रजिस्ट्रीकरण के लिए प्रक्रिया
रजिस्ट्रीकरण के लिए प्रक्रिया
12कक. (1) प्रधान आयुक्त या आयुक्त, किसी न्यास/संस्था के रजिस्ट्रीकरण के लिए धारा 12क की उपधारा (1) के खंड (क) या खंड (कक) 25[या खंड (कख)] के अधीन किए गए आवेदन की प्राप्ति पर,—
25क[(क) न्यास या संस्था से ऐसे दस्तावेज या जानकारी मंगा सकेगा, जिन्हें वह स्वयं का निम्नलिखित के बारे में समाधान करने के लिए आवश्यक समझे,—
(i) न्यास या संस्था के क्रियाकलापों की वास्तविकता; और
(ii) न्यास या संस्था द्वारा तत्समय प्रवृत्त किसी ऐसी अन्य विधि का अनुपालन, जिसका अनुपालन इस कारण से अपेक्षित है कि वह उसके उद्देश्यों की पूर्ति के लिए तात्विक है,
और वह ऐसी जांच भी कर सकेगा, जो वह इस निमित्त आवश्यक समझे; और]
(ख) 25ख[खंड (क) के उपखंड (i) और उक्त खंड के उपखंड (ii) के अधीन अपेक्षाओं का अनुपालन]—
(i) न्यास या संस्था को रजिस्ट्रीकृत करने के लिए लिखित में आदेश पारित करेगा;
(ii) न्यास या संस्था को रजिस्ट्रीकृत करने से इन्कार करने के लिए लिखित में आदेश पारित करेगा यदि उसका समाधान नहीं होता है,
और ऐसे आदेश की एक प्रति आवेदक को भेजी जाएगी :
परन्तु उपखंड (ii) के अधीन ऐसा आदेश तब तक पारित नहीं किया जाएगा जब तक कि आवेदक को सुने जाने का युक्तियुक्त अवसर प्रदान न कर दिया गया हो।
(1क) प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त के समक्ष लंबित ऐसे सभी आवेदन, जिन पर 1 जून, 1999 के पूर्व उपधारा (1) के खंड (ख) के अधीन कोई आदेश पारित नहीं किया गया है, उस दिन को प्रधान आयुक्त या आयुक्त को अंतरित हो जाएंगे और प्रधान आयुक्त या आयुक्त उस उपधारा के अधीन ऐसे आवेदनों पर ऐसे प्रक्रम से आगे कार्यवाही कर सकेगा जिस पर वे उस दिन को थे।
(2) उपधारा (1) के खंड (ख) के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रदान करने या उससे इन्कार करने वाला प्रत्येक आदेश धारा 12क की उपधारा (1) के खंड (क) या खंड (कक) 26[या खंड (कख)] के अधीन आवेदन प्राप्त करने वाले मास के अंत से छह मास के अवसान के पूर्व पारित किया जाएगा।
(3) जहां किसी न्यास या किसी संस्था को उपधारा (1) के खंड (ख) के अंतर्गत रजिस्ट्रीकरण मंजूर किया गया है या धारा 12क [जैसी वह वित्त (संख्यांक 2) अधिनियम, 1996 (1996 का 33) द्वारा इसका संशोधन किए जाने से पूर्व विद्यमान थी] के अधीन किसी समय रजिस्ट्रीकरण अभिप्राप्त किया गया है और तत्पश्चात् प्रधान आयुक्त या आयुक्त का यह समाधान हो जाता है कि, यथास्थिति, ऐसे न्यास या संस्था के कार्यकलाप प्रामाणिक नहीं हैं या वे न्यास या संस्था के उद्देश्यों के अनुसार नहीं किए जा रहे हैं तो वह ऐसे न्यास या संस्था के रजिस्ट्रीकरण को रद्द करने संबंधी आदेश लिखित रूप में पारित करेगा:
परंतु इस उपधारा के अधीन कोई आदेश तब तक पारित नहीं किया जाएगा जब तक कि ऐसे न्यास या संस्था को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर प्रदान न कर दिया गया हो।
