कतिपय मामलों में आयुक्त को निर्देश
वित्त अधिनियम, 2012 द्वारा 1.4.2014 से धारा 144 ख के पश्चात् निम्नलिखित धारा 144 खक अंत:स्थापित की जाएगी :
कतिपय मामलों में आयुक्त को निर्देश
144खक. (1) यदि निर्धारण अधिकारी का, उसके समक्ष निर्धारण या पुनर्निर्धारण संबंधी कार्यवाहियों के किसी प्रक्रम पर, उपलब्ध सामग्री और साक्ष्य को ध्यान में रखते हुए, यह विचार है कि किसी ठहराव को अध्याय 10क के अर्थांतर्गत किसी अननुज्ञेय परिवर्जन ठहराव के रूप में घोषित करना और ऐसे ठहराव के परिणाम अवधारित करना आवश्यक है तो वह इस संबंध में आयुक्त को निर्देश कर सकेगा।
(2) यदि आयुक्त उपधारा (1) के अधीन कोर्इ निर्देश प्राप्त होने पर, उसकी यह राय है कि अध्याय 10क के उपबंधों का अवलंब लेना अपेक्षित है तो एक नोटिस, उसमें ऐसी राय के कारणों और आधार को उल्लिखित करते हुए निर्धारिती को अक्षेप, यदि कोर्इ हों, प्रस्तुत करने के लिए और निर्धारिती को साठ दिन से अनधिक की ऐसी अवधि के भीतर, जो सूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, सुनवार्इ का अवसर प्रदान करते हुए, जारी करेगा।
(3) यदि निर्धारिती उपधारा (2) के अधीन जारी किए नोटिस में विनिर्दिष्ट समय के भीतर नोटिस के प्रति कोर्इ आक्षेप प्रस्तुत नहीं करता है तो आयुक्त ऐसे निदेश जारी करेगा, जो वह ठहराव की अननुज्ञेय परिवर्जन ठहराव के रूप में घोषित करने के संबंध में ठीक समझे।
(4) यदि निर्धारिती प्रस्तावित कार्रवार्इ के प्रति आक्षेप करता है और आयुक्त का मामले में निर्धारिती की सुनवार्इ करने के पश्चात् निर्धारिती के स्पष्टीकरण के प्रति समाधान नहीं होता है तो वह उस मामले में ठहराव की अननुज्ञेय परिवर्जन ठहराव के रूप में घोषित करने के प्रयोजन के लिए अनुमोदनकर्ता पैनल को निर्देश करेगा।
(5) यदि आयुक्त का निर्धारिती के पक्ष को सुनने के पश्चात् यह समाधान हो जाता है कि अध्याय 10क के उपबंधों का अवलंब नहीं लिया जाना चाहिए तो वह लिखित आदेश द्वारा उसकी संसूचना, निर्धारिती को एक प्रति के साथ, निर्धारण अधिकारी को देगा।
(6) अनुमोदनकर्ता पैनल, उपधारा (4) के अधीन आयुक्त से निर्देश प्राप्त होने पर, ठहराव को अध्याय 10क के उपबंधों के अनुसार अननुज्ञेय परिवर्जन ठहराव के रूप में घोषित करने के संबंध में, जिसके अंतर्गत उस पूर्ववर्ष या उन पूर्ववर्षों को विनिर्दिष्ट करना भी है, जिनके लिए ठहराव की अननुज्ञेय परिवर्जन ठहराव के रूप में ऐसी घोषणा लागू होगी, ऐसे निदेश जारी करेगा, जो वह ठीक समझे।
(7) उपधारा (6) के अधीन कोर्इ निदेश तब तक जारी नहीं किया जाएगा, जब तक ऐसे निदेशों के संबंध में, जो, यथास्थिति, निर्धारिती के हित या राजस्व के हित के प्रतिकूल हों, निर्धारिती और निर्धारण अधिकारी को सुनवार्इ का अवसर न दे दिया गया हो।
(8) अनुमोदनकर्ता पैनल, उपधारा (6) के अधीन कोर्इ निदेश जारी करने से पूर्व,–
