आयकर विभाग

वित्त मंत्रालय, भारत सरकार

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धारा 11

धर्मार्थ या धार्मिक उद्देश्यों के लिए आयोजित की संपत्ति से आय

धारा

धारा संख्या

11

अध्याय शीर्षक

अध्याय III - आय जो कुल आय का हिस्सा नहीं है

अधिनियम

आय-कर अधिनियम, 1961

वर्ष

2001

धर्मार्थ या धार्मिक उद्देश्यों के लिए आयोजित की संपत्ति से आय

धर्मार्थ या धार्मिक उद्देश्यों के लिए आयोजित की संपत्ति से आय

75पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए धारित सम्पत्ति से आय76

7711. (1) धारा 60 से 63 तक के उपबंधों के अधीन रहते हुए निम्नलिखित आय, आय प्राप्त करने वाले व्यक्ति की पूर्ववर्ष की कुल आय में सम्मिलित नहीं की जाएगी--

78[() ऐसी सम्पत्ति76 से प्राप्त ऐसी आय76 जो पूर्णत: पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए न्यास के अधीन धारित है, उस परिमाण तक जिस तक ऐसी आय76 भारत में ऐसे प्रयोजनों में प्रयोग76 की जाती है और जहां ऐसी आय भारत में ऐसे प्रयोजनों में प्रयोग किए जाने के लिए संचित की जाती है या अलग रखी जाती है76 वहां उस परिमाण तक जिस तक इस प्रकार संचित76 की गर्इ या अलग रखी76 गर्इ आय उस सम्पत्ति से होने वाली आय के पच्चीस प्रतिशत से अधिक नहीं है;

() ऐसी सम्पत्ति से प्राप्त आय जो केवल भागत:76 ऐसे प्रयोजनों के लिए न्यास के अधीन धारित है और ऐसा न्यास इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व सृष्ट किया गया है, उस परिमाण तक जिस तक ऐसी आय भारत में ऐसे प्रयोजनों में प्रयोग की जाती है और जहां ऐसी आय भारत में ऐसे प्रयोजनों में प्रयोग किए जाने के लिए अन्तिम रूप से अलग रखी जाती है, वहां उस परिमाण तक, जिस तक इस प्रकार अलग रखी गर्इ आय उस संपत्ति से होने वाली आय के पच्चीस प्रतिशत से अधिक नहीं है;]

() ऐसे न्यास के अधीन धारित सम्पत्ति से 79[प्राप्त] आय--

(i) जो किसी ऐसे पूर्त प्रयोजन के लिए, जो अन्तर्राष्ट्रीय कल्याण को, जिसमें भारत की अभिरुचि है, प्रोन्नत करने में साधक होता है, 1 अप्रैल, 1952 को या उसके पश्चात् सृष्ट किया गया है, उस परिमाण तक जिस तक ऐसी आय भारत के बाहर ऐसे प्रयोजनों में प्रयुक्त की जाती है; और

(ii) जो पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए 1 अप्रैल, 1952 के पूर्व सृष्ट किया गया है, उस परिमाण तक जिस तक ऐसी आय भारत के बाहर ऐसे प्रयोजनों में प्रयुक्त की जाती है :

परन्तु यह कि बोर्ड ने, साधारण या विशेष आदेश द्वारा दोनों में से किसी भी दशा में यह निर्देश दिया है कि वह ऐसी आय प्राप्त करने वाले व्यक्ति की कुल आय में सम्मिलित नहीं की जाएगी;

80[() स्वैच्छिक अभिदायों के रूप में आय जो इस विशिष्ट निर्देश के साथ किए गए हैं कि वे समग्र न्यास या संस्था का भाग होंगे।]

81[स्पष्टीकरण.–खंड () और () के प्रयोजनों के लिए--

(1) उस आय के पच्चीस प्रतिशत की संगणना करने में जो संचित की जा सकती है या अलग रखी जा सकती है, धारा 12 में निर्दिष्ट ऐसे स्वैच्छिक अभिदाय आय के भाग रूप में समझे जाएंगे।

