आयकर विभाग

वित्त मंत्रालय, भारत सरकार

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धारा 36

अन्य कटौतियां

धारा

धारा संख्या

36

अध्याय शीर्षक

अध्याय IV - कुल आय की गणना

अधिनियम

आय-कर अधिनियम, 1961

वर्ष

2013

अन्य कटौतियां

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अन्य कटौतियां

2936. (1) धारा 28 में निर्दिष्ट आय संगणित करने में ऐसी कटौतियां, जो निम्नलिखित खंडों में उपबंधित हैं, उनमें वर्णित मामलों की बाबत अनुज्ञात की जाएंगी—

29क(i) कारबार या वृत्ति के प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त स्टाक या स्टोरों30 के नुकसान30 या विनाश30 के जोखिम के विरुद्ध बीमे की बाबत दी गर्इ किसी प्रीमियम की रकम;

31[(iक) किसी परिसंघ दुग्ध सहकारी सोसाइटी द्वारा सहकारी सोसाइटी के किसी सदस्य के स्वामित्वाधीन पशुओं के जीवन का बीमा कराने या उसे प्रवृत्त रखने की बाबत संदत्त प्रीमियम की रकम, जहां वह सहकारी सोसाइटी अपने सदस्यों द्वारा उत्पादित दूध का प्रदाय उस परिसंघ दुग्ध सहकारी सोसाइटी को करने में लगी हुर्इ प्राथमिक सोसाइटी है;]

32[(iख) निर्धारिती द्वारा नियोजक के रूप में,–

(अ) साधारण बीमा कारबार (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1972 (1972 का 57) की धारा 9 के अधीन बनाए गए भारतीय साधारण बीमा निगम और केंद्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित; अथवा

(आ) किसी अन्य बीमाकर्ता द्वारा इस निमित्त बनार्इ गर्इ और बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (1999 का 41) की धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण द्वारा अनुमोदित,

किसी स्कीम के अधीन अपने कर्मचारियों के स्वास्थ्य का बीमा कराने या उसे प्रवृत्त रखने के लिए 33[नकदी से भिन्न संदाय के किसी अन्य ढंग द्वारा दी गर्इ] किसी प्रीमियम की रकम;]

34(ii) की गर्इ सेवाओं के लिए बोनस या कमीशन35 के रूप में किसी कर्मचारी को संदत्त कोर्इ राशि, जहां ऐसी राशि उसको लाभ या लाभांश के रूप में संदेय न हुर्इ होती यदि वह बोनस या कमीशन35 के रूप में संदत्त न की गर्इ होती;

35क[ * * *]

35ख[ * * *]

(iiक) 35ग[वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.4.2000 से लोप किया गया।]

36(iii) कारबार37 या वृत्ति के प्रयोजनों के लिए उधार ली गर्इ पूंजी37 की बाबत दिए गए ब्याज37 की रकम :

38[परंतु विद्यमान कारबार या वृत्ति के विस्तार के लिए किसी आस्ति (चाहे लेखा बहियों में पूंजीगत हो या नहीं) के अर्जन के लिए उधार ली गर्इ पूंजी की बाबत उस तारीख से, जिसको आस्ति के अर्जन के लिए पूंजी उधार ली गर्इ थी, प्रारंभ होने वाली और उस तारीख तक की, जिसको ऐसी आस्ति पहली बार प्रयोग में लार्इ गर्इ थी, किसी अवधि के लिए, संदत्त ब्याज की कोर्इ रकम कटौती के रूप में अनुज्ञात नहीं की जाएगी।]

स्पष्टीकरण.–पारस्परिक फायदा सोसाइटियों में, जो ऐसी शर्तें पूरी करती हैं जो विहित की जाएं, शेयरधारकों या अभिदायकर्ताओं द्वारा समय-समय पर दिए गए आवर्ती अभिदाय इस खंड के अर्थ में उधार ली गर्इ पूंजी समझे जाएंगे;

39[(iiiक) किसी जीरो कूपन बंधपत्र पर, ऐसे बंधपत्र की ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, परिकलित अवधि को ध्यान में रखते हुए, छूट की अनुपातिक रकम।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए,–

(i) "छूट" से बंधपत्र जारी करने वाली अवसंरचनात्मक पूंजी कंपनी या अवसंरचनात्मक पूंजी निधि या पब्लिक सेक्टर कंपनी 39क[या अनुसूचित बैंक] द्वारा प्राप्त की गर्इ या प्राप्य रकम और ऐसे बंधपत्र की परिपक्वता या मोचन पर ऐसी कंपनी या निधि या पब्लिक सेक्टर कंपनी 39क[या अनुसूचित बैंक] द्वारा संदेय रकम के बीच का अंतर अभिप्रेत है ;

(ii) "बंधपत्र की अवधि" से बंधपत्र के जारी किए जाने की तारीख से प्रारंभ होने वाली और ऐसे बंधपत्र की परिपक्वता या मोचन की तारीख को समाप्त होने वाली अवधि अभिप्रेत है ;

(iii) 40[ * * *]]

41(iv) 42किसी मान्यताप्राप्त भविष्य निधि या किसी अनुमोदित अधिवार्षिकी निधि के लिए अभिदाय के तौर पर नियोजक के रूप में निर्धारिती द्वारा संदत्त कोर्इ राशि,43 ऐसी परिसीमाओं के अधीन रहते हुए, जो यथास्थिति, भविष्य निधि को मान्यता देने या अधिवार्षिकी निधि को अनुमोदित करने के लिए विहित की जाए और ऐसी शर्तों44 के अधीन रहते हुए, जैसी बोर्ड उन दशाओं में विनिर्दिष्ट करना ठीक समझे जिनमें अभिदाय नियत रकमों के वार्षिक अभिदायों के "वेतन" शीर्ष के अधीन प्रभार्य आय या अभिदायों या निधि के सदस्यों की संख्या के निर्देश में किसी निश्चित आधार पर नियत वार्षिक अभिदायों के प्रकार के नहीं है;

44क[(ivक) निर्धारिती द्वारा नियोजक के रूप में किसी कर्मचारी के खाते में धारा 80 गगघ में यथानिर्दिष्ट किसी पेंशन स्कीम के मद््दे अभिदाय के रूप में उस सीमा तक संदत्त कोर्इ रकम जहां तक वह पूर्ववर्ष में कर्मचारी के वेतन के दस प्रतिशत से अधिक नहीं है।

स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनों के लिए, ''वेतन'' के अंतर्गत, यदि नियोजन के निबंधनों में इस प्रकार उपबंधित हो, मंहगार्इ भत्ता भी है, किंतु इसके अंतर्गत सभी अन्य भत्ते और परिलब्धियां नहीं आती हैं;]

45(v) 46अप्रतिसंहरणीय न्यास के अधीन अपने कर्मचारियों के अनन्य फायदे के लिए अपने द्वारा सृष्ट किसी अनुमोदित उपदान निधि में अभिदाय के तौर पर नियोजक के रूप में निर्धारिती द्वारा संदत्त कोर्इ राशि47;

48[(vक) निर्धारिती द्वारा अपने किसी कर्मचारी से, जिसको धारा 2 के खंड (24) के उपखंड (x) के उपबंध लागू होते हैं, प्राप्त कोर्इ राशि यदि ऐसी राशि निर्धारिती द्वारा निश्चित तारीख को या उसके पूर्व सुसंगत निधि या निधियों में कर्मचारी के खाते में जमा की जाती है।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए, ''निश्चित तारीख'' से वह तारीख अभिप्रेत है जिस तक निर्धारिती से यह अपेक्षित है कि वह नियोजक के रूप में कर्मचारी के अभिदाय को किसी अधिनियम, नियम, आदेश या उसके अधीन या किसी स्थायी आदेश, अधिनिर्णय, सेवा संविदा के अधीन या अन्यथा निकाली गर्इ अधिसूचना के अधीन कर्मचारी के सुसंगत निधि के खाते में जमा करे;]