(i) यदि उसकी यह राय है कि मामले में कोर्इ और जांच आवश्यक है, आयुक्त को ऐसी और जांच करने या किसी अन्य आय-कर प्राधिकारी द्वारा ऐसी और जांच कराने तथा ऐसी जांच के परिणामों वाली रिपोर्ट उसे प्रस्तुत करने का निदेश दे सकेगा; या
(ii) मामले से संबंधित ऐसे अभिलेखों को मंगा सकेगा और उनकी परीक्षा कर सकेगा, जो ठीक समझे; या
(iii) निर्धारिती से ऐसा दस्तावेज और साक्ष्य प्रस्तुत करने की अपेक्षा कर सकेगा, जो वह इस प्रकार निदेश दे।
(9) यदि अनुमोदनकर्ता पैनल के सदस्यों के बीच किसी मुद्दे पर मतभेद है तो उस मुद्दे का विनिश्चय सदस्यों के बहुमत के अनुसार किया जाएगा।
(10) उपधारा (6) के अधीन अनुमोदनकर्ता पैनल द्वारा या उपधारा (3) के अधीन आयुक्त द्वारा जारी किया गया प्रत्येक निदेश निर्धारण अधिकारी पर आबद्धकर होगा और निर्धारण अधिकारी, निदेशों के प्राप्त होने पर, निदेशों और अध्याय 10क के उपबंधों के अनुसार उपधारा (1) में निर्दिष्ट कार्यवाहियों को पूरा करने के लिए अग्रसर होगा।
(11) यदि उपधारा (6) के अधीन जारी किए गए किसी निदेश में यह विनिर्दिष्ट है कि ऐसे ठहराव की अननुज्ञेय परिवर्जन ठहराव के रूप में घोषणा ऐसे किसी पूर्ववर्ष के लिए लागू होती है, जिससे उपधारा (1) में निर्दिष्ट कार्यवाहियां तात्पर्यित हैं, तो निर्धारण अधिकारी ऐसे अन्य पूर्ववर्ष से सुसंगत निर्धारण वर्ष की किसी निर्धारण या पुनर्निर्धारण संबंधी कार्यवाहियों को पूरा करते समय ऐसे निदेशों और अध्याय 10क के उपबंधों के अनुसार ऐसा करेगा और उसके लिए उस मुद्दे पर सुसंगत निर्धारण वर्ष के संबंध में नए सिरे से निदेश लेना आवश्यक नहीं होगा।
(12) निर्धारण अधिकारी द्वारा निर्धारण या पुन:निर्धारण संबंधी कोर्इ आदेश, आयुक्त के पूर्व अनुमोदन के बिना उस दशा में पारित नहीं किया जाएगा, यदि किसी ठहराव की अननुज्ञेय परिवर्जन ठहराव के रूप में घोषणा करते हुए उपधारा (6) या उपधारा (3) के अधीन जारी किए गए किसी निदेश के अनुसरण में अध्याय 10क के उपबंधों के अधीन आदेश में कोर्इ कर परिणाम अवधारित किए गए हैं।
(13) उपधारा (6) के अधीन कोर्इ निदेश उस मास के अंत से, जिसमें उपधारा (4) के अधीन अनुमोदनकर्ता पैनल द्वारा निर्देश प्राप्त किया गया था, छह मास की अवधि के पश्चात् जारी नहीं किया जाएगा।
(14) बोर्ड, इस धारा के प्रयोजनों के लिए, एक अनुमोदनकर्ता पैनल का गठन करेगा, जो तीन से अन्यून ऐसे सदस्यों से मिलकर बनेगा, जो,–
(i) ऐसे आय-कर प्राधिकारी हों जो आयुक्त की पंक्ति से नीचे की पंक्ति के न हों; और
(ii) भारतीय विधिक सेवा का ऐसा कोर्इ अधिकारी, जो संयुक्त सचिव, भारत सरकार की पंक्ति से नीचे की पंक्ति का न हो।
(15) बोर्ड, अनुमोदनकर्ता पैनल के दक्ष कार्यकरण और उपधारा (4) के अधीन प्राप्त निर्देशों के शीघ्र निपटान के प्रयोजनों के लिए नियम बना सकेगा।
[वित्त अधिनियम, 2012 द्वारा संशोधित रूप में]

