वार्षिक मूल्य कैसे निर्धारित
वार्षिक मूल्य कैसे अवधारित किया जाता है*
1223. (1) 14[धारा 22 के प्रयोजनों के लिए, संपत्ति का वार्षिक मूल्य निम्नलिखित समझा जाएगा, अर्थात् —
(क) वह राशि जिस पर संपत्ति के वर्षानुवर्ष किराए पर दिए जाने की युक्तियुक्त रूप से प्रत्याशा की जा सकती हो; या
(ख) जहां सम्पत्ति किराए पर दी जाती है और स्वामी द्वारा उसकी बाबत प्राप्त किया गया या प्राप्य वार्षिक किराया खंड (क) में विनिर्दिष्ट राशि से अधिक है वहां इस प्रकार प्राप्त की गर्इ या प्राप्य रकम:]
15[परन्तु जहां सम्पत्ति किसी किराएदार के अधिभोग में है वहां उस पूर्ववर्ष की जिसमें स्वामी द्वारा ऐसे करों का वास्तव में संदाय किया जाता है, संपत्ति का वार्षिक मूल्य अवधारित करने में (ऐसे पूर्ववर्ष को दृष्टि में लाए बिना जिसमें ऐसे करों को देने का दायित्व ऐसे स्वामी द्वारा निरन्तर अपनार्इ जाने वाली लेखा पद्धति के अनुसार उसके द्वारा उपगत किया गया था) किसी स्थानीय प्राधिकारी द्वारा उस संपत्ति की बाबत उद्गृहीत16 करों की उस सीमा तक कटौती की जाएगी जिस तक ऐसे कर उसके द्वारा 16वहन किए जाते हैं:]
17[परन्तु यह और कि इस उपधारा के अधीन अवधारित किए गए वार्षिक मूल्य में से,—
(क) एक या अधिक निवास इकाइयों वाले ऐसे भवन की दशा में, जिसका निर्माण 1 अप्रैल, 1961 के पश्चात् आरम्भ किया गया है और 1 अप्रैल, 1970 के पूर्व पूरा हो गया है, उस भवन के पूरे होने की तारीख से तीन वर्ष की कालावधि के लिए इतनी राशि घटा दी जाएगी जो निम्नलिखित के योग के बराबर है—
(i) किसी ऐसी निवास इकार्इ की बाबत जिसका इस प्रकार अवधारित वार्षिक मूल्य छह सौ रुपए से अधिक नहीं है, ऐसे वार्षिक मूल्य की रकम;
(ii) किसी ऐसी निवास इकार्इ की बाबत जिसका इस प्रकार अवधारित वार्षिक मूल्य छह सौ रुपए से अधिक है, छह सौ रुपए की रकम;
(ख) एक या अधिक निवास-इकाइयों वाले ऐसे भवन की दशा में जिसका निर्माण 1 अप्रैल, 1961 के पश्चात् आरम्भ किया गया है और 31 मार्च, 1970 के पश्चात् 18[किंतु 1 अप्रैल, 1978 के पूर्व] पूरा हो गया है उस भवन के पूरे होने की तारीख से पांच वर्ष की अवधि के लिए उतनी राशि घटा दी जाएगी जो निम्नलिखित के योग के बराबर है–
(i) किसी ऐसी निवास इकार्इ की बाबत जिसका इस प्रकार अवधारित वार्षिक मूल्य एक हजार दो सौ रुपए से अधिक नहीं है, ऐसे वार्षिक मूल्य की रकम;
(ii) किसी ऐसी निवास इकार्इ की बाबत जिसका इस प्रकार अवधारित वार्षिक मूल्य एक हजार दो सौ रुपए से अधिक है, एक हजार दो सौ रुपए की रकम;
19[(ग) एक या अधिक निवास इकाइयों वाले ऐसे भवन की दशा में जिसका निर्माण 20[31 मार्च, 1978 के पश्चात् किन्तु 1 अप्रैल, 1982 के पूर्व पूरा हो गया है] उस भवन के पूरे होने की तारीख से पांच वर्ष की कालावधि के लिए उतनी राशि घटा दी जाएगी जो निम्नलिखित के योग के बराबर है—
(i) किसी ऐसी निवास इकार्इ की बाबत, जिसका इस प्रकार अवधारित वार्षिक मूल्य दो हजार चार सौ रुपए से अधिक नहीं है, ऐसे वार्षिक मूल्य की रकम;
(ii) किसी ऐसी निवास इकार्इ की बाबत, जिसका इस प्रकार अवधारित वार्षिक मूल्य दो हजार चार सौ रुपए से अधिक है, दो हजार चार सौ की रकम;]
21[(घ) एक या अधिक निवास इकाइयों वाले ऐसे भवन की दशा में जिसका निर्माण 31 मार्च, 1982 के पश्चात् 22[किंतु 1 अप्रैल, 1992 के पूर्व] पूरा हो गया है, उस भवन के पूरे होने की तारीख से पांच वर्ष की अवधि के लिए उतनी राशि घटा दी जाएगी जो निम्नलिखित के योग के बराबर है—