49(vi) ऐसे जीव-जन्तुओं की बाबत जो व्यापार-स्टाक के रूप में प्रयुक्त किए जाने से अन्यथा कारबार या वृत्ति के प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त किए गए हैं और मर गए हैं या ऐसे प्रयोजनों के लिए स्थायी रूप से बेकार हो गए हैं, निर्धारिती को जीव-जन्तुओं की वास्तविक लागत और जीव-जंतुओं के शवों की बाबत प्राप्त रकम का, यदि कोर्इ हो, अंतर;

49(vii) उपधारा (2) के उपबंधों के अधीन 50[किसी ऐसे डूबंत51 ऋण की रकम या उसका भाग जो पूर्ववर्ष के लिए निर्धारिती के लेखाओं में अवसूलीय रकम के रूप में बट्टे खाते डाल दिया गया है]:

52[परन्तु ऐसे किसी 53[निर्धारिती] की दशा में जिसको खंड (viiक) लागू होता है ऐसे किसी ऋण या उसके भाग के संबंध में कटौती की रकम की सीमा वह रकम होगी जिससे ऐसा ऋण या उसका भाग उस खंड के अधीन डूबंत और शंकास्पद ऋणों के लिए की गर्इ व्यवस्था लेखा में जमा अतिशेष से अधिक है।]

54[54क[स्पष्टीकरण.]–इस खंड के प्रयोजनों के लिए निर्धारिती के लेखा में अवसूलनीय रूप में बट्टे खाते डाले गए डूबंत ऋण या उसके किसी भाग में निर्धारिती के लेखा में डूबंत और शंकास्पद ऋणों के लिये कोर्इ व्यवस्था नहीं होगी;]

वित्त अधिनियम, 2013 द्वारा 1.4.2014 से धारा 36 की उपधारा (1) के खंड (vii) के पुन:संख्यांकित स्पष्टीकरण 1 के पश्चात् निम्नलिखित स्पष्टीकरण 2 अंत:स्थापित किया जाएगा :

स्पष्टीकरण 2–शंकाओं को दूर करने के लिए, यह स्पष्ट किया जाता है कि इस उपधारा के खंड (vii) के परंतुक और उपधारा (2) के खंड (v) के प्रयोजनों के लिए उसमें निर्दिष्ट लेखा, खंड (viiक) के अधीन डूबन्त और शंकास्पद ऋणों के उपबंध की बाबत केवल एक लेखा होगा और ऐसा लेखा सभी प्रकार के अग्रिमों, जिनके अंतर्गत ग्रामीण शाखाओं द्वारा दिए गए अग्रिम भी हैं, से संबंधित होगा;

55[(viiक) 56[57डूबंत और शंकास्पद ऋणों के लिए की गर्इ व्यवस्था की बाबत—

(क) जहां ऐसी व्यवस्था किसी ऐसे अनुसूचित बैंक द्वारा की जाती है, [जो 58[ * * *] भारत के बाहर किसी देश की विधि द्वारा या उसके अधीन निगमित बैंक नहीं है] या गैर-अनुसूचित बैंक 59[या प्राथमिक कृषि प्रत्यय सोसाइटी से भिन्न किसी सहकारी बैंक या किसी प्राथमिक सहकारी कृषि और ग्रामीण विकास बैंक] द्वारा की जाती है, वहां कुल आय (इस खंड और अध्याय 6क के अधीन कटौती करने के पूर्व संगणित) के 60[साढ़े सात प्रतिशत से अनधिक] रकम और ऐसे बैंक की ग्रामीण शाखाओं द्वारा दिए गए, विहित रीति से संगणित कुल औसत अग्रिम के 61[दस] प्रतिशत से अनधिक रकम :

62[परन्तु उस उपखंड में निर्दिष्ट अनुसूचित बैंक या गैर-अनुसूचित बैंक को, अपनी इच्छानुसार, किसी भी सुसंगत वर्ष में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा इस निमित्त जारी दिशानिर्देशों के अनुसार शंकास्पद आस्तियों या हानि की आस्तियों के रूप में उसके द्वारा वर्गीकृत किन्हीं आस्तियों के लिए उसके द्वारा की गर्इ किसी व्यवस्था की बाबत उस रकम की कटौती अनुज्ञात होगी जो पूर्ववर्ष के अंतिम दिन बैंक की बहियों में दर्शित ऐसी आस्तियों की रकम के पांच प्रतिशत से अधिक न हो:]

63[परन्तु यह और कि 1 अप्रैल, 2003 को या उसके पश्चात् प्रारंभ होने वाले और 1 अप्रैल, 2005 से पूर्व समाप्त होने वाले सुसंगत निर्धारण वर्षों के लिए, पहले परन्तुक के उपबंध इस प्रकार प्रभावी होंगे मानो "पांच प्रतिशत" शब्दों के स्थान पर "दस प्रतिशत" शब्द रखे गए हों:]

64[परंतु यह भी कि इस उपखंड में निर्दिष्ट किसी अनुसूचित ब®क या किसी गैर- अनुसूचित ब®क को, उसके विकल्प पर, केन्द्रीय सरकार द्वारा बनार्इ गर्इ किसी स्कीम के अनुसार प्रतिभूतियों के मोचन से प्राप्त आय से अनधिक रकम के लिए पूर्वगामी उपबंधों में विनिर्दिष्ट सीमाओं से अधिक की अतिरिक्त कटौती अनुज्ञात की जाएगी:

परंतु यह भी कि तीसरे परंतुक के अधीन कोर्इ कटौती तब तक अनुज्ञात नहीं की जाएगी जब तक कि ऐसी आय "कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ" शीर्ष के अधीन आय की विवरणी में प्रकट न कर दी गर्इ हो।]

65[स्पष्टीकरण.–इस उपखंड के प्रयोजनों के लिए ''सुसंगत निर्धारण वर्षों'' से 1 अप्रैल, 2000 को या उसके पश्चात् प्रांरभ होने वाले और 1 अप्रैल, 2005 से पूर्व समाप्त होने वाले पांच क्रमवर्ती निर्धारण वर्ष अभिप्रेत हैं;]

(ख) जहां ऐसी व्यवस्था किसी ऐसे बैंक द्वारा की जाती है, जो भारत के बाहर किसी देश की विधि द्वारा या उसके अधीन निगमित बैंक है वहां कुल आय के (इस खंड और अध्याय 6क के अधीन कटौती करने के पूर्व संगणित) पांच प्रतिशत से अनधिक रकम;]

66[(ग) जहां ऐसी व्यवस्था किसी लोक वित्तीय संस्था या राज्य वित्तीय निगम या राज्य औद्योगिक विनिधान निगम द्वारा की जाती है वहां कुल आय के (इस खंड और अध्याय 6क के अधीन कटौती करने के पूर्व संगणित) पांच प्रतिशत से अनधिक रकम:]

