निर्धारित वह प्लास्टिक की थैलियां जिनकी मोटार्इ 20 मार्इक्रोन से कम है, देखिये अधिसूचना नं0 एस.ओ. 705(ड.), दिनांक 2 सितम्बर, 1999 और एस.ओ. 698(ड.), दिनांक 17 जून, 2003, और

♦ केन्द्रीय राज्यकर शुल्क नियम, 1985 (1986 का 5) की पहली अनुसूचि के अध्याय 27 में आने वाली वस्तुऐं, जो पैट्रोलियम तेल व गैस रिफार्इनरी द्वारा उत्पादित होती हैं।

41.4. योग्य कारोबार की परिभाषा है वह कारोबार जो हो-

♦ होटलों का (2-सितारा से कम नहीं)

♦ साहसिक और फुर्सत वाले खेल (रज्जो मार्ग समेत)

♦ चिकित्सा व स्वास्थ्य सेवायें प्रदान करने हेतु नर्सिंग होम खोलना जिसमें कम से कम 25 बिस्तर उपलब्ध हों।

♦ वृद्धावस्था-आश्रम खोलना।

♦ होटल मैनेजमेंट, खान-पान व खाना की कला, उद्यम वृत्ति, उद्यम विकास कार्यक्रम, नर्सिंग व अर्ध-चिकित्सा, नागरिक उद्यम प्रशिक्षण, फैशन डिजार्इन और औद्योगिक प्राशिक्षण संस्थाऐं चलाना।

♦ सूचना प्रौद्योगिकी से सम्बन्धित प्रशिक्षण केन्द्र चलाना।

♦ सूचना प्रौद्योगिकी के हार्डवेयर का निर्माण, और

♦ जैव प्रौद्योगिकी।

41.5. इस धारा के अन्तर्गत कटौती निरन्तर 10 निर्धारण वर्षों के लिये उपलब्ध है, पहले निर्धारण वर्ष से शुरू होकर, यानि वह निर्धारण वर्ष जो उस पिछले वर्ष से सम्बर्न्धित है, जिसमें उपक्रम ने वस्तुऐं या सामान बनाना प्रारम्भ किया या ठोस बढ़ावा सम्पूर्ण किया या योग्य कारोबार शुरू किया।

41.6. नर्इ डाली गर्इ धारा में निम्नलिखित शर्तें भी प्रावधानिक हैं :-

♦ उद्यम का निर्माण किसी पूर्व स्थापित कारोबार को तोड़ कर या उसका पुननिर्माण करके नहीं होना चाहिये। यह शर्त उस उपक्रम के सम्बन्ध में लागू नहीं होगी जिसका निर्माण निर्धारिती के उस कारोबार या उपक्रम के पुन: स्थापन, पुननिर्माण या पुनरूत्थान द्वारा किया जाता है, जो धारा 33 में सन्दर्भित है, उन परिस्थितियों और उस अवधि के अन्तर्गत जो धारा में निर्धारित है।

♦ उसका निर्माण नये कारोबार में पहले उपयोग करी गर्इ मशीनों या संयत्र के हस्तांतरण द्वारा नहीं होना चाहिये। धारा 80झक की उप-धारा (3) की व्याख्या 1 और 2 के प्रावधान इस स्थिति पर भी लागू होंगे।

♦ एक निर्धारिती, जो धारा 80झड. के अन्तर्गत इस उपक्रम के मुनाफे और फायदे के सम्बन्ध में कटौती का हकदार है, वह अध्याय vi- की अन्य किसी धारा, या धारा 10 या धारा 10कक या धारा 10 या धारा 10खक के सम्बन्ध में कथित मुनाफे और फायदे के सम्बन्ध में कटौती का हकदार नहीं होगा।

♦ धारा 80झड. के अन्तर्गत कटौती की कुल अवधि के आंकलन के लिये वह अवधि भी सम्मिलित करी जायेगी जिसमें धारा 80झख(4) या धारा 80झग या धारा 10 के दूसरे परन्तु क के अन्तर्गत कटौती की अनुमति थी। दूसरे शब्दों में, धारा 80झड में निर्धारित तिथियों के पहले जो उपक्रम स्थापित हुये हैं, और धारा 80झख या 10 या 80झग के अन्तर्गत कटौती के योग्य हैं, वहां धारा 80झड के अन्तर्गत कटौती का दावा करने की समुचित अवधि 10 वर्ष से अधिक नहीं होगी।

♦ धारा 80डक की उप-धारा (5) और उप-धारायें (7) से (12) में जो प्रावधान हैं, वह इस धारा के अन्तर्गत जो उपक्रम हैं, उन पर भी लागू होंगे।

41.7. प्रासंगिकता - यह प्रावधान 01.04.2008 से प्रभाव में आयेंगे और इस तरह निर्धारण वर्ष 2008-09 और उसके बाद आने वाले वर्षों के सम्बन्ध में लागू होंगे

[धाराए 30 & 32]

42. धारा 80क और 80कग में परिणामी संशोधन।

42.1. धारा 80झघ और 80झड के अन्तर स्थापन के बाद, धारा 80क की उप-धारा (2) और धारा 80कग में भी संशोधन किये गए हैं ताकि वह उन निर्धारितियों पर भी लागू हों सकें जो धारा 80झघ और धारा 80झड के अन्तर्गत कटौती के हकदार होते हैं।

42.2. यह संशोधन 1 अप्रैल, 2008 से प्रभाव में आयेंगे, और इस कारण निर्धारण वर्ष 2008-09 और इसके बाद के निर्धारण वर्षों के सम्बन्ध में लागू होंगे।

42.3. धारा 80 की उप-धारा (3) में भी पूर्वव्यापी संशोधन करे गये हैं ताकि यह धारा 80कग के अन्तर्गत कटौती का दावा करने वाले व्यक्तियों पर लागू हो सके।

42.4. यह संशोधन पूर्वव्यापी रूप् से 1 अप्रैल, 2004 से लागू होगा, और इस कारण निर्धारण वर्ष 2004-05 और इसके बाद आने वाले वर्षों के सम्बन्ध में लागू होगा।

[धाराए 22 & 23]

43. उस मामले में समय-सीमा को बढ़ाना। जब आंकलन करने के लिये अंतरण मूल्य-निर्धारण अधिकारी को सन्दर्भित किया जाता है।

43.1. नियम के वर्तमान प्रावधानों में कर-निर्धारण अधिकारी को अतिरिक्त समय नहीं दिया जाता कि वह उन मामलों का निर्धारण पूरा करे या पुन:निर्धारण करे जहाँ उनके द्वार मूल्य-निर्धारण अधिकारी को धारा 92सी.ए. के अंतर्गत सन्दर्भित किया जाता है ताकि वह अन्तर्राष्ट्रीय लेन-देन के मामले में न्यूनतम मूल्य निर्धारित करें। क्योंकि कर-विवरण भरने के बाद एक वर्ष का समय मिलता है, मामलों की जाँच करने के लिये, मूल्य-निर्धारण अधिकारी को अधिकांश मामलों में विवरण भरने के एक वर्ष बाद ही सन्दर्भित किया जाता है। इस प्रकार मूल्य-निर्धारण अधिकारियों को उन मामलों में अर्थपूर्ण लेखा-परीक्षण करने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता जहाँ उन्हें इन मामलों में सन्दर्भित किया जाता है।

43.2. यह बात को ध्यान में रखते हुए कि अन्तरण मूल्य-निर्धारण अधिकारियों को अन्तरण-मूल्य का लेखा-परीक्षण करने का पर्याप्त समय मिले और उन्हें अंतर्राष्ट्रीय कार्य-सम्पादन के मामलों में आंकलन करने के लिये भी पर्याप्त समय मिले, जिन मामलों में अन्तरण मूल्य-निर्धारण अधिकारी को सन्दर्भित किया गया है, धारा 153 और 153 में जो समय-सीमा निर्धारित करी गर्इ थी, उसे बदला गया है। ऐसे मामलों में संशोधित समय-सीमा वह होगी जो पहले उल्लिखित धाराओं में निर्धारित करी गर्इ थी, 12 महीने का समय जुड़ने के बाद। आगे, यह भी प्रावधानित किया गया है कि अन्तरण मूल्य निर्धारण अधिकारी संवैधानिक समय-सीमा की समाप्ति होने से कम से कम 2 महीने पहले न्यूनतम मूल्य तय करेगा ताकि आंकलन या पुन: आंकलन करा जा सके। इस तरह कानून में समय-सीमा प्रदान करी गर्इ हैं, जिससे (टी.पी.ओ.) पर यह बाध्य हो जाता है कि वह निर्धारित अवधि में अन्तरण-मूल्य का लेखा परीक्षण पूरा करे।

43.3. धारा 92गक की उप-धारा (4) के प्रावधानों के अन्तर्गत यह सुविधा है कि कथित धारा की उप-धारा (3) के अन्तर्गत जब ऑर्डर की रसीद प्राप्त होती है, तो आंकलन अधिकारी निर्धारिती की कुल आय का आंकलन द्वारा 92 की उप-धारा (4) के अन्तर्गत करेगा, यह ध्यान में रखते हुए कि अन्तरण-मूल्य निर्धारण अधिकारी (टी.पी.ओ.) ने उप-धारा (3) के अन्तर्गत क्या न्यूनतम

43.4. धारा 92गक की उप-धारा (4) को संशोधित किया गया है ताकि धारा 92गक की उप-धारा (3) के अन्तर्गत, ऑर्डर की रसीद की प्राप्ति पर निर्धारण अधिकारी निर्धारिती की कुल आय का आंकलन धारा 92 की उप-धारा (4) के अन्तर्गत करेगा, यह ध्यान में रखते हुये कि अन्तरण-मूल्य निर्धारण अधिकारी के द्वारा उप-धारा (3) के अन्तर्गत न्यूनतम मूल्य क्या तय किया गया है। इसलिए प्रावधानों में संशोधन के बाद, अन्तरण मूल्य निर्धारण अधिकारी (टी.पी.ओ.) द्वारा जो मूल्य तय किया गया है, वह निर्धारण अधिकारी पर बाध्य होगा।

43.5. प्रासंगिकता - यह संशोधन तब लागू होंगे जब अन्तरण मूल-निर्धारण अधिकारी को 1 जून, 2007 को या उसके बाद सन्दर्भित किया गया हो और उन मामलों में भी लागू होंगे जब 01.06.2007 से पहले (टी.पी.ओ.) को सन्दर्भित किया गया हो, परन्तु उसने (टी.पी.ओ.) उप-धारा (3) के अन्तर्गत ऑर्डर पास (पारित) नहीं किया हो, कथित तारीख से पहले।

[धाराए 33, 48 & 49]

44. न्यूनतम वैकल्पिक कर की गुजार्इश को बढ़ाना ताकि आयकर नियम की धारा 10क और 10ख के अन्तर्गत जो कर की माफी है वह भी सम्मिलित हो जाये।

44.1. न्यूनतम वैकल्पिक कर (एम.ए.टी.) के प्रावधान आयकर नियम की धारा 115त्रख और 115त्रकक द्वारा शासित हैं। इन धाराओं में (एम.ए.टी.) लागू करने और उसका आंकलन करने का प्रावधान है, और (एम.ए.टी.) द्वारा उत्पन्न कर-ऋण को आगे ले जाने और इसकी क्षतिपूर्ति करने का प्रावधान ही है।

44.2. (एम.ए.टी.) कम्पनियों की आय पर लागू होता है, केवल उस आय पर नहीं जो किसी ऐसे कारोबार या सेवा के चलाने या देने से, जो एक उद्यमी या विकासक किसी खास आर्थिक-क्षेत्र (एस.र्इ.जैड.) की इकार्इ में करता है। वित्त नियम, 2007 के व्यवस्थापन के पहले, (एम.ए.टी.) के आंकलन की जो प्रणाली थी वह भी उस आय को सम्मिलित नहीं करती थी, जो धारा (10) के अन्तर्गत मुक्त थी या कटौती के रूप् में अनुमोदित थी (धारा 10(38) के अलावा) धारा 10, धारा 11 और धारा 12 इस तरह आय को (एम.ए.टी.) के दायरे से बाहर रखना, (एम.ए.टी.) को लाने के मूल सिद्धान्त के विरूद्ध है जिसमें यह प्रयोजन है कि प्रत्येक संगठित कर-दाता, जो देश की अर्थव्यवस्था में भागीदार है, उसे राजकोष में अपने बहि-लाभ पर न्यूनतम राशि का कर देना चाहिये। इसके अनुसार खण्ड (f) और खण्ड (ii) जो उप-धारा (2), धारा 115त्रख के बाद आते हैं, उन्हें वित्त नियम, 2007 द्वारा संशोधित किया गया है, ताकि धारा 10 और 10 के सन्दर्भ को छोड़ा जा सके।

44.3. इसलिये निर्धारण वर्ष 2008-09 और उसके बाद, जब (एम.ए.टी.) का आंकलन किया जाता है (धारा 115त्रख के अन्तर्गत), तो बहि-लाभ को उस रकम से बढ़ाया नहीं जायेगा जो उस आय से सम्बन्धित है जिस पर धारा 10 या 10 पर लागू होती है। इसी तरह, आय की वह रकम जिस पर धारा 10 या 10 के प्रावधान लागू होते हैं, उन्हें बहि-लाभ से कम नहीं किया जायेगा जब धारा 115त्रख के अन्तर्गत देयित आयकर का आंकलन करना होगा। दूसरे शब्दों में, वह आय जिस पर धारा 10 या धारा 10 लागू होती है, वह (एम.ए.टी.) के प्रावधानों से शासित होगी।

44.4. प्रासंगिकता - यह प्रावधान 01.04.2008 से प्रयोग में आयेगा और इस कारण निर्धारण वर्ष 2008-09 और बाद के निर्धारण वर्षों के सम्बन्ध में लागू होगा।

(धारा 34)

45. विशेष मामलों में (वितरित मुनाफे) पर कर की दरों में बढ़ोत्तरी।

45.1. धारा 115- की उप-धारा (1) जो अध्याय XII-, और अन्य विषयों के अन्तर्गत जो घोषित राशि है, 1 अप्रैल, 2003 को या उसके बाद किसी घरेलू कम्पनी द्वारा वितरित या भुगतानित करी गर्इ, चाहे चालू या समुचित फायदे में से, उसे अतिरिक्त आयकर में जोड़ा या प्रभारित किया जायेगा या 'वितरित मुनाफे पर कर' के रूप में 12.5 प्रतिशत पर आंकलन करा जायेगा।

45.2. उपर्युक्त मुनाफे पर कर को 12.5 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया गया है।