(4) उपधारा (3) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, जहां किसी न्यास या किसी संस्था को उपधारा (1) के खंड (ख) के अधीन रजिस्ट्रीकरण मंजूर किया गया है या उसने धारा 12क [जैसी वह वित्त (संख्यांक 2) अधिनियम, 1996 (1996 का 33) द्वारा उसके संशोधन के पूर्व विद्यमान थी] के अधीन किसी समय रजिस्ट्रीकरण अभिप्राप्त किया है और तत्पश्चात् यह अवेक्षा की जाती है कि :
26क[(क) न्यास या संस्था द्वारा किए जाने वाले क्रियाकलाप ऐसी रीति में किए जा रहे हैं कि धारा 11 और धारा 12 के उपबंध इस प्रकार लागू नहीं होते हैं कि ऐसे न्यास या संस्था की संपूर्ण आय या उसके किसी भाग को धारा 13 की उपधारा (1) के प्रवर्तन के कारण अपवर्जित किया जाए; या
(ख) न्यास या संस्था ने किसी अन्य विधि की अपेक्षाओं का अनुपालन नहीं किया है, जैसा कि उपधारा (1) के खंड (क) के उपखंड (ii) में निर्दिष्ट है और आदेश, निदेश या डिक्री, चाहे किसी भी नाम से ज्ञात हो, जो यह धारित करती है कि ऐसा अननुपालन हुआ है, को या तो प्रश्नगत नहीं किया गया है या उसने अंतिमता प्राप्त कर ली है,
तब, प्रधान आयुक्त या आयुक्त लिखित आदेश द्वारा ऐसे न्यास या संस्था के रजिस्ट्रीकरण को रद्द कर सकेगा:]
परंतु इस उपधारा के अधीन रजिस्ट्रीकरण उस दशा में रद्द नहीं किया जाएगा यदि न्यास या संस्था यह साबित कर देती है कि क्रियाकलापों को उक्त रीति से किए जाने के लिए युक्तियुक्त कारण था।
26कक[(5) इस धारा की कोई बात 1 अप्रैल, 2021 को या उसके पश्चात् लागू नहीं होगी।]
25. वित्त अधिनियम, 2017 द्वारा 1.4.2018 से अंत:स्थापित।
25क. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2019 द्वारा 1.9.2019 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व खंड (क) निम्न प्रकार था:
"(क) न्यास या संस्था से ऐसे दस्तावेज या जानकारी प्रस्तुत करने के लिए कहेगा जो वह न्यास या संस्था के क्रियाकलापों की यथार्थता के संबंध में अपना समाधान करने के लिए आवश्यक समझे और ऐसी जांच भी करेगा जो वह इस निमित्त आवश्यक समझे; और"
25ख. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2019 द्वारा 1.9.2019 से प्रतिस्थापित।
26 वित्त अधिनियम, 2017 द्वारा 1.4.2018 से अंत:स्थापित।
26क. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2019 द्वारा 1.9.2019 से प्रतिस्थापित।
26कक. कराधान और अन्य विधि (कतिपय उपबंधो का शिथिलीकरण और संशोधन) अधिनियम, 2020 द्वारा 1.4.2021 से अंत:स्थापित इससे पूर्व कराधान और अन्य विधि (कतिपय उपबंधो का शिथिलीकरण और संशोधन) अधिनियम, 2020 द्वारा भूतलक्षी प्रभाव से 1.6.2020 से लोप किया गया। लोप से पूर्व वित्त अधिनियम, 2020 द्वारा 1.6.2020 से अंत:स्थापित किया गया जो निम्न प्रकार था:
"(5) इस धारा की कोई बात 1 जून, 2020 को या उसके पश्चात् लागू नहीं होगी।"
[वित्त अधिनियम, 2022 द्वारा संशोधित रूप में]