67[परन्तु यह कि इस उपखंड में निर्दिष्ट कोर्इ लोक वित्तीय संस्था या कोर्इ राज्य वित्तीय निगम अथवा कोर्इ राज्य औद्योगिक विनिधान निगम को उसके विकल्प पर 1 अप्रैल, 2003 को या उसके पश्चात् प्रारंभ होने वाले और 1 अप्रैल, 2005 से पूर्व समाप्त होने वाले दो क्रमवर्ती निर्धारण वर्षों में से किसी वर्ष के लिए, भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा शंकास्पद आस्तियों या हानिप्रद आस्तियों के रूप में इस निमित्त जारी किए गए मार्गदर्शक सिद्धांतों के अनुसार वर्गीकृत किन्हीं आस्तियों के लिए इसके द्वारा बनाए गए किसी उपबंध की बाबत, पूर्ववर्ष के अंतिम दिन, यथास्थिति, ऐसी संस्था या निगम के खातों में दर्शित ऐसी आस्तियों की रकम के दस प्रतिशत से अनधिक रकम की कटौती अनुज्ञात की जाएगी।]

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए,—

68[(i) ''गैर-अनुसूचित बैंक'' से बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 5 के खण्ड (ग) में यथापरिभाषित ऐसी बैंककारी कम्पनी69 अभिप्रेत है जो अनुसूचित बैंक नहीं है;]

70[(iक)] ''ग्रामीण शाखा'' से किसी अनुसूचित बैंक 71[या गैर-अनुसूचित बैंक] की ऐसी शाखा अभिप्रेत है जो ऐसे स्थान में स्थित है जिसकी जनसंख्या उस अंतिम पूर्ववर्ती जनगणना के अनुसार, जिसके सुसंगत आंकड़े पूर्ववर्ष के पहले दिन के पूर्व प्रकाशित हो गए हैं, दस हजार से अधिक नहीं है;]

72[(ii) ''अनुसूचित बैंक'' से भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम, 1955 (1955 का 23) के अधीन गठित भारतीय स्टेट बैंक, भारतीय स्टेट बैंक (समनुषंगी बैंक) अधिनियम, 1959 (1959 का 38) में परिभाषित समनुषंगी बैंक, बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) की धारा 3 के अधीन या बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1980 (1980 का 40) की धारा 3 के अधीन गठित तत्स्थानी नया बैंक, या कोर्इ ऐसा अन्य बैंक अभिप्रेत है, जो भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की द्वितीय अनुसूची में सम्मिलित बैंक है 73[ * * *];

74[(iii) ''लोक वित्तीय संस्था'' का वही अर्थ है जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की 75धारा 4 क में है;

(iv) ''राज्य वित्तीय निगम'' से अभिप्रेत है राज्य वित्तीय निगम अधिनियम, 1951 (1951 का 63) की धारा 3 या धारा 3 क के अधीन स्थापित कोर्इ वित्तीय निगम या धारा 46 के अधीन अधिसूचित कोर्इ संस्था;

(v) ''राज्य औद्योगिक विनिधान निगम'' से अभिप्रेत है कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 के अर्थ में कोर्इ सरकारी कम्पनी,76 जो औद्योगिक परियोजनाओं के लिए दीर्घकालिक वित्त उपलब्ध कराने के कारबार में लगी हुर्इ है और 77[इस उपधारा के खंड (viii) के अधीन कटौती के लिए पात्र है];

78[(vi) "सहकारी बैंक", "प्राथमिक कृषि प्रत्यय सोसाइटी" और "प्राथमिक सहकारी कृषि और ग्रामीण विकास बैंक" के वही अर्थ हैं, जो धारा 80 त की उपधारा (4) के स्पष्टीकरण में क्रमश: उनके हैं;]

79[(viii) किसी विनिर्दिष्ट इकार्इ (एन्टीटी) द्वारा सृष्ट और बनाए रखे गए किसी विशेष रिजर्व के संबंध में ऐसी कोर्इ रकम, जो ऐसे रिजर्व खाते में अग्रनीत, "कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ" शीर्ष के अधीन संगणित, पात्र कारबार से व्युत्पन्न लाभों के (इस खंड के अधीन कोर्इ कटौती करने से पूर्व) बीस प्रतिशत से अधिक नहीं है :

परंतु यह कि जहां उन रकमों का योग, जो ऐसे रिजर्व खाते में समय-समय पर अग्रनीत की जाती रही हों, विनिर्दिष्ट इकार्इ की समादत्त शेयर पूंजी और साधारण रिजर्व की रकम से दो गुने से अधिक है, वहां ऐसे आधिक्य की बाबत इस खंड के अधीन कोर्इ मोक नहीं दिया जाएगा।

स्पष्टीकरण-इस खंड में,-

(क) "विनिर्दिष्ट इकार्इ" से निम्नलिखित अभिप्रेत है,-

( i) कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 4 क में विनिर्दिष्ट कोर्इ वित्तीय निगम80;

( ii) कोर्इ वित्तीय निगम, जो पब्लिक सेक्टर कंपनी है;

( iii) कोर्इ बैंककारी कंपनी;

( iv) प्राथमिक कृषि प्रत्यय सोसाइटी या किसी प्राथमिक सहकारी कृषि और ग्रामीण विकास बैंक से भिन्न कोर्इ सहकारी बैंक;

( v) आवास वित्त कंपनी ; और

( vi) कोर्इ अन्य वित्तीय निगम, जिसके अंतर्गत पब्लिक कंपनी भी है;

(ख़) "पात्र कारबार" से निम्नलिखित अभिप्रेत है,-

80क[(i) खंड (क) के उपखंड (i) या उपखंड (ii) या उपखंड (iii) या उपखंड (iv) में निर्दिष्ट इकार्इ की बाबत,–

(अ) औद्योगिक या कृषि विकास;

(आ) भारत में अवसंरचनात्मक सुविधा के विकास;

(इ) भारत में आवास के विकास,

के लिए दीर्घकालिक वित्त उपलब्ध कराने का कारबार;]

(ii) खंड (क) के उपखंड (v) में निर्दिष्ट विनिर्दिष्ट इकार्इ के संबंध में भारत में आवासीय प्रयोजनों के लिए गृहों के निर्माण या क्रय करने के लिए दीर्घकालिक वित्त उपलब्ध कराने का कारबार; और

(iii) खंड (क) के उपखंड (vi) में निर्दिष्ट विनिर्दिष्ट इकार्इ के संबंध में भारत में अवसंरचनात्मक सुविधा के विकास के लिए दीर्घकालिक वित्त उपलब्ध कराने का कारबार;

(ग) "बैंककारी कंपनी" से ऐसी कंपनी अभिप्रेत है, जिसे बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) लागू होता है और इसके अंतर्गत उस अधिनियम की धारा 51 में निर्दिष्ट कोर्इ बैंक या बैंककारी संस्था भी है;

(घ) "सहकारी बैंक", "प्राथमिक कृषि प्रत्यय सोसाइटी" और "प्राथमिक सहकारी कृषि और ग्रामीण विकास बैंक" के वही अर्थ हैं जो धारा 80 त की उपधारा (4) के स्पष्टीकरण में क्रमश: उनके हैं;

(ड.) "आवास वित्त कंपनी" से ऐसी पब्लिक कंपनी अभिप्रेत है, जो भारत में आवासीय प्रयोजनों के लिए गृहों के निर्माण या क्रय करने के लिए दीर्घकालिक वित्त उपलब्ध कराने का कारबार करने के मुख्य उˆेश्य से भारत में बनार्इ गर्इ है या रजिस्ट्रीकृत है;

(च) 81"पब्लिक कंपनी" का वही अर्थ है जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 3 में है;