45.3. यह संशोधन 1 अप्रैल, 2007 से लागू होगा।

45.4. धारा 115 की उप-धारा (2) जो अध्याय XII-ड. में है, अन्य विषयों के साथ, में यह प्रावधान है कि आय की कितनी भी रकम जो विशिष्ट कम्पनी या 'म्यूचुअल' फण्ड द्वारा वितरित करी गर्इ है, सभी यूनिट-धारकों को, वह कर को प्रभारित होगी और ऐसी कम्पनी या 'म्यूचुअल' फण्ड को इस वितरित आय पर अतिरिक्त आयकर भरने का दायित्व होगा, इस दर पर-

i) किसी व्यक्ति को वितरित आय पर 12.5 प्रतिशत, यदि वह एक व्यक्तिगत इन्सान है या हिन्दू अविभाजित परिवार है।

ii) किसी अन्य व्यक्ति को वितरित है तो 20 प्रतिशत।

45.5. उपर्युक्त उप-धारा (2) को संशोधित किया गया है ताकि किसी कम्पनी या म्यूचुअल फण्ड द्वारा वितरित आय जो वह यूनिट-धारकों को देते हैं, वह 'कर' को प्रभारित होगी और ऐसी कम्पनी या म्यूचुअल फण्ड पर यह दायित्व होगा कि वह ऐसे वितरित आय पर अतिरिक्त आयकर भरें, इन दरों पर-

i) मुद्रा-बाजार या चल-फण्ड द्वारा वितरित आय पर 25 प्रतिशत।

ii) मुद्रा-बाजार या चल-फण्ड के अलावा अन्य फण्ड द्वारा वितरित आय, जो किसी व्यक्ति, या हिन्दू अविभाजित परिवार को दी जाती है, उस पर 12.5 प्रतिशत।

iii) मुद्रा-बाजार या चल-फण्ड के अलावा अन्य फण्ड द्वारा वितरित आय, जो किसी व्यक्ति को दी जाती है, उस पर 20 प्रतिशत।

45.6. इस तरह, ऊपर किये गये संशोधन द्वारा, मुद्रा-बाजार या चल-फण्ड द्वारा वितरित किये जाने वाली आय के सम्बन्ध में कर का नया दर निर्धारित किया गया है। मुद्रा-बाजार या चल-फण्ड के अलावा वितरित किये जाने वाली आय पर 'कर' का वही 'दर' लागू होगा जो पहले से विद्यमान है।

45.7. इस उद्देश्य से 'मुद्रा बाजार म्यूचुअल फण्ड' और 'चल-फण्ड' को धारा 115 की व्याख्या में परिभाषित किया गया है। 'मुद्रा बाजार म्यूचुअल फण्ड' को इस तरह परिभाषित किया गया है जो भारतीय प्रतिभूतियां और विनियम बोर्ड (म्यूचुअल फण्ड) नियम, के उप-खण्ड (P), खण्ड (2) में परिभाषित है। इस तरह 1996 'चल फण्ड' की परिभाषा यह करी गर्इ है कि म्यूचुअल फण्ड की वह प्रणाली या योजना जो सेबी द्वारा 'चल फण्ड' के रूप में वर्गीकृत है, उन दिशा-निर्देशों के अनुसार जो इस हेतु सेबी नियम, 1992 के अन्तर्गत जारी करी गर्इ है।

45.8. प्रासंगिकता - यह संशोधन 1 अप्रैल, 2007 से लागू होंगे।

(धारा 35, 36 और 37)

46. अनुशंगी लाभ-कर का परिमयकरण।

46.1. आयकर नियम के अध्याय XII- के प्रावधानों के अनुसार, एक नियोक्ता, यदि एक कम्पनी है, तो उसका दायित्व है कि वह अनुशंगी लाभ-कर (FBT) प्रदान करे, उस सम्बन्ध में जिस हक से वह मानती है कि वह अपने कर्मचारियों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में अनुशंगी-लाभ दे रही है, पिछले साल हेतु।

46.2. इस उद्देश्य से कि नियोक्ता अपने कर्मचारियों को जो पूंजि विकल्प प्रदान करती है, उसे एफ.बी.टी. के दायरे में लाया जाए, वित्त नियम, 2007 ने धारा 115बख की उप-धारा (1) में एक नया खण्ड () अन्तर स्थापित किया था। कथित धारा 115बग की उप-धारा (1) में एक नया खण्ड (खक) अन्तर स्थापित किया गया है ताकि ऐसे मामलों में अनुशंगी-लाभ का आंकलन किया जा सके। इस प्रावधान के मुख्य पहलू यह हैं :-

i) FBT उन सब मामलों में लागू होगा जहां निर्धारित प्रतिभूमि या परिश्रमी सामान्य शेयर नियोक्ता द्वारा अपने कर्मचारियों को आबंटित या हस्तांतरित किये गए हैं।

ii) FBT उससे पिछले वर्ष देयित्व होगा जिस वर्ष यह आबंटन या हस्तांतरण हुआ।

iii) नये खण्ड के प्रावधान लागू होंगे चाहे आबंटन या हस्तांतरण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से करा गया हो।

iv) नये खण्ड के प्रावधान लागू होंगे चाहे आबंटन या हस्तांतरण लागत-रहित किया गया हो या रियायती दरों पर।

v) नये खण्ड के प्रावधान लागू होंगे चाहे आबंटन या हस्तांतरण वर्तमान या भूतपूर्व कर्मचारी या कर्मचारियों को किया गया है।

vi) नये खण्ड के प्रावधान लागू होंगे उन मामलों में जहां आबंटन या हस्तांतरण 1 अप्रैल, 2007 को या उसके बाद करा गया हो।

vii) ऐसे मामलों में अनुशंगी लाभ का मूल्य इस फॉर्मूले के अनुसार निकाला जायेगा-

A-B

जहां = निष्पक्ष बाजार मूल्य (एफ.एम.वी.) उस निर्धारित प्रतिभूमि या परिश्रमी सामान्य शेयरों की जिस तारीख को विकल्प चुना गया।

= वह रकम, अगर कुछ है, जो कर्मचारी द्वारा भुगतानित करी गर्इ या उससे वापस ली गर्इ।

46.3. वाक्यांश 'निर्धारित प्रतिभूति' और परिश्रमी सामान्य शेयर को भी परिभाषित किया गया है। अनुशंगी-लाभ का मूल्य उस पर निर्धारित है कि अनुशंगी-लाभ पर (एफ.एम.वी.) का वर्तमान दर क्या है, जो वर्तमान में शिक्षा उपकर व अधिशुल्क व 30 प्रतिशत है।

46.4. वाक्यांश 'निष्पक्ष बाजार दर' की परिभाषा के अनुसार वह मूल्य है जो उस प्रणाली के अनुसार निकाला गया है जैसा बोर्ड में प्रावधानित है। 'विकल्प' को 'हक' माना गया है परन्तु एक आभार नहीं जो एक कर्मचारी को दिया जा रहा है कि वह निर्धारित प्रतिभूति या परिश्रमी सामान्य शेयर के लिये पूर्व निर्धारित मूल्य पर आवेदन कर सके।

46.5. केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर-बोर्ड (सी.बी.डी.टी.) ने अधिसूचना एस.ओ. नं0 1805 ( ड.), दिनांक 23 अक्टूबर, 2007 के जरिये आयकर नियमों में नियम 40 अन्तर स्थापित किया है, जिसमें वह प्रणाली निर्धारित करी गर्इ है जिससे प्रतिभूति और परिश्रमी सामान्य शेयर की निष्पक्ष बाजार-मूल्य तय हो सके, उसे कम्पनी का शेयर मानते हुये। इस नियम के मुख्य पहलू हैं :-

i) उस मामले में जब विकल्प लिया जा रहा है, कम्पनी का शेयर, माने हुए 'स्टॉक-एक्सचेंज' पर सूचिबद्ध है, निष्पक्ष बाजार मूल्य वह होगा जो उस 'स्टॉक एक्सचेंज' पर उस दिन के प्रारम्भिक भाव और 'बन्द-भाव' का औसत होगा।

ii) अगर विकल्प लेने की तारीख पर, शेयर एक से ज्यादा स्टॉक-एक्सचेंज पर सूचिबद्ध है तो, निष्पक्ष बाजार मूल्य वह होगा जो उस 'स्टॉक-एक्सचेंज' के प्रारम्भिक भाव और 'बन्द भाव' का औसत होगा जो 'स्टॉक एक्सचेंज' उस शेयर पर सबसे अधिक व्यापार दर्ज करेगा,

iii) अगर 'विकल्प' लेने वाली तारीख पर, किसी भी माने हुए 'स्टॉक-एक्सचेंज' में उस दिन कोर्इ व्यापार नहीं होता, तो निष्पक्ष बाजार मूल्य वह होगा जो,-

) किसी मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेंज का शेयर का बन्द-भाव जो उस तारीख को रिकार्ड कर गया जो विकल्प लेने की तारीख से सबसे नजदीक है और इसके ठीक पहले है, या

) किसी मान्यता प्राप्त स्टॉक-एक्सचेंज का 'बन्द-भाव', जो उस शेयर का सबसे अधिक व्यापार रिकार्ड करता है, यदि जो 'बन्द-भाव' है विकल्प लेने की तारीख से सबसे नजदीक है और उससे पहले है, वह एक से अधिक 'स्टॉक-एक्सचेंज' पर रिकार्ड किया जाता है।

iv) ऐसे मामले में जहां, विकल्प लेने की तारीख को, कम्पनी में वह शेयर मान्यता प्राप्त 'स्टॉक-एक्सचेंज' पर सूचिबद्ध नहीं है तो, निष्पक्ष बाजार मूल्य वह होगा जो कम्पनी में उस शेयर की कीमत है, जो किसी (वर्ग 1 के) श्रेष्ठी बैंकर द्वारा निर्धारित तारीख पर सेबी में रजिस्ट्रीकृत है।

v) निर्धारित तारीख की परिभाषा यह दी गर्इ है,-

i) विकल्प लेने या स्थापित करने की तारीख, या

ii) विकल्प लेने से पहले की कोर्इ भी तारीख, जो विकल्प लेने की तारीख से 180 दिन पहले ना हो।

46.6. आगे, केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर-बोर्ड ने आयकर नियमों में एक नया नियम अन्तरस्थापन किया है, देखिये अधिसूचना एस.ओ. नं0 113 ( ड.), दिनांक 18.01.2008, जिससे विशिष्ट प्रतिभूति का निष्पक्ष बाजार मूल्य निश्चित करने की प्रणाली निर्धारित करी गर्इ है, बशर्ते कि वह कम्पनी में सामान्य शेयर ना हो। इसी अधिसूचना द्वारा, नियम 40 में भी संशोधन करके ''सामान्य शेयर'' की परिभाषा को छोड़ दिया गया है।

46.7. धारा 115बग की उप-धारा (1) में खण्ड (खक) के अन्तरस्थापन से यह प्रावधान मिल रहा था कि धारा 115बख की उप-धारा (1) के खण्ड ( ) द्वारा अनुशंगी-लाभ का आंकलन हो पा रहा था, इसके बाद धारा (49) में एक नर्इ उप-धारा (2कख) अन्तरस्थापित करी गर्इ है।

46.8. यह नर्इ उप-धारा यह प्रावधान करती है कि निर्धारित प्रतिभूति या परिश्रमी सामान्य शेयर को प्राप्त करने का मूल्य वह निष्पक्ष-बाजार मूल्य होगा जो धारा 115बग की उप-धारा (1) के नये खण्ड (खक ) के अन्तर्गत अनुशंगी लाभ का आंकलन करने के लिये ध्यान में रखा जाता है।

46.9. धारा (2) के खण्ड (42) की व्याख्या 1 में एक नया उप-खण्ड (h ) अन्तरस्थापित किया गया है। इस नये उप-खण्ड में यह प्रावधान है कि कर्मचारी के पास धारक के रूप में जो समयावधि है निर्धारित प्रतिभूति या परिश्रमी सामान्य शेयर के सम्बन्ध में, वह उस दिन (तारीख) से मानी जायेगी, जिस तारीख को यह प्रतिभूति या शेयर आबंटित या स्थानान्तरित करे गये।

46.10. एक नर्इ धारा 115बटक भी अन्तरस्थापित करी गर्इ है ताकि कर्मचारी से वह अनुशंगी लाभ-कर वापस लिया जा सके उन निर्धारित प्रतिभूति या परिश्रमी सामान्य शेयरों के सम्बन्ध में जो कर्मचारी को 1 अप्रैल, 2007 को या उसके बाद आबंटित या हस्तांतरित करे गये।

46.11. यह निर्धारित किया गया है कि नियोक्ता उस अनुबन्ध या योजना में बदलाव ला सकता है जिसके अन्तर्गत निर्धारित प्रतिभूति या परिश्रमी सामान्य शेयर आबंटित या हस्तांतरित करे गये। इसमें बदलाव लाने का उद्देश्य यह होगा कि कर्मचारी से अनुशंगी लाभ-कर की प्राप्ति उस हद तक करी जाये जिस तक नियोक्ता का दायित्व बनता है कि वह अनुशंगी लाभ-कर का भुगतान करे उस सम्बन्ध में जिसमें उस कर्मचारी को निर्धारित प्रतिभूति या परिश्रमी सामान्य शेयर आबंटित या हस्तांतरित किये जाते हैं।

46.12. ऊपर दिये गए संशोधन का एक उदाहरण द्वारा व्याकरण किया जा रहा है

उदाहरण - "X" नामक कम्पनी अपने "R" नामक कर्मचारी को 1 अप्रैल, 2004 को कम्पनी के 100 शेयर प्रदान करती है, पूर्व निर्धारित मूल्य, 50 रूपये प्रति शेयर, व विकल्प लेने की तिथि है 1 अप्रैल, 2006 और प्रयोग अवधि है 1 अप्रैल, 2006 से लेकर 31 मार्च, 2010.

