आयकर विभाग

वित्त मंत्रालय, भारत सरकार

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धारा 220

कर कब देय होगा और निर्धारिती कब व्यतिक्रमी समझा जाएगा

धारा

धारा संख्या

220

अध्याय शीर्षक

अध्याय XVII - कर संग्रह और वसूली

अधिनियम

आय-कर अधिनियम, 1961

वर्ष

2023

कर कब देय होगा और निर्धारिती कब व्यतिक्रमी समझा जाएगा

कर कब देय होगा और निर्धारिती कब व्यतिक्रमी समझा जाएगा

घ–संग्रहण और वसूली

कर कब देय होगा और निर्धारिती कब व्यतिक्रमी समझा जाएगा

220. (1) अग्रिम कर से भिन्न प्रकार की कोर्इ रकम जो धारा 156 के अधीन मांग की सूचना में देय के रूप में विनिर्दिष्ट है, सूचना की तामील के तीस दिन के भीतर सूचना में वर्णित स्थान पर और व्यक्ति को भुगतान की जाएगी :

परन्तु जहां निर्धारण अधिकारी के पास यह विश्वास करने के लिए कोर्इ कारण है कि यदि पूर्वोक्त तीस दिन की पूरी अवधि दी जाती है तो वह राजस्व के लिए अहितकर होगी, वहां वह संयुक्त आयुक्त के पूर्व अनुमोदन से यह निदेश दे सकेगा कि मांग की सूचना में विनिर्दिष्ट राशि तीस दिन की पूर्वोक्त अवधि से कम ऐसी अवधि के भीतर भुगतान की जाएगी, जो मांग की सूचना में उसके द्वारा विनिर्दिष्ट की गर्इ हो।

(1क) जहां किसी मांग सूचना की किसी निर्धारिती पर तामील की गर्इ है और उक्त मांग सूचना में विनिर्दिष्ट रकम की बाबत, यथास्थिति, ऐसी कोर्इ अपील फाइल की जाती है या अन्य कार्यवाही आरंभ की जाती है, वहां ऐसी मांग को, यथास्थिति, अंतिम अपील प्राधिकारी द्वारा अपील का निपटारा किए जाने तक या कार्यवाहियों का निपटारा किए जाने तक विधिमान्य समझा जाएगा और ऐसी किसी मांग सूचना का, कराधान विधियां (वसूली की कार्यवाहियों का चालू रखा जाना और विधिमान्यकरण) अधिनियम, 1964 (1964 का 11) की धारा 3 में यथाविनिर्दिष्ट प्रभाव होगा।

(2) यदि धारा 156 के अधीन किसी सूचना में उल्लिखित रकम उपधारा (1) के अधीन परिसीमित अवधि के भीतर भुगतान नहीं की जाती है तो निर्धारिती उपधारा (1) में उल्लिखित कालावधि के अंत के ठीक पश्चात्वर्ती दिन से प्रारंभ होने वाली और उस दिन को, जिस दिन उस रकम का भुगतान किया जाता है, समाप्त होने वाली अवधि में समाविष्ट प्रत्येक मास या मास के किसी भाग के लिए एक प्रतिशत की दर से :

परन्तु यह कि जहां धारा 154 या धारा 155 या धारा 250 या धारा 254 या धारा 260 या धारा 262 या धारा 264 के अधीन दिए गए किसी आदेश या धारा 245घ की उपधारा (4) के अधीन समझौता आयोग के किसी आदेश के परिणामस्वरूप वह रकम जिस पर इस धारा के अधीन ब्याज संदेय था, कम कर दी गर्इ है, वहां ब्याज तदनुसार कम कर दिया जाएगा और दिया गया अधिक ब्याज, यदि कोर्इ हो, वापस कर दिया जाएगा :