(i) किसी ऐसी निवास इकार्इ की बाबत, जिसका इस प्रकार अवधारित वार्षिक मूल्य तीन हजार छह सौ रुपए से अधिक नहीं है, ऐसे वार्षिक मूल्य की रकम;
(ii) किसी ऐसी निवास इकार्इ की बाबत, जिसका इस प्रकार अवधारित वार्षिक मूल्य तीन हजार छह सौ रुपए से अधिक है, तीन हजार छह सौ रुपए की रकम]
23[***]]]
24[25[स्पष्टीकरण 1.–[इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए "वार्षिक किराया" से अभिप्रेत है—
(क) उस दशा में जिसमें संपत्ति पूरे पूर्ववर्ष भर किराए पर दी गर्इ हो, स्वामी द्वारा उस वर्ष की बाबत प्राप्त किया गया या प्राप्य वास्तविक किराया; और
(ख) किसी अन्य दशा में वह रकम जिसका, स्वामी द्वारा संपत्ति किराए पर दिए जाने की कालावधि के लिए प्राप्त किए गए या प्राप्य वास्तविक किराए की रकम का वही अनुपात है जो बारह मास की कालावधि का उस अवधि से है।]
26[स्पष्टीकरण 2.–शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि जहां इस उपधारा के पहले परन्तुक में निर्दिष्ट किसी कर की बाबत कोर्इ कटौती ऐसे किसी पूर्ववर्ष की बाबत (जो 1 अप्रैल, 1984 को प्रारम्भ होने वाले निर्धारण वर्ष या किसी पूर्वतर निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष है) संपत्ति के वार्षिक मूल्य का अवधारण करने में अनुज्ञात की जाती है, वहां ऐसे पूर्ववर्ष की बाबत, जिसमें स्वामी द्वारा ऐसे करों का वास्तव में संदाय किया जाता है, संपत्ति के वार्षिक मूल्य का अवधारण करने में पहले परन्तुक के अधीन कोर्इ कटौती अनुज्ञात नहीं की जाएगी।]
27[(2) जहां संपत्ति में—
(क) कोर्इ ऐसा मकान या मकान का भाग है जो स्वामी के अधिभोग में स्वयं उसके निवास के प्रयोजनों के लिए है,–
(i) जो पूर्ववर्ष के किसी भाग के दौरान वास्तव में किराए पर नहीं दिया गया है तथा स्वामी द्वारा उससे कोर्इ भी अन्य फायदा नहीं उठाया गया है वहां ऐसे मकान या उसके भाग का वार्षिक मूल्य शून्य माना जाएगा;
(ii) जो पूर्ववर्ष के किसी भाग या किन्हीं भागों के दौरान किराए पर दिया गया है वहां वार्षिक मूल्य का वह भाग (वार्षिक मूल्य उसी रीति से अवधारित किया जाएगा मानो वह संपत्ति किराए पर दी गर्इ हो) जो उस अवधि का आनुपातिक है जिसके दौरान यथास्थिति, संपत्ति स्वामी के अधिभोग में स्वयं उसके निवास के प्रयोजनों के लिए है या जहां ऐसी संपत्ति भागों में किराए पर दी जाती है वहां स्वामी के अधिभोग में स्वयं उसके निवास के प्रयोजनों के लिए रखे गए भाग के लिए समुचित वार्षिक मूल्य के उस प्रभाग की, जो उस अवधि का आनुपातिक है जिसके दौरान ऐसा भाग स्वयं उसके निवास के लिए संपूर्णत: उसके अधिभोग में रहा है, वार्षिक मूल्य का अवधारण करने में कटौती कर दी जाएगी।
स्पष्टीकरण.–इस उपखंड के अधीन कटौती इस बात का ध्यान किए बिना की जाएगी कि क्या वह अवधि जिसके दौरान, या संपत्ति, संपत्ति का कोर्इ भाग स्वामी के निवास के उपयोग में लाया गया था, उस अवधि के जिसमें वह किराए पर दी जाती है, पहले आती है या बाद में;
(ख) ऐसे एक से अधिक मकान हैं जो स्वामी के अधिभोग में स्वयं उसके निवास के प्रयोजनों के लिए हैं वहां खंड (क) के उपबंध ऐसे मकानों में से केवल ऐसे एक मकान के संबंध में लागू होंगे जो निर्धारिती, अपने विकल्प पर, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे;
