रिफंड पर ब्याज
36[प्रतिदायों पर ब्याज
37244क. (1) 38[जहां इस अधिनियम के अधीन किसी रकम का प्रतिदाय निर्धारिती को देय हो जाता है], वहां वह इस धारा के उपबंधों के अधीन रहते हुए, उक्त रकम के अतिरिक्त उस पर साधारण ब्याज प्राप्त करने का हकदार होगा जो निम्नलिखित रीति से संगणित किया जाएगा अर्थात् :--
(क) जहां प्रतिदाय निर्धारण वर्ष के ठीक पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष के दौरान 39[धारा 206ग के अधीन स्रोत पर संगृहीत या] अग्रिम कर के रूप में संदत्त या धारा 199 के अधीन संदत्त माने गए किस कर में से किया जाता हैं वहां ऐसा ब्याज, निर्धारण वर्ष के अप्रैल के प्रथम दिन से उस तारीख तक की जिसको प्रतिदाय मंजूर किया जाता है, अवधि में समाविष्ट प्रत्येक मास, या किसी मास के भाग के लिए 40[एक प्रतिशत] की दर से संगणित किया जाएगा :
परन्तु यदि प्रतिदाय की रकम 41[धारा 143 की उपधारा (1) के अधीन या] नियमित निर्धारण पर अवधारित कर के दस प्रतिशत से कम है तो कोर्इ ब्याज संदेय नहीं होगा;
(ख) किसी अन्य दशा में, ऐसा ब्याज, कर या शास्ति देने की, यथास्थिति तारीख या तारीखों से उस तारीख तक की जिसको प्रतिदाय मंजूर किया जाता है, अवधि या अवधियों में समाविष्ट प्रत्येक मास या मास के भाग के लिए 42[एक प्रतिशत] की दर से संगणित किया जाएगा।
स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए "कर या शास्ति के संदाय की तारीख" से अभिप्रेत है वह तारीख जिसको और जिससे धारा 156 के अधीन जारी की गर्इ मांग सूचना में विनिर्दिष्ट कर या शास्ति की रकम ऐसी मांग से अधिक अदा की जाती है।
(2) यदि ऐसी कार्यवाहियों में जिनका परिणाम प्रतिदाय है, विलंब, चाहे पूर्णत: या भागत: निर्धारिती के कारण हुआ माना जाता है। तो ऐसे विलम्ब की अवधि को, जिसे उसके कारण इस प्रकार हुआ माना जा सकता है, उस अवधि में से निकाल दिया जाएगा जिसके लिए ब्याज संदेय है, और जहां निकाली जाने वाली अवधि के बारे में कोर्इ प्रश्न उठता है, वहां उसका विनिश्चय मुख्य आयुक्त या आयुक्त द्वारा किया जाएगा और उस पर उसका विनिश्चय अंतिम होगा।
(3) जहां 43[धारा 143 की उपधारा (3) या धारा 144 या] धारा 147 या धारा 154 या धारा 155 या धारा 250 या धारा 254 या धारा 260 या धारा 262 या धारा 263 या धारा 264 के अधीन किसी आदेश के अथवा धारा 245घ की उपधारा (4) के अधीन समझौता आयोग के किसी आदेश के परिणामस्वरूप ऐसी रकम जिस पर उपधारा (1) के अधीन ब्याज संदेय था, यथास्थिति, बढ़ार्इ गर्इ है, या घटार्इ गर्इ है, वहां ब्याज तदनुसार बढ़ा दिया जाएगा या घटा दिया जाएगा और किसी ऐसी दशा में जहां ब्याज घटाया जाता है, वहां निर्धारण अधिकारी, अधिक दी गर्इ ब्याज की रकम को विनिर्दिष्ट करते हुए और ऐसी रकम देने की निर्धारिती से अपेक्षा करते हुए विहित प्ररूप में मांग सूचना की तामील उस पर करेगा और ऐसी मांग सूचना को, धारा 156 के अधीन सूचना समझा जाएगा और इस अधिनियम के उपबंध तदनुसार लागू होंगे।
(4) इस धारा के उपबंध 1 अप्रैल, 1989 को प्रारम्भ होने वाले निर्धारण वर्ष और पश्चात्वर्ती निर्धारण वर्षों के निर्धारणों की बाबत लागू होंगे।]
36. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से अन्त:स्थापित।
37. परिपत्र सं. 20 डी(XXII-22), तारीख 20.8.1968 भी देखिए। ब्यौरे के लिए, देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।
38. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से "जहां इस अधिनियम के अधीन पारित किसी आदेश के अनुसरण में किसी रकम का प्रतिदाय निर्धारिती को देय हो जाता है" के स्थान पर प्रतिस्थापित।
39. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से अंत:स्थापित।
40. "एक प्रतिशत" शब्द वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.10.1991 से "डेढ़ प्रतिशत" के स्थान पर रखे गए थे।
41. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से अंत:स्थापित।
42. "एक प्रतिशत" शब्द वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.10.1991 से "डेढ़ प्रतिशत" के स्थान पर रखे गऐ थे।
43. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से अंत:स्थापित।
[वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा संशोधित रूप में]

