आवासीय घर में निवेश करने के मामले में आरोप लगाए जाने की नहीं कुछ पूंजीगत परिसंपत्तियों के हस्तांतरण पर "पूंजीगत लाभ
27[निवास गृह में विनिधान की दशा में कतिपय पूंजी आस्तियों के अंतरण पर पूंजी लाभ का प्रभारित न किया जाना28
54च. (1) 29[उपधारा (4) के उपबंधों के अधीन रहते हुए जहां, किसी निर्धारिती की दशा में, जो एक व्यष्टि या हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब है] पूंजी अभिलाभ किसी दीर्घकालिक पूंजी आस्ति के जो निवास गृह नहीं है (जिसे धारा में इसके पश्चात् मूल आस्ति कहा गया है) अंतरण से उद्भूत होता है और निर्धारिती ने, जिस तारीख को अंतरण हुआ था उस तारीख से एक वर्ष पूर्व या 30[दो वर्ष] की अवधि के पश्चात् निवास गृह (जिसे इस धारा में इसके पश्चात् मूल आस्ति कहा गया है), खरीदा है, या उस तारीख के पश्चात् तीन वर्ष की अवधि के भीतर उसे बनाया है, वहां पूंजी अभिलाभ के संबंध में कार्रवार्इ इस धारा के निम्नलिखित उपबंधों के अनुसार की जाएगी, अर्थात् :–
(क) यदि नर्इ आस्ति की लागत मूल आस्ति की बाबत शुद्ध प्रतिफल से कम नहीं है तो ऐसा संपूर्ण पूंजी अभिलाभ धारा 45 के अधीन प्रभारित नहीं किया जाएगा;
(ख) यदि नर्इ आस्ति की लागत मूल आस्ति की बाबत शुद्ध प्रतिफल से कम है तो पूंजी अभिलाभ का उतना भाग जिसका संपूर्ण पूंजी अभिलाभ से वही अनुपात है जो नर्इ आस्ति की लागत का शुद्ध प्रतिफल से है, धारा 45 के अधीन प्रभारित नहीं किया जाएगा :
31[परन्तु इस उपधारा की कोर्इ बात वहां लागू नहीं होगी जहां–
(क) निर्धारिती–
(i) मूल आस्ति के अंतरण की तारीख को नर्इ आस्ति से भिन्न एक से अधिक निवास गृह का स्वामी है; या
(ii) मूल आस्ति के अंतरण की तारीख के पश्चात एक वर्ष की अवधि के भीतर नर्इ आस्ति से भिन्न कोर्इ निवास गृह खरीदता है; या
(iii) मूल आस्ति के अंतरण की तारीख के पश्चात तीन वर्ष की अवधि के भीतर नर्इ आस्ति से भिन्न कोर्इ निवास गृह बनाता है; और
(ख) ऐसे निवास गृह से, जो मूल आस्ति के अंतरण की तारीख को स्वामित्व वाले एक निवास गृह से भिन्न है, आय, "गृह संपत्ति से आय" शीर्ष के अधीन प्रभार्य है]।
स्पष्टीकरण.–इस धारा के प्रयोजनों के लिए–
32[* * *]
33[* * *] पूंजी आस्ति के अंतरण के संबंध में "शुद्ध प्रतिफल" से अभिप्रेत है पूंजी आस्ति के अंतरण के परिणामस्वरूप प्राप्त या होने वाले प्रतिफल का पूर्ण मूल्य जो ऐसे अंतरण के संबंध में पूर्णत: और अनन्यत: किए गए किसी व्यय को घटाकर आए।
(2) जहां निर्धारिती मूल आस्ति के अंतरण की तारीख के पश्चात् 34[दो वर्ष] की अवधि के भीतर नर्इ आस्ति से भिन्न कोर्इ निवास गृह खरीदता है या ऐसी तारीख से तीन वर्ष की अवधि के भीतर नर्इ आस्ति से भिन्न कोर्इ निवास गृह बनाता है जिसकी आय "गृह संपत्ति से आय" शीर्ष के अधीन प्रभार्य है, वहां मूल आस्ति के अंतरण से उद्भूत होने वाले पूंजी अभिलाभ की रकम को जो उपधारा (1) के खंड (क) या खंड (ख) में यथा उपबंधित नर्इ आस्ति की लागत के आधार पर धारा 45 के अधीन प्रभारित नहीं की गर्इ है उस पूर्ववर्ष के लिए जिसमें ऐसा निवास गृह खरीदा या बनाया गया है, दीर्घकालिक पूंजी आस्तियों के संबंध में "पूंजी अभिलाभ" शीर्ष के अधीन प्रभार्य आय समझा जाएगा।
(3) जहां नर्इ आस्ति, उसके विक्रय या निर्माण की तारीख से तीन वर्ष की अवधि के भीतर अंतरित की जाती है, वहां मूल आस्ति के कारण होने वाले पूंजी अभिलाभ की रकम, जो उपधारा (1) के खंड (क) या खंड (ख) में, जो भी हो, उपबंधित नर्इ आस्ति की लागत के आधार पर धारा 45 के अधीन प्रभारित नहीं की गर्इ है उस पूर्ववर्ष के लिए जिसमें ऐसी नर्इ आस्ति अंतरित की जाती है, दीर्घकालिक पूंजी आस्तियों के संबंध में "पूंजी अभिलाभ" शीर्ष के अधीन प्रभार्य आय समझी जाएगी।
