आयकर विभाग

वित्त मंत्रालय, भारत सरकार

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धारा 48

अभिकलन की विधि

धारा

धारा संख्या

48

अध्याय शीर्षक

अध्याय IV - कुल आय की गणना

अधिनियम

आय-कर अधिनियम, 1961

वर्ष

2000

अभिकलन की विधि

अभिकलन की विधि

96[संगणना करने का ढंग

9748. "पूंजी अभिलाभ" शीर्ष के अधीन प्रभार्य आय की संगणना, पूंजी आस्ति के अंतरण के परिणामस्वरूप प्राप्त या प्रोद्भूत प्रतिफल98 के पूरे मूल्य98 में से निम्नलिखित रकमों की कटौती करके की जाएगी, अर्थात् :--

(i) ऐसे अंतरण के संबंध में98 पूर्णत: और अनन्यत: उपगत व्यय;

(ii) आस्ति के अर्जन की लागत और उसमें किसी सुधार98 की लागत :

99परन्तु ऐसे निर्धारिती की दशा में, जो अनिवासी भारतीय है, किसी भारतीय कंपनी में शेयरों या उसके डिबेंचरों के रूप में किसी पूंजी आस्ति के अंतरण से उद्भूत पूंजी अभिलाभ की संगणना, अर्जन की लागत, ऐसे अंतरण के संबंध में पूर्णत: और अनन्यत: उपगत व्यय और शेयरों या डिबेंचरों के क्रय में आरंभिक रूप से उपयोग की गर्इ उसी विदेशी करेंसी में पूंजी आस्ति के अंतरण के परिणामस्वरूप प्राप्त या उद्भूत प्रतिफल के पूरे मूल्य को संपरिवर्तित करके की जाएगी और ऐसी विदेशी करेंसी में इस प्रकार संगणित पूंजी अभिलाभ को भारतीय करेंसी में पुन: संपरिवर्तित किया जाएगा, तथापि इस प्रकार कि पूंजी अभिलाभ की संगणना की पूर्वोक्त रीति तत्पश्चात् किसी भारतीय कंपनी में शेयरों में प्रत्येक पुन: विनिधान या डिबेंचरों के विक्रय से प्रोद्भूत या उद्भूत पूंजी अभिलाभ की बाबत लागू होगी :

परन्तु यह और कि जहां दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभ किसी दीर्घकालिक पूंजी आस्ति के, जो किसी अनिवासी को पहले परंतुक में निर्दिष्ट किसी भारतीय कंपनी में शेयरों या उसके डिबेंचरों के अंतरण में उद्भूत पूंजी अभिलाभ से भिन्न है, अंतरण से उद्भूत होता है, वहां खंड (ii) के उपबंध इस प्रकार प्रभावी होंगे मानो "अर्जन की लागत" और "किसी सुधार की लागत" शब्दों के स्थान पर क्रमश: "अर्जन की सूचकांकित लागत" और "किसी सुधार की सूचकांकित लागत" शब्द रखे गए हों :

1[परन्तु यह भी कि दूसरे परन्तुक में की कोर्इ भी बात दीर्घकालिक पूंजी आस्ति के अंतरण से जो सरकार द्वारा जारी केपिटल इन्डेक्स बांड से भिन्न बांड या डिबेंचर हैं उत्पन्न होने वाले दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभ को लागू नहीं होगी :]

वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा 1.4.2001 से धारा 48 के तीसरे परन्तुक के पश्चात् निम्नलिखित चौथा परन्तुक अन्त:स्थापित किया जाएगा :

परन्तु यह और भी कि जहां धारा 47 के खंड (iii) के परन्तुक में निर्दिष्ट शेयर, डिबेंचर या वारन्ट दान या अप्रतिसंहरणीय न्यास के अधीन अंतरित किए जाते हैं, वहां ऐसे अंतरण की तारीख को बाजार मूल्य इस धारा के प्रयोजनों के लिए अंतरण के परिणामस्वरूप प्राप्त या प्रोद्भूत होने वाले प्रतिफल का पूरा मूल्य समझा जाएगा।

स्पष्टीकरण.–इस धारा के प्रयोजनों के लिए :–

(i) "विदेशी करेंसी" और "भारतीय करेंसी"2-3 के वही अर्थ हैं जो क्रमश: विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973 (1973 का 46) की धारा 2 में है;

(ii) भारतीय करेंसी का विदेशी करेंसी में संपरिवर्तन और विदेशी करेंसी का भारतीय करेंसी में संपरिवर्तन इस निमित्त विहित विनिमय की दर पर किया जाएगा;

(iii) "अर्जन की सूचकांकित लागत" से अभिप्रेत है वह रकम जिसका उसी अनुपात में अर्जन की लागत से संबंध है जिस प्रकार के उस वर्ष का मुद्रास्फीति सूचकांक जिसमें अंतरित की गर्इ आस्ति का संबंध उस प्रथम वर्ष के जिसमें निर्धारिती ने आस्ति धारित की थी या 1 अप्रैल, 1981 को प्रारंभ होने वाले वर्ष के लिए, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो, लागत मुद्रास्फीति सूचकांक से है;

(iv) "किसी सुधार की सूचकांकित लागत" से ऐसी रकम अभिप्रेत है जिसका उसी अनुपात में जो उस वर्ष के लिए, जिसमें आस्ति का अंतरण किया जाता है का उस वर्ष के लागत मुद्रास्फीति सूचकांक से संबंधित जिसमें आस्ति में सुधार हुआ है;

4[(v) किसी वर्ष के लिए "लागत मुद्रास्फीति सूचकांक" से ऐसा सूचकांक अभिप्रेत है जो केंद्रीय सरकार, शारीरिक श्रम न करने वाले नगरीय कर्मचारियों के लिए, ऐसे पूर्ववर्ष के ठीक पूर्ववर्ष के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में पचहत्तर प्रतिशत की औसत वृद्धि को ध्यान में रखते हुए राजपत्र में अधिसूचना5 द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे।]]

 

96. वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1993 से प्रतिस्थापित। इसके पूर्व वित्त अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से, प्रत्यक्ष कर विधि (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1990 से, वित्त अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1990 से और वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.4.1992 से संशोधित धारा 48 निम्न प्रकार थी,–

'48. संगणना करने का ढंग और कटौतियां–"पूंजी अभिलाभ" शीर्ष के अधीन प्रभार्य आय की संगणना,–

() पूंजी आस्ति के अंतरण के परिणामस्वरूप प्राप्त या प्रोद्भूत प्रतिफल के पूरे मूल्य में से निम्नलिखित रकमों की कटौती करके की जाएगी, अर्थात् :--

(i) ऐसे अंतरण के संबंध में पूर्णत: और अनन्यत: उपगत व्यय;

(ii) आस्ति के अर्जन की लागत और उसमें किसी सुधार की लागत :

परन्तु ऐसे निर्धारिती की दशा में जो अनिवासी भारतीय है, किसी भारतीय कंपनी में शेयरों या उसके डिबेंचरों के रूप में किसी पूंजी आस्ति के अंतरण से उद्भूत पूंजी अभिलाभ की संगणना, अर्जन की लागत, ऐसे अंतरण के संबंध में पूर्णत: और अनन्यत: उपगत व्यय और शेयरों या डिबेंचरों के क्रय में आरंभिक रूप से उपयोग की गर्इ उसी विदेशी करेंसी में पूंजी आस्ति के अंतरण के परिणामस्वरूप प्राप्त या उद्भूत प्रतिफल के कुल मूल्य को संपरिवर्तित करके की जाएगी, और ऐसी विदेशी करेंसी में इस प्रकार संगणित पूंजी अभिलाभ को भारतीय करेंसी में पुन: संपरिवर्तित किया जाएगा, तथापि, इस प्रकार से कि पूंजी अभिलाभ की संगणना की पूर्वोक्त रीति तत्पश्चात् किसी भारतीय कंपनी में शेयरों में प्रत्येक पुन: विनिधान या डिबेंचरों के विक्रय से प्रोद्भूत या उद्भूत पूंजी अभिलाभ की बाबत लागू होगी।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए--

(i) "अनिवासी भारतीय" का वही अर्थ है जो धारा 115ग के खंड () में है;

(ii) "विदेशी करेंसी" और "भारतीय करेंसी" के क्रमश: वही अर्थ हैं जो उनके विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973 (1973 का 46) की धारा 2 में है;

(iii) भारतीय करेंसी का विदेशी करेंसी में संपरिवर्तन और विदेशी करेंसी का भारतीय करेंसी में पुन: संपरिवर्तन इस निमित्त विहित विनिमय की दर पर किया जाएगा;

() जहां पूंजी अभिलाभ किसी दीर्घकालिक पूंजी आस्ति के अंतरण से उद्भूत होता है (जिसे इस धारा में इसके पश्चात् क्रमश: दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभ और दीर्घकालिक पूंजी आस्ति कहा गया है), वहां उपधारा (2) में अतिरिक्त कटौतियां करके की जाएगी:--

(2) उपधारा (1) के खंड () में निर्दिष्ट कटौतियां निम्नलिखित हैं, अर्थात् :--

() जहां उपधारा (1) के खंड () के अधीन कटौतियां करने के पश्चात् प्राप्त दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभ की रकम पंद्रह हजार रुपए से अधिक नहीं है, वहां ऐसी संपूर्ण रकम;

() किसी अन्य दशा में यथावधित पंद्रह हजार रुपए की निम्नलिखित के समतुल्य राशि, अर्थात्:–

(i) भवनों या भूमियों अथवा भूमियों या भवनों में किन्हीं अधिकारों या स्वर्ण, बुलियन या आभूषण के रूप में पूंजी आस्तियों के संबंध में इस प्रकार प्राप्त दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभ की बाबत,–

() किसी कंपनी की दशा में पंद्रह हजार रुपए से अधिक ऐसे अभिलाभ की रकम का पंद्रह प्रतिशत;

() किसी अन्य निर्धारिती की दशा में पंद्रह हजार रुपए से अधिक ऐसे अभिलाभ की रकम का पचास प्रतिशत;

(iक) साहसिक पूंजी उपक्रमों के साधारण अंशों के संबंध में इस प्रकार प्राप्त दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभ की बाबत–

() साहसिक पूंजी कंपनी से भिन्न किसी कंपनी की दशा में, पंद्रह हजार रुपए से अधिक ऐसे अभिलाभ की रकम का तीस प्रतिशत;

() साहसिक पूंजी कंपनी की दशा में, पंद्रह हजार रुपए से अधिक ऐसे अभिलाभ की रकम का साठ प्रतिशत;

() किसी अन्य दशा में, पंद्रह हजार रुपए से अधिक ऐसे अभिलाभ की रकम का साठ प्रतिशत;

(ii) उपखंड (i) और (iक) में निर्दिष्ट पूंजी आस्तियों से भिन्न पूंजी आस्तियों के संबंध में इस प्रकार प्राप्त दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभ की बाबत,-

() किसी कंपनी की दशा में, पंद्रह हजार रुपए से अधिक ऐसे अभिलाभ की रकम का तीस प्रतिशत;

() किसी अन्य दशा में, पंद्रह हजार रुपए से अधिक ऐसे अभिलाभ की रकम का साठ प्रतिशत :

परन्तु जहां दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभ उपखंड (i) और उपखंड (ii) में निर्दिष्ट पूंजी आस्तियों के दोनों प्रवर्गों से संबंधित है, वहां पंद्रह हजार रुपए की कटौती निम्नलिखित क्रम में अनुज्ञात की जाएगी, अर्थात् :–

(1) सबसे पहले कटौती उपखंड (i) में उल्लिखित आस्तियों से संबंधित दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभों के बारे में अनुज्ञात की जाएगी;

(2) उसके पश्चात् उक्त पंद्रह हजार रुपए का अतिशेष, यदि कोर्इ हो, उपखंड (ii) में उल्लिखित आस्तियों से संबंधित दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभों के बारे में कटौती के रूप में अनुज्ञात किया जाएगा,

और उपखंड (ii) के उपबंध इस प्रकार लागू होंगे मानो उनमें पंद्रह हजार रुपए के प्रति निर्देश इस परन्तुक के खंड (1) और खंड (2) के अनुसार अनुज्ञात कटौती की रकम के प्रति निर्देश हों :

परन्तु यह और कि धारा 45 की उपधारा (5) के खंड () में निर्दिष्ट रकम के संबंध में, इस उपधारा के खंड () के अधीन पंद्रह हजार रुपए कि आरंभिक कटौती में से 1 अप्रैल, 1987 को प्रारम्भ होने वाले निर्धारण वर्ष या किसी पूर्वतर निर्धारण वर्ष के लिए निर्धारण में धारा 80न के खंड () के अधीन पहले ही अनुज्ञात कटौती अथवा, यथास्थिति, धारा 45 की उपधारा (5) के खंड () में निर्दिष्ट प्रतिकर या प्रतिफल की रकम के संबंध में इस उपधारा के खंड () के अधीन अनुज्ञात कटौती, घटा दी जाएगी और इस उपधारा के खंड () और खंड () में दस हजार रुपए के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे घटार्इ गर्इ रकम के, यदि कोर्इ हो, प्रति निर्देश हैं।

स्पष्टीकरण.–इस धारा के प्रयोजनों के लिए–

() "साहसिक पूंजी कंपनी" से अभिपेत है ऐसी कंपनी, जो साहसिक पूंजी उपक्रमों के साधारण अंशों का अर्जन करके या, यदि परिस्थितियों से ऐसा अपेक्षित हो तो, ऐसे उपक्रमों को उधार देकर, उनका वित्तपोषण करने के काम में मुख्यत: लगी हुर्इ है और जो इस निमित्त केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित है;

() "साहसिक पूंजी उपक्रम" से ऐसी कंपनी अभिप्रेत है जिसे विहित प्राधिकारी, निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखते हुए उपधारा (2) के खंड () के उपखंड (iक) के प्रयोजनों के लिए अनुमोदित करे, अर्थात्–

(1) कंपनी में कुल विनिधान दस करोड़ रुपए या ऐसी अन्य उच्चतर रकम से अधिक नहीं है जो विहित की जाए;

(2) कंपनी के पास ऐसी परियोजनाओं को प्रारंभ करने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन नहीं हैं जिन्हें प्रारंभ करने के लिए वह वृत्तिक या तकनीकी रूप से अन्यथा समर्थ है; और

(3) कंपनी ऐसी प्रौद्योगिकी का उपयोग करना चाहती है जिसका परिणाम भारत में किसी क्षेत्र में विद्यमान प्रौद्योगिकी में महत्त्वपूर्ण सुधार करना होगा और ऐसी प्रौद्योगिकी के विनिधान में बहुत जोखिम है।

(3) उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट कटौतियां "पूंजी अभिलाभ" शीर्ष के अधीन हानि की संगणना के प्रयोजनों के लिए भी की जाएंगी जहां तक वे दीर्घकालिक पूंजी आस्ति के संबंध में हैं और इस प्रयोजन के लिए उपधारा (1) के खंड (क) के अधीन कटौतियां करने के बाद निकाले गए दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभ की रकम के प्रति उस उपधारा में निर्देश उक्त कटौती करने के बाद निकाली गर्इ हानि की रकम के प्रति भी निर्देश माना जाएगा।'

97. सुसंगत केस लॉज़ के लिए, देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

98. "प्रतिफल", "प्रतिफल का पूरा मूल्य", "ऐसे अंतरण के संबंध में" और "सुधार" पदों के अर्थ के लिए, देखिए टैक्समैन्स डायरैक्ट टैक्सेज मैनुअल, खंड 3।

99. देखिए नियम 115क।

1. वित्त अधिनियम, 1997 द्वारा 1.4.1998 से अंत:स्थापित।

2-3. "विदेशी मुद्रा" और "भारतीय करेंसी" की परिभाषा के लिए, देखिए क्रमश: पूर्व पृष्ठ 1.78 पर पाद टिप्पण 90 और पृष्ठ 1.302 पर पाद टिप्पण 40.

4. वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा 1.4.1993 से भूतलक्षी प्रभाव से प्रतिस्थापित। इससे पूर्व स्पष्टीकरण का खंड (v) इस प्रकार से था :–

'(v) किसी वर्ष के लिए "लागत मुद्रास्फीति सूचकांक" से ऐसा सूचकांक अभिप्रेत है जो केन्द्रीय सरकार, उस वर्ष के लिए शारीरिक श्रम न करने वाले नगरीय कर्मचारियों के लिए, उस वर्ष के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में पचहत्तर प्रतिशत औसत वृद्धि को ध्यान में रखते हुए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे।'

5. सुसंगत वित्त वर्ष की अधिसूचित लागत मुद्रास्फीति इस प्रकार से है :

1981-82 : 100/1982-83 : 109/1983-84 : 116/1984-85 : 125/1985-86 : 133/1986-87 : 140/ 1987-88 : 150/1988-89 : 161/1989-90 : 172/1990-91 : 182/1991-92 : 199/1992-93 : 223/ 1993-94 : 244/1994-95 : 259/1995-96 : 281/1996-97 : 305/1997-98 : 331/1998-99 : 351/ 1999-2000 : 389/2000-2001: 406, ब्यौरों के लिए, देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

 

 

[वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा संशोधित रूप में]

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