आयकर विभाग

वित्त मंत्रालय, भारत सरकार

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धारा 27

"गृह संपत्ति का स्वामी", "वार्षिक प्रभार" आदि की परिभाषा

धारा

धारा संख्या

27

अध्याय शीर्षक

अध्याय IV - कुल आय की गणना

अधिनियम

आय-कर अधिनियम, 1961

वर्ष

2009

"गृह संपत्ति का स्वामी", "वार्षिक प्रभार" आदि की परिभाषा

"गृह संपत्ति का स्वामी", "वार्षिक प्रभार" आदि की परिभाषा

"गृह संपत्ति का स्वामी", "वार्षिक प्रभार" आदि की परिभाषा

727. धारा 22 से 26 तक के प्रयोजनों के लिए—

(i) कोर्इ व्यष्टि जो गृह संपत्ति का पर्याप्त प्रतिफल से अन्यथा अंतरण अपने पति या अपनी पत्नी को, जो अलग रहने के लिए करार के संबंध में अंतरण नहीं है, या अवयस्क संतान को, जो विवाहिता पुत्री नहीं है, करता है, ऐसी अंतरित गृह संपत्ति का स्वामी समझा जाएगा;

(ii) किसी अविभाज्य सम्पदा के धारक को उस संपदा में समाविष्ट सब संपत्तियों का व्यष्टिक स्वामी समझा जाएगा;

8[(iii) किसी सहकारी सोसाइटी, कंपनी या अन्य व्यक्ति-संगम का सदस्य जिसको, यथास्थिति उस सोसाइटी, कंपनी या संगम की गृह निर्माण स्कीम के अधीन कोर्इ भवन या उसका कोर्इ भाग आबंटित किया गया है या पट्टे पर दिया गया है, उस भवन का या उसके उस भाग का स्वामी समझा जाएगा;

(iiiक) कोर्इ व्यक्ति जिसको संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 (1882 का 4) की 9धारा 53क में निर्दिष्ट प्रकृति की संविदा के भागिक पालन में किसी भवन या उसके किसी भाग का कब्जा लेने या रखे रहने के लिए अनुज्ञात किया जाता है, उस भवन या उसके उस भाग का स्वामी समझा जाएगा;

(iiiख) कोर्इ व्यक्ति जो किसी भवन या उसके किसी भाग में या उसकी बाबत कोर्इ अधिकार (मास-दर-मास या एक वर्ष से अनधिक अवधि के लिए पट्टे के रूप में किन्हीं अधिकारों को अपवर्जित करते हुए) धारा 269पक के खंड () में निर्दिष्ट किसी ऐसे संव्यवहार के आधार पर अर्जित करता है, उस भवन या उसके उस भाग का स्वामी समझा जाएगा;

(iv) 10[***]

(v) 10[***]

(vi) किसी संपत्ति की बाबत किसी स्थानीय प्राधिकारी द्वारा उद्गृहीत करों के अंतर्गत उस संपत्ति की बाबत उस स्थानीय प्राधिकारी द्वारा उद्गृहीत सेवा कर भी समझे जाएंगे।

 

7. सुसंगत केस लॉज़ के लिए देखिये टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

8. वित्त अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 प्रतिस्थापित।

9. संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 53क के पाठ के लिए देखिये परिशिष्ट।

10. वित्त अधिनियम, 2001 द्वारा 1.4.2002 से खंड (iv) और (v) का लोप किया गया। लोप किए जाने से पूर्व खंड (iv) और (v) इस प्रकार थे :

'(iv) "वार्षिक प्रभार" से किसी वार्षिक दायित्व को प्रतिभूत करने के लिए कोर्इ प्रभार अभिप्रेत है किन्तु किसी स्थानीय प्राधिकारी या केन्द्रीय या राज्य सरकार द्वारा संपत्ति या संपत्ति से होने वाली आय की बाबत अधिरोपित कोर्इ कर उसके अंतर्गत नहीं है;

(v) "पूंजी प्रभार" से पूंजी की प्रकृति वाले किसी दायित्व का उन्मोचन प्रतिभूत करने के लिए प्रभार अभिप्रेत है;'

 

 

[वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2009 द्वारा संशोधित रूप में]

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