35[(4) शुद्ध प्रतिफल की रकम, जो निर्धारिती द्वारा उस तारीख के पूर्व जिसको मूल आस्ति का अंतरण किया गया है, एक वर्ष के भीतर बनार्इ गर्इ नर्इ आस्ति खरीदने के लिए विनियोजित नहीं की जाती है या जिसका उसके द्वारा उपयोग धारा 139 के अधीन आय की विवरणी देने के तारीख के पूर्व नर्इ आस्ति के क्रय या निर्माण के लिए नहीं किया जाता है, ऐसे विवरणी देने से पूर्व उसके द्वारा किसी ऐसे बैंक या संस्था में खाते में निक्षेप की जाएगी [ऐसा निक्षेप किसी भी दशा में, धारा 139 की उपधारा (1) के अधीन उस निर्धारिती की दशा में आय की विवरणी देने के लिए लागू निश्चित तारीख तक किया जाएगा] जो ऐसी स्कीम36 में बतार्इ जाए और ऐसी स्कीम के अनुसार उसका उपयोग किया जाएगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त बनाए तथा ऐसी विवरणी के साथ ऐसे निक्षेप का सबूत होगा और उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिये, वह रकम, यदि कोर्इ हो, जिसका नर्इ आस्ति के क्रय या निर्माण के लिए निर्धारिती द्वारा पहले ही उपयोग किया जा चुका है, इस प्रकार जमा रकम सहित नर्इ आस्ति की लागत समझी जाएगी :
परन्तु यदि इस उपधारा के अधीन जमा रकम का उपयोग उपधारा (1) में बतार्इ गर्इ अवधि के भीतर नर्इ आस्ति के क्रय या निर्माण के लिए पूर्णत: या भागत: नहीं किया जाता है, तो–
(i) वह रकम जिससे–
(क) मूल आस्ति के अंतरण से होने वाले पूंजी अभिलाभ की रकम, जो उपधारा (1) के खंड (क) या खंड (ख) में, जो भी हो, उपबंधित नर्इ आस्ति की लागत के आधार पर धारा 45 के अधीन प्रभारित नहीं की गर्इ है;
(ख) ऐसी रकम से अधिक है जो उस समय इस प्रकार प्रभारित नहीं की गर्इ होती, यदि निर्धारिती द्वारा उपधारा (1) में बतार्इ गर्इ अवधि के भीतर नर्इ आस्ति के क्रय या निर्माण के लिए वस्तुत: उपयोग की गर्इ रकम नर्इ आस्ति की लागत होती, धारा 45 के अधीन उस पूर्ववर्ष की आय के रूप में प्रभारित की जाएगी जिसमें मूल आस्ति के अंतरण की तारीख से तीन वर्ष की अवधि समाप्त होती है; और
(ii) निर्धारिती पूर्वोक्त स्कीम के अनुसार उपयोग में न लार्इ गर्इ रकम वापस लेने का हकदार होगा।
स्पष्टीकरण.–37[वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1993 से लोप किया गया।]
27. वित्त अधिनियम, 1982 द्वारा 1.4.1983 से अंत:स्थापित।
28. सुसंगत केस लॉज़ के लिए, देखिये टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।
29. वित्त अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से, "जहां निर्धारिती की दशा में, जो एक व्यष्टि है" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।
30. वित्त अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से अंत:स्थापित।
31. वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा 1.4.2001 से प्रतिस्थापित। प्रस्थापन से पहले वित्त अधिनियम, 1982 द्वारा 1.4.1983 से अंत:स्थापित परन्तुक इस प्रकार था :
'परन्तु इस उपधारा की कोर्इ बात वहां लागू नहीं होगी जहां निर्धारिती मूल आस्ति के अन्तरण की तारीख को, ऐसी तारीख के पश्चात् एक वर्ष की अवधि के भीतर किसी निवास गृह का स्वामी है या उसे खरीदता है, वहां वह आय जो नर्इ आस्ति से भिन्न "गृह संपत्ति से आय" शीर्षक के अधीन प्रभार्य है।'
32. वित्त अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से लोप किया गया। इससे पहले खंड (i) इस प्रकार था:
'(i) "दीर्घकालिक पूंजी आस्ति" से ऐसी पूंजी आस्ति अभिप्रेत है जो अल्पकालिक पूंजी आस्ति नहीं है':
33. यथोक्त द्वारा, "(ii)" का लोप किया गया।
34. यथोक्त द्वारा, "एक वर्ष" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।
35. वित्त अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से अंत:स्थापित।
36. पूँजी अभिलाभ लेखा स्कीम, 1988 के पाठ के लिए–सा.का.नि. 724(इ), तारीख 22.6.1988 और निक्षेप प्राप्त करने और लेखा रखने के लिए विनिर्दिष्ट बैंकों की (ग्रामीण शाखाओं को छोड़कर) प्राधिकृत शाखाओं की सूची सा.का.नि. 725(इ), तारीख 22.6.1988 के लिए, देखिये टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज सर्कुलर्स, 1999 संस्करण, खंड 1, पृष्ट 1.1143-1.1164।
37. लोप से पहले स्पष्टीकरण, जिसका वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.4.1992 से संशोधन किया गया था, इस प्रकार था :
"स्पष्टीकरण.–जहां कोर्इ रकम उपधारा (2) या उपधारा (3) या इस उपधारा के परन्तुक के अनुसार धारा 45 के अधीन प्रभार्य हो जाती है, वहां धारा 48 की उपधारा (1) के खंड (ख) के अधीन की जाने वाली कटौतियों के प्रयोजनों के लिए इस धारा की उपधारा (2) के अधीन पंद्रह हजार रुपए की आरंभिक कटौती स्वीकार्य नहीं होगी।"
[वित्त अधिनियम, 2001 द्वारा संशोधित रूप में]