कर्मचारी "R" अपना विकल्प 31 मार्च, 2007 को प्रयोग करता है और उसे शेयर का आबंटन या हस्तांतरण 3 अप्रैल, 2007 को होता है। 25 अक्टूबर, 2007 को यह शेयर 200/प्रति शेयर के भाव से बेचे जाते हैं। विकल्प लेने की तारीख को, शेयरों का निष्पक्ष बाजार मूल्य 80/प्रति शेयर था। उपर्युक्त स्थिति का कर निहितार्थ यह होगा :-

क्योंकि शेयरों का आबंटन या हस्तांतरण 1 अप्रैल, 2007 को या उसके बाद हुआ, अनुशंगी कर-लाभ का प्रावधान लागू होगा। कर्मचारी "R" के सम्बन्ध में अनुशंगी लाभ है (80-50) × 100= 3,000

"X" कम्पनी अनुशंगी कर-लाभ, 3,000 रूपये पर देगी। कर्मचारी "R" के हाथ में प्राप्त करने की लागत है = 80 रूपया/प्रति शेयर पूंजिगत मुनाफा = (200-80) × 100 = 12,000 रूपया।

धारक होने की अवधि - 3 अप्रैल, 2007 से 25 अक्टूबर, 2007, यानि 12 महीने से कम। इसलिये यह रकम अल्पकालीन पूंजिगत मुनाफे को प्रभारित होगी।

46.13. उपर्युक्त संशोधन के कारण जो मामले उठ रहे हैं वह परिपत्र संख्या 9/2007, दिनांक 20.12.2007 में व्याख्यित करे गए हैं।

46.14. धारा 115बख की उप-धारा (2) कुछ व्ययों (खर्चों) या भुगतानों को अनुशंगी लाभ मानती है। धारा 115बख की उप-धारा (2) के खण्ड () का परन्तुक बिक्री बढ़ाने वाले इश्तहार व विज्ञापन हेतु जो खर्चा होता है उसे नहीं मानती। परन्तुक का खण्ड (v) विज्ञापन की कुछ वस्तुओं को खर्चे के दायरे से बाहर रखता है। परन्तुक का खण्ड (vii) डॉक्टरों को दिये गए दवार्इ के मुफ्त नमूनों और चिकित्सा यन्त्रों को खर्चें से बाहर रखता है।

46.15. कर्मचारियों को छूट प्रदान करने के लिये ऐसे अपवादों के दायरे को बढ़ाया गया है, उपर्युक्त परन्तुक के खण्ड (v) को संशोधित किया गया है और परन्तुक के खण्ड (vii) का स्थानापन्न किया गया है ताकि उत्पादों के प्रदर्शन और मुफ्त नमूनों के वितरण या रियायती मूलों पर दिये गए 'सैम्पल', जो डॉक्टरों या अन्य व्यक्तियों को दिये जाते हैं, पर जो खर्च होता है, उसे अनुशंगी लाभ आंकलित करने में सम्मिलित नहीं किया जाए।

46.16. प्रासंगिकता - यह संशोधन 1 अप्रैल, 2008 से लागू होंगे और इस कारण निर्धारण वर्ष 2008-09 और उसके बाद के निर्धारण वर्षों के सम्बन्ध में लागू होंगे।

(धारा 3, 17, 38, 39 व 41)

47. अनुशंगी-लाभ पर जो पूर्व-कर भुगतान करने की तिथि है उस तिथि का सरेखण उस तिथि से करना जिस तिथि को पूर्व-आयकर भुगतानित करना होता है।

47.1. धारा 115बत्र में प्रावधान है कि हर निर्धारिती जो चालू अनुशंगी लाभ पर पूर्व कर देने का उत्तरदायी है, वह इसे स्वेच्छा से देगा।

47.2. धारा 115बत्र की उप-धारा (2) में यह प्रावधान था कि धारा 115बग में जो अनुशंगी लाभ के मूल्य पर उस वित्त वर्ष का जो पूर्व-कर भुगतान योग्य है, उसे हर तीन महीने पूरे होने पर महीने की 15 तारीख या उसके बाद दिया जायेगा। लेकिन वित्त वर्ष की वह तिमाही जो 31 मार्च को समाप्त हो रही है, उसे महीने का पूर्व-कर 15 मार्च या उससे पहले भुगतानित किया जायेगा।

47.3. धारा 115बत्र की उप-धारा (3) में यह प्रावधान था कि यदि निर्धारिती ने किसी भी तिमाही का पूर्व-कर नहीं भरा है या जिस मामले में उसने अनुशंगी लाभ के मूल्य का 30 प्रतिशत से कम भुगतानित किया है, तो उस पर दायित्व होगा कि वह उस रकम पर 1 प्रतिशत से साधारण ब्याज अदा करेगा, जिस रकम से पूर्व-कर अनुशंगी कर के मूल्य के 30 प्रतिशत से कम पड़ रहा है (किसी भी तिमाही में), हर उस महीने या महीने के हिस्से में जब तक कमी पूरी नहीं हो जाती।

47.4. उपर्युक्त धारा की उप-धारा (2) का स्थानापन्न किया गया है ताकि यह प्रावधान हो कि चालू अनुशंगी लाभ पर जो पूर्व-कर है वह सभी कम्पनियों द्वारा अदा किया जायेगा, जिन पर दायित्व है कि वह प्रत्येक वित्त वर्ष इसे चार किश्तों में अदा करें। ये कम्पनियां इस पूर्व-कर की 15 प्रतिशत से कम रकम नहीं चुकायेंगी, 15 जून या उससे पहले, इसमें से 15 सितम्बर से पहले जो पूर्व-कर दिया है वह 45 प्रतिशत से कम हो जायेगा, 75 प्रतिशत उन किश्तों द्वारा कम होगा जो पहले की किश्तों में भुगतान किया गया है जो 15 दिसम्बर को यह उससे पहने दी गर्इ, और कुल रकम, ऐसी किसी भी रकम से कम हो जायेगी जो वित्त-वर्ष की 15 मार्च या उससे पहले की तारीख को दी गर्इ।

47.5. यह भी प्रावधान किया गया है कि निर्धारिती (कम्पनियों के अलावा) जिन पर दायित्व है कि वह चालू अनुशंगी लाभ पर पूर्व-कर भरें, कि वह हर वित्त-वर्ष में उतनी ही रकम 3 किश्तों में भुगतानित करें। ऐसे निर्धारिती पूर्व-कर का 30 प्रतिशत से कम भुगतान नहीं करेंगे 15 सितम्बर या उससे पहले, यदि भुगतान 15 सितम्बर या उससे पहले कर दिया गया है तो रकम 60 प्रतिशत से कम कर दी जायेगी, और पूरी रकम से वह रकम कम कर दी जायेगी जो वित्त-वर्ष की 15 मार्च या उससे पहले भुगतान कर दी गर्इ है।

47.6. धारा 115बत्र की नर्इ उप-धारा (3) और (4) में यह प्रावधान है कि यदि निर्धारिती ने किश्त की तारीख को या उससे पहले पूर्व-कर देने में चूक कर दी है, या वह उस रकम से कम है जो उसे निर्धारित तारीख तक देना चाहिये था, तो उस पर दायित्व होगा कि वह उस रकम पर प्रति मास 1 प्रतिशत की दर से तीन महीनों तक साधारण ब्याज अदा करे, उस रकम पर जो प्रति किश्त कम पड़ रही थी। उदाहरण के लिये यदि एक कम्पनी 15 जून तक केवल 10 प्रतिशत पूर्व-कर देती है, 15 सितम्बर तक 45 प्रतिशत, 15 दिसम्बर तक 65 प्रतिशत और 15 मार्च तक 95 प्रतिशत, तो इस कम्पनी पर दायित्व होगा कि यह निम्नलिखित ब्याज दे -

- पहली किश्त में जो पूर्व-कर के भुगतान में 5 प्रतिशत की कमी है, उस पर प्रति मास 1 प्रतिशत ब्याज दिया जायेगा, 3 महीनों तक।

- तीसरी किश्त में जो पूर्व-कर के भुगतान में 10 प्रतिशत की कमी है, उस पर प्रति मास 1 प्रतिशत ब्याज दिया जायेगा, 3 महीनों तक।

- चौथी किश्त में जो पूर्व-कर के भुगतान में 5 प्रतिशत की कमी है, उस पर 1 प्रतिशत ब्याज दिया जायेगा।

47.7. नर्इ उप-धारा (5) को भी अन्तरस्थापन किया गया है कि जहां निर्धारिती ने पूर्व-कर भुगतानित नहीं किया है या धारा 115बड. या धारा 115बच के अन्तर्गत आंकलित कर का 90 प्रतिशत से कम भुगतान किया है, वहां निर्धारिती पर दायित्व होगा कि वह ...............

47.8. केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर-बोर्ड (सी.बी.डी.टी.) की अधिसूचना एस.ओ. संख्या 1805 ( ड.), दिनांक 23 अक्टूबर, 2007 ने आयकर नियम, 1962 में नियम 40 अन्तरस्थापित किया है, ताकि कम्पनी के शेयरों का मूल्यांकन करा जा सके, र्इ.एस.ओ.पी. के अनुशंगी लाभों हेतु। यह नियम 1 अप्रैल, 2008 से लागू होगा और इस कारण निर्धारण वर्ष 2008-09 और इसके बाद आने वाले वर्षों के सम्बन्ध में लागू होगा।

47.9. क्योंकि मूल्यांकन से सम्बन्धी नियम सबसे पहले 23 अक्टूबर, 2007 को अधिसूचित हुये थे, (सी.बी.डी.टी.) ने पहली और दूसरी किश्तों के अनुशंगी लाभ-कर के भुगतान की तारीख बढ़ा दी थी, (पहले इसे 15 जून, 2007 और 15 सितम्बर, 2007 को या इन तारीखों से पहले देना होता था), कर्मचारियों की निर्धारित प्रतिभूति या परिश्रमी सामान्य शेयर के आबंटन या हस्तांतरण के सम्बन्ध में, इसे 15 दिसम्बर, 2007 कर दिया गया था (तीसरी किश्त देने की तारीख)।

47.10. यह भी देखा गया है कि ऐसे मामले भी हैं जहां कर्मचारियों को निर्धारित प्रतिभूति या परिश्रमी सामान्य शेयर के आबंटन या हस्तांतरण के बाद जो 1 अप्रैल, 2007 को या उसके बाद हुआ, ने इन शयरों को फिर से हस्तांतरित कर दिया जिससे पूंजिगत मुनाफा हुआ। ऐसे निर्धारिती के लिये, इन शेयरों को प्राप्त करने की लागत पता लगाने और पूंजिगत मुनाफे का आंकलन करने के उद्देश्य से, उन आंकलन के मानदण्डों पर निर्भर थे जो केवल 23 अक्टूबर, 2007 को अधिसूचित करे गये। इसलिये ऐसे मामलों में यह स्पष्टीकरण भी दिया जाता है कि पूंजिगत मुनाफे की पहली किश्त की भुगतान की तारीख (यानि 15 सितम्बर, 2007) को निर्धारित प्रतिभूति या परिश्रमी सामान्य शेयर के हस्तांतरण के सम्बन्ध में, 15 दिसम्बर, 2007 तक बढ़ाया जाता है (दूसरे किश्त की भुगतान की तारीख)।

47.11. प्रासंगिकता - यह संशोधन 1 जून, 2007 से लागू होंगे।

(धारा 40)

48. गैर-मानक वापसी भरने के नियम।

48.1. धारा 139 की उप-धारा (9) की व्याख्या में जो प्रावधान प्राप्त हैं, उनके अनुसार आय-विवरण को तब तक त्रुटिगत माना जायेगा जब तक उपर्युक्त उप-धारा के खण्ड ( ) से ( ) की व्याख्या की शर्तें पूरी नहीं होती।

48.2. वित्त नियम, 2006 में उपर्युक्त धारा की उपर्युक्त उप-धारा (9) में परन्तुक को अन्तरस्थापित करके उसमें संशोधन कर दिया, केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड को यह हक प्रदान किया कि वह व्याख्या के खण्ड ( ) से ( ) में निर्धारित किसी भी शर्त को हटा सकता है। लेकिन उपर्युक्त उप-धार की व्याख्या के खण्ड ( ) से ( ) तक में जो शर्तें निर्धारित हैं, उनके अलावा उन दस्तावेजों, कथनों, रसीदों, प्रमाण पत्रों, लेखा परिक्षित रिपोर्टों व अन्य दस्तावेजों को जोड़ने की आवश्यकता भी है यदि आयकर नियम के अन्तर्गत लाभ या कटौतियों का दावा करना है, जैसे अन्य धाराओं में निर्धारित है।

48.3. एक नर्इ धारा 139 को अन्तरस्थापित किया गया है ताकि बोर्ड को उन वर्ग या वर्गों के व्यक्तियों के लिये नियम बनाने में सुविधा हो जिन्हें वह दस्तावेज, कथन, रसीद, प्रमाण पत्र, लेखा परिक्षित रिपोर्ट या अन्य दस्तावेज देने की आवश्यकता नहीं है, जिनको देना (विवरण के समेत) इस नियम के प्रावधानों के अनुसार आवश्यक होता है। लेकिन मांगने पर यह आवश्यक है कि उपर्युक्त दस्तावेज, कथन, रसीद, प्रमाण पत्र, लेखा परिक्षित रिपोर्ट या अन्य दस्तावेज निर्धारण प्राधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करे जायें।

48.4. एक नर्इ धारा 139 को भी अन्तरस्थापित किया गया है ताकि बोर्ड को उन वर्ग या वर्गों के व्यक्तियों के लिये नियम बनाने में सुविधा हो जिन्हें इलैक्ट्रॉनिक रूप में आय-विवरण देने की आवश्यकता है, और वह फॉर्म और विवरण भरने की प्रणाली (इलैक्ट्रॉनिक रूप में) के नियम बना पायें, जो दस्तावेज, कथन, रसीद, प्रमाण पत्र या लेखा परिक्षित रिपोर्ट को आय-विवरण समेत इलैक्ट्रॉनिक रूप में देने की आवश्यकता नहीं है, उन्हें मांग आने पर निर्धारिण प्राधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करना पड़ता है, वह कम्प्यूटर का संसाधन या इलैक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड जिसमें आयकर विवरण इलैक्ट्रॉनिक रूप में भेजा जा रहा है।

48.5. फलस्वरूप, धारा (295) की उप-धारा (2) में नये खण्ड ( ड.ड.खक ) और ( ड.ड.खख ) अन्तरस्थापित करे गये हैं। जिनसे बोर्ड को नियम बनाने का हक प्राप्त होता है।

48.6. क्योंकि धारा 139 की उप-धारा ( ) के परन्तुक में जो प्रावधान हैं, वह नर्इ धाराओं 139( ) और 139 में निगमित करे गये हैं, धारा 139 की उप-धारा (9) की व्याख्या के परन्तुक को जगह नहीं दी गर्इ है।

48.7. प्रासंगिकता - यह संशोधन पूर्वव्यापी रूप से 1 जून, 2006 से लागू होंगे।

(धारा 44, 45 और 79)

49. धारा 142(2 क ) के अन्तर्गत विशेष लेखा-परीक्षण से सम्बन्धित प्रावधानों का परिमयकरण।