(ग) ऐसे एक से अधिक मकान हैं और ऐसे मकान स्वामी के अधिभोग में स्वयं उसके निवास के प्रयोजनों के लिए हैं वहां ऐसे मकान या मकानों का वार्षिक मूल्य, उस मकान को छोड़कर, जिसकी बाबत निर्धारिती ने खंड (ख) के अधीन विकल्प का प्रयोग किया है, उपधारा (1) के अधीन अवधारित किया जाएगा मानो ऐसा मकान या ऐसे मकान किराए पर दिए गए थे।
स्पष्टीकरण.–जहां उपधारा (1) के दूसरे परन्तुक में निर्दिष्ट कोर्इ निवास इकार्इ स्वामी के अधिभोग में स्वयं उसके निवास के प्रयोजनों के लिए है वहां उस परन्तुक की कोर्इ बात उस निवास इकार्इ के वार्षिक मूल्य की संगणना करने में लागू नहीं होगी।]
28[* * *]
29[(3) जहां उपधारा (2) में निर्दिष्ट संपत्ति में केवल एक निवास गृह है और स्वामी द्वारा उस पर वास्तविक अधिभोग इस कारण नहीं रखा जा सकता है कि उसके नियोजन, कारबार या वृत्ति का स्थान पर अन्य स्थान पर होने के कारण उसे अन्य स्थान में किसी ऐसे भवन में निवास करना पड़ता है जो उसका नहीं है वहां ऐसे मकान का वार्षिक मूल्य शून्य माना जाएगा:
परन्तु यह तब जबकि निम्नलिखित शर्तें पूरी होती हैं, अर्थात् :—
(i) ऐसा मकान वास्तव में किराए पर नहीं दिया जाता है; और
(ii) स्वामी द्वारा उससे कोर्इ भी अन्य फायदा नहीं उठाया जाता है;]
वित्त अधिनियम, 2001 द्वारा 1.4.2002 से वर्तमान धारा 23 के स्थान पर निम्नलिखित धारा 23 रखी जाएगी :
वार्षिक मूल्य किस प्रकार अवधारित किया जाता है
23. (1) धारा 22 के प्रयोजनों के लिए, किसी संपत्ति का वार्षिक मूल्य निम्नलिखित समझा जाएगा, अर्थात् :—
(क) वह राशि जिस पर संपत्ति के वर्षानुवर्ष किराये पर दिए जाने की युक्तियुक्त रूप से प्रत्याशा की जा सकती हो; या
(ख) जहां संपत्ति या संपत्ति का कोर्इ भाग किराए पर दिया जाता है और उसकी बाबत स्वामी द्वारा प्राप्त या प्राप्य वास्तविक किराया खंड (क) में निर्दिष्ट राशि से अधिक है, वहां इस प्रकार प्राप्त या प्राप्य रकम; या
(ग) जहां संपत्ति या संपत्ति का कोर्इ भाग किराए पर दिया जाता है और वह संपूर्ण पूर्ववर्ष या उसके किसी भाग के दौरान खाली था और इस प्रकार खाली रहने के कारण इसकी बाबत स्वामी द्वारा प्राप्त या प्राप्य वास्तविक किराया खंड (क) में निर्दिष्ट राशि से कम है वहां इस प्रकार प्राप्त या प्राप्य रकम :
परंतु संपत्ति की बाबत किसी स्थानीय प्राधिकारी द्वारा उद्गृहीत कर की (ऐसे पूर्ववर्ष को दृष्टि में रखे बिना जिसमें ऐसे करों का संदाय करने का दायित्व ऐसे स्वामी द्वारा निरंतर अपनार्इ जाने वाली लेखा पद्धति के अनुसार उसके द्वारा उपगत किया गया था) उस पूर्ववर्ष की जिसमें ऐसे करों का उसके द्वारा वास्तव में संदाय किया जाता है, संपत्ति के वार्षिक मूल्य को अवधारित करने में कटौती की जाएगी।
स्पष्टीकरण.–इस उपधारा के खंड (ख) या खंड (ग) के प्रयोजनों के लिए स्वामी द्वारा प्राप्त या प्राप्य वास्तविक किराए की रकम के अंतर्गत ऐसे नियमों के अधीन जो इस निमित्त बनाए जाएं किराए की वह रकम नहीं होगी जिसे स्वामी वसूल नहीं कर सकता है।
(2) जहां संपत्ति में कोर्इ ऐसा मकान या मकान का भाग है जो—
(क) स्वामी के स्वयं उसके निवास के प्रयोजनों के लिए अधिभोग में है; या
(ख) स्वामी द्वारा इस कारण उसका वस्तुत: अधिभोग नहीं रखा जा सकता, कि उसके नियोजन, कारबार या वृत्ति का स्थान अन्य स्थान पर होने के कारण उसे अन्य स्थान में किसी ऐसे भवन में निवास करना पड़ रहा है जो उसका नहीं है,