(2) यदि भारत में पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए किसी पूर्ववर्ष में प्रयुक्त आय, यथास्थिति, न्यास के अधीन धारित या भागत: न्यास के अधीन धारित सम्पत्ति से उस वर्ष के दौरान प्राप्त आय के पचहत्तर प्रतिशत से कम पड़ती है, चाहे रकम कुछ भी हो--

(i) इस कारण से कि वह आय पूर्णत: या भागत: उस वर्ष के दौरान प्राप्त नहीं की गर्इ है; या

(ii) किसी अन्य कारण से,

तब--

() उपखंड (i) में निर्दिष्ट दशा में, उस पूर्ववर्ष के, जिसमें ऐसी आय प्राप्त होती है या उसके ठीक बाद के पूर्ववर्ष के दौरान भारत में ऐसे प्रयोजनों में प्रयुक्त आय का उतना भाग जो उक्त रकम से अधिक नहीं है; और

() उपखंड (ii) में निर्दिष्ट दशा में, पूर्ववर्ष के ठीक बाद के उस पूर्ववर्ष के दौरान जिसमें ऐसी आय प्राप्त हुर्इ थी, भारत में ऐसे प्रयोजनों में प्रयुक्त आय का उतना भाग जो उक्त रकम से अधिक नहीं है,

आय प्राप्त करने वाले व्यक्ति के विकल्प पर (ऐसे विकल्प का प्रयोग धारा 139 की उपधारा (1) 82[* * *] के अधीन आय की विवरणी देने के लिए दिए गए समय की समाप्ति के पूर्व 83[* * *] लिखित रूप में किया जाएगा) उस पूर्ववर्ष के दौरान जिसमें ऐसी आय प्राप्त हुर्इ थी ऐसे प्रयोजनों में प्रयुक्त आय समझी जाएगी और इस प्रकार प्राप्त समझी गर्इ आय, उपखंड (i) में निर्दिष्ट दशा में, यथास्थिति, उस पूर्ववर्ष के दौरान जिसमें ऐसी आय प्राप्त होती है या उसके ठीक बाद के पूर्ववर्ष के दौरान और उपखंड (ii) में निर्दिष्ट दशा में उस पूर्ववर्ष के ठीक बाद के पूर्ववर्ष के दौरान जिसमें ऐसी आय प्राप्त हुर्इ थी, ऐसे प्रयोजनों में प्रयुक्त आय की रकम की संगणना करने में हिसाब में नहीं ली जाएगी;]

84[(1क) उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए--

() जहां पूंजी आस्ति, जो पूर्णत: पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए न्यास के अधीन धारित सम्पत्ति है, अन्तरित की जाती है और संपूर्ण शुद्ध प्रतिफल या उसका कोर्इ भाग इस प्रकार धारित की जाने वाली किसी अन्य पूंजी के अर्जन के लिए उपयोग किया जाता वहां, अंतरण से प्राप्त होने वाला पूंजी अभिलाभ इसके नीचे निर्दिष्ट परिमाण तक पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त किया गया समझा जाएगा, अर्थात :--

(i) जहां नर्इ पूंजी आस्ति के अर्जन में पूर्ण शुद्ध प्रतिफल उपयोग में लाया जाता है वहां ऐसा संपूर्ण पूंजी अभिलाभ;

(ii) जहां नर्इ पूंजी आस्ति के अर्जन में शुद्ध प्रतिफल उपयोग में लाया जाता है वहां पूंजी अभिलाभ का उतना भाग जो उस रकम के, यदि कोर्इ हो, बराबर है, जिससे इस प्रकार उपयोग की गर्इ रकम अंतरित आस्ति के मूल्य से अधिक है;