49.1. धारा 142 की उप-धारा (2 ) के वर्तमान प्रावधानों के अन्तर्गत, यह सुविधा है कि निर्धारण प्राधिकारी के समक्ष कार्यवाही की कोर्इ भी सीढ़ी पर यदि उसका विचार है कि निर्धारिती के खातों की प्रवृति और जटिलताओं को देखते हुए यह आवश्यक है कि निर्धारिती अपने खातों का लेखा-परीक्षण किसी लेखाकार से कराये तो वह मुख्य कमिश्नर या कमिश्नर के पूर्व अनुमोदन से निर्धारिती को ऐसा करने का निर्देश दे सकता है, जैसे धारा 288 की उप-धारा (2) की व्याख्या में परिभाषित है। लेखाकार मुख्य कमिश्नर या कमिश्नर द्वारा मनोनीत होगा और उसे इसे लेखा-परीक्षण की रिपोर्ट निर्धारित फॉर्म में, विधिवत रूप से हस्ताक्षर करके और प्रमाणित करके देनी होंगी, उन विवरणों के साथ जो विदित हैं या अन्य विवरणों के साथ, जैसा निर्धारण प्राधिकारी को आवश्यकता हो। धारा 142 की उप-धारा (2 ) यह प्रावधान करती है कि उप-धारा (2 ) (लेखाकार का पारितोषिक जोड़कर) के अन्तर्गत लेखा-परीक्षण से जुड़ा कोर्इ भी खर्च, मुख्य कमिश्नर या कमिश्नर (जो कि अन्तिम अभिप्राय या खर्च होगा) द्वारा निश्चित होगा और निर्धारिती द्वारा भरा जायेगा, और यदि वह भुगतान नहीं करता तो वह निर्धारिती से प्राप्य होगा जैसा कि अध्याय XVII- में प्रावधानित है, कर-बकाया वसूल करने हेतु।

49.2 आयकर अधिनियम की धारा142 की उपधारा (2क) के प्रावधानों पर माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा राजेश कुमार बनाम उप. सीआईटी [287 आईटीआर 91 (2006)] के मामले में पुन: समीक्षा की गयी। माननीय उच्चतम न्यायालय ने पाया कि करदाता के खाताओ का विशेष लेखा परीक्षण आयकर अधिनियम 152 के अन्तर्गत की उपधारा (2क) में दिए गए निर्देश प्रशासनिक प्रकृति के नहीं है बल्कि यह एक अर्ध न्यायिक आदेश है। अतः इन प्रावधानों के अन्तर्गत विशेष लेखा परीक्षण के आदेश का निर्णेय लेते समय अन्य विषयो को छोड़कर मनमानी ना करते हुए स्वाभाविक न्याय के सिध्दांतों का पालन करना आवश्यक है। माननीय उच्चतम न्याययालय ने अपने पर्यवेक्षण में पाया कि खातों की जटिलता तथा प्रकृति का आदर करना महत्वपूर्ण है और यदि करदाता को एक नोटिस दी जाये तो वह खातों की प्रकृति को साबित कर सकता है कि खातों के लिए विशेष लेखा परीक्षक की नियुक्ति की आवश्यकता नहीं है तथा करदाता यह भी साबित कर सकता है कि निर्धारण अधिकारी जिससे जटिल समझ रहे है वो ऐसा नहीं है। इन कारणों से माननीय उच्चतम न्यायलय में यह माना कि धारा142 की उपधारा (2क) के अंतर्गत विशेष लेखा परिक्षण के आदेश के निर्णेय लेने से पूर्व कर दाता को यह अवसर दिया जाना चाहिए. एम/एस. सहारा इंडिया के मामले में यह मुद्दा माननीय उच्चतम न्यायलय के पास विचार के लिए दुबारा आया.। माननीय न्यायालय ने पाया कि राजेश तथा अन्य के मामले में दिए गए निर्णय में कानून की स्थिति सही प्रतीत नहीं होती है अतः मामले को लार्जर बेंच को सौंप दिया गया, न्यायालय ने यह भी आदेश दिया कि विशेष लेखा परिक्षण तथा निर्धारण प्रक्रियाओ के निर्देश लागू रहेंगे यदि इस मामले में याचिका के नतीजे क विषय है। लार्जर बेंच का निर्णेय अभी शेष है।

49.3 आयकर अधिनियम की धारा142 की उपधारा (2क) के अंतर्गत विशेष लेखा परिक्षण के आदेश के पूर्व करदाता को अपना पक्ष रखने के अवसर की कोई वैधानिक उद्देश्य नहीं है। इस कारण से गत वर्षो में करदाता को बिना कोई अवसर दिए आयकर विभाग ने विशेष लेखा परिक्षण के आदेश काफी बड़ी संख्या में दिए हैं। उन मामलो की विशाल संख्या को देखते हुए जिनमें ऐसे लेखा परिक्षण के आदेश दिए गए हैं माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा राजेश कुमार तथा अन्य के मामले में दिए गए निर्णय को प्रभाव देने का अनुपात संभव नहीं है, इस मामले में माननीय उच्चतम न्यायायलय के निर्णय का आदर करते हुए आयकर अधिनियम की धारा 142 की उपधारा (2क) में एक शर्त जोड़ दिया गया कि निर्धारण अधिकारी करदाता को अपने खातों के परीक्षण के निर्देश तबतक नहीं देंगे जबतक यह आश्वस्त ना किया जाये कि करदाता को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर प्रदान किया गया है । भविष्य में यह लागू रहेगा।

49.4 उपधारा (2घ) में भी एक शर्त जोड़ा गया है जिससेकि जब करदाता को निर्धारण अधिकारी द्वारा उपधारा (2क) के अंतर्गत खाताओ के लेखा परिक्षण का निर्देश जारी करता है, तो ऐसे लेखा परिक्षण (जिसमें लेखापाल का पारिश्रमिक सम्मिलित है) पर आने वाले व्यय का निर्धारण आयुक्त अथवा मुख्य आयुक्त द्वारा किया जायेगा जो केंद्रीय सरकार द्वारा विहित मापदंडों के अनुसार देय होगा ।

49.5 प्रासंगिकता - यह संशोधन 1 जून 2007 से प्रभावी होंगे।

[धारा 46]

50. तलाशी के मामलो का मूल्यांकन – संयुक्त आयुक्त द्वारा अनुमोदित होने वाले आदेशो का मूल्यांकन तथा पुनर्मूल्यांकन

50.1 जिन मामलो में धारा 132 के अंतर्गत तलाशी की गयी है अथवा 132क के अंतर्गत अभियाचन किया गया है , उनके मूल्यांकन तथा पुर्नमूल्यांकन के वर्तमान प्रावधानों में ऐसे मूल्यांकन का अनुमोदन नहीं हुआ है।

50.2 वित अधिनियमों में एक नयी धारा 153घ को शामिल किया गया है जिसके संयुक्त आयुक्त से नीचे के किसी भी निर्धारण अधिकारी द्वारा मूल्यांकन अथवा पुनर्मूल्यांकन का आदेश नहीं दिया जा सकता और यदि ऐसा किया जाता है तो इसमें संयुक्त आयुक्त की पूर्व अनुमति प्राप्त करनी होगी। धारा 132 के अंतर्गत की गयी तलाशी अथवा धारा 132क के अंतर्गत किये गए अधियाचन के ठीक पूर्व के छः मूल्यांकन वर्षो के लिए धारा 153क खंड ख के इस प्रावधान को मूल्यांकन अथवा पुनर्मूल्यांकन सम्बन्धी आदेशों के लिए यह प्रावधान लागू होता है। धारा 132 के अंतर्गत तलाशी अथवा धारा 132क के अंतर्गत अधियाचन से ठीक पूर्व के निर्धारण वर्ष के लिए धारा 153ख खंड ख के अंतर्गत मूल्यांकन सम्बन्धी आदेशों पर यह प्रावधान लागू होता है।

50.3 लागू होना - यह संशोधन 1 जून 2007 से प्रभावी होंगे।

[धारा 50]

51. धारा 172 के अंतर्गत रिटर्न्स फाइल के लिए मूल्यांकन को पूर्ण करने की निर्धारित अवधि

51.1 धारा 172 के प्रावधान अप्रवासियों के जहाजरानी व्यापार से सम्बंधित है जिसमे अन्य विषयो के अलावा जहाज के प्रस्थान से पूर्व अथवा प्रस्थान के बाद 30 दिनों के अंदर रिटर्न फाइल करने की तैयारी तथा प्रस्तुतीकरण की आवश्यकता होती है। इस धारा के वर्तमान प्रावधानों में वैसे उप धारा 3 के अंतर्गत रिटर्न प्रस्तुत करने के लिए समय सीमा निर्धारित नहीं की गयी है।

51.2 वित्त अधिनियम 2007 के अंतर्गत एक नयी उपधारा 4 खशामिल की गयी है जिसमें प्रावधान है कि आय के मूल्यांकन तथा उसके आधार पर कर के भुगतान का आदेश वित्त वर्ष के समाप्त होने के बाद नौ महीने तक नहीं दिए जा सकते जिनमें उपधारा 3 के अंतर्गत रिटर्न प्रस्तुत किये जाते है।

51.3 वित्त अधिनियम 2007 के अनुसार नयी उपधारा 4क में एक नयी शर्त सम्मिलित की गयी है जिसके अनुसार उपधारा 3 के अंतर्गत 1 अप्रैल 2007 से पूर्व का रिटर्न जहाँ प्रस्तुत किया जाना है उसके आय का मूल्यांकन तथा कर के भुगतान का निर्धारण 31 दिसंबर 2008 तक कभी भी किया जा सकता है। धारा 172 के अंतर्गत जब से यह मूल्यांकन लंबित है वे सभी इन 21 महीनो की समय सीमा के अंतर्गत पूरे किये जायेंगे।

51.4 लागू होना - यह संशोधन 1 जून 2007 से प्रभावी होंगे.

[धारा 51]

52. 8% (कर योग्य) बचत बांड्स पर 1961 के आयकर अधिनियम की धारा 193 में संशोधन द्वारा टीडीएस ( टीडीएस) का प्रावधान

52.1 धारा 193 के वर्तमान प्रावधानों द्वारा अन्य विषयो को छोड़कर किसी भी केंद्रीय अथवा राज्य सरकार द्वारा जारी सिक्योरिटी पर स्रोत से कर की कटौती की आवश्यकता नहीं थी। फलस्वरूप 2003 के 8% बचत (कर योग्य) बांड्स पर दिए जाने वाले ब्याज में से कर की कटौती नहीं होती थी।

52.2 8% बचत (कर योग्य) बांड्स, 2003 केंद्रीय सरकार द्वारा जारी की गई प्रतिभूतियां हैं। आर्थिक मामलो के विभाग द्वारा 21 मार्च 2003 को जारी की गयी अधिसूचना से भी स्पष्ट है कि 8% बचत (कर योग्य) बांड्स, 2003 पर दिया जाने वाला ब्याज आयकर अधिनियम के अंतर्गत कर योग्य है । इन बांड्स पर कर की कटौती नहीं करने के फलस्वरूप कर की चोरी होती रही है।

52.3 अतः वित्त अधिनियम 2007 द्वारा उपरोक्त धारा में संशोधन कर ऐसा प्रावधान बनाया है कि अगर 8% बचत (कर योग्य) बांड्स, 2003 पर दिया जाने वाला ब्याज यदि किसी वितीय वर्ष में 10,000/- रुपये से ज्यादा है, तब उसपर आयकर उस व्यक्ति के द्वारा काटा जायेगा जो इस ब्याज का भुगतान करने के लिए जिम्मेवार है, काट लिया जायेगा।

52.4 लागू होना - यह संशोधन 1 जून 2007 से प्रभावी होंगे।

[धारा 52]

53. धारा 194 क के अंतर्गत अधिसूचित डाक घर बचत योज़ना सहकारी समिति अथवा बैंकिंग कंपनी द्वारा भुगतान किये जाने वाले ब्याज से सम्बंधित सीमा में वृद्धि ।

53.1 धारा 194 क की उपधारा (3) खंड (झ) में प्रावधान था कि स्रोत से कर की कटौती तब की जाएगी जब प्रतिभूति पर ब्याज की रकम 5000/- रूपये से अधिक होगी।

53.2 2007 के वित अधिनियम के द्वारा उपधारा (3) को संशोधित कर प्रावधान बनाया गया है कि उपरोक्त धारा के अंतर्गत स्रोत से कर की कटौती तब होगी जब यह रकम 10,000/- रुपये से अधिक होगी –

(i) अगर अदाकर्ता कोई बैंकिंग कंपनी है जिस पर बैंकिंग विनियम अधिनियम, 1949 ( 1949 के 10) लागू होता है (अधिनियम की धारा 51 द्वारा निर्देशित कोई बैंक अथवा वित्तीय संस्थान शामिल है);

(ii) अगर अदाकर्ता एक सहभागी संस्था है जो बैंकिंग के व्यापार में संलग्न हो;

(iii) केंद्रीय सरकार तथा इसके द्वारा अधिसूचित किसी भी योजना के अंतर्गत डाक घर में रखी

बचत अन्य मामलो में यह सीमा 5000/- रुपये तक रखी जाएगी।

53.3 अदाकर्ता को स्रोत से बिना कर की कटौती के ब्याज के भुगतान के लिए तिमाही रिटर्न के प्रस्तुतीकरण से सम्बंधित धारा 206 क के प्रावधानों में भी संशोधन किये गए है।

53.4 आय कर अधिनियम की धारा 194A उपधारा (3) खंड क उपखंड (ग) के अंतर्गत केंद्रीय सरकार द्वारा 1 जून 2007 को अधिसूचना संख्या एस0 ओ0. 861(ड) के माध्यम से वरिष्ठ नागरिक बचत योज़ना 2004 को अधिसूचित किया गया है। इस अधिसूचना से अब आयकर अधिनियम 1961 की धारा 194 क के अंतर्गत ब्याज के भुगतान अथवा होने वाले भुगतान अथवा किये जाने वाले जमाराशि अगर यह ब्याज की राशि उस वित्तीय वर्ष में 10,000/- रुपये से कम हो, पर किसी भी कर की कटौती वरिष्ठ नागरिक बचत योज़ना 2004 पर नहीं की जाएगी।

53.5 . लागू होना- यह संशोधन 1 जून 2007 से प्रभावी होंगे.

