अनिवासियों को आय के अंतरण में परिणत होने वाले संव्यवहारों द्वारा आय-कर का परिवर्जन
अनिवासियों को आय के अंतरण में परिणत होने वाले संव्यवहारों द्वारा आय-कर का परिवर्जन
93. (1) जहां आस्तियों का अंतरण हुआ है जिसके आधार पर या जिसके परिणामस्वरूप या तो अकेले या सहयुक्त संक्रियाओं के संयोजन से, कोर्इ आय अनिवासी को संदेय हो जाती है, वहां निम्नलिखित उपबंध लागू होंगे–
(क) जहां किसी व्यक्ति ने, ऐसे किसी अंतरण के द्वारा या तो अकेले या सहयुक्त संक्रियाओं के संयोजन से कोर्इ अधिकार अर्जित किये हैं, जिनके आधार पर उसको, अनिवासी व्यक्ति की किसी ऐसी आय का, उस समय या भविष्य में, इस धारा के अर्थ में उपभोग करने की शक्ति है, जो यदि प्रथम वर्णित व्यक्ति की आय होती तो आय-कर के लिए प्रभार्य होती वहां वह आय, चाहे वह इस धारा के उपबंधों के अतिरिक्त भी आय-कर से प्रभार्य होती या नहीं होती, इस अधिनियम के सभी प्रयोजनों के लिए प्रथम वर्णित व्यक्ति की आय समझी जाएगी ;
(ख) जहां ऐसे किसी अंतरण से पूर्व या पश्चात्, ऐसा कोर्इ प्रथम वर्णित व्यक्ति, कोर्इ पूंजी राशि प्राप्त करता है या प्राप्त करने का हकदार है जिसका संदाय, अंतरण या किन्हीं सहयुक्त संक्रियाओं के साथ किसी प्रकार संबंध है, वहां कोर्इ ऐसी आय, जो अंतरण के आधार पर या परिणामस्वरूप या तो अकेले या सहयुक्त संक्रियाओं के संयोजन से अनिवासी की आय हो गर्इ है, चाहे वह इस धारा के उपबंधों के अतिरिक्त भी आय-कर के लिए प्रभार्य होती या नहीं होती, इस अधिनियम के सभी प्रयोजनों के लिए प्रथम वर्णित व्यक्ति की आय समझी जाएगी।
स्पष्टीकरण.–इस उपधारा के उपबंध इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व किए गए आस्तियों के अंतरण और सहयुक्त संक्रियाओं के संबंध में भी लागू होंगे।
(2) जहां कोर्इ व्यक्ति इस धारा के उपबंधों के अधीन उसकी समझी जाने वाली किसी आय पर आय-कर से प्रभारित किया गया है और वह आय, तत्पश्चात् उसके द्वारा आय के रूप में या किसी अन्य रूप में प्राप्त की जाती है, वहां वह इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए उसकी आय का भाग पुन: नहीं समझी जाएगी।
(3) इस धारा के उपबंध लागू नहीं होंगे, यदि उपधारा (1) में प्रथम-वर्णित व्यक्ति निर्धारण अधिकारी को समाधानप्रद रूप में यह दर्शित कर देता है कि–
(क) न तो अंतरण का और न किसी सहयुक्त संक्रिया का प्रयोजन या उसके प्रयोजनों में से कोर्इ प्रयोजन कराधान के दायित्व से बचना था, या
(ख) अन्तरण और सब सहयुक्त संक्रियाएं सद्भावी वाणिज्यिक संव्यवहार थीं और कराधान के दायित्व से बचने के प्रयोजनों के लिए परिकल्पित नहीं थी।
स्पष्टीकरण.–इस धारा के प्रयोजनों के लिए–
(क) किन्हीं आस्तियों, आय या आय के संचयनों के रूप की आस्तियों के प्रति निर्देशों के अंतर्गत किसी ऐसी कंपनी के शेयरों या उसकी बाध्यता या किसी ऐसे अन्य व्यक्ति की बाध्यता के प्रति निर्देश भी हैं जिसको वे आस्तियां, वह आय या वे संचयन अंतरित हैं या किए गए हैं;
(ख) किसी ऐसे निगमित निकाय के बारे में, जो भारत के बाहर निगमित है, यह माना जाएगा, कि वह अनिवासी है;
(ग) किसी व्यक्ति की बाबत यह समझा जाएगा कि उसे किसी अनिवासी की आय का उपभोग करने की शक्ति है यदि–
(i) उस आय को किसी व्यक्ति द्वारा वस्तुत: इस प्रकार बरता जाता है जिससे वह किसी समय-विशेष पर और चाहे आय के रूप में या अन्यथा, उपधारा (1) में प्रथम वर्णित व्यक्ति के फायदे के लिए प्रवृत्त होने के लिए प्रकल्पित होती है; या
(ii) उस आय की प्राप्ति या प्रोद्भूत होने का ऐसा प्रभाव होता है जिससे ऐसे प्रथम-वर्णित व्यक्ति के लिए उन आस्तियों का मूल्य बढ़ जाता है जो उस द्वारा या उसके फायदे के लिए धारित हैं; या
(iii) ऐसा प्रथम-वर्णित व्यक्ति किसी समय कोर्इ ऐसा फायदा प्राप्त करता है या प्राप्त करने का हकदार है जो उस आय में से या ऐसे धनों में से उपलभ्य है या उपलभ्य किया जाने वाला है जो उस आय पर या उस आय के रूप की आस्तियों पर की जाने वाली सहयुक्त संक्रियाओं के प्रभाव या उत्तरोत्तर प्रभाव के कारण उस प्रयोजनार्थ उपलब्ध है या होंगे; या
(iv) ऐसे प्रथम-वर्णित व्यक्ति को, किसी नियोजन की शक्ति या प्रतिसंहरण की शक्ति के प्रयोग द्वारा या अन्यथा रूप से किसी अन्य व्यक्ति की सम्मति से या उसके बिना, आय का फायदाप्रद उपभोग स्वयं अपने लिए करने की शक्ति है; या
(v) ऐसा प्रथम-वर्णित व्यक्ति आय के उपयोजन को किसी भी रीति में और प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रित करने के लिए समर्थ है;
(घ) इस बात का अवधारण करने में कि क्या किसी व्यक्ति को आय का उपभोग करने की शक्ति है, अंतरण और किन्हीं सहयुक्त संक्रियाओं के सारवान परिणाम और प्रभाव का ध्यान रखा जाएगा और ऐसे सभी फायदों को जो अन्तरण और किन्हीं सहयुक्त संक्रियाओं के परिणामस्वरूप ऐसे व्यक्ति को किसी समय प्रोद्भूत हो, उन फायदों की प्रकृति या स्वरूप को दृष्टि में रखे बिना, हिसाब में लिया जाएगा।
(4)(क) ''आस्तियों'' के अंतर्गत सम्पत्ति या किसी भी किस्म के अधिकार हैं और अधिकारों के संबंध में ''अन्तरण'' के अंतर्गत उन अधिकारों का सृजन भी है;
(ख) किसी अंतरण के संबंध में ''सहयुक्त संक्रिया'' से किसी किस्म की संक्रिया अभिप्रेत है जो किसी व्यक्ति द्वारा निम्नलिखित के संबंध में की गर्इ है–
(i) अन्तरित आस्तियों में से कोर्इ आस्ति, या
(ii) अन्तरित आस्तियों में से किसी को, चाहे प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से, प्रदर्शित करने वाली कोर्इ आस्तियां, या
(iii) ऐसी किन्हीं आस्तियों से होने वाली आय, या
(iv) ऐसी किन्हीं आस्तियों से होने वाली आय के संचय को, चाहे प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से, प्रदर्शित करने वाली कोर्इ आस्तियां;
(ग) ''फायदा'' के अंतर्गत किसी भी किस्म का भुगतान भी है;
(घ)''मूल राशि'' से अभिप्रेत है–
(i) किसी उधार या उधार चुकाने के रूप में दी गर्इ या दी जाने वाली कोर्इ राशि, और
(ii) आय से अन्यथा किसी रूप में दी गर्इ या दी जाने वाली कोर्इ अन्य राशि, जो धन या धन के मूल्य के रूप में पूर्ण प्रतिफल के लिए दी गर्इ या दी जाने योग्य राशि नहीं है।
[वित्त अधिनियम, 2019 द्वारा संशोधित रूप में]