() जहां कोर्इ पूंजी आस्ति, जो भागत: ऐसे प्रयोजनों के लिए न्यास के अधीन धारित सम्पत्ति है, अंतरित की जाती है और संपूर्ण शुद्ध प्रतिफल या उसका कोर्इ भाग इस प्रकार धारित की जाने वाली किसी अन्य पूंजी आस्ति के अर्जन के लिए उपयोग किया जाता है वहां अंतरण से प्राप्त होने वाले पूंजी अभिलाभ का समुचित भिन्नांश इसके नीचे विनिर्दिष्ट परिमाण तक पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए लगाया गया समझा जाएगा, अर्थात् :--

(i) जहां पूंजी आस्ति के अर्जन में सम्पूर्ण शुद्ध प्रतिफल उपयोग में लाया जाता है वहां ऐसे पूंजी अभिलाभ का सम्पूर्ण समुचित भिन्नांश;

(ii) किसी अन्य दशा में पूंजी अभिलाभ के समुचित भिन्नांश का वह भाग जो उस रकम के, यदि कोर्इ हो, बराबर है जिससे नर्इ आस्ति के अर्जन में उपयोग में लार्इ गर्इ रकम का समुचित भिन्नांश अंतरित आस्ति की लागत के समुचित भिन्नांश से अधिक है।

स्पष्टीकरण.–इस उपधारा में--

(i) "समुचित भिन्नांश" से यह दर्शाने वाला भिन्नांश अभिप्रेत है कि किस सीमा तक अंतरित पूंजी आस्ति से प्राप्त आय ऐसे अंतरण के ठीक पहले पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए उपयोजनीय थी;

(ii) "अंतरित आस्तियों की लागत" से उस पूंजी आस्ति के, जो अंतरण का विषय है, अर्जन की लागत (धारा 48 और 49 के प्रयोजनों के लिए यथा अभिनिश्चित) और धारा 55 के खंड (i) के उपखंड () में सुधार पद को दिए गए अर्थ के अंतर्गत उसके सुधार की लागत का योग अभिप्रेत है;

(iii) "शुद्ध प्रतिफल" से पूंजी आस्ति के अन्तरण के फलस्वरूप प्राप्त या उद्भूत प्रतिफल का पूर्ण मूल्य अभिप्रेत है जिसमें से अंतरण के संबंध में पूर्णत: और अनन्यत: उपगत खर्चे घटा दिए गए हैं।]

85[(1ख) जहां कोर्इ आय, जिसकी बाबत उपधारा (1) के स्पष्टीकरण के खंड (2) के अधीन विकल्प का प्रयोग किया जाता है, उक्त खंड के, यथास्थिति, उपखंड () या उपखंड () में निर्दिष्ट कालावधि के दौरान भारत में पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों में प्रयुक्त नहीं की जाती है वहां ऐसी आय, उसे प्राप्त करने वाले व्यक्ति की--

() उक्त खंड के उपखंड (i) में निर्दिष्ट दशा में, उस पूर्ववर्ष के, जिसमें ऐसी आय प्राप्त हुर्इ थी, ठीक बाद के पूर्ववर्ष की आय समझी जाएगी; या

() उक्त खंड के उपखंड (ii) में निर्दिष्ट दशा में, उस पूर्ववर्ष के, जिसमें ऐसी आय प्राप्त हुर्इ थी, ठीक बाद के पूर्ववर्ष की आय समझी जाएगी।]

86[(2) 87[जहां उपधारा (1) के स्पष्टीकरण के साथ पठित उस उपधारा के खंड () या खंड () में निर्दिष्ट आय का पचहत्तर प्रतिशत पूर्ववर्ष के दौरान भारत में पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों में प्रयुक्त न हो या प्रयुक्त न समझा जाए किंतु भारत में ऐसे प्रयोजनों में प्रयुक्त किए जाने के लिए पूर्णत: या भागत: संचित किया जाए या अलग रखा जाए, वहां ऐसी आय जो इस प्रकार संचित या अलग रखी गर्इ हो, उसे प्राप्त करने वाले व्यक्ति की पूर्ववर्ष की कुल आय में सम्मिलित नहीं की जाएगी, परन्तु यह तब जबकि निम्नलिखित शर्तों का पालन किया जाए, अर्थात् :--]