[धारा 53 तथा धारा 60]

54. धारा 194ग के प्रावधानों की गुंजाइश का विस्तार

54.1 धारा 194ग की उपधारा (झ) में निहित प्रावधानों के अनुसार किसी भी निवासी ठेकेदार के खाते में जमा किये गए रकम में स्रोत से कर की कटौती होगी जो उसे उसके तथा सरकार, स्थानीय प्राधिकरणों, वैधानिक निगमों, कम्पनियों, सहभागी समितियों, वैधानिक प्राधिकरणों जो रिहायशी आवास प्रदान करने में लगी है, पंजीकृत संस्थाएं, न्यास, विश्वविद्यालयों एवं फॉर्म्स के बीच हुए अनुबंध का अनुसरण करते हुए किसी भी कार्य के लिए प्राप्त हुई है। स्रोत पर कर की दर विज्ञापन अनुपन्धो के सन्दर्भ में 1 प्रतिशत तथा अन्य मामलो में 2 प्रतिशत है।

54.2 धारा 194ग के उपधारा (झ) के वर्तमान प्रावधानों में संयुक्त हिंदी परिवार अथवा एक व्यक्ति द्वारा ठेकेदार को किये गए भुगतानों पर स्रोत पर कर की कटौती नहीं की जा सकती।

54.3 संयुक्त हिंदी परिवार अथवा एक व्यक्ति द्वारा ठेकेदार को व्यापर अथवा पेशे के लिए प्रदान किये जाने वाले अनुबंधों की बढ़ती हुई संख्या तथा ठेकदार को भुगतान की जाने वाली राशि के बढ़ते हुए मात्रा को ध्यान में रखते हुए यह अनुभव किया गया कि ऐसे व्यक्तियों द्वारा ठेकेदार को भुगतान की जाने वाली राशि पर स्रोत पर कर की कटौती की जानी चाहिए।

54.4 यदि व्यक्तियों, कम बिक्री वाले संयुक्त हिन्दू परिवारो अथवा पेशे की सकल रसीदों पर स्रोत पर कर की कटौती करनी हो तो इसमें वास्तविक रूप से कठिनाइयां होगी । वैसे ऐसे मामलो में कोई भी अपवाद न्यायोचित होगा। इसी प्रकार किसी व्यक्ति विशेष अथवा संयुक्त हिन्दू परिवार के किसी सदस्य द्वारा अपने व्यक्तिगत उद्देश्यो के लिए दिए गए अनुबंध पर यह लागू नहीं होना चाहिए।

54.5 वित्त अधिनियम 2007 के फलस्वरूप उपरोक्त उपधारा (I) के अनुसार ऐसे ठेकेदार को भुगतान किये गए अथवा उसके खाते में जमा की गयी राशि वाले वितीय वर्ष से ठीक पूर्व के वित्त वर्ष के दौरान धारा 44कख के खंड (क) अथवा खंड (ख) में विहित मौद्रिक सीमाओ से यदि किसी व्यक्ति, संयुक्त हिन्दू परिवार द्वारा चलाये जाने वाले व्यवसाय में कुल बिक्री, पेशे की सकल रसीदों वितीय सीमा से अधिक है तो उसे वित अधिनियम 2007 के द्वारा उपधारा (झ) में शामिल किया जाना है। यह संशोधन किसी व्यक्ति अथवा संयुक्त हिन्दू परिवार के किसी सदस्य द्वारा अपने व्यक्तिगत उद्देशयो के लिए किसी ठेकेदार को भुगतान किये गए रकम के सन्दर्भ में लागू नहीं होगा।

54.6 लागू होना - यह संशोधन 1 जून 2007 से प्रभावी होंगे।

धारा [54]

55 .धारा 194ज के अंतर्गत स्रोत पर कर के दर में 10 प्रतिशत की वृद्धि तथा भारत संचार निगम लिमिटेड एवं महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड द्वारा पीसीओ का प्रतिनिधित्व करने वाली इकाइयों को भुगतान की जाने वाली कमीशन में टीडीएस ( टीडीएस) की छूट शामिल है।

55.1 धारा 194ज के वर्तमान प्रावधानों के अनुसार कमीशन अथवा दलाली के भुगतान पर 5 प्रतिशत की दर से स्रोत पर कर की कटौती का प्रावधान है।

55.2 स्रोत पर कर की कटौती आय पर लगने वाले कर को शीघ्र अति शीघ्र प्राप्त करने में सहायक है। वैसे उन करदाताओ के मामले में जिनके आय आयसीमा से नीचे है, स्रोत से कर की कटौती एक अनावश्यक कागजी कार्यवाही है । भारत संचार निगम लिमिटेड अथवा महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड के प्रतिनिधित्व करने वाले पब्लिक कॉल ऑफिस (पीसीओ) इसी श्रेणी में आते है क्योंकि उन्हें प्राप्त होने वाले कमीशन की रकम बहुत कम है तथा छूट की सीमा से ऊपर के मामलो की सम्भावना अत्यंत ही कम है।

55.3 अतः वित्त अधिनियम 2007 में उपरोक्त धारा में संशोधन कर यह प्रावधान बनाया गया कि भारत संचार निगम लिमिटेड अथवा महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड के प्रतिनिधित्व करने वाले पब्लिक कॉल ऑफिस (पीसीओ) को भुगतान की जाने वाली कमीशन अथवा दलाली की रकम में से स्रोत पर कर की कटौती नहीं की जाएगी ।

55.4 ऐसे बहुत से मामलो की जानकारी मिली है जहाँ कमीशन अथवा दलाली पाने वाले व्यक्तियों की यह आय 5 प्रतिशत की दर से इकट्ठी होने वाली आय से बहुत ही अधिक है। इसके परिणामस्वरूप या तो कर के संग्रह में स्थगन या कुछ मामलो में कर की चोरी हुई है। वित्त अधिनियम 2007 द्वारा इस समस्या को ध्यान में रखते हुए स्रोत पर कर में कटौती के वर्तमान 5 प्रतिशत से बढ़ा कर 10 प्रतिशत कर दिया गया।

55.5 लागू होना - यह संशोधन 1 जून 2007 से प्रभावी होंगे।

धारा [55]

56 . धारा 194- झ के अंतर्गत किसी मशीनरी, संयंत्र अथवा उपकरण के उपयोग पर लगने वाले किराये की राशि पर स्रोत पर की जाने वाली कटौती की दर में कमी

56.1 धारा 194- झ के वर्तमान प्रावधानों में किसी व्यक्ति अथवा संयुक्त हिन्दू परिवार को घर के किराये से प्राप्त आय के स्रोत पर कटौती का प्रावधान है। धारा 44कख के खंड (क) अथवा खंड (ख) में विहित निर्देशों में किसी व्यक्ति अथवा संयुक्त हिन्दू परिवार के व्यापार से प्राप्त आय यदि निर्देशित सीमा से कम है तो कर काटने की आवश्यकता नहीं होती है। कर कटौती की वर्तमान दर 15 प्रतिशत होगी अगर अदाकर्ता कोई व्यक्ति है अथवा संयुक्त हिन्दू परिवार का सदस्य है तथा अन्य अदाकर्ताओ के मामले में 20 प्रतिशत होगी । इस धारा के अंतर्गत "किराये" की विस्तृत परिभाषा दी गयी है।

56.2 करारोपण अधिनियम (संशोधित), 2006 में वर्तमान " किराये" की परिभाषा में संशोधन कर इसे 13 जुलाई, 2006 से लागू किया गया है तथा इस परिभाषा में तीन तत्वों मशीनरी, संयंत्र अथवा उपकरण पर किराये को शामिल किया गया है। उपरोक्त संशोधन के पश्चात इस आशय के प्रतिवेदन प्राप्त हुए कि मशीनरी, संयंत्र अथवा उपकरण के किराये अथवा लीज के लेन-देन में लाभ का अंतर काफी कम होता है जो कि स्रोत पर वर्तमान 15% तथा 20% की दर से कटौती के फलस्वरूप ऐसे मामलो से प्राप्त होने वाले कर की राशि का संग्रहण ज्यादा होता है।

56.3 इस प्रकार वित्त अधिनियम 2007 द्वारा उपरोक्त धारा में संशोधन कर स्रोत पर कर की कटौती घर के किराये, मशीनरी, संयंत्र अथवा उपकरण पर किराये द्वारा प्राप्त आय में से 10% की दर से करने का प्रावधान रखा गया है।

56.4 लागू होना - यह संशोधन 1 जून 2007 से प्रभावी होंगे।

धारा [56]

57 . आयकर अधिनियम की धारा 194त्र के अंतर्गत टीडीएस (टीडीएस) की दर में वृद्धि

57.1 धारा 194त्र की उपधारा (I) के वर्तमान प्रावधानों के अंतर्गत किसी विशिष्ट व्यक्ति को पेशेवर सेवाओं की फीस अथवा तकनीकी सेवाओ की फीस के लिए लाभकर्ता द्वारा देय राशि पर 5 प्रतिशत की दर से कटौती करनी चाहिए।

57.2 पेशेवर व्यक्तियों तथा तकनिकी विशेषज्ञों के कर कटौती पर संगृहित आंकड़ों से पता चलता है कि ऐसे मामलो में एकत्रित की गयी कर की राशि स्रोत पर 5 प्रतिशत कर की दर से काटी गयी राशि से बहुत ज्यादा है।

57.3 वित्त अधिनियम 2007 के द्वारा उपरोक्त धारा में संशोधन कर स्त्रोत्र पर कर की 10 प्रतिशत की उच्च दर का प्रावधान किया गया है. स्रोत पर कर की कटौती का बड़ा हुआ दर पेशेवर सेवाओ की फीस अथवा तकनीकी विशेषज्ञों की फीस की अथवा धरा 28 के खंड (5क) में निर्देशित किसी रकम के भुगतान पर लागू होगा।

57.4 लागू होना - यह संशोधन 1 जून 2007 से प्रभावी होंगे।

धारा [57]

58. धारा 197क से धारा 88 ख के विलोपन का उल्लेख

58.1 धारा 88 ख जिसे 1 अप्रैल 2006 से विलोपित कर दिया गया था उसका उल्लेख 197 क के उपधारा (1ग) के वर्तमान प्रावधानों में है।

58.2 वित्त अधिनियम 2007 द्वारा उपरोक्त उपधारा से धारा 88ख के विलोपन के उल्लेख को मिटा दिया गया है।

58.3 लागू होना - यह संशोधन 1 अप्रैल 2006 से प्रभावी होंगे तथा वर्ष 2006-07 तथा बाद के वर्षो में लागू होंगे।

धारा [58]

59. ब्याज की गणना प्रति वर्ष से प्रति माह के आधार पर परिवर्तन की विधि

59.1 धारा 201 के उपधारा (1क) में प्रावधान किया गया है कि जिस व्यक्ति ने टैक्स का भुगतान आंशिक रूप से या पूर्ण रूप से नहीं किया है अथवा कटौती के बाद अधिनियम के अंतर्गत आवश्यक कर का भुगतान करने में असफल रहा है तो उसे उस कर की रकम पर प्रति वर्ष 12 प्रतिशत के साधारण ब्याज का भुगतान दंडस्वरूप करना होगा जो उस तिथि से प्रभावी होगा जिस तिथि में यह कर देय था।

59.2 दूसरी और आय कर अधिनियम के अन्य प्रावधानों में जो कर दाताओ से लिए जाने वाले ब्याज से सम्बंधित है ,जैसे धारा 220, 234क, 234ख तथा 234घ उनमें कर दाता से लिया जाने वाले ब्याज की गणना प्रति माह होती है अथवा महीने के भाग से होती है जिसके लिए ब्याज की रकम देय है। धारा 234ग (I)(क)(i) के अंतर्गत निर्दिष्ट अवधि के लिए 1 प्रतिशत की दर से साधारण ब्याज लिया जाता है। धारा 244क के अंतर्गत जिसमे करदाता को विभाग द्वारा अगर रिफंड दिया जाता है तो ब्याज की गणना प्रति माह अथवा महीने के एक हिस्से पर की जाती है।

59.3 प्रति वर्ष के आधार पर तथा प्रति माह के आधार पर की गयी ब्याज की गणना का अंतर इन दो विधियों के अंतर्गत की गयी ब्याज की गणना की विधि में निहित है। जब ब्याज की गणना वार्षिक आधार पर की जाती है तब महीने के किसी भाग की उपेक्षा कर दी जाती है और जब यह गणना प्रति माह के आधार पर की जाती है तब महीने के किसी भाग को एक पूरा महीना मान लिया जाता है और तब ब्याज की गणना की जाती है। नियम 119क के फ्रेमन में इसी सिद्धांत को अपनाया गया है जिसमें वार्षिक अथवा मासिक आधार पर ब्याज की गणना की विधि का प्रावधान है।

59.4 धारा 220(2), 234क, 234ख, 234ग, 234घ तथा 244क के प्रावधानों के अंतर्गत ब्याज को मासिक आधार पर देय बनाया गया है। तदनुसार 2007 के वित्त अधिनियम में ब्याज की गणना की विधि को वार्षिक आधार से बदल कर आयकर अधिनिायम के दूसरे अनुच्छेद के नियम 68क(3) तथा सम्पति कर अधिनियम की धारा 22 घ की उपधारा (6क) के अंतर्गत धारा 132ख की उपधारा (4) खंड (क), धारा 201 की उपधारा (1क), धारा 245घ की उपधारा (6क) नियम 60(I)(क) में मासिक आधार पर कर दिया गया है।

59.5 ब्याज की गणना की विधि में परिवर्तन से सम्बंधित संशोधनों को 1 अप्रैल 2008 से शुरू होने वाली अवधि की लिए लागू किया गया है जिसमें ब्याज की गणना मासिक आधार पर की जाएगी तथा यह उसी आधार पर देय होगा । 31 मार्च 2008 को अथवा उससे पूर्व की किसी अवधि के लिए ब्याज की गणना वार्षिक आधार पर की जाएगी जो उपरोक्त धाराओ के अंतर्गत आता है और उन्हें संशोधित किया गया है । वैसे 31 मार्च 2008 को या उससे पूर्व आरम्भ होने वाली किसी भी अवधि के लिए जो उस तिथि के बाद समाप्त होती है ,ब्याज की गणना उस तिथि के बाद की अवधि के लिए मासिक आधार पर की जाएगी।

59.6 लागू होना - यह संशोधन 1 अप्रैल 2008 से प्रभावी होंगे।

[धारा 43, 59, 64, 81 तथा 86]

60 आयकर अधिनियम 1961 की धारा 206ग के अंतर्गत खनन एवं निष्कासन की परिभाषा

60.1 धारा 206 के वर्तमान प्रावधानों के अनुसार अन्य विषयो के अलावा लाइसेंस अथवा लेस्सी(पट्टेदार), इसी धारा की उपधारा 1ग की तालिका के कॉलम 2 में निर्दिष्ट खनन एवं निष्कासन से सम्बंधित किसी अनुबंध अथवा लीज पर टैक्स की कटौती स्रोत से किया जाना है। स्रोत से कर की कटौती का दर तालिका के कॉलम (3) में निर्दिष्ट है।

60.2 उपरोक्त धारा के वर्तमान प्रावधानों में खनन एवं निष्कासन को परिभाषित नहीं किया गया है। कुछ स्रोतों से इस आशय के प्रतिवेधन प्राप्त हुए थे कि इस धारा में इस परिभाषा के आभाव में तेल की खोज तथा जुड़ी हुई सेवाओ को सम्मिलित किया गया है तथा ऐसे खोज करने वाले लाइसेंस धरियो से कर की रकम को उसी प्रकार लिया जाता है। चूँकि तेल खोज तथा इससे जुड़ी हुई सेवाएं संगठित क्षेत्र में आते है, जो टीसीएस (टीसीएस) के प्रावधानों को लागू नहीं किया गया है।