वहां ऐसे मकान या मकान के भाग का वार्षिक मूल्य शून्य माना जाएगा।
(3) उपधारा (2) के उपबंध लागू नहीं होंगे, यदि—
(क) मकान या मकान का भाग संपूर्ण पूर्ववर्ष या उसके भाग के दौरान वास्तव में किराये पर दिया गया है; या
(ख) स्वामी द्वारा उससे कोर्इ अन्य फायदा उठाया गया है।
(4) जहां उपधारा (2) में निर्दिष्ट संपत्ति में एक से अधिक मकान हैं, वहां—
(क) उस उपधारा के उपबंध ऐसे मकानों में से केवल एक ऐसे मकान की बाबत लागू होंगे जो निर्धारिती अपने विकल्प पर इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे;
(ख) उस मकान से भिन्न, जिसकी बाबत निर्धारिती ने खंड (क) के अधीन विकल्प का प्रयोग किया है, मकान या मकानों का वार्षिक मूल्य, उपधारा (1) के अधीन ऐसे अवधारित किया जाएगा मानो ऐसा मकान या ऐसे मकान किराये पर दिया गया था/दिए गए थे।
12. सुसंगत केस लाज़ के लिए देखिये टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।
14. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1976 से प्रतिस्थापित।
*नर्इ धारा 23 के लिए (1.4.2002 से) पृष्ठ 1.167 देखिए।
15. यह निम्नलिखित परन्तुक के स्थान पर रखा गया था जो पहले वित्त अधिनियम, 1968 द्वारा 1.4.1969, कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.4.1985 से प्रथम परन्तुक और स्पष्टीकरण के स्थान पर रखा गया था :
"परन्तु जहां सम्पत्ति किराएदार के अधिभोग में है, वह उस संपत्ति के संबंध में किसी स्थानीय प्राधिकारी द्वारा उद्गृहीत कर, जितना स्वामी द्वारा वहन किया जाता है, संपत्ति का वार्षिक मूल्य तय करते समय काटा जाएगा।"
16. 'उद्गृहीत' और 'वहन' शब्दों के अर्थ के लिए देखिये टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ मैनुअल, खंड 3.
17. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1970 द्वारा 1.4.1971 से प्रतिस्थापित।
18. वित्त अधिनियम, 1978 द्वारा 1.4.1979 से अंत:स्थापित।
19. वित्त अधिनियम, 1978 द्वारा 1.4.1979 से अन्त:स्थापित।
20. वित्त अधिनियम, 1982 द्वारा 1.4.1983 से "31 मार्च, 1978 के पश्चात् पूरा हो गया है" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।
21. यथोक्त द्वारा "किन्तु इस प्रकार कि खंड (क) या खंड (ख) या खंड (ग) में निर्दिष्ट किसी निवास इकार्इ की बाबत आय किसी भी दशा में हानि नहीं है।" के स्थान पर प्रतिस्थापित।
22. वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1993 से अन्त:स्थापित।
23. "किन्तु इस प्रकार कि खंड (क) या खंड (ख) या खंड (ग) या खंड (घ) में निर्दिष्ट किसी निवास इकार्इ की बाबत आय किसी भी दशा में हानि नहीं है", शब्दों का कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.4.1984 से लोप किया गया।
24. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1976 से अंत:स्थापित।
25. इस स्पष्टीकरण को कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.4.1985 से स्पष्टीकरण 1 के रूप में पुन:संख्यांकित किया गया।
26. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.4.1985 से अंत:स्थापित।
27. वित्त अधिनियम, 1986 द्वारा 1.4.1987 से निम्नलिखित उपधारा (2) के स्थान पर प्रतिस्थापित :
"(2) जहां संपत्ति में निम्नलिखित हैं–