(छ) "अवसंरचनात्मक सुविधा" से अभिप्रेत है,-

(i) धारा 80 झक की उपधारा (4) के खंड (i) के स्पष्टीकरण में यथापरिभाषित कोर्इ अवसंरचनात्मक सुविधा या ऐसी ही प्रकृति की कोर्इ अन्य लोग सुविधा, जो बोर्ड द्वारा इस निमित्त राजपत्र में अधिसूचित82 की जाए और जो उन शर्तों को पूरा करती हो, जो विहित की जाए83;

(ii) धारा 80 झक की उपधारा (4) के खंड (ii) या खंड (iii) या खंड (iv) या खंड (vi) में निर्दिष्ट कोर्इ उपक्रम; और

(iii) धारा 80 झक की उपधारा (10) में निर्दिष्ट कोर्इ उपक्रम;

(ज) "दीर्घकालिक वित्त" से ऐसा कोर्इ उधार या अग्रिम अभिप्रेत है, जहां कि उसके निबंधनों में, जिनके अधीन ऐसा धन उधार या अग्रिम दिया जाता है, पांच वर्ष से अन्यून की किसी अवधि के दौरान ब्याज सहित उसके प्रतिसंदाय के लिए उपबंध किया गया है;]

(viiiक) 84-94[ * * *]

95[(ix) कोर्इ ऐसा व्यय, जो किसी कंपनी द्वारा अपने कर्मचारियों में परिवार नियोजन को प्रोत्साहित करने के प्रयोजन के लिए सद्भावपूर्वक उपगत किया गया हो :

परन्तु यह कि जहां ऐसा व्यय या उसका कोर्इ भाग पूंजीगत प्रकार का है, वहां ऐसे व्यय के पंचमांश की कटौती उस पूर्ववर्ष के लिए की जाएगी जिसमें वह उपगत किया गया था और उसके अतिशेष की कटौती ठीक उत्तरवर्ती चार पूर्ववर्षों में से हर एक वर्ष के लिए बराबर किस्तों में की जाएगी :

परन्तु यह और कि धारा 32 की उपधारा (2) और धारा 72 की उपधारा (2) के उपबंध इस खंड के अधीन अनुज्ञेय कटौतियों के संबंध में उसी प्रकार लागू होंगे जैसे वे अवक्षयण के संबंध में अनुज्ञेय कटौतियों के बारे में लागू होते हैं :

परन्तु यह और कि धारा 35 की उपधारा (2) के खंड (ii), (iii), (iv) और (v) 96[और उपधारा (5)] के, धारा 41 की उपधारा (3) के तथा धारा 43 के खंड (1) के स्पष्टीकरण 1 के उपबंध किसी ऐसी आस्ति के संबंध में, जो परिवार नियोजन को प्रोत्साहित करने के प्रयोजनों के लिए पूंजीगत प्रकार के व्यय के रूप की है, जहां तक संभव हो, उस प्रकार लागू होंगे जैसे उस आस्ति के संबंध में व्यय को लागू होते हैं जो वैज्ञानिक अनुसंधान पर पूंजीगत प्रकार की है;]

(x) 97-99[ * * *]

1[(xi) निर्धारिती द्वारा 1 अप्रैल, 1999 को या उसके पश्चात्, किंतु 1 अप्रैल, 2000 से पूर्व उपगत कोर्इ व्यय, जो पूर्णत: और अनन्यत: निर्धारिती के स्वामित्वाधीन और कारबार या वृत्ति के प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त, गैर-Y2K कम्पलायंट कम्प्यूटर सिस्टम की बाबत किया गया हो, जिससे कि ऐसे कम्प्यूटर सिस्टम को Y2K कम्प्लायंट कम्प्यूटर सिस्टम बनाया जा सके :

परन्तु ऐसी कोर्इ कटौती इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध के अधीन ऐसे व्यय की बाबत अनुज्ञात नहीं की जाएगी :

परन्तु यह और कि ऐसी कोर्इ कटौती तब तक स्वीकार्य नहीं होगी जब तक कि निर्धारिती आय-कर विवरणी के साथ-साथ विहित फार्म2 में लेखापाल की रिपोर्ट न दे दे जैसा कि धारा 288 की उपधारा (2) के नीचे के स्पष्टीकरण में परिभाषित है, जिसमें यह प्रमाणित हो कि कटौती का इस खंड के उपबंधों के अनुसार सही दावा किया गया है।

स्पष्टीकरण.—इस खंड के प्रयोजनों के लिए,—

(क) ''कम्प्यूटर सिस्टम'' से युक्ति या युक्ति संग्रह अभिप्रेत है जिसमें इनपुट और आउटपुट समर्थन युक्तियां भी शामिल हैं और केलकुलेटर शामिल नहीं हैं जिनका प्रोग्राम नहीं बनाया जा सकता और जो बाहरी फाइलों के योग में प्रयुक्त नहीं किया जा सकता, या जिनमें से ज्यादातर में कम्प्यूटर प्रोग्राम, इलैक्ट्रानिक हिदायतें, इनपुट आंकड़े और आउटपुट आंकड़े होते हैं जो ऐसे कार्य करते हैं जिनमें तर्क, गणित, डाटा स्टोरेज और पुन: स्थापन, संचार और नियंत्रण भी शामिल हैं किंतु उन्हीं तक सीमित नहीं है;

(ख) ''Y2K कम्प्लायंट कम्प्यूटर सिस्टम'' से ऐसा कम्प्यूटर सिस्टम अभिप्रेत है जो बीसवीं और इक्कीसवीं शताब्दी के भीतर और उनके बीच अद्यतन आंकड़े ठीक से प्रोसेस, प्रोवाइड या ग्रहण कर सकता है;]

3[(xii) ऐसे किसी निगम या निगमित निकाय द्वारा, चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो, उपगत कोर्इ व्यय (जो पूंजीगत व्यय की प्रकृति का नहीं है), यदि,–

(क) उसे किसी केंद्रीय, राज्य या प्रान्तीय अधिनियम द्वारा गठित या स्थापित किया जाता है;

(ख) ऐसा निगम या निगमित निकाय, जिसे उपखंड (क) में निर्दिष्ट अधिनियम के उद्देश्यों और प्रयोजनों को ध्यान में रखते हुए, केंद्रीय सरकार द्वारा इस खंड के प्रयोजनों के लिए राजपत्र में अधिसूचित4 किया जाता है; और

(ग) वह व्यय उस अधिनियम द्वारा, जिसके अधीन वह गठित या स्थापित किया जाता है, प्राधिकृत उद्देश्यों और प्रयोजनों के लिए उपगत किया जाता है;]

5[(xiii) बैंककारी नकद संव्यवहार कर की ऐसी कोर्इ रकम जो निर्धारिती द्वारा पूर्ववर्ष के दौरान उसके द्वारा किए गए कराधेय बैंककारी संव्यवहारों पर संदत्त की गर्इ है।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए, "बैंककारी नकद संव्यवहार कर" और "कराधेय बैंककारी संव्यवहार" पदों के वही अर्थ होंगे, जो वित्त अधिनियम, 2005 के अध्याय 7 में क्रमश: उनके हैं;]

5क[(xiv) किसी लोक वित्तीय संस्था द्वारा लघु उद्योगों के लिए ऐसे प्रत्यय (क्रेडिट) प्रत्याभूति निधि न्यास को, जो केंद्रीय सरकार द्वारा राजपत्र5ख में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट किया जाए, अभिदाय के रूप में संदत्त कोर्इ रकम।

स्पष्टीकरण–इस खंड के प्रयोजनों के लिए, "लोक वित्तीय संस्था" का वही अर्थ है जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 4 क5ग में है;]