60.3 इसी प्रकार वित्त अधिनियम 2007 के द्वारा व्याख्यान 1 को शामिल कर प्रावधान बनाया गया है कि धारा 206ग की उपधारा 1 में "खनन एवं निष्कासन " में खनिज तेल के खनन तथा निष्कासन को सम्मिलित नहीं किया जायेगा। व्याख्यान 2 आगे यह स्पष्ट करता है कि व्याख्यान 1 द्वारा खनिज तेल में पेट्रोलियम तथा प्राकर्तिक गैस को शामिल किया गया है।

60.4 लागू होना - यह संशोधन 1जून 2007 से प्रभावी होंगे।

धारा 61

61 संशोधित निपटारा योजना

61.1 आयकर अधिनियम के अध्याय 19 क में समझौता आयोग द्वारा मामलो के निपटारे से सम्बंधित प्रावधान है। प्रक्रियाओ का दोहरीकरण, मामले के निपटारे के लिए वैधानिक समय सीमा का अभाव के कारण करदाता के द्वारा देय कर को निर्धारित करने में होने वाले विलम्ब से बचने के लिए तथा समझौता आयोग के सामने प्रक्रियाओ को सरल करने के लिए आयकर अधिनियम के अध्याय XIX –क के प्रावधानों में संशोधन किये गए है। जो प्रमुख परिवर्तन, अन्य विषयों के अलावा, किये गए है उनके विवरण निम्नांकित है:

61.2 वर्तमान प्रावधानों के अंतर्गत करदाता आयोग के सामने अपने केस की प्रक्रिया के किसी भी चरण में, जो आयकर अधिकारियो के पास लंबित है, आवेदन पत्र प्रस्तुत कर सकता है। 31 मई, 2007 के बाद कोई करदाता निर्धारण अधिकारी के पास प्रक्रिया के लंबित रहने के दौरान ही कमीशन के सामने आवेदन पत्र प्रस्तुत कर सकता है। यह आगे स्पष्ट किया जाता है कि (क) चूँकि 143(झ) के अंतर्गत सूचना देना कोई मूल्यांकन का आदेश नहीं है अतः निपटारे के लिए धारा 143(झ) के अंतर्गत प्राप्त हुए सूचना के बाद निपटारे के लिए आवेदन पत्र प्रस्तुत करने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है। जिस तिथि को आवेदक के पास मूल्यांकन का आदेश जारी किया गया उसी दिन ऐसे पूर्ण माना जायेगा ।

61.3 प्रावधानों को आगे निम्नलिखित मूल्यांकन प्रक्रियाओ के लिए संशोधित किया गया है, जिसमें मूल्यांकन प्रक्रियाओं जिस दौरान करदाता को कमीशन के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करने की अनुमति नहीं होगी ,उसे बाहर निकाल दिया गया है :

(क) धारा 148 के अंतर्गत जारी की गयी नोटिस के जवाब में मूल्यांकन / पुनर्मूल्यांकन की कार्यवाही। यह कार्यवाही उस तिथि से आरम्भ समझी जाएगी जिस तिथि पर धारा 148 के अंतर्गत नोटिस जारी की गयी थी.

(ख) धारा 132 के अंतर्गत की गयी तलाशी अथवा धारा 132क के अंतर्गत किये गए अधियाचन के ठीक पूर्व के छ मूल्यांकन वर्षो के लिए धारा 153क के अंतर्गत मूल्यांकन अथवा पुरमूल्यांकन की कार्यवाही ;

(ग) जिस वर्ष धारा 132 के अंतर्गत तलाशी की गयी है अथवा धारा 132 क के अंतर्गत अधियाचन किया गया है ,उसके ठीक पूर्व के छह मूल्यांकन वर्षो के लिए धारा 153 क के अंतर्गत मूल्यांकन अथवा पुनर्मूल्यांकन की कार्यवाही; तथा धारा 132 के अंतर्गत की गयी तलाशी अथवा धारा 132 क के अंतर्गत अधियाचन के ठीक पूर्व के मूल्यांकन वर्ष के लिए ऐसे व्यक्तियों पर मूल्यांकन अथवा पुनर्मूल्यांकन की कार्यवाही। यह कार्यवाहियां उस तिथि से आरम्भ मानी जाएँगी ,जिस तिथि को धारा 132 के अंतर्गत तलाशी शुरू की गयी अथवा धारा 132 क के अंतर्गत अधियाचन किया गया था।

(घ) जहाँ अपील अधिकरण द्वारा धारा 254 के अंतर्गत अथवा धारा 263 अथवा धारा 264 के अंतर्गत कमिश्नर द्वारा पूर्व मूल्यांकन को नजरअंदाज करके नए सिरे से मूल्यांकन की कार्यवाहियां की जाती है। ऐसे कार्यवाही को उस तिथि से लागू माना जायेगा, जब पूर्व के मूल्यांकन को दरकिनार करने का आदेश पारित किया गया ।

61.4 प्रावधानों में विहित है कि कोई आवेदन तब ही प्रस्तुत किया जा सकता है ,यदि आवेदन में घोषित आय पर देय अतिरिक्त आय कर एक लाख रुपये से अधिक हो। यह सीमा बढ़ाकर तीन लाख रुपये कर दी गयी है।

61.5 प्रावधानों में विहित है कि आवेदन में घोषित आय पर देय आय कर का भुगतान धारा 245 घ की उपधारा (I) के अंतर्गत आवेदन को आगे बढ़ने की अनुमति दी जाये। प्रावधानों में संशोधन किया गया है कि ऐसे कर का ब्याज के साथ, यदि आवेदन की तिथि पर अथवा उससे पूर्व देय है, तो उसका भुगतान किया जायेगा तथा इस भुगतान के प्रमाण को आवेदन पत्र के साथ संलग्न किया जायेगा । आगे यह प्रावधान किया गया है कि आवेदक विहित ढंग से निर्धारण अधिकारी को भी सूचित करेगा कि उसने समन्वय कमीशन के सामने ऐसा आवेदन प्रस्तुत किया है।

61.6 प्रावधानों में विहित है कि आयोग आवेदन की प्राप्ति पर आयुक्त से तत्सम्बन्धी प्रतिवेदन को प्रस्तुत करने का आदेश जारी करेगा। कमीशन इस प्रतिवेदन में उल्लेखित तथ्यों पर विचार करने के बाद तथा मामले की परिस्थिति तथा प्रकृति अथवा अनुसन्धान की जटिलता को ध्यान में रखते हुए आयोग आवेदन पत्र को अस्वीकृत करने का अथवा इसपर आगे की कार्यवाही करने का आदेश जारी करता है। वर्तमान प्रावधानों के अंतर्गत ऐसा करने के लिए कोई वैधानिक समय सीमा निर्धारित नहीं है। वैसे आवेदन पत्र की तिथि वाले महीने के अंत से लेकर एक वर्ष की समय सीमा के अंतर्गत आयोग द्वारा कार्यवाही करने के सुझाव का प्रावधान है। प्रावधानों में संशोधन करके यह निर्धारित किया गया है कि आवेदन पत्र कि प्राप्ति के सात दिनों के अंदर समन्वय आयोग आवेदक यह स्पष्टीकरण मांगेगा कि उसके आवेदन को क्यों स्वीकार किया जाये। तदोपरांत आवेदन पत्र की प्राप्ति के 14 दिनों के अंदर समन्वय आयोग आवेदन को अस्वीकृत अथवा उसपर आगे की कर्यवाही करने का आदेश जारी करेगा । आवेदन को स्वीकृत अथवा अस्वीकृत करने का निर्णय इस मामले से जुड़े हुए अनुसंधान की जटिलता के आधार पर नहीं किया जायेगा । इस सम्बन्ध में निम्नलिखित प्रावधान भी रखे गए हैं --

(क) जो आवेदन पत्र 1 जून 2007 से पूर्व दिए गए लेकिन उस तिथि तक लंबित हो जब उन्हें अस्वीकृत किया जाना है अथवा उनपर विचार किया जाना है, उन्हें आगे बढ़ाने की अनुमति होगी यदि 31 जुलाई 2007 से अथवा इसके पूर्व आवेदन में घोषित आय पर कर तथा ब्याज की रकम का भुगतान कर दिया गया है । यदि ऐसे कर तथा ब्याज का भुगतान उपरोक्त तिथि या उससे पूर्व नहीं किया जाता है तो आवेदन पत्र को अस्वीकृत समझा जायेगा।

(ख) उन आवेदन पत्रों को जिन्हे 1 जून 2007 से पूर्व स्वीकार किया गया था परन्तु निपटारे का आदेश इस तिथि के पूर्व नहीं किया गया, आवेदन पत्र में घोषित आय पर कर तथा ब्याज की राशि का भुगतान 31 जुलाई 2007 अथवा उससे पूर्व करना होगा । कर तथा ब्याज का भुगतान उन मामलों में भी करना होगा, जिनमें आयोग ने उस तिथि के आगे कर के भुगतान के लिए किश्त अथवा अतिरिक्त समय का अनुमोदन किया हो। यदि कर तथा ब्याज की राशि का भुगतान 31 जुलाई 2007 तक अथवा उससे पूर्व नहीं किया गया है तो आवेदन को आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं होगी तथा आयोग के समक्ष कार्यवाही 31 जुलाई 2007 को समाप्त कर दी जाएगी।

61.7 यदि किसी आवेदन पत्र पर 1 जून 2007 अथवा उसके बाद कार्यवाही की जाती है तो समन्वय आयोग इस आवेदन की प्राप्ति के 30 दिनों के अंदर आयुक्त को एक नोटिस जारी करता है। उपरोक्त अनुच्छेद 61.6(क) में उल्लेखित आवेदन पत्रो के मामले में यदि कर तथा ब्याज की रकम का भुगतान 31 जुलाई 2007 तक या उससे पूर्व किया गया है तो यह सूचना 7 अगस्त 2007 या उससे पूर्व आयुक्त को दी जाएगी. आयुक्त को अपना प्रतिवेदन समन्वय आयोग द्वारा प्राप्त सूचना के 30 दिनों के अंदर प्रेषित करना होगा।

61.8 आयुक्त से प्रतिवेदन प्राप्त करने के बाद समन्वय आयोग आवेदक तथा आयुक्त की 15 दिनों के अंदर सुनवाई करेगा। यदि यह पाया जाता है कि एक आवेदन पत्र वैध नहीं था तब आयोग एक आदेश पारित कर उस आवेदन को अवैध घोषित कर सकता है। किसी आवेदन को अवैध घोषित करने वाले आदेश की प्रति आवेदक तथा आयुक्त को भेजी जाएगी । यदि कोई आवेदन अवैध घोषित कर दिया जाता है तो आयोग द्वारा इसकी कार्यवाही समाप्त कर दी जाएगी । यदि आयुक्त अपना प्रतिवेदन निर्दिष्ट अवधि के दौरान नहीं भेजता है तो आयोग आयुक्त द्वारा प्राप्त होने वाले प्रतिवेदन के बिना ही कार्यवाही जारी रख सकता है।

61.9 उपरोक्त अनुच्छेद 61.6(क) अथवा 61.6 (ख) में उल्लेखित आवेदन पत्र जो 1 जुलाई 2007 से पहले दिए गए तथा जिन्हे अवैध करार नहीं किया गया उनपर समन्वय आयोग द्वारा यदि, यह उचित प्रतीत होता है, आगे कार्यवाही की अनुमति देकर आयुक्त को निर्देश दिया जा सकता है कि वे या तो कारण बताये या आगे की जाँच अथवा अनुसन्धान जो भी सही प्रतीत होता हो, करें। आयुक्त अपना प्रतिवेदन समन्वय आयोग द्वारा प्राप्त सुचना की तिथि के 90 दिनों के अंदर प्रस्तुत करेगा।

61.10 आयोग आयुक्त अथवा आवेदक को उचित अवसर प्रदान करने तथा आयुक्त के प्रतिवेदनों तथा अन्य उपलब्ध किये गए तथ्यों पर विचार करने के बाद भुगतान का आदेश पारित करता है। पूर्व संशोधित प्रावधानों के अंतर्गत मामले के निपटारे के लिए कोई समय सीमा नहीं थी। प्रावधानों में संशोधन करने के बाद अब आयोग आवेदन पत्र प्राप्त करने के महीने के अंत से 9 महीनो के अंदर यह आदेश पारित करेगा। उपरोक्त अनुच्छेद 61.6(क) अथवा 61.6(ख) में विहित आवेदन पत्रो के सन्दर्भ में समन्वय आयोग 31 मार्च 2008 तक या उससे पूर्व आदेश पारित कर सकता है।

61.11 पहले यह प्रावधान था कि आयोग भारतीय दंड संहिता, आय कर अधिनियम तथा किसी अन्य किसी केंद्रीय अधिनियम के अंतर्गत अभियोग की स्थिति में माफ़ी दे सकता है। इन प्रावधानों में संशोधन होने के बाद अब आयोग के पास आयकर अधिनियम तथा सम्पति कर अधिनियम के अलावा अन्य किसी कानून के अंतर्गत अभियुक्त पाये जाने पर आयोग के पास माफ़ करने का अधिकार नहीं है। वैसे लंबित आवेदनो के सन्दर्भ में पूर्व के प्रावधान यथावत है।

61.12 ऐसा प्रावधान है कि यदि आवश्यक हो तो आयोग किसी भी पूर्ण हो चुकी कार्यवाही को दुबारा प्रारम्भ कर सकता है। इन प्रावधानों में संशोधन के बाद अब आयोग किसी ऐसे पूर्ण हुए मामले पर दुबारा कार्यवाही नहीं कर सकता जिसमे 1 जून 2007 अथवा उसके बाद आवेदन पत्र धारा 254ग के अंतर्गत आवेदन किया गया है।

61.13 यह भी प्रावधान है कि 1 जुलाई 2007 को अथवा उसके उपरांत प्रस्तुत किये गए आवेदन अस्वीकृत होते है अथवा उपरोक्त अनुच्छेद 61.6() में उल्लेखित आवेदन अवैध करार किये जाते है अथवा उपरोक्त अनुच्छेद 61.6() में उल्लेखित आवेदन पर कार्यवाही नहीं होती है, अथवा निर्धारित अवधि के अंदर निर्णेय नहीं दिए जाते है, आयोग के समक्ष कार्यवाही को समाप्त कर दिया जायेगा ,तथा यह कार्यवाही आवेदन पत्र देते समय जिस निर्धारण अधिकारी अथवा किसी आयकर अधिकारी के समक्ष कार्यवाही के लिए लंबित था ।वही अधिकारी उसे फिर से शुरू कर कार्यवाही को पूर्ण करेंगे। आवेदक द्वारा भुगतान किये गए कर तथा ब्याज के लिए निर्धारण अधिकारी द्वारा उनके खाते में जमा करने की अनुमति होगी। जिस तिथि को आयोग के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया गया उस तिथि से लेकर कार्यवाही के समाप्त होने की तिथि तक की अवधि को निर्धारण अधिकारी द्वारा कार्यवाही को पूर्ण करने की समय सीमा से बाहर रखा जायेगा।