(i) स्वामी के अधिभोग में अपने निवास के प्रयोजनार्थ कोर्इ मकान, ऐसे मकान का वार्षिक मूल्य पहले उसी रीति से अवधारित किया जाएगा मानो वह संपत्ति किराए पर दी गर्इ हो और फिर उसमें से इस प्रकार निर्धारित रकम का आधा हिस्सा या [तीन हजार छह सौ] रुपये इनमें से जो भी कम हो, घटा दिया जाएगा;
(ii) स्वामी के अधिभोग में अपने निवास के प्रयोजनार्थ एक से अधिक मकान, खंड (i) के उपबंध ऐसे एक ही मकान के बारे में लागू होंगे जिसे निर्धारिती इस निमित्त, अपने विकल्प पर विनिर्दिष्ट करें :
परन्तु खंड (i) और खंड (ii) के प्रयोजनों के लिए, जहां इस प्रकार निकाली गर्इ राशि स्वामी की कुल आय के 10 प्रतिशत से अधिक है (इस प्रयोजन के लिए कुल आय से वह आय अभिप्रेत है जो ऐसी संपत्ति से कोर्इ आय उसमें शामिल किए बिना और अध्याय 6क के अधीन कोर्इ कटौती करने से पूर्व संगणित की गर्इ हो) वहां आधिक्य राशि पर ध्यान नहीं दिया जाएगा।
स्पष्टीकरण.–जहां उपधारा (1) के दूसरे परन्तुक में विनिर्दिष्ट ऐसी कोर्इ निवासीय इकार्इ अपने निवास के प्रयोजनार्थ स्वामी के अधिभोग में है वहां उस परन्तुक की कोर्इ भी बात उस निवासीय इकार्इ का वार्षिक मूल्य संगणित करते समय लागू नहीं होगी।"
इससे पूर्व, उपधारा (2) का सर्वप्रथम संशोधन वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1967 द्वारा 1.4.1967 से किया गया था। बाद में इसे कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1970 द्वारा 1.4.1971 से और कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1976 से प्रतिस्थापित किया गया था। खंड (i) में कोष्ठक के अन्दर आने वाले शब्द वित्त अधिनियम, 1982 द्वारा 1.4.1983 से "एक हजार आठ सौ" के स्थान पर रखे गए थे।
28. उपधारा (2क) का वित्त अधिनियम, 1986 द्वारा 1.4.1987 से लोप किया गया था। इससे पूर्व कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1976 से यथा अन्त:स्थापित उपधारा (2क) इस प्रकार थी :
"(2क) शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि जहां सम्पत्ति में एक से अधिक मकान हैं और ऐसे मकान अपने निवास के लिए स्वामी के अधिभोग में हैं वहां मकानों का वार्षिक मूल्य, जो उस वार्षिक मूल्य से भिन्न है जो उपधारा (2) के खंड (ii) के अधीन अवधारित किया जाना अपेक्षित है, उपधारा (1) के अधीन इस प्रकार अवधारित किया जाएगा मानो मकान किराए पर दिए गए थे।"
29. वित्त अधिनियम, 1986 द्वारा 1.4.1987 से निम्नलिखित उपधारा (3) के स्थान पर प्रतिस्थापित :
"(3) जहां उपधारा (2) में निर्दिष्ट संपत्ति में केवल एक निवासीय मकान है और उस पर स्वामी इस कारण अधिभोग नहीं रख सकता कि किसी अन्य स्थान पर अपने रोजगार, कारबार या वृत्ति का स्थान अन्य स्थान पर होने के कारण उसे दूसरी जगह ऐसे मकान में रहना पड़ता है जो उसका नहीं है, वहां ऐसे मकान का वार्षिक मूल्य–
(क) यदि पूरे पूर्ववर्ष के दौरान वह मकान वास्तव में स्वामी के अधिभोग में नहीं रहा तो, शून्य माना जाएगा, अथवा
(ख) यदि पूर्ववर्ष में किसी समय मकान स्वामी के वास्तविक अधिभोग में रहा था तो, उपधारा (2) के अधीन अवधारित वार्षिक मूल्य वह अंश माना जाएगा :
परन्तु यह तब जब, किसी भी स्थिति में, निम्नलिखित शर्तें पूरी हों कि :–
(i) मकान वास्तव में किराये पर नहीं दिया गया हो, और
(ii) उससे कोर्इ अन्य फायदा स्वामी द्वारा न उठाया गया हो।"
[वित्त अधिनियम, 2001 द्वारा संशोधित रूप में]