() ऐसा व्यक्ति 88[निर्धारण] अधिकारी को विहित89 रीति में90 दी गर्इ लिखित सूचना द्वारा, वह प्रयोजन, जिसके लिए आय संचित की जा रही है या अलग रखी जा रही है, और वह कालावधि जिसके लिए आय संचित की जानी है या अलग रखी जानी है, जो किसी भी दशा में दस वर्ष से अधिक नहीं होगी, विनिर्दिष्ट करे;

91[() इस प्रकार संचित किया गया92 या अलग रखा गया धन उपधारा (5) में विनिर्दिष्ट स्वरूप या पद्धतियों में विनिहित या निक्षिप्त किया जाए]:]

93[परन्तु खंड () में निर्दिष्ट दस वर्ष की कालावधि की संगणना करने में वह कालावधि, जिसके दौरान आय उस प्रयोजन के लिए जिसके लिए वह इस प्रकार संचित की गर्इ है या अलग रखी गर्इ है, किसी न्यायालय के किसी आदेश या व्यादेश के कारण प्रयुक्त नहीं की जा सकी थी, अपवर्जित कर दी जाएगी।]

वित्त अधिनियम, 2001 द्वारा तारीख 1.4.2002 से धारा 11 की उपधारा (2) में विद्यमान परन्तुक के पश्चात निम्नलिखित दूसरा परन्तुक अंत:स्थापित किया जाएगा :

परन्तु यह और कि 1 अप्रैल, 2001 को या उसके पश्चात् संचित या अलग रखी गर्इ किसी आय की बाबत इस उपधारा के उपबंध ऐसे प्रभावी होंगे मानो "दस वर्ष" शब्दों के स्थान पर, दोनों स्थानों पर जहां-जहां वे आते हैं, "पांच वर्ष" शब्द रखे गए हों।

94[(3) उपधारा (2) में निर्दिष्ट कोर्इ आय, जो--

() उपरोक्तानुसार पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों से भिन्न प्रयोजनों में प्रयुक्त की जाए या उनमें प्रयुक्त किए जाने के लिए संचित या अलग रखी न रह जाए; या

95[() उपधारा (5) में विनिर्दिष्ट किसी स्वरूप या पद्धति में विनिहित या निक्षिप्त न रह जाए; या]

() उस उपधारा के खंड () में निर्दिष्ट कालावधि के दौरान या उसकी समाप्ति के ठीक पश्चात् के वर्ष में उस प्रयोजन में प्रयुक्त95क न की जाए जिसके लिए वह इस प्रकार संचित की गर्इ या अलग रखी गर्इ है,

ऐसे व्यक्ति की, यथास्थिति, उस पूर्ववर्ष की, जिसमें वह ऐसे प्रयुक्त की जाए अथवा संचित या अलग रखी न रह जाए अथवा ऐसे विनिहित या निक्षिप्त न रह जाए या पूर्वोक्त कालावधि की समाप्ति के ठीक पश्चात् के पूर्ववर्ष की आय समझी जाएगी।]

96[(3क) उपधारा (3) में किसी बात के होते हुए भी जहां ऐसी आय प्राप्त करने वाले व्यक्ति के नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियों के कारण कोर्इ ऐसी आय जो उपधारा (2) के खंड () के उपबंधों के अनुसार विनिहित या निक्षिप्त की गर्इ हो, उस प्रयोजन के लिए प्रयुक्त नहीं की जा सकती, जिसके लिए वह संचित की गर्इ थी या अलग रखी गर्इ थी, वहां 97[निर्धारण] अधिकारी इस निमित्त उसे किए गए आवेदन पर, ऐसे व्यक्ति को ऐसी आय को भारत में ऐसे अन्य पूर्त या धार्मिक प्रयोजन के लिए प्रयोग करने को अनुज्ञात कर सकेगा जो वह व्यक्ति आवेदन में निर्दिष्ट करे और जो न्यास के उद्देश्य के अनुरूप हो और तब उपधारा (3) के उपबंध ऐसे लागू होंगे मानो इस उपधारा के अधीन 98[निर्धारण] अधिकारी को दी गर्इ सूचना में विनिर्दिष्ट प्रयोजन हो।]