5घ[(xv) निर्धारिती द्वारा पूर्ववर्ष के दौरान अपने कारबार के अनुक्रम में किए गए कराधेय प्रतिभूति संव्यवहारों की बाबत संदत्त प्रतिभूति संव्यवहार कर के बराबर रकम, यदि ऐसे कराधेय प्रतिभूति संव्यवहारों से होने वाली आय ''कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ'' शीर्ष के अधीन संगणित आय में सम्मिलित की गर्इ है।

स्पष्टीकरण - इस खंड के प्रयोजनों के लिए, ''प्रतिभूति संव्यवहार कर'' और ''कराधेय प्रतिभूति संव्यवहार'' पदों के वही अर्थ होंगे जो वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2004 (2004 का 23) के अध्याय 7 के अधीन क्रमश: उनके हैं ।]

(xvi) 5ड़[ * * *]]

वित्त अधिनियम, 2013 द्वारा 1.4.2014 से धारा 36 की उपधारा (1) के खंड (xv) के पश्चात् निम्नलिखित खंड (xvi) अंत:स्थापित किया जाएगा :

(xvi) निर्धारिती द्वारा पूर्ववर्ष के दौरान अपने कारबार के दौरान किए गए कराधेय वस्तु संव्यवहारों के संबंध में संदत्त वस्तु संव्यवहार कर के बराबर रकम, यदि ऐसे कराधेय वस्तु संव्यवहारों से उद्भूत आय को "कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ" शीर्ष के अधीन संगणित आय में सम्मिलित किया जाता है।

स्पष्टीकरण--इस खंड के प्रयोजनों के लिए, "वस्तु संव्यवहार कर" और "कराधेय वस्तु संव्यवहार" पदों का वही अर्थ होगा जो वित्त अधिनियम, 2013 के अध्याय 7 में क्रमश: उनका है।

6(2) किसी डूबंत ऋण या उसके किसी भाग के लिए कटौती करने में, निम्नलिखित उपबंध लागू होंगे—

7[(i) कोर्इ भी ऐसी कटौती तब के सिवाय अनुज्ञात नहीं की जाएगी जब ऐसा ऋण या उसका कोर्इ भाग निर्धारिती की ऐसे पूर्ववर्ष की, जिसमें ऐसा ऋण या उसका भाग अपलिखित कर दिया जाता है या किसी पूर्वतर पूर्ववर्ष की आय की संगणना करने में हिसाब में ले लिया गया है, अथवा बैंककारी या साहूकारी के ऐसे कारबार के मामूली अनुक्रम में, जो निर्धारिती द्वारा चलाया जाता है, उधार दिए गए धन के रूप में है;]

(ii) यदि कोर्इ रकम जो ऐसे किसी ऋण या ऋण के भाग की बाबत अंतत: वसूल की गर्इ है, जब ऋण या उसके भाग और इस प्रकार की कटौती की गर्इ रकम के अंतर से कम है, तो ऐसी कमी उस पूर्ववर्ष में कटौती योग्य होगी जिसमें वह अंतत: वसूली की जाती है;

(iii) ऐसी किसी ऋण या भाग की कटौती तब की जा सकेगी जब उसको किसी पूर्वतर पूर्ववर्ष 8[(जो 1 अप्रैल, 1988 को प्रारम्भ होने वाले निर्धारण वर्ष या किसी पूर्वतर निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष है)] के लेखाओं में अवसूलनीय रकम के रूप में पहले ही अपलिखित कर दिया गया है, किन्तु 9[निर्धारण] अधिकारी ने उसकी कटौती इस आधार पर अनुज्ञात नहीं की थी कि यह सिद्ध नहीं किया गया कि उस वर्ष में वह डूबंत ऋण हो गया था;

(iv) जहां ऐसा कोर्इ ऋण या ऋण का भाग उस पूर्ववर्ष के 10[(जो 1अप्रैल, 1988 को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष या किसी पूर्वतर निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष है)] लेखाओं में अवसूलीय रकम के रूप में अपलिखित कर दिया जाता है और 11[निर्धारण] अधिकारी का समाधान हो जाता है कि ऐसा ऋण या उसका भाग किसी ऐसे पूर्वतर पूर्ववर्ष में डूबंत ऋण हो गया था जो उस पूर्ववर्ष से जिसमें ऐसा ऋण या उसका भाग अपलिखित कर दिया जाता है ठीक पहले के चार पूर्ववर्षों की कालावधि के बाहर नहीं पड़ता है, वहां धारा 155 की उपधारा (6) के उपबंध लागू होंगे;

12[(v) जहां ऐसा ऋण या उसका भाग ऐसे किसी निर्धारिती द्वारा, जिसको उपधारा (1) का खंड (viiक) लागू होता है, दिए गए अग्रिमों के संबंध में है वहां ऐसी कटौती तब तक अनुज्ञात नहीं की जाएगी जब तक कि निर्धारिती ने ऐसे ऋण या उसके भाग की रकम को पूर्ववर्ष में उस खंड के अधीन डूबंत और शंकास्पद ऋण लेखा के लिए की गर्इ व्यवस्था में डेबिट न कर दिया हो।]

 

29. देखिए परिपत्र संख्या 4-पी(LVIII-30), तारीख 25.11.1965, परिपत्र संख्या 44(3)-आर्इ.टी./49, तारीख 12.2.1949, परिपत्र संख्या 110, तारीख 13.4.1973, पत्र [एफ. सं. 44/13/64-आर्इ.टी.जे.], तारीख 6.9.1964, पत्र [एफ.सं. 216/6/77-आर्इ.टी.(ए-II)], तारीख 7.6.1978, परिपत्र संख्या 403, तारीख 5.12.1984, परिपत्र संख्या 30(XLVII-18), तारीख 30.11.1964, परिपत्र संख्या 14, तारीख 23.4.1969, तारीख 5.11.1966 को हुर्इ डी.टी.ए.सी. की नवीं बैठक के कार्यवृत्त (मद संख्या 31) से उद्धरण, आय-कर आयुक्त बनाम कारपोरेशन बैंक लिमिटेड [1986] 157 आर्इ.टी.आर. 509 (कर्ना.) से उद्धृत परिपत्र तारीख 6.10.1952, परिपत्र संख्या 20, तारीख 13.6.1969, अनुदेश संख्या 370 [एफ.सं. 205/15/71-आर्इ.टी.(ए-II)], तारीख 13.1.1972 और पत्र [एफ. सं. 10/66/61-आर्इ.टी.(ए-I)], तारीख 16.1.1962 से उद्धरण।

29क. सुसंगत केस लॉज़ देखिए।

30. ''नुकसान'', ''विनाश'' और ''स्टॉक या स्टोर'' पदों के अर्थ के लिए सम्बंधित केस लाज़ देखिए।

31. वित्त अधिनियम, 1979 द्वारा 1.4.1980 से अंत:स्थापित।

32. वित्त अधिनियम, 2006 द्वारा 1.4.2007 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व, आय-कर (संशोधन) अधिनियम, 1986 द्वारा 1.4.1987 से यथा अंत:स्थापित खंड (iख) इस प्रकार था :

"(iख) निर्धारिती द्वारा नियोजक के रूप में, साधारण बीमा कारबार (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1972 (1972 का 57) की धारा 9 के अधीन बनाए गए भारतीय साधारण बीमा निगम द्वारा इस निमित्त बनार्इ गर्इ और केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित स्कीम के अधीन अपने कर्मचारियों के स्वास्थ्य का बीमा कराने या उसे प्रवृत्त रखने के लिए चैक द्वारा दी गर्इ प्रीमियम की रकम;"

33. वित्त अधिनियम, 2007 द्वारा 1.4.2008 से "चैक द्वारा दी गर्इ" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।

34. सुसंगत केस लॉज़ देखिए।

35. ''कमीशन'' पद के अर्थ के लिए सम्बंधित केस लाज़ देखिए।

35क. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से प्रथम परन्तुक का लोप किया गया। लोप से पूर्व प्रथम परन्तुक बोनस संदाय (संशोधन) अधिनियम, 1976 द्वारा 25.9.1975 से भूतलक्षी प्रभाव से अंत:स्थापित किया गया था।

35ख. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से दूसरे परन्तुक का लोप किया गया। लोप से पूर्व दूसरा परन्तुक बोनस संदाय (संशोधन) अधिनियम, 1976 द्वारा 25.9.1975 से भूतलक्षी प्रभाव से प्रतिस्थापित किया गया था।

35ग. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1980 द्वारा 1.4.1981 से अंत:स्थापित और बाद में वित्त अधिनियम, 1984 द्वारा 1.4.1984 से और प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से संशोधित खंड (iiक) लोप से पहले निम्न प्रकार था :—

'(iiक) किसी कर्मचारी को 1 मार्च, 1984 से पूर्व नियोजन की किसी अवधि के लिए वेतन के संदाय पर उपगत व्यय की रकम के 11/3 गुणा के बराबर राशि, जहां वह कर्मचारी पूर्ववर्ष के अंत में–

(क) पूर्णत: अंधा है, अथवा

(ख) (अंधेपन से भिन्न) ऐसी स्थायी शारीरिक नि:शक्तता से ग्रस्त है या उससे पीड़ित है जिसका प्रभाव यह है कि अभिलाभ पूर्ण नियोजन या उपजीविका में लगने का उसका सामथ्र्य प्रर्याप्त रूप से घट गया है :

परन्तु यह तब जबकि ऐसा निर्धारिती उस प्रथम निर्धारण वर्ष के संबंध में, जिसके लिए इस खंड के अधीन ऐसे प्रत्येक कर्मचारी के संबंध में कटौती का दावा किया जाता है, निर्धारण प्राधिकारी के समक्ष निम्नलिखित प्रमाणपत्र पेश करता है :—

(i) उपखंड (क) में विनिर्दिष्ट दशा में, किसी रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी से, जो नेत्ररोग विशेषज्ञ है, अपने पूर्ण अंधेपन का प्रमाणपत्र, तथा

(ii) उपखंड (ख) में निर्दिष्ट दशा में, किसी रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी से उस उपखण्ड मंथ निर्दिष्ट स्थायी शारीरिक नि:शक्तता का प्रमाणपत्र :

परन्तु यह और कि इस खंड में अंतर्विष्ट कोर्इ बात ऐसे कर्मचारी की दशा में लागू नहीं होगी जिसकी पूर्ववर्ष में ''वेतन'' शीर्ष के अधीन प्रभार्य आय बीस हजार रुपये से अधिक है।

स्पष्टीकरण 1.–इस खंड में ''वेतन'' के अंतर्गत संबलम्, भत्ते, बोनस या मासिक रूप से अन्यथा संदेय कमीशन है।

स्पष्टीकरण 2.–शंकाओं का निराकरण करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि जहां इस खंड के अधीन कोर्इ कटौती किसी भी व्यय की बाबत किसी निर्धारण वर्ष में अनुज्ञात की जाती है वहां उसी या किसी अन्य निर्धारण वर्ष के लिए ऐसे व्यय की बाबत कोर्इ कटौती इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध के अधीन अनुज्ञात नहीं की जाएगी;'

36. सुसंगत केस लॉज़ देखिये।

37. "कारबार के प्रयोजनों के लिये", ''ब्याज'' और ''पूंजी'' पदों के अर्थ के लिए सम्बंधित केस लाज़ देखिये।

38. वित्त अधिनियम, 2003 द्वारा 1.4.2004 से अंत:स्थापित।

39. वित्त अधिनियम, 2005 द्वारा 1.4.2006 से अंत:स्थापित।

39क. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2009 द्वारा भूतलक्षी प्रभाव से 1.4.2009 से अंत:स्थापित।

40. वित्त अधिनियम, 2006 द्वारा 1.4.2006 से लोप किया गया। लोप किए जाने से पूर्व खंड (iii) इस प्रकार था :

'(iii) "अवसंरचनात्मक पूंजी कंपनी" या "अवसंरचनात्मक पूंजी निधि" के वही अर्थ होंगे, जो धारा 10 के खंड (23छ) के स्पष्टीकरण 1 के खंड (क) और खंड (ख) में क्रमश: उनके हैं ;'

41. सुसंगत केस लॉज़ देखिये।

42. नियम 75, 87 और 88 देखिये.

43. ''संदत्त कोर्इ राशि'' पद के अर्थ के लिए सम्बंधित केस लाज़ देखिये।

44. बोर्ड द्वारा विनिर्दिष्ट शर्तों के लिए सम्बंधित केस लाज़ देखिये।

44क.. वित्त अधिनियम, 2011 द्वारा 1.4.2012 से अंत:स्थापित।

45. नियम 103 और 104 देखिये।

46. सुसंगत केस लॉज़ देखिये।

47. ''संदत्त कोर्इ राशि'' पद के अर्थ के लिए सम्बंधित केस लाज़ देखिये।

48. वित्त अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से अंत:स्थापित।

49. सुसंगत केस लॉज़ देखिये।

50. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से ''किसी ऐसे ऋण की रकम या उसका भाग जो पूर्ववर्ष में डूबंत ऋण साबित हो गया है,'' शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।

51. 'डूबंत' पद के अर्थ के लिए सम्बंधित केस लाज़ देखिये।

52. वित्त अधिनियम, 1985 द्वारा 1.4.1985 से अंत:स्थापित।

53. वित्त अधिनियम, 1997 द्वारा 1.4.1992 से भूतलक्षी प्रभाव से 'बैंक' शब्द के स्थान पर प्रतिस्थापित।

54. वित्त अधिनियम, 2001 द्वारा 1.4.1989 से भूतलक्षी प्रभाव से अंत:स्थापित।

54क.. वित्त अधिनियम, 2013 द्वारा 1.4.2014 से स्पष्टीकरण को स्पष्टीकरण 1 के रूप में पुन:संख्यांकित किया जाएगा।

55. वित्त अधिनियम, 1979 द्वारा 1.4.1980 से अंत:स्थापित।

56. आय-कर (संशोधन) अधिनियम, 1986 द्वारा 1.4.1987 से प्रतिस्थापित। इससे पूर्व, खण्ड (viiक) का उपरोक्त आरम्भिक पैरा वित्त अधिनियम, 1985 द्वारा 1.4.1985 से प्रतिस्थापित किया गया था। इसे वित्त अधिनियम, 1982 द्वारा 1.4.1983 से संशोधित भी किया गया था।

57. नियम 6कखक में यह उपबंध है कि अनुसूचित बैंक की ग्रामीण शाखाओं द्वारा दिए गए कुल औसत अग्रिम निम्नलिखित रीति से संगणित किए जाएंगे :–

(क) पूर्ववर्ष में आए प्रत्येक मास के अंतिम दिन के अंत में बकाया प्रत्येक ग्रामीण शाखा द्वारा दी गर्इ अग्रिम राशियों का योग अलग-अलग किया जाएगा;

(ख) ऐसी प्रत्येक शाखा की दशा में इस प्रकार निकाली गर्इ राशि उन महीनों की संख्या से विभाजित की जाएगी जिनके लिए बकाया अग्रिमों को खंड (क) के प्रयोजनों के लिए हिसाब में लिया गया है;

(ग) प्रत्येक ग्रामीण शाखा की बाबत इस प्रकार निकाली गर्इ राशियों का योग अनुसूचित बैंक की ग्रामीण शाखाओं द्वारा दिया गया सकल औसत अग्रिम धन होगा।

58. वित्त अधिनियम, 1994 द्वारा 1.4.1995 से ''खंड (viiiक) के प्रयोजनों के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित बैंक या'' का लोप किया गया।

59. वित्त अधिनियम, 2007 द्वारा 1.4.2007 से अंत:स्थापित।

60. वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.4.2003 से "पांच प्रतिशत से अनधिक" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

61. वित्त अधिनियम, 1994 द्वारा 1.4.1995 से ''चार'' के स्थान पर प्रतिस्थापित। इससे पहले वित्त अधिनियम, 1993 द्वारा 1.4.1994 से "दो" के स्थान पर ''चार'' रखा गया था।

62. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.4.2000 से अंत:स्थापित।

63. वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.4.2003 से अंत: स्थापित।

64. वित्त अधिनियम, 2003 द्वारा 1.4.2004 से अंत:स्थापित।

65. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.4.2000 से अंत:स्थापित।

66. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.4.1992 से अंत:स्थापित।

67. वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.4.2003 से अंत:स्थापित।

68. वित्त अधिनियम, 1982 द्वारा 1.4.1983 से अंत:स्थापित।

69. बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 5 (ग) में 'बैंककारी कंपनी' पद की परिभाषा इस प्रकार दी गर्इ है:

'(ग) "बैंककारी कम्पनी" से कोर्इ कम्पनी अभिप्रेत है जो भारत में बैंककारी कारबार करती है।

स्पष्टीकरण.–कोर्इ कंपनी जो माल विनिर्माण में लगी हुर्इ है या कोर्इ व्यापार करती है और जो ऐसे विनिर्माता या व्यापारी के रूप में अपने कारबार के वित्त पोषण के लिए ही जनता से धन निक्षेप स्वीकार करती है, इस खंड के अर्थ में बैंककारी कारबार करने वाली नहीं समझी जाएगी;'

70. वित्त अधिनियम, 1982 द्वारा 1.4.1983 से पुन:संख्यांकित।

71. यथोक्त द्वारा अंत:स्थापित।

72. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व यह वित्त अधिनियम, 1985 द्वारा 1.4.1985 से यथासंशोधित किया गया था।

73. वित्त अधिनियम, 2007 द्वारा 1.4.2007 से ", किन्तु इसके अंतर्गत कोर्इ सहकारी बैंक नहीं है" शब्दों का लोप किया गया।

74. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.4.1992 से अंत:स्थापित।

75. कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 4 क के पाठ के लिए और उसके अधीन अधिसूचित संस्थाओं के लिए देखिये परिशिष्ट।

76. ''सरकारी कंपनी'' की परिभाषा के लिए देखिये पृष्ठ 1.28 पर पाद-टिप्पण 64.

77. वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा 1.4.2000 से ''इस उपधारा के खंड (viii) के अधीन केंद्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित है'' के स्थान पर प्रतिस्थापित।

78. वित्त अधिनियम, 2007 द्वारा 1.4.2007 से अंत:स्थापित।

79. वित्त अधिनियम, 2007 द्वारा 1.4.2008 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व, वित्त अधिनियम, 1966 द्वारा 1.4.1966 से, वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1967 द्वारा 1.4.1968 से, वित्त अधिनियम, 1970 द्वारा 1.4.1966 से भूतलक्षी प्रभाव से, वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1971 द्वारा 1.4.1972 से, वित्त अधिनियम, 1974 द्वारा 1.4.1975 से, वित्त अधिनियम, 1979 द्वारा 1.4.1980 से, वित्त अधिनियम, 1981 द्वारा 1.4.1982 से, वित्त अधिनियम, 1985 द्वारा 1.4.1985 से, वित्त (सं.2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.4.1987 से भूतलक्षी प्रभाव से, वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1987 से भूतलक्षी प्रभाव से, वित्त अधिनियम, 1995 द्वारा 1.4.1996 से, वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1996 द्वारा 1.4.1996 से भूतलक्षी प्रभाव से/1.4.1997 से, वित्त अधिनियम, 1997 द्वारा 1.4.1998 से वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.4.2000 से तथा वित्त अधिनियम, 2006 द्वारा 1.4.2007 से यथासंशोधित खंड (viii) इस प्रकार था :

'(viii) किसी वित्तीय निगम द्वारा जो भारत में औद्योगिक या कृषि विकास के लिए दीर्घकालिक वित्त की उपलब्धि कराने में लगी हुर्इ है या भारत में बनार्इ गर्इ और रजिस्ट्रीकृत किसी ऐसी पब्लिक कम्पनी द्वारा जिसका मुख्य उद्देश्य भारत में आवासिक प्रयोजनों के लिए गृहों के निर्माण या क्रय के लिए दीर्घकालिक वित्त उपलब्ध कराने का कारबार करना है, सृष्ट और बनाए रखे गए किसी विशेष रिजर्व की बाबत कोर्इ रकम जो उस रिजर्व खाते में अग्रनीत दीर्घकालीन वित्त उपलब्ध कराने के ऐसे कारबार से व्युत्पé लाभों के (इस खंड के अधीन कोर्इ कटौती करने से पूर्व) "कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ" शीर्ष के अधीन संगणित चालीस प्रतिशत से अधिक नहीं है:

परन्तु यह कि जहां उन रकमों का योग, जो ऐसे रिजर्व खाते में समय-समय पर अग्रनीत की जाती रही हों, यथास्थिति, निगम या कंपनी की समादत्त शेयर पूंजी और साधारण रिजर्व की रकम के दो गुने से अधिक है वहां ऐसे आधिक्य की बाबत इस खंड के अधीन कोर्इ मोक नहीं दिया जाएगा।

स्पष्टीकरण.–इस खंड में,—

(क) ''वित्तीय निगम'' के अंतर्गत पब्लिक कंपनी और सरकारी कंपनी है;

(ख) ''पब्लिक कंपनी'' का वही अर्थ है जो उसका कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 3 में है;

(ग) ''सरकारी कंपनी'' का वही अर्थ है जो उसका कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 में है,

(घ) "अवसंरचनात्मक सुविधा" से निम्नलिखित अभिप्रेत है,–

(i) धारा 80 झक की उपधारा (4) के खंड (i) के स्पष्टीकरण में यथापरिभाषित अवसंरचनात्मक सुविधा या उसी प्रकृति की कोर्इ अन्य लोक सुविधा, जो बोर्ड द्वारा इस निमित्त राजपत्र में अधिसूचित की जाए और जो उन शर्तों को पूरा करती है, जो विहित की जाएं;

(ii) धारा 80 झक की उपधारा (4) के खंड (ii) या खंड (iii) या खंड (iv) में निर्दिष्ट कोर्इ उपक्रम; और

(iii) धारा 80 झख की उपधारा (10) में निर्दिष्ट कोर्इ उपक्रम;

(ड़) ''दीर्घकालिक वित्त'' से कोर्इ उधार या अग्रिम अभिप्रेत है जहां वे शर्तें जिनके अधीन धन उधार या अग्रिम दिया जाता है पांच वर्ष से अन्यून अवधि के दौरान ब्याज सहित धन वापस लौटाने का उपबंध करती हैं;'

80. कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 4 क के पाठ के लिए परिशिष्ट देखिए।

80क. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2009 द्वारा 1.4.2010 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व उपखंड (i) इस प्रकार था:

"(i) खंड (क) के उपखंड (i) या उपखंड (ii) या उपखंड (iii) या उपखंड (iv) में निर्दिष्ट विनिर्दिष्ट इकार्इ के संबंध में भारत में औद्योगिक या कृषि विकास या अवसंरचनात्मक सुविधा के विकास या आवास के प्रयोजनों के लिए भारत में मकानों के सन्निर्माण या क्रय के लिए दीर्घकालिक वित्त उपलब्ध कराने का कारबार;"

81. ''पब्लिक कंपनी'' की परिभाषा के लिए परिशिष्ट देखिए।

82. अधिसूचित वित्तीय संस्थानों के लिए सम्बंधित अधिसूचना देखिए।

83. नियम 6कखकक देखिए।

84-94. वित्त अधिनियम, 1994 द्वारा 1.4.1995 से लोप किया गया। लोप किए जाने से पहले वित्त अधिनियम, 1982 द्वारा 1.4.1983 से अंत:स्थापित और बाद में वित्त अधिनियम, 1985 द्वारा 1.4.1985 से संशोधित खंड (viiiक) निम्न प्रकार था :

'(viiiक) किसी अनुसूचित बैंक द्वारा (भारत के बाहर किसी देश की विधियों द्वारा या उनके अधीन निगमित बैंक से भिन्न) जो भारत के बाहर बैंककारी संक्रियाओं में लगा है, सृजित किसी विशेष आरक्षिती की बाबत ऐसे आरक्षित खाते में अग्रनीत कुल रकम (इस खंड और अध्याय 6क के अधीन कोर्इ कटौती किए जाने से पूर्व संगणित) के चालीस प्रतिशत से अनधिक राशि :

परन्तु यह कि इसकी पूंजीगत संरचना भारत से बाहर उसकी बैंककारी संक्रियाओं की सीमा, भारत के बाहर ऐसी संक्रियाओं के लिए संसाधनों की उसकी जरूरत और अन्य सुसंगत तथ्यों को ध्यान में रखते हुए बैंक इस खंड के प्रयोजनों के लिए केंद्रीय सरकार द्वारा तत्समय अनुमोदित हो।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए, ''अनुसूचित बैंक'' का वही अर्थ है जो उसका खंड (viiक) के स्पष्टीकरण के खंड (ii) में है;'

95. वित्त अधिनियम, 1965 द्वारा 1.4.1965 से अंत:स्थापित।

96. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1967 द्वारा 1.4.1967 से अंत:स्थापित।

97-99. वित्त अधिनियम, 2007 द्वारा 1.4.2008 से खंड (x) को लोप किया गया। लोप किए जाने से पूर्व, वित्त अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से यथा अंत:स्थापित तथा वित्त अधिनियम, 2003 द्वारा 1.4.2003 से संशोधित खंड (x) इस प्रकार था :

"(x) लोक वित्तीय संस्थाओं द्वारा संयुक्त रूप से या पृथक् रूप से स्थापित कोर्इ विनिमय जोखिम प्रशासन निधि मद्दे अभिदाय के रूप में किसी लोक वित्तीय संस्था द्वारा दी गर्इ कोर्इ राशि।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए ''लोक वित्तीय संस्था'' का वही अर्थ है जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 4 क है;"

1. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.4.2000 से अंत:स्थापित।

2. नियम 6कखख और प्ररूप सं. 3खक देखिये।

3. वित्त अधिनियम, 2007 द्वारा 1.4.2008 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व वित्त अधिनियम, 2003 द्वारा 1.4.2002 से भूतलक्षी प्रभाव से अंत:स्थापित खंड (xii) इस प्रकार था:

"(xii) कोर्इ ऐसा व्यय (जो पूंजीगत व्यय की प्रकृति का नहीं है), जो किसी निगम या किसी निगमित निकाय द्वारा, चाहे वह जिस नाम से ज्ञात हो, किसी केंद्रीय, राज्य या प्रान्तीय अधिनियम द्वारा, उस अधिनियम द्वारा प्राधिकृत ऐसे उद्देश्यों और प्रयोजनों के लिए गठित या स्थापित किया गया है, जिसके अधीन ऐसा निगम या निगमित निकाय गठित या स्थापित किया गया था, उपगत किया गया है।"

4. अधिसूचित निगम या निगमित निकाय के लिए सम्बंधित अधिसूचना देखिए।

5. वित्त अधिनियम, 2005 द्वारा 1.4.2006 से अंत:स्थापित।

5क. वित्त अधिनियम, 2007 द्वारा 1.4.2008 से अंत:स्थापित।

5ख. अधिसूचित प्रत्यय (क्रेडिट) निधि न्यास के लिए सम्बंधित अधिसूचना देखिए।

5ग.. कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 4 क के पाठ के लिए परिशिष्ट देखिए।

5घ. वित्त अधिनियम, 2008 द्वारा 1.4.2009 से खंड (xv) और (xvi) अंत:स्थापित।

5ड़. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2009 द्वारा भूतलक्षी प्रभाव से 1.4.2009 से खंड (xvi) का लोप किया गया। लोप किए जाने के पूर्व खंड (xvi) इस प्रकार था:

"(xvi) निर्धारिती द्वारा पूर्ववर्ष के दौरान अपने कारबार के अनुक्रम में किए गए कराधेय वस्तु संव्यवहारों की बाबत संदत्त वस्तु संव्यवहार कर के बराबर रकम, यदि ऐसे कराधेय वस्तु संव्यवहारों से होने वाली आय ''कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ'' शीर्ष के अधीन संगणित आय में सम्मिलित की गर्इ है।

स्पष्टीकरण - इस खंड के प्रयोजनों के लिए, ''वस्तु संव्यवहार कर'' और ''कराधेय वस्तु संव्यवहार'' पदों के वही अर्थ होंगे जो वित्त अधिनियम, 2008 के अध्याय 7 के अधीन क्रमश: उनके हैं।"

6. सुसंगत केस लॉज़ देखिये।

7. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से प्रतिस्थापित।

8. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से अंत:स्थापित।

9. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से ''आय-कर'' के स्थान पर प्रतिस्थापित।

10. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से अंत:स्थापित।

11. यथोक्त द्वारा 1.4.1988 से ''आय-कर'' के स्थान पर प्रतिस्थापित।

12. वित्त अधिनियम, 1997 द्वारा 1.4.1992 से भूतलक्षी प्रभाव से प्रतिस्थापित। इसके प्रतिस्थापन से पूर्व वित्त अधिनियम, 1985 द्वारा 1.4.1985 से अंत:स्थापित खंड (v) निम्न प्रकार था:

''(v) जहां ऐसा ऋण या उसका भाग ऐसे बैंक द्वारा दिए गए अग्रिम धन से संबंधित है जिस पर उपधारा (1) का खंड (viiक) लागू होता है वहां ऐसी कोर्इ कटौती तब तक अनुज्ञात नहीं की जाएगी जब तक कि बैंक ने उस पूर्ववर्ष में ऐसे ऋण या उसके भाग की रकम को उस खंड के अधीन किए गए डूबंत और शंकास्पद ऋण लेखा के लिए की गर्इ व्यवस्था में डेबिट न कर दिया हो।''

 

 

[वित्त अधिनियम, 2013 द्वारा संशोधित रूप में]

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