परंतु यह और कि जहां पहले परंतुक में विनिर्दिष्ट धाराओं के अधीन किसी आदेश के परिणामस्वरूप उस रकम को, जिस पर इस धारा के अधीन ब्याज संदेय था, कम कर दिया गया था और तत्पश्चात्, उक्त धाराओं या धारा 263 के अधीन किसी आदेश के परिणामस्वरूप उस रकम को, जिस पर इस धारा के अधीन ब्याज संदेय था, बढ़ा दिया जाता है, वहां निर्धारिती, उपधारा (1) में निर्दिष्ट पहली मांग सूचना में वर्णित किसी अवधि के अंत से ठीक बाद के दिन से और उस दिन तक, जिसको रकम का संदाय किया जाता है, उपधारा (2) के अधीन ब्याज का संदाय करने के लिए दायी होगा:

परन्तुयह भी कि 31 मार्च, 1989 को या उसके पूर्व प्रारंभ होने वाली और उस तारीख के बाद समाप्त होने वाली किसी कालावधि के संबंध में ऐसा ब्याज, ऐसी अवधि के उतने भाग के संबंध में जो उस तारीख के पश्चात् पड़ता है, प्रत्येक मास या किसी मास के भाग के लिए डेढ़ प्रतिशत की दर से परिकलित किया जाएगा।

(2क) उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त उक्त उपधारा के अंतर्गत किसी निर्धारिती द्वारा संदत्त या देय ब्याज की रकम को घटा सकेगा या उसका अधित्यजन कर सकेगा यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि–

(i) ऐसी रकम के भुगतान से निर्धारिती को वास्तव में कठिनार्इ हुर्इ है या होगी;

(ii) ऐसी रकम के, जिस पर ब्याज उक्त धारा के अंतर्गत संदत्त किया गया है या संदेय था, भुगतान में चूक निर्धारिती के नियंत्रण के बाहर की परिस्थितियों के कारण हुआ था; और

(iii) निर्धारिती ने निर्धारण से या उससे शोध्य किसी रकम की वसूली के लिए किसी कार्यवाही से संबंधित किसी जांच में सहयोग किया है:

परंतु निर्धारिती के आवेदन को पूर्णत: या भागत: मंजूर या नामंजूर करने वाला आदेश उस मास के अंत से, जिसमें आवेदन प्राप्त हुआ है, बारह मास की अवधि के भीतर पारित किया जाएगा :

परंतु यह और कि आवेदन को पूर्णत: या भागत: नामंजूर करने वाला कोर्इ भी आदेश तब तक पारित नहीं किया जाएगा, जब तक निर्धारिती को सुनवार्इ का कोर्इ अवसर न दे दिया गया हो :

परंतु यह भी कि जहां कोर्इ आवेदन 1 जून, 2016 को लंबित है, वहां आदेश 31 मर्इ, 2017 को या उससे पहले पारित किया जाएगा ।

(2ख) उपधारा (2) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहां किसी अवधि के लिए, धारा 200क की उपधारा (1) के अधीन जारी की गर्इ सूचना में विनिर्दिष्ट कर की रकम पर धारा 201 की उपधारा (1क) के अधीन ब्याज प्रभारित किया जाता है, वहां उसी अवधि के लिए उसी रकम पर उपधारा (2) के अधीन कोर्इ ब्याज प्रभारित नहीं किया जाएगा।

(2ग) उपधारा (2) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहां धारा 206गख की उपधारा (1) के अधीन जारी की गर्इ संसूचना में विनिर्दिष्ट कर की रकम पर धारा 206ग की उपधारा (7) के अधीन ब्याज, किसी अवधि के लिए, प्रभारित किया जाता है, वहां उसी अवधि के लिए उसी रकम पर उपधारा (2) के अधीन कोर्इ ब्याज प्रभारित नहीं किया जाएगा।

(3) उपधारा (2) में अंतर्विष्ट उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उपधारा (1) के अंतर्गत देय होने की तारीख की समाप्ति के पूर्व निर्धारिती द्वारा आवेदन करने पर निर्धारण अधिकारी ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जैसी वह उस मामले की परिस्थितियों में अधिरोपित करना ठीक समझे, भुगