आयकर विभाग

वित्त मंत्रालय, भारत सरकार

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धारा 72क

आगे ले जाने और आदि समामेलन या डीमर्जर, में संचित हानि और अनवशोषित मूल्यह्रास भत्ता के बंद सेट करने के लिए संबंधित प्रावधान

धारा

धारा संख्या

72क

अध्याय शीर्षक

अध्याय VI - आय का एकत्रीकरण और हानि समायोजन या अग्रेषण

अधिनियम

आय-कर अधिनियम, 1961

वर्ष

2005

आगे ले जाने और आदि समामेलन या डीमर्जर, में संचित हानि और अनवशोषित मूल्यह्रास भत्ता के बंद सेट करने के लिए संबंधित प्रावधान

आगे ले जाने और आदि समामेलन या डीमर्जर, में संचित हानि और अनवशोषित मूल्यह्रास भत्ता के बंद सेट करने के लिए संबंधित प्रावधान

76[समामेलन या अविलयन आदि में संचयित हानि और शेष अवक्षयण मोक के अग्रनयन और मुजरा करने से संबंधित उपबंध

72क. 77[(1) जहां किसी औद्योगिक उपक्रम या किसी पोत या किसी होटल का स्वामित्व रखने वाली किसी कंपनी का किसी अन्य कंपनी से समामेलन हुआ है या बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 5 के खंड (ग) में निर्दिष्ट किसी बैंककारी कंपनी का किसी विनिर्दिष्ट बैंक से समामेलन हुआ है वहां इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध में किसी बात के होते हुए भी समामेलक कम्पनी की संचयित हानि और शेष अवक्षयण उस पूर्ववर्ष के लिए, जिसमें समामेलन किया गया था, समामेलित कंपनी के अवक्षयण के लिए, यथास्थिति, हानि या मोक माने जाएंगे और हानि के मुजरा तथा अग्रनयन और अवक्षयण के मोक से संबंधित इस अधिनियम के अन्य उपबंध तदनुसार लागू होंगे।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी संचयित हानि मुजरा या अग्रनीत नहीं की जाएगी और शेष अवक्षयण समामेलित कंपनी के निर्धारण में तब तक अनुज्ञात नहीं किया जाएगा जब तक कि,–

() समामेलक कंपनी,–

(i) ऐसे कारबार में न लगी हो जिसमें तीन वर्ष या अधिक के लिए संचयित हानि हुर्इ थी या अवक्षयण अनामेलित रहा था;

(ii) समामेलन की तारीख को, समामेलन की तारीख के पूर्व दो वर्ष तक इसके द्वारा धारित स्थिर आस्तियों के कम से कम तीन बटा चार बही मूल्य को लगातार प्रतिधारित न करती हो;

() समामेलित कंपनी,–

(i) समाममेलन की तारीख से कम से कम पांच वर्ष की अवधि के लिए समामेलन की स्कीम में अर्जित की गर्इ समामेलक कंपनी की स्थिर आस्तियों के कम से कम तीन बटा चार बही मूल्य को लगातार प्रतिधारित न करती हो;

(ii) समामेलन की तारीख से कम से कम पांच वर्ष की अवधि के लिए समामेलक कंपनी का कारबार चालू न रखती हो;

(iii) ऐसी अन्य शर्तों को पूरा न करती हो, जो समामेलक कंपनी के कारबार को पुनर्जीवित करने को सुनिश्चित करने के लिए या यह सुनिश्चित करने के लिए कि समामेलन असली कारबार के प्रयोजन के लिए है, विहित78 की जाएं।

(3) किसी ऐसी दशा में, जिसमें उपधारा (2) में अधिकथित शर्तों का पालन नहीं किया जाता है, समामेलित कंपनी के पास किसी पूर्ववर्ष में हानि या अवक्षयण मोक का मुजरा उस वर्ष के लिए, जिसमें ऐसी शर्तों का पालन नहीं किया जाता है, कर से प्रभार्य समामेलित कंपनी की आय समझा जाएगा।

(4) जहां किसी उपक्रम का अविलयन हुआ है, वहां अधिनियम के किन्हीं अन्य उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी अविलयित कंपनी की संचित हानि और शेष अवक्षयण के लिए मोक :–

() जहां हानि या शेष अवक्षयण प्रत्यक्षत: परिणामी कंपनी को अंतरित से संबंधित है, वहां पारिणामी कंपनी को अग्रनीत और मुजरा किए जाने के लिए अनुज्ञात किया जाएगा;

() जहां ऐसी हानि और शेष अवक्षयण प्रत्यक्षत: परिणामी कंपनी को अंतरित उपक्रमों से संबंधित नहीं है, वहां अविलयित कंपनी और परिणामी कंपनी के बीच उसी अनुपात में प्रभाजित किया जाएगा जिसमें उपक्रम की आस्तियां अविलयित कंपनी द्वारा प्रतिधारित की गर्इ हैं और परिणामी कंपनी को अंतरित की गर्इ हैं, यथास्थिति, अविलयित कंपनी या परिणामी कंपनी को अग्रनीत या मुजरा किए जाने के लिए अनुज्ञात किया जाएगा।

(5) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा ऐसी शर्तें विनिर्दिष्ट कर सकेगी जो वह यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक समझे कि अविलयन असली कारबार के लिए है।

(6) जहां कारबार का पुनर्गठन होता है, जिसके द्वारा धारा 47 के खंड (xiii) में दी गर्इ शर्तों को पूरा करने वाली कोर्इ कंपनी किसी फर्म की उत्तरवर्ती होती है या धारा 47 के खंड (xiv) में दी गर्इ शर्तों को पूरा करने वाली कोर्इ कंपनी किसी स्वत्वधारी समुत्थान की उत्तरवर्ती होती है, वहां इस अधिनियम के किन्हीं अन्य उपबंधों में उल्लिखित किसी बात के होते हुए भी, यथास्थिति, पूर्ववर्ती फर्म या स्वत्वधारी समुत्थान की संचित हानि और शेष अवक्षयण उस पूर्ववर्ष के लिए जिसमें कारबार का पुनर्गठन प्रभावी किया गया था, उत्तरवर्ती कंपनी के अवक्षयण के लिए हानि या मोक समझा जाएगा और अवक्षयण के लिए हानि और मोक का मुजरा करने और उसे अग्रनीत करने से संबंधित इस अधिनियम के अन्य उपबंध तदनुसार लागू होंगे:

परन्तु यदि धारा 47 के खंड (xiii) के परन्तुक में या खंड (xiv) के परन्तुक में दी गर्इ किन्हीं शर्तों का पालन नहीं किया जाता है तो उत्तरवर्ती कंपनी के पास किसी पूर्ववर्ष में किए गए अवक्षयण की हानि या मोक के मुजरा को उस वर्ष में, जिसमें ऐसी शर्त का पालन नहीं किया गया है, कर से प्रभार्य कंपनी की आय समझा जाएगा।

(7) इस धारा के प्रयोजनों के लिए–

() ''संचित हानि'' से अभिप्रेत है कोर्इ ''कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ'' शीर्ष के अधीन, यथास्थिति, पूर्ववर्ती फर्म या स्वत्वधारी समुत्थान या समामेलक कंपनी या अविलयित कंपनी की उतनी हानि (जो सट्टे के कारबार में हुर्इ हानि नहीं है) जिसके लिए ऐसी पूर्ववर्ती फर्म या स्वत्वधारी समुत्थान या समामेलक कंपनी या अविलयित कंपनी धारा 72 के उपबंधों के अधीन अग्रनीत या मुजरा करने के लिए हकदार होती यदि कारबार का पुनर्गठन या समामेलन या अविलयन नहीं हुआ होता।

79[(कक) ''औद्योगिक उपक्रम'' से कोर्इ ऐसा उपक्रम अभिप्रेत है जो,–

(i) माल के विनिर्माण या प्रसंस्करण में; या

(ii) कंप्यूटर साफ्टवेयर के विनिर्माण में; या

(iii) विद्युत या शक्ति के किसी अन्य रूप के उत्पादन या वितरण के कारबार में; या

80[(iiiक) दूरसंचार सेवाएं, चाहे आधारिक हों या सेलुलर, जिनके अंतर्गत रेडियो पेजिंग, घरेलू सेटेलाइट सेवा, ट्रंकिंग नेटवर्क, ब्राडबैंड नेटवर्क और इंटरनेट सेवाएं भी हैं, उपलब्ध कराने के कारबार में; या]

(iv) खनन में; या

(v) पोत, वायुयान या रेल प्रणाली के विनिर्माण में,

लगा हुआ है;]

() ''शेष अवक्षयण'' से अभिप्रेत है, यथास्थिति, पूर्ववर्ती फर्म या स्वत्वधारी समुत्थान या समामेलक कंपनी या अविलयित कंपनी के अवक्षयण के लिए इतना मोक जो अनुज्ञात किए जाने से शेष रहता है और जो इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन, यथास्थिति, पूर्ववर्ती फर्म या स्वत्वधारी समुत्थान या समामेलक कंपनी या अविलयित कंपनी को अनुज्ञात किया गया होता यदि कारबार का पुनर्गठन या समामेलन या अविलयन नहीं हुआ होता।]

80क[(ग) ''विनिर्दिष्ट बैंक'' से भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम, 1955 (1955 का 23) के अधीन गठित भारतीय स्टेट बैंक या भारतीय स्टेट बैंक (समनुषंगी बैंक) अधिनियम, 1959 (1959 का 38) में यथापरिभाषित कोर्इ समनुषंगी बैंक या बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) की धारा 3 या बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1980 (1980 का 40) की धारा 3 के अधीन गठित कोर्इ तत्स्थानी नया बैंक अभिप्रेत है।]

 

76. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.4.2000 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन के पूर्व, वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1977 द्वारा 1.4.1978 से यथा अंत:स्थापित और बाद में वित्त अधिनियम, 1978 द्वारा 1.4.1978 से तथा वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से यथा संशोधित धारा 72क निम्नानुसार थी :

'72क. समामेलन के कतिपय मामलों में संचित हानि और शेष अवक्षयण मोक के अग्रनयन और मुजरा करने से संबंधित उपबंध–(1) जहां किसी औद्योगिक उपक्रम या पोत की स्वामी किसी कंपनी का, किसी अन्य कंपनी से समामेलन हुआ है, वहां इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध में किसी बात के होते हुए भी समामेलक कंपनी की संचयित हानि और शेष अवक्षयण उस पूर्ववर्ष के लिए जिसमें समामेलन प्रभावी किया गया था, समामेलित कंपनी के अवक्षयण के, यथास्थिति, हानि या मोक माने जाएंगे और हानि के मुजरा या अग्रनयन तथा अवक्षयण के मोक से संबंधित अधिनियम के अन्य उपबंध तदनुसार लागू होंगे।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, संचित हानि मुजरा नहीं की जाएगी और उसका अग्रनयन नहीं किया जाएगा और शेष अवक्षयण समामेलित कंपनी के निर्धारण में तब तक अनुज्ञात नहीं किया जाएगा जब तक कि निम्नलिखित शर्तें पूरी नहीं हो जाती हैं, अर्थात् :–

(i) समामेलित कंपनी समामेलन की तारीख से कम से कम पांच वर्ष की अवधि के लिए समामेलन की स्कीम में अर्जित की गर्इ समामेलक कंपनी की स्थिर आस्तियों के कम से कम तीन बटा चार बही मूल्य को प्रतिधारित नहीं करती है;

(ii) समामेलित कंपनी समामेलन की तारीख से कम से कम पांच वर्ष की अवधि के लिए समामेलक कंपनी का कारबार चालू न रखती हो;

(iii) समामेलित कंपनी ऐसी अन्य शर्तों को पूरा न करती हो जो समामेलक कंपनी के कारबार को पुनर्जीवित करने को सुनिश्चित के लिए या यह सुनिश्चित करने के लिए कि समामेलन अन्य असली कारबार के प्रयोजन के लिए है विहित की जाएं।

(3) जहां औद्योगिक उपक्रम या पोत की स्वामी कोर्इ कंपनी किसी अन्य कंपनी से समामेलन करने की प्रस्थापना करती है और ऐसी अन्य कंपनी समामेलन की प्रस्थापित स्कीम विनिर्दिष्ट प्राधिकारी को प्रस्तुत करती है और उस प्राधिकारी की स्कीम की परीक्षा करने के पश्चात् और सभी सुसंगत तथ्यों पर विचार करने के पश्चात् यह समाधान हो जाता है कि यदि ऐसा समामेलन, यथास्थिति, ऐसी स्कीम के अनुसार या उस प्राधिकारी द्वारा विनिर्दिष्ट रीति से यथा उपांतरित स्कीम के अनुसार किया जाता है तो उपधारा (1) में निर्दिष्ट शर्तें पूरी हो जाएंगी, वहां वह ऐसी अन्य कंपनी को यह सूचित करेगा कि, यथास्थिति, ऐसी स्कीम के अनुसार या इस प्रकार उपांतरित स्कीम के अनुसार समामेलन के पश्चात् वह केन्द्रीय सरकार को (जब तक कि सुसंगत तथ्यों में तात्विक परिवर्तन न हो जाए) उपधारा (1) के अधीन सिफारिश करेगा।

(4) जहां कारबार का ऐसे पुनर्गठन हो गया है कि धारा 47 के खंड (xiii) में अधिकथित शर्तों को पूरा करके कंपनी फर्म की उत्तरवर्ती बने या धारा 47 के खंड (xiv) में अधिकथित शर्तों को पूरा करके कंपनी सांपत्तिक समुत्थान की उत्तरवर्ती बने वहां इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, यथास्थिति, पूर्ववर्ती फर्म या सांपत्तिक समुत्थान की संचयित हानि और शेष अवक्षयण उस पूर्ववर्ष के लिए उत्तरवर्ती कंपनी की हानि या अवक्षयण मोक समझा जाएगा जिसमें कारबार का पुनर्गठन किया गया था और हानि तथा अग्रनयन के संबंध में तथा अवक्षयण मोक की बाबत इस अधिनियम के अन्य उपबंध तदनुसार लागू होंगे :

परन्तु यह कि यदि धारा 47 के खंड (xiii) के परन्तुक या खंड (xiv) के परन्तुक में अधिकथित शर्तों में से किसी शर्त का पालन नहीं किया जाता है तो उत्तरवर्ती कंपनी को किसी पूर्ववर्ष में किया गया हानि या अवक्षयण मोक का मुजरा उस वर्ष में कर के लिए प्रभार्य कंपनी की आय समझी जाएगी जिसमें शर्तों का पालन नहीं किया गया है।

(5) उपधारा (4) के प्रयोजनों के लिए,–

() 'संचयित हानि' से यथास्थिति, पूर्ववर्ती फर्म या सांपत्तिक समुत्थान की 'कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ' शीर्ष के अधीन उतनी हानि अभिप्रेत है, जो (सट्टाबाजी के कारबार में हुर्इ हानि न हो), जिसे वह पूर्ववर्ती फर्म या सांपत्तिक समुत्थान धारा 72 के अधीन अग्रणीत कराने या मुजरा कराने के लिए हकदार होते यदि कारबार का पुनर्गठन न किया गया होता;

() 'शेष अवक्षयण' से, यथास्थिति पूर्ववर्ती फर्म या सांपत्तिक समुत्थान का उतना अवक्षयण मोक अभिप्रेत है जो अनुज्ञात किया जाना शेष रहता और जो इस अधिनियम के अधीन, यथास्थिति, पूर्ववर्ती फर्म या सांपत्तिक समुत्थान को अनुज्ञात किया गया होता यदि कारबार का पुनर्गठन न किया गया होता।

स्पष्टीकरण.–इस धारा में,–

() ''संचित हानि'' से समामेलक कंपनी की ''कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ'' शीर्ष के अधीन उतनी हानि अभिप्रेत है (जो सट्टे के कारबार से हुर्इ हानि नहीं है), जो यदि समामेलन नहीं किया जाता तो उसे अग्रनीत करने के लिए और मुजरा करने के लिए समामेलक कंपनी धारा 72 के उपबंधों के अधीन हकदार होती;

() ''विनिर्दिष्ट प्राधिकारी'' से ऐसा प्राधिकारी अभिप्रेत है जो केन्द्रीय सरकार इस धारा के प्रयोजनों के लिए राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे;

() ''शेष अवक्षयण'' से समामेलक कंपनी का उतना अवक्षयण मोक अभिप्रेत है जिसके लिए मोक नहीं दिया गया है और यदि समामेलन नहीं किया जाता तो जिसके लिए समामेलक कंपनी को इस अधिनियम के अधीन मोक दिया जाता।'

77. वित्त अधिनियम, 2003 द्वारा 1.4.2004 से उपधारा (1) और (2) प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व, उपधारा (1) और (2) जो वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा 1.4.2000 से संशोधित की गर्इ थीं इस प्रकार थीं:

"(1) जहां किसी औद्योगिक उपक्रम या पोत की स्वामी किसी कंपनी का, किसी अन्य कंपनी से समामेलन हुआ है, वहां इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध में किसी बात के होते हुए भी समामेलक कंपनी की संचयित हानि और शेष अवक्षयण उस पूर्ववर्ष के लिए जिसमें समामेलन प्रभावी किया गया था, समामेलित कंपनी के अवक्षयण के, यथास्थिति, हानि या मोक माने जाएंगे और हानि के मुजरा या अग्रनयन तथा अवक्षयण के मोक से संबंधित अधिनियम के अन्य उपबंध तदनुसार लागू होंगे।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, संचित हानि मुजरा नहीं की जाएगी और उसका अग्रनयन नहीं किया जाएगा और शेष अवक्षयण समामेलित कंपनी के निर्धारण में तब तक अनुज्ञात नहीं किया जाएगा जब तक कि निम्नलिखित शर्तें पूरी नहीं हो जाती हैं, अर्थात् :–

(i) समामेलित कंपनी समामेलन की तारीख से कम से कम पांच वर्ष की अवधि के लिए समामेलन की स्कीम में अर्जित की गर्इ समामेलक कंपनी की स्थिर आस्तियों के कम से कम तीन बटा चार बही मूल्य को प्रतिधारित नहीं करती है;

(ii) समामेलित कंपनी समामेलन की तारीख से कम से कम पांच वर्ष की अवधि के लिए समामेलक कंपनी का कारबार चालू न रखती हो;

(iii) समामेलित कंपनी ऐसी अन्य शर्तों को पूरा न करती हो जो समामेलक कंपनी के कारबार को पुनर्जीवित करने को सुनिश्चित के लिए या यह सुनिश्चित करने के लिए कि समामेलन अन्य असली कारबार के प्रयोजन के लिए है विहित की जाएं।"

78. नियम 9ग और फार्म सं. 62 देखिए

79. वित्त अधिनियम, 2001 द्वारा 1.4.2000 से, भूतलक्षी प्रभाव से अंत:स्थापित।

80. वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.4.2003 से अंत:स्थापित।

80क. वित्त अधिनियम, 2003 द्वारा 1.4.2004 से अंत:स्थापित

 

 

[वित्त अधिनियम, 2005 तथा विशेष आर्थिक जोन अधिनियम, 2005 द्वारा संशोधित रूप में]

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