61.14 प्रावधानों में यह भी संशोधन किया गया है कि 1 जून 2007 के बाद कोई भी कर दाता निपटारे के लिए अपने जीवन काल में सिर्फ एक बार आवेदन कर सकता है। इस उद्देश्य से जिस आवेदन को स्वीकार निहिं किया गया था उसे आवेदन नहीं माना जायेगा।

61.15 यह भी प्रावधान किया गया है कि "उप सभापति " की परिभाषा में वरिष्ठ सदस्यों को न्यायापीठ के सदस्य में शामिल किया गया है, यदि न्यायपीठ में कोई उपसभापति नहीं है, तो न्यायापीठ के सदस्य का कोई वरिष्ठ सदस्य इसका संचालन कर सकता है।

61.16 सम्पति कर अधिनियम के अध्याय VA में समन्वय आयोग द्वारा सम्पति कर मामले को निपटाने के सिमिलर प्रावधान है । सम्पति कर अधिनियम के लिए वैसे ही संशोधन किये गए है ।

61.17 लागू होना -- 1 जून 2007 से यह संशोधन प्रभावी होंगे।

[धाराएं 62, 63, 64, 65, 66, 67, 68, 69, 70, 84, 85, 86, 87, 88, 89, 90, 91 तथा 92]

62 धारा 206ग(6क) के अंतर्गत एक व्यक्ति को एक अदाकर्ता के रूप में एक व्यक्ति को भुगतान न करने वाला करदाता ठहरने वाले करदाता के रूप में करार देने वाले आदेश के विरुद्ध याचन करने के अधिकार का प्रावधान ।

62.1 धारा 206ग की उपधारा (6घ) के वर्तमान प्रावधानों के अंतर्गत कोई व्यक्ति जो कर संग्रहित करने के लिए उत्तरदायी है, कर का भुगतान न करने वाला करदाता माना जायेगा यदि वह आंशिक या पूर्ण रूप से अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार कर की राशि को संग्रहित करने में अथवा संग्रहित कर भुगतान करने में असफल रहता है। निर्धारण अधिकारी के लिए यह आवश्यक है कि वह ऐसे व्यक्ति भुगतान न करने वाला करदाताका होने का आदेश जारी करे।

62.2 उपरोक्त उपधारा (6क) के प्रावधानों द्वारा कोई भी व्यक्ति कर संग्रहित करने का तथा उससे प्राप्त होने वाले करो के भुगतान करने का उत्तरदायी माना जाता है। ऐसे व्यक्ति को निर्धारण अधिकारी के विरुद्ध अपील फाइल करने का अधिकार है ,यदि उसे भुगतान न करने वाला करदाता ठहराया गया हो। धारा 201 की उपधारा (झ) के अंतर्गत निर्धारण अधिकारी द्वारा इस तरह के जारी किये जाने के विरुद्ध अपील के प्रावधान है जिनमे किसी व्यक्ति को करदाता के रूप में भुगतान न करने का उत्तरदायी माना गया हो यदि वो कर कटौती अथवा कर कटौती के बाद सरकारी खाते में कर की रकम जमा करने में असफल रहता है।

62.3 वित्त अधिनियम 2007 द्वारा धारा 246 क की उपधारा (1) में एक नया खंड ( जख) शामिल किया गया है कि जिसमें प्रावधान है कि एक व्यक्ति को भुगतान न करने वाला करदाता ठहराया गया हो तो वह आयुक्त (अपील) के समक्ष अपील कर सकता है।

62.4 वित अधिनियम 2007 द्वारा धारा 246क में एक नयी उपधारा (1ख) को शामिल किया गया है जिसमें प्रावधान है कि करदाता द्वारा धारा 206 ग की उपधारा 6क के अंतर्गत भुगतान न करने की स्थिति में जारी किये गए आदेश के विरुद्ध 1 अप्रैल 2007 अथवा उसके बाद की तिथि में लेकिन 1 जून 2007 के पूर्व धारा 246 के उपधारा (I) के नए खंड (hb) के अंतर्गत आयुक्त (अपील) के समक्ष किये गए अपील को स्वीकार किया जायेगा ।

63. व्यक्ति द्वारा कर की कटौती के अपने दायित्व से इंकार करने पर अपील का प्रावधान।

63.1 धारा 248 के प्रावधानों के अंतर्गत, बशर्ते की किसी व्यक्ति ने धारा 195 तथा धारा 200 के प्रावधानों के अनुरूप इस अधिनियम के अंतर्गत ब्याज के अतिरिक्त कर योग्य किसी रकम के सम्बन्ध में कर की कटौती तथा कर का भुगतान कर दिया है, तथा जो ऐसी कटौती के लिए अपने दायित्व से इंकार करता है, आयुक्त (अपील) के समक्ष, इस घोषणा कि वह ऐसी कटौती के लिए उत्तरदायी नहीं है, अपील कर सकता है।

63.2 धारा 248 अवस्थापित की गयी है, जहाँ धारा 195 के अंतर्गत ब्याज के अतिरिक्त किसी आय पर कर की कटौती के लिए कोई अनुबंध अथवा अन्य व्यवस्था की जाती है जो की उस व्यक्ति द्वारा उठाया जायेगा जिसे आय का भुगतान होना है तथा ऐसा व्यक्ति जिसने ऐसे कर को केंद्र सरकार के पास जमा करा दिया है, दावा करता है कि ऐसी आय पर कोई कर काटने की आवश्यकता नहीं है आयुक्त (अपील) के पास अपील कर सकता है।

63.3 लागू होना - यह संशोधन 1 जून, 2007 से लागू होंगे।

[धारा 72]

64. अपील के प्रावधान का स्वरूप तथा सीमाये : फलस्वरूप धारा 248 में संशोधन

64.1 धारा 249 की उपधारा (2) के प्रावधानों में विभिन्न स्थितियों तथा सम्बंधित तिथियों पर 30 दिनों के अंदर अपील फाइल करने का प्रावधान है। उपधारा (2) के खंड (क) में प्रावधान है कि जब धारा 195 की उपधारा (I) के अंतर्गत किसी कर की कटौती से सम्बंधित मामले में अपील किया जाना है तो कर के भुगतान की तिथि से 30 दिनों के अंदर अपील की जा सकती है ।

64.2 धारा 248 को संशोधित कर प्रावधान बनाया गया है कि कोई व्यक्ति, जिसने 'नेट ऑफ टैक्स'('नेट ऑफ़ टैक्स') व्यवस्था के अंतर्गत अप्रवासी के आय पर देय कर का भुगतान किया है, तथा इस बात से इंकार कर रहा हो कि कोई कर देय था, इसके विरुद्ध अपील कर सकता है। फलस्वरूप धारा 249 कि उपधारा (2) खंड क को संशोधित कर प्रावधान किया गया है कि यदि धारा 248 के अंतर्गत अपील की जाती है तो कर की राशि के भुगतान की तिथि से विहित समय प्रारम्भ होगा।

64.3 लागू होना - यह संशोधन1 जून 2007 से प्रभावी होंगे।

[धारा 73]

65. धर्मार्थ संस्थाओ तथा निधि के अनुमोदन से सम्बंधित प्रावधान

65.1 धारा 80 छ में दिए गए प्रावधान किसी विशेष निधि को दिए जाने वाले दान पर कर की कटौती से सम्बंधित है । कथित धारा के प्रावधानों में दो वर्गों के फण्ड होते है – पहला वो जो उपधारा (2) में सूचीबद्ध है तथा दूसरे वो फण्ड जो उपरोक्त धारा की उपधारा (5) के खंड (vi) के अंतगत आयुक्त द्वारा अनुमोदित किया जाता है। धारा 253 के पूर्व संशोधित प्रावधानों के अंतर्गत अपील अधिकरण के समक्ष धारा 80छ(5)(vi) के अंतर्गत आयुक्त द्वारा अनुमोदित अस्वीकृति के आदेश के विरुद्ध कोई अपील नहीं की जा सकती थी।

65.2 अतः धारा 253 को संशोधित किया गया जिससे की आयुक्त द्वारा अनुमोदित ऐसे आदेशो के विरुद्ध अपील अधिकरण के समक्ष अपील की जा सके।

65.3 लागू होना -- यह संशोधन 1 जून 2007 से प्रभावी होंगे।

[धारा 74]

66 . अपील अधिकरण के द्वारा विहित स्थगन की अनुमति के लिए समय सीमा का निर्धारण

66.1 धारा 254 के प्रावधानों के अनुसार अपील अधिकरण इसके समक्ष की गयी किसी भी अपील की कार्यवाही में स्थगन का आदेश जारी कर सकता है। ऐसे मामलो में यह प्रावधान था कि अपील अधिकरण ऐसे आदेश की तिथि से 180 दिनों की अवधि के अंदर अपील पर सुनवाई पूरी कर लेगा। यदि अपील पर स्थगन के आदेश की अवधि के अंदर अपील पर कोई निर्णय नहीं हो पाता है तो इस अवधि की समाप्ति के बाद यह स्थगन आदेश प्रभावी नहीं होगा।

66.2 धारा 254 में संशोधन कर यह प्रावधन दिया गया है कि करदाता द्वारा प्रस्तुत किये गए आवेदन के तथ्यों पर विचार करने के बाद अपील अधिकरण धारा 253 उपधारा (I) के अंतर्गत फाइल किये गए किसी अपील से सम्बंधित कार्यवाही में स्थगन का आदेश जारी कर सकता है। यह आदेश 180 दिनों की अवधि के बाद प्रभावी नहीं होगा। अपील अधिकरण उपरोक्त स्थगन आदेश की अवधि के अंदर ही अपील पर सुनवाई पूरी करेगा ।

66.3 आगे यह प्रावधान है कि जब स्थगन आदेश की अवधि के अंदर अपील पर सुनवाई पूर्ण नहीं हो पाती है तो अपील अधिकरण स्थगन आदेश की अवधि का विस्तार कर सकता है अथवा इसका विस्तार उस अवधि तक कर सकता है जितना इसे उचित प्रतीत होता है। स्थगन आदेश पर ऐसे विस्तार को करदाता के द्वारा प्रस्तुत किये गए आवेदन पर प्रदान किया जाता है यदि अपील अधिकरण यह समझता है कि अपील की सुनवाई में देरी के लिए करदाता जिम्मेवार नहीं है।

66.4 यह भी प्रावधान है कि मूल रूप से प्रदान की गयी अवधि तथा विस्तार की गयी अवधि का कुल योग किसी भी स्थिति में 365 दिनों की अवधि से अधिक नहीं होगा। अपील अधिकरण को अपील की सुनवाई पर अपना निर्णेय इस अवधि के अंदर देना होगा।

66.5 यह भी प्रावधान किया गया है कि यदि अपील की सुनवाई मूल अवधि अथवा विस्तृत अवधि अथवा अवधियों, आगे विस्तृत की गयी अवधि के अंदर पूरी नहीं होती है तो इन अवधियों की समाप्ति के बाद स्थगन आदेश प्रभावी नहीं होगा।

66.6 लागू होना - यह संशोधन 1 जून 2007 से प्रभावी होंगे ।

[धारा 75]

67 . आय के गलत विवरण प्रस्तुत करने अथवा छुपाने पर दिए जाने वाले दंड से सम्बंधित प्रावधानो की व्याख्या

67.1 धारा 271 उपधारा (1) व्याख्या 4 खंड (ख) के प्रावधानों के अनुसार किसी मामले में यदि उपरोक्त उपधारा (1) की व्याख्या 3 लागू होती है तो छुपाई जाने वाले कर की रकम का मतलब होगा सम्पूर्ण मूल्यांकित आय पर लगने वाला कर।

67.2 व्याख्या 4 को इस प्रकार संशोधित किया गया है की जिस मामले में व्याख्या 3 लागू होती है, कर की रकम का वो भाग जिसे छुपाया गया है उसका मतलब होगा की कुल मूल्यांकित आय पर कर की रकम में अग्रिम कर की रकम के भुगतान के उपरांत शेष कर की राशि , स्रोत पर कर में कटौती , स्रोत से कर का संग्रह तथा स्वतः मूल्यांकित कर की अदायगी धरा 148 के अंतर्गत जारी की गयी सूचना से पूर्व कर का भुगतान ।

67.3 लागू होना – यह संशोधन 1 अप्रैल 2003 के पूर्व प्रभाव से प्रभावी होगा तथा इसे मूल्यांकन वर्ष 2003-04 तथा बाद के वर्षों के सन्दर्भ में लागू माना जायेगा ।

67.4 धारा 271 की उपधारा (I) के व्याख्या 5 के प्रावधानों के अनुसार जब धारा 132 के अंतर्गत तलाशी के दौरान कोई धन , सोने चाँदी की ईंट , हीरे जवाहरात अथवा कोई मूलयवान वस्तुएं (जिन्हे व्याख्या में सम्पति कहा गया है ) पायी जाती है तथा करदाता यह दावा करता है कि यह सम्पति उसने अपनी आय का उपयोग करके (आंशिक अथवा पूर्ण रूप से ) अर्जित की है – (i) किसी गत वर्ष में जो तलाशी की तिथि के पूर्व समाप्त हुई हो परन्तु उस वर्ष के लिए इस तिथि से पहले आय का रिटर्न प्रस्तुत नहीं किया गया हो अथवा यह रिटर्न उस तिथि के पहले प्रस्तुत किया गया हो पर उसमे आय को घोषित नहीं किया गया हो अथवा , (ii) किसी विगत वर्ष में जो तलाशी की तिथि से पहले समाप्त हुआ हो तब तलाशी की तिथि पर अथवा उसके बाद आय की किसी भी रिटर्न को भरते समय इस आय को घोषित करने के बावजूद वह व्यक्ति धारा 271 उपधारा (I) खंड (ग) के अंतर्गत दंड का भागी होगा जिसका कारन उसके द्वारा आय के गलत विवरण को प्रस्तुत करना अथवा आय के विवरण को छुपाना समझा जायेगा । वैसे यदि कुछ विहित शर्तें पूरी होती हैं तो वह दंड का भागी नहीं होगा ।

67.5 व्याख्या 5 को संशोधित कर प्रावधान बनाया गया है की उपरोक्त व्याख्या उन्ही मामलों में लागू होंगे जब धारा 132 के अंतर्गत 1 जून 2007 को या इसके पूर्व तलाशी की गयी हो ।