(4) इस धारा के प्रयोजनों के लिए "न्यास के अधीन धारित सम्पत्ति" के अंतर्गत इस प्रकार धारित उपक्रम भी है और जहां यह दावा किया जाता है कि किसी ऐसे उपक्रम की आय, उसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों की कुल आय में सम्मिलित नहीं की जाएगी वहां 99[निर्धारण] अधिकारी को इस अधिनियम के निर्धारण संबंधी उपबंधों के अनुसार ऐसे उपक्रम की आय अवधारित करने की शक्ति होगी, और जहां इस प्रकार अवधारित कोर्इ आय उपक्रम के लेखाओं में यथादर्शित आय से अधिक है वहां ऐसे आधिक्य के बारे में यह समझा जाएगा कि वह पूर्त या धार्मिक प्रयोजन से भिन्न प्रयोजनों के लिए 1[***] प्रयुक्त किया गया है।

2[(4क) उपधारा (1) या उपधारा (2) या उपधारा (3) या उपधारा (3क) किसी न्यास या संस्था की किसी ऐसी आय की बाबत, जो कारबार का लाभ और अभिलाभ है, लागू नहीं होगी जब तक कि वह कारबार, यथास्थिति, न्यास या संस्था के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए आनुषंगिक नहीं है और ऐसे न्यास या संस्था द्वारा ऐसे कारबार की बाबत पृथक लेखा-बहियां नहीं रखी जाती हैं।]

3[4(5) उपधारा (2) के खंड () में निर्दिष्ट धन विनिहित या निक्षिप्त करने के स्वरूप और पद्धतियां निम्नलिखित होंगी, अर्थात् :--

(i) सरकारी बचत पत्र अधिनियम, 1959 (1959 का 46) की धारा 2 के खंड () में यथा परिभाषित बचतपत्रों5 में तथा केन्द्रीय सरकार की अल्प बचत स्कीमों के अधीन उस सरकार द्वारा जारी की गर्इ किन्हीं अन्य प्रतिभूतियों या प्रमाणपत्रों में विनिधान;

(ii) डाकघर बचत बैंक में किसी खाते में निक्षेप;

(iii) किसी अनुसूचित बैंक या बैंककारी का कारबार करने वाली सहकारी सोसाइटी (जिसके अंतर्गत सहकारी भूमि बंधक बैंक या सहकारी भूमि विकास बैंक भी है) के किसी खाते में निक्षेप।

स्पष्टीकरण.–इस खंड में "अनुसूचित बैंक" से भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम, 1955 (1955 का 23) के अधीन गठित भारतीय स्टेट बैंक, भारतीय स्टेट बैंक (समनुषंगी बैंक) अधिनियम, 1959 (1959 का 38) में यथा परिभाषित समनुषंगी बैंक, बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) की धारा 3 के अधीन अथवा बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1980 (1980 का 40) की धारा 3 के अधीन गठित तत्स्थानी नया बैंक अथवा कोर्इ अन्य बैंक जो भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की द्वितीय अनुसूची में सम्मिलित बैंक है, अभिप्रेत है;

(iv) भारतीय यूनिट ट्रस्ट अधिनियम, 1963 (1963 का 52) के अधीन स्थापित भारतीय यूनिट ट्रस्ट के यूनिटों में विनिधान;

(v) केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार द्वारा सृष्ट और पुरोधृत किसी धन प्रतिभूति में विनिधान;

(vi) किसी कंपनी या निगम द्वारा उसकी ओर से पुरोधृत डिबेंचरों में विनिधान, जिसके मूलधन और उस पर ब्याज दोनों को केन्द्रीय सरकार द्वारा या किसी राज्य सरकार द्वारा पूर्णत: और अंशत: प्रत्याभूत किया गया है;

(vii) 6[पब्लिक सेक्टर कंपनी] में विनिधान या निक्षेप :

7[परन्तु यह कि जहां कोर्इ विनिधान या निक्षेप किसी पब्लिक सैक्टर कंपनी में किया गया है और ऐसी पब्लिक सैक्टर कंपनी, पब्लिक सैक्टर कंपनी नहीं रह गर्इ है, वहाँ,--

(अ) ऐसी कंपनी के शेयरों में किया गया विनिधान, ऐसी पब्लिक सेक्टर कंपनी के पब्लिक सैक्टर कंपनी न रह जाने की तारीख से तीन वर्ष की अवधि के लिए इस खंड के अधीन किया गया विनिधान माना जाएगा;

(आ) ऐसा अन्य विनिधान या निक्षेप उस तारीख को ऐसी अवधि के लिए इस खंड के अधीन किया गया विनिधान या निक्षेप समझा जाएगा जिस पर ऐसा विनिधान या निक्षेप ऐसी कंपनी द्वारा प्रतिसंदेय हो जाता है;]

(viii) ऐसे वित्त निगम में निक्षेप या उसके द्वारा पुरोधृत किन्हीं बंधपत्रों में विनिधान, जो भारत में औद्योगिक विकास के लिए दीर्घकालीन वित्त उपलब्ध कराने में लगा है और 8[जो धारा 36 की उपधारा (1) के खंड (viii) के अधीन कटौती के लिए पात्र है];

(ix) भारत में बनार्इ गर्इ और रजिस्ट्रीकृत किसी ऐसी पब्लिक कंपनी में निक्षेप या उसके द्वारा पुरोधृत किन्हीं बंधपत्रों में विनिधान, जिसका मुख्य उद्देश्य भारत में आवासिक प्रयोजनों के लिए गृहों के निर्माण या क्रय के लिए दीर्घकालीन वित्त उपलब्ध कराने का कारबार करना है 8[जो धारा 36 की उपधारा (1) के खंड (viii) के अधीन कटौती के लिए पात्र है];

9[(ixक) भारत में बनार्इ गर्इ और रजिस्ट्रीकृत किसी ऐसी पब्लिक कंपनी द्वारा पुरोधृत किसी बंधपत्र में निक्षेप या विनिधान, जिसका मुख्य उद्देश्य भारत में शहरी अवसंरचना के लिए दीर्घकालिक वित्त उपलब्ध कराने का कारबार करना है।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए--

() "दीर्घकालिक वित्त" से ऐसा कोर्इ उधार या अग्रिम अभिप्रेत है जहां उन निबंधनों में जिनके अधीन धन उधार या अग्रिम दिया गया हो, पांच वर्ष से अन्यून अवधि के दौरान उसके ब्याज सहित वापस करने का उपबंध है;

() "पब्लिक कंपनी"10 का वही अर्थ है जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 3 में उसका है;

() "शहरी अवसंरचना" से पेयजल आपूर्ति, स्वच्छता और मल व्ययन, जल निकास, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, सड़क, पुल और ऊपरोगामी पुल या शहरी परिवहन की व्यवस्था के लिए कोर्इ परियोजना अभिप्रेत है;]

(x) स्थावर सम्पत्ति में विनिधान।

स्पष्टीकरण.–"स्थावर सम्पत्ति" के अंतर्गत कोर्इ मशीनरी या संयंत्र (जो ऐसी मशीनरी या संयंत्र से भिन्न है जो किसी भवन में उस भवन के सुविधापूर्ण अधिभोग के लिए लगाया गया है) नहीं है चाहे वे भूमि में लगे हों या उससे संलग्न किसी वस्तु से स्थायी रूप से बद्ध हों;

