लाभ और अभिलाभों का उपधारणात्मक आधार पर संगणित करने के लिए विशेष उपबंध
लाभ और अभिलाभों का उपधारणात्मक आधार पर संगणित करने के लिए विशेष उपबंध
44कघक. (1) धारा 28 से धारा 43ग में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, किसी ऐसे निर्धारिती के मामले में, जो भारत में कोर्इ निवासी है और धारा 44कक की उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी वृत्ति में लगा हुआ है और जिसकी सकल प्राप्तियां किसी पूर्ववर्ष में पचास लाख रुपए से अधिक नहीं हैं, यथास्थिति, ऐसी वृत्ति के परिणामस्वरूप पूर्ववर्ष में निर्धारिती की सकल प्राप्तियों के पचास प्रतिशत के समतुल्य कोर्इ राशि या निर्धारिती द्वारा अर्जित की गर्इ पूर्वोक्त दावाकृत राशि से उच्चतर कोर्इ राशि "कारबार या वृत्ति से लाभ और अभिलाभ" शीर्ष के अधीन कर से प्रभार्य ऐसी वृत्ति के लाभ और अभिलाभ समझे जाएंगे ।
(2) उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए धारा 30 से धारा 38 के उपबंधों के अधीन अनुज्ञेय कोर्इ कटौती को पहले ही पूर्ण प्रभाव दिया गया समझा जाएगा और उन धाराओं के अधीन कोर्इ और कटौती अनुज्ञात नहीं की जाएगी ।
(3) वृत्ति के प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त किसी आस्ति का अवलिखित मूल्य संगणित किया गया समझा जाएगा मानो निर्धारिती ने दावा किया था और वस्तुत: सुसंगत प्रत्येक निर्धारण वर्षों के लिए अवक्षयण के संबंध में कटौती अनुज्ञात की गर्इ थी ।
(4) इस धारा के पूर्वगामी उपबंधों में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, किसी निर्धारिती से जो दावा करता है कि वृत्ति से उसके लाभ और अभिलाभ, उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट लाभ और अभिलाभों से निम्नतर हैं और जिसकी कुल आय ऐसी अधिकतम रकम से अधिक है जो आय-कर से प्रभार्य नहीं है, यह अपेक्षित होगा कि वह लेखा बहियां और दस्तावेज बनाए रखे जैसा कि धारा 44कक की उपधारा (2) के अधीन अपेक्षित है तथा उन्हें लेखा परीक्षित कराए और धारा 44कख के अधीन यथा अपेक्षित ऐसी लेखा परीक्षा की एक रिपोर्ट प्रस्तुत करे।
[वित्त अधिनियम, 2018 द्वारा संशोधित रूप में]