67.6 लागू होना – यह संशोधन 1 जून 2007 से प्रभावी होंगे तथा उन मामलों में लागु होंगे जिनमें धारा 132 के अंतर्गत 1 जून 2007 अथवा उसके बाद तलाशी ली गयी हो ।

67.7 धारा 271 उपधारा (I) में एक नया व्याख्या 5क शामिल किया गया है जिसमे प्रावधान है की 1 जून 2007 अथवा उसके बाद धारा 132 के अंतर्गत तलाशी के दौरान करदाता के पास यदि कोई धन , सोने चाँदी की ईंट , हीरे जवाहरात अथवा कोई मूलयवान वस्तुए (जिन्हे नई व्याख्या में सम्पति माना गया है ) पायी जाती है अथवा (ii) किसी बही खाते में कोई प्रविष्टि अथवा दूसरे तरह के दस्तावेज अथवा पैसे के लें -दें पर आधारित कोई आय किसी विगत वर्ष में जो तलाशी की तिथि से पूर्व समाप्त हुई हो , तथा उस वर्ष का आयकर रिटर्न फाइल करने की निश्चित अवधि समाप्त हो गयी हो और करदाता ने रिटर्न फाइल नहीं किया हो तब उसके द्वारा घोषित इस आय को तलाशी के बाद की तिथि अथवा उसके बाद किसी आयकर रिटर्न में घोषित करने पर भी उसे इस धारा के उपधारा (I) खंड (ग) के अंतर्गत दंड का भागी माना जायेगा और समझा जायेगा की उसने अपनी आय के ब्योरे को छुपाया है अथवा इस आय का गलत ब्यौरा प्रस्तुत किया है ।

67.8 लागू होने -- यह संशोधन 1 जून 2007 से प्रभावी होंगे तथा उन मामलों में जहाँ धारा 132 के अंतर्गत 1 जून 2007 अथवा उसके बाद की तिथि में तलाशी ली जाती है वहां लागू माना जायेगा ।

(धारा 76)

68 . तलाशी तथा ज़ब्ती के मामलो में दंड का प्रावधान

68.1 एक नयी धारा 271 ककक को भी शामिल किया गया है ताकि इस मामले में जहाँ धारा 132 के अंतर्गत 1 जून 2007 को अथवा उसके बाद तलाशी ली गयी है वहां करदाता को दंड स्वरूप कर के अतिरिक्त निर्दिष्ट विगत वर्ष की आय के 10% की दर से गणना की गयी राशि का भुगतान करना होंगे । वैसे इस धारा के प्रावधान कर डेटा के लिए तब लागू नहीं होंगे जब – (i) धारा 132 के उपधारा 4 के अंतर्गत तलाशी की प्रक्रिया में करदाता अपने अघोषित आय के विवरण को प्रस्तुत कर देता है और बता देता है कि यह आय किस प्रकार अर्जित की गयी है (ii) करदाता अपने अघोषित आय के तरीके को सिद्ध कर देता है तथा (iii) करदाता ब्याज के साथ अघोषित आय पर , यदि कोई शेष है , कर का भुगतान कर देता है । इसमें आगे प्रावधान है की धारा 273 उपधारा (I) खंड (ग) के प्रावधानों के अंतर्गत करदाता को अपने अघोषित आय पर कोई दंड नहीं देना होगा । आगे यह भी प्रावधान है की धारा 274 तथा धारा 275 के प्रावधान नयी धारा के अंतर्गत लगने वाले दंड के सम्बन्ध में लागू होंगे ।

68.2 इस धारा के उद्देश्यों के लिए अघोषित आय को परिभाषित कर मतलब है (i) धारा 132 के अंतर्गत तलाशी के दौरान विनिर्दिष्ट पिछले प्रस्तावित वर्षो में कोई आय, चाहें पूर्ण रूप से हो अथवा आंशिक, किसी अन्य धन, सोने चांदी की इंटे, जेवरात अथवा अन्य मूलयवान वस्तुएं अथवा चीजे अथवा बही खातों अथवा अन्य दस्तावेजो में कोई लेखा प्रविष्टि अथवा लेन-देन जिन्हे तलाशी की तिथि तक अथवा उससे पहले सामान्य तौर पर पिछले वर्ष से सम्बंधित रखे (लिखे) जाने वाले बही खातों अथवा अन्य दस्तावेजो में अथवा

जिसे अन्यथा मुख्य आयुक्त अथवा आयुक्त के समक्ष तलाशी की तिथि से पहले घोषित न किया गया हो; अथवा (ii) विनिर्दिष्ट पिछले प्रस्तावित वर्षो की अन्य आय, चाहें पूर्ण हो अथवा आंशिक रूप से, बही खातों में दर्ज़ किसी व्यय के सन्दर्भ में कोई लेखा प्रविष्टि अथवा सामान्य तौर पर पिछले वर्ष से सम्बंधित रखे (लिखे) जाने वाले बही खातों जो असत्य पाये जाते है तथा यदि तलाशी नहीं ली जाती तो असत्य नहीं पाये जाते।

68.3 इस धारा के उद्देश्य से निर्दिष्ट विगत वर्ष का मतलब है वह विगत वर्ष –

(i) जो तलाशी की तिथि के पूर्व समाप्त हो चुका है परन्तु धारा 139 के उपधारा (I) के अंतर्गत आयकर रिटर्न फाइल करने की तिथि के लिए वर्ष तलाशी की तिथि से पूर्व समाप्त नहीं हुआ हो एवं उस तिथि के पूर्व विगत वर्ष के लिए करदाता ने आयकर रिटर्न प्रस्तुत नहीं किया हो ; अथवा

(ii) जिसमे तलाशी की गयी थी ।

68.4 प्रस्तावित नयी धारा 271ककक के अंतर्गत दिए गए दंड के विरुद्ध आयुक्त को अपील करने का प्रावधान दिया गया है ।

68.5 लागू होना -- यह संशोधन 1 जून 2007 से प्रभावी होगा और तदनुसार मूल्यांकन वर्ष 2007-08 एवं बाद के वर्षो के लिए उन मामलो में लागू होता है जिनमे धारा 132 के अंतर्गत 1 जून 2007 को अथवा उसके बाद तलाशी ली गयी है।

[धारा 71 एवं 77]

69 . आयकर अधिनियम के अंतर्गत जब्त किये गए बहीखातों, नकद राशि, सोने चांदी की इंट, हीरे के जेवरात अथवा अन्य मूलयवान वस्तुओ की धारणा से सम्बंधित स्पष्टीकरण

69.1 धारा 132 की उपधारा (4क) के प्रावधानों के अनुसार यदि किसी व्यक्ति के पास धारा 132 के अंतर्गत की गयी तलाशी के दौरान बहीखाते, नकद राशि, सोने चांदी की इंट, हीरे के जेवरात अथवा अन्य मूल्यवान वस्तु, पाये जाते है अथवा उनके नियंत्रण में है को उसे उस व्यक्ति की सम्पति समझी जाएगी। इसके आगे यह प्रावधान है कि बही खाते तथा अन्य दस्तावेजो के विषयवस्तु को सही माना जायेगा; तथा हस्ताक्षर अथवा बही खातों की ऐसे अन्य दस्तावेजों जिसका अर्थ किसी खास व्यक्ति की लिखावट अथवा सही रूप से हस्ताक्षरित होने से है अथवा किसी खास व्यक्ति की लिखाई में है तथा अंकपत्रित दस्तावेजो के मामले में; सत्यापित अथवा कार्यान्वित की स्थिति में माना जायेगा कि यह सही रूप से अंकपत्रित तथा सत्यापित तथा यह उस व्यक्ति द्वारा अंकपत्रित तथा सत्यापित किया गया जिसका उद्देश्य ऐसा करना था।

69.2 एक नयी धारा 292ग को शामिल किया गया है जिससे धारा 132 की उपधारा (4क) में दिए गए प्रावधान इस अधिनियम के अंतर्गत किसी प्रावधान द्वारा किसी कार्यवाही का स्पष्टीकरण हो सके।

69.3 आगे सम्पति कर अधिनियम में एक नयी धारा 42घ को भी ऐसे ही संशोधन के द्वारा जोड़ा गया है।

69.4 लागू होना -- यह संशोधन 1 अक्टूबर 1975 के पूर्व प्रभाव से लागू माना जायेगा।

[धारा 78 एवं 93]

70. आयकर अधिनियम के चौथी अनुसूची के भाग नियम 4 खंड (डक) में निहित शर्तो को पूर्ण करने की नियम 3 में निर्दिष्ट समय सीमा का विस्तार

70.1 आयकर अधिनियम की चौथी अनुसूची के नियम 4 में उन शर्तो का प्रावधान है जिन्हें आयकर अधिनियम की मान्यता को बचाये रखने के लिए भविष्य निधि द्वारा शर्तो को पूरा करने की आवश्यकता होती है. इस नियम के खंड (डक) में प्रावधान है कि यह फण्ड एक संस्था होगी जिसपर ईपीएफ की धारा 1 उपधारा (4) अथवा उपधारा (3) के प्रावधान तथा विबिध प्रावधान अधिनियम 1952 लागू होगे और इस संस्था को अधिनियम की धारा 17 के अंतर्गत इस धारा में दिए गए किसी योज़ना के सभी प्रावधानों से मुक्त रखा गया है।

70.2 खंड (डक) में दिए गए शर्तो को स्पष्ट करने के दृश्टिकोण से खंड (डक) को स्थान्पन्न कर दिया गया है ताकि आयकर अधिनियम के अंतर्गत मान्यता प्राप्त करने तथा बनाये रखने की सुविधा हो, फण्ड उस संस्था का फण्ड होगा जिसपर ईपीएफ की धारा 1 उपधारा 3 के प्रावधानों तथा विविध प्रावधान अधिनियम 1952 पर लागू होते है अथवा उस संस्था का फण्ड होगा जिसे केंद्रीय भविष्ये निधि आयुक्त ने इस अधिनियम की धारा 1 उपधारा 4 की अंतर्गत अधिसूचित किया हो तथा यह संस्था उपाधिनियम की धारा 17 के अंतर्गत उस धारा में निहित किसी योजना के सभी प्रावधानों से मुक्त हो।

70.3 चौथी अनुसूची के भाग A नियम 3 में प्रावधान है कि आयकर के मुख्य आयुक्त अथवा आयुक्त किसी भविष्य निधि फण्ड को मान्यता प्रदान कर सकते है अगर वह नियम 4 में तथा बोर्ड द्वारा इस सम्बन्ध में बनाये गए नियमों की शर्तो को पूरा करता हो ।

70.4 उपरोक्त नियम 3 के उपनियम (I) की शर्त, अन्य विषयो के अलावा, स्पष्ट करता है कि किसी मामले में जहाँ किसी भविष्य निधि को 31 मार्च 2006 को अथवा उससे पूर्व मान्यता दी गयी है और यह भविष्य निधि नियम 4 के खंड (डक) में स्पष्ट शर्तो को पूरा नहीं करता है तो इसके मान्यता वापस ले ली जाएगी अगर यह 31 मार्च 2007 को या उससे पूर्व ऐसी शर्तो को पूरा नहीं करता है।

70.5 क्योंकि कर्मचारी भविष्य निधि संगठन को पर्याप्त समय देने के विचार से कि वे ईपीएफ की धारा 17 तथा विविध प्रावधान अधिनियम 1952 के अंतर्गत छूट के लिए आवेदन पत्र पर निर्णय कर सकें, उन्हें आयकर अधिनियम की चौथी सूची के नियम 3 के अंतर्गत समय सीमा दी गयी ताकि वे उक्त अनुसूची के भाग A नियम 4 खंड (डक) में निर्दिष्ट शर्तो को पूरा कर सकें। इस समय सीमा को 31 मार्च 2007 से बढ़ाकर 31 मार्च 2008 कर दिया गया है।

70.6 नियम 3 के उपनियम (I) में एक शर्त शामिल की गयी है जिससे कि पहली शर्त किसी संस्था के भविष्य निधि फण्ड पर ईपीएफ की धारा 16 उपधारा (2) तथा विविध प्रावधान अधिनियम 1952 के अंतर्गत केंद्रीय सरकार द्वारा जारी किये गए अधिसूचना के सम्बन्ध में लागू नहीं होगी ।

70.7 लागू होना -- यह संशोधन 1 अप्रैल 2008 के प्रभाव से लागू होगी और तदनुसार मूल्यांकन वर्ष 2009 एवं बाद के मूल्यांकन वर्षो के लिए लागू रहेंगी।

[धारा 82]

71. केंद्रीय सरकार अथवा राज्य सरकार के ऑफिस अथवा संस्था का अपवर्जन तथा बैंकिंग नकद लेनदेन कर (बीसीटीटी) के प्रावधानों में छूट की सीमा में वृद्धि

71.1 जैसा कि वित अधिनियम 2005 की धारा 94 के अध्याय VII में प्रावधान है कि बैंकिंग नकद लेनदेन (बीसीटीटी) के प्रावधानों में लगाये जाने वाले कर की दर कर योग्य लेन-देन पर 0.1 प्रतिशत है इस तरह की बैंक सम्बन्धी लेन-देन में निम्नलिखित शामिल है - (i) नकद रकम की निकासी (चाहे जिस तरीके से हो) जो किसी व्यक्ति अथवा संयुक्त हिन्दू परिवार के मामले में 25,000/- रुपये से ज्यादा है तथा 1,00,000/- रुपये की निकासी किसी कर योग्य तत्वों के लिए की गयी हो, एक दिन में किसी एक खाते से (बचत खाते के अलावा) किसी विशेष बैंक से की गयी हो (ii) बैंक में रखे गए मियादी बचत की परिपक्वता अथवा किसी और कारण से की स्थिति में किसी एक दिन में निर्धारित सीमा से अधिक नकद की प्राप्ति. अन्य प्रकार के करो के अलावा किसी ऑफिस द्वारा अथवा केंद्रीय अथवा राज्य सरकार की संस्थाओ द्वारा बीसीटीटी भी देय माना जाता था।

71.2 उपरोक्त धारा में संशोधन कर दिया गया है ताकि केंद्रीय सरकार अथवा राज्य सरकार के संस्थाओ अथवा कार्यलयों का व्यक्ति की परिभाषा के क्षेत्र से उन्हें बाहर किया जा सके।

71.3 इसके आगे किसी व्यक्ति तथा अविभाजित हिन्दू परिवार के लिए कर योग्य बैंकिंग लेन-देन की वर्तमान सीमा को 25,000/- रुपये से बढ़ाकर 50,000/- रुपये कर दिया गया है।

71.4 लागू होना -- यह संशोधन 1 जून 2007 से प्रभावी होंगे ।

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