11[(xi) भारतीय औद्योगिक विकास बैंक अधिनियम, 1964 (1964 का 18) के अधीन स्थापित भारतीय औद्योगिक विकास बैंक में निक्षेप;]

12[(xii) किसी अन्य रूप या रीति में विनिधान या निक्षेप, जो विहित13 की जाए।]

 

75. धारा 11, जिसका प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से लोप कर दिया गया था, प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा उपांतरणों सहित उसी तारीख से पुन: स्थापित की गर्इ थी।

76. "आय", "संपत्ति", "ऐसी आय", "प्रयोग", "संचित की जाती है या अलग रखी जाती है" और "भागत:" पदों/शब्दों के अर्थ के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ मैनुअल, खंड 3।

77. परिपत्र सं. 100, तारीख 24.1.1973, परिपत्र सं. 273, तारीख 3.6.1980 परिपत्र सं. 52, तारीख 30.12.1970 परिपत्र सं. 12-पी(1960 का LXX-7), तारीख 26.11.1968 परिपत्र सं. 5-पी(1968 का LXX-6), तारीख 19.6.1968, परिपत्र सं. 566, तारीख 17.7.1990 परिपत्र सं. 584, तारीख 13.11.1990 का अनुदेश सं. 1132, तारीख 5.1.1978 और तारीख 17.8.1968 को नर्इ दिल्ली में आयोजित प्रत्यक्ष कर सलाहकार समिति (केंद्रीय) की 12वीं बैठक की शासकीय कार्यसूची के सुसंगत उद्धरण भी देखें। ब्यौरे के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

78. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1976 से प्रतिस्थापित, इससे पूर्व खंड () और खंड () वित्त अधिनियम, 1970 द्वारा 1.4.1971 से संशोधित किए गए थे।

79. वित्त अधिनियम, 1972 द्वारा 1.4.1973 से अंत:स्थापित।

80. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से अंत:स्थापित।

81. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1976 से प्रतिस्थापित। इससे पहले, स्पष्टीकरण वित्त अधिनियम, 1970 द्वारा 1.4.1971 से भी प्रतिस्थापित किया गया था।

82. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से "या उपधारा (2)" शब्दों का लोप किया गया।

83. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से "चाहे मूल रूप से या विस्तार पर नियत हो" शब्दों का लोप किया गया।

84. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1971 द्वारा 1.4.1962 से अंत:स्थापित।

85. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1976 से अंत:स्थापित।

86. वित्त अधिनियम, 1970 द्वारा 1.4.1971 से प्रतिस्थापित।

87. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1976 से "जहां उपधारा (1) के साथ" शब्दों से प्रारंभ होने वाले और "पालन किया जाए, अर्थात्" शब्दों पर समाप्त होने वाले भाग के स्थान पर प्रतिस्थापित।

88. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से "आय-कर" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।

89. पूर्त न्यास या संस्था द्वारा आय संचित करने की सूचना के लिए देखिए नियम 17 और फार्म सं. 10 [धारा 139(1) के अधीन अनुज्ञात समय की समाप्ति के पूर्व प्रस्तुत किया जाएगा]।

90. "विहित रीति में" शब्दों के अर्थ के लिए देखिए टैक्समैन्स डाइरेक्ट टैक्सेज़ मैनुअल, खंड 3.

91. वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1983 से प्रतिस्थापित। पहले, मूल खंड () का वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1977 द्वारा 1.4.1978 से संशोधन किया गया था।

92. "इस प्रकार संचित किया गया" शब्दों के अर्थ के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ मैनुअल, खंड 3.

93. वित्त अधिनियम, 1993 द्वारा 1.4.1962 से अंत:स्थापित।

94. वित्त अधिनियम, 1970 द्वारा 1.4.1971 से प्रतिस्थापित।

95. वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1983 से प्रतिस्थापित।

95क. "प्रयुक्त" पद के अर्थ के लिए देखिए टैक्समैन्स डाइरेक्ट टैक्सेज़ मैनुअल, खंड 3.

96. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1976 से अंत:स्थापित।

97. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से "आय-कर" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

98. यथोक्त द्वारा "आय-कर" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

99. यथोक्त द्वारा "आय-कर" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

1. "और तदनुसार उपधारा (3) के अर्थ में कर के लिए प्रभार्य" शब्दों का वित्त अधिनियम, 1970 द्वारा 1.4.1971 से लोप किया गया।

2. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991, द्वारा 1.4.1992 से प्रतिस्थापित। इसके प्रतिस्थापन के पूर्व, वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1984 से यथा अंत:स्थापित उपधारा (4क) निम्नानुसार थी :

"(4क) उपधारा (1) या उपधारा (2) या उपधारा (3) या उपधारा (3क), किसी ऐसी आय के संबंध में, जो कारबार का लाभ या अभिलाभ है, लागू नहीं होंगी, जब तक कि,--

() कारबार किसी न्यास द्वारा संपूर्ण रूप से लोक धार्मिक प्रयोजनों के लिए नहीं किया जाता हो और कारबार पुस्तकों के मुद्रण और प्रकाशन या पुस्तकों के प्रकाशन या इस प्रकार का न हो जैसा कि इस निमित्त केन्द्रीय सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचित किया गया हो; या

() कारबार किसी संस्था द्वारा संपूर्ण रूप से पूर्त प्रयोजनों के लिए नहीं किया जाता हो और कारबार से संबंधित कार्य मुख्य रूप से संस्था के हिताधिकारियों द्वारा न किया जाता हो;

और ऐसे कारबार की बाबत ऐसे न्यास या संस्था द्वारा पृथक् लेखा बहियां नहीं रखी जाती हों।"

3. वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1983 से अंत:स्थापित।

4. परिपत्र सं. 566, तारीख 17.7.1990 भी देखें। ब्यौरे के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

5. सरकारी बचतपत्र अधिनियम, 1959 की धारा 2 के खंड () में बचतपत्र निम्नानुसार परिभाषित है :

"() 'बचतपत्र' से ऐसा बचतपत्र अभिप्रेत है जिसे यह अधिनियम लागू होता है। धारा 1(3) यह उपबंध करती है कि अधिनियम बचत पत्रों के ऐसे वर्ग को लागू होगा जिसे केन्द्रीय सरकार अधिसूचना द्वारा राजपत्र में विनिर्दिष्ट करे।"

6. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से "कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 में यथा परिभाषित सरकारी कंपनी" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

7. वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा 1.4.2001 से अंत:स्थापित।

8. वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा 1.4.2000 से "जो धारा 36 की उपधारा (1) के खंड (viii) के प्रयोजनों के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित है" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।

9. यथोक्त द्वारा 1.4.2001 से अंत:स्थापित।

10. कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 3(1) के खंड (iv) के अधीन "पब्लिक कंपनी" की परिभाषा के लिए देखिए परिशिष्ट एक

11. वित्त अधिनियम, 1984 द्वारा 1.4.1985 से अंत:स्थापित।

12. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से अंत:स्थापित।

13. नियम 17ग में निम्नलिखित अन्य रीतियां विनिर्दिष्ट हैं-- (1) धारा 10(23घ) में निर्दिष्ट पारस्परिक निधि की किसी स्कीम के अधीन जारी यूनिट में विनिधान; (2) निक्षेप का भारत के लोक लेखा में कोर्इ अंतरण; (3) आवास स्थान की आवश्यकता के संबंध में या उसका समाधान करने के प्रयोजन के लिए अथवा नगरों, कस्बों और ग्रामों की योजना, विकास और सुधार के प्रयोजन के लिए या दोनों के लिए अधिनियमित विधि द्वारा या उसके अधीन भारत में गठित किसी प्राधिकरण में किया गया निक्षेप; और (4) किसी 'निक्षेपागार' के साधारण शेयर अर्जित करने के लिए किया गया विनिधान।

 

 

[वित्त अधिनियम, 2001 द्वारा संशोधित रूप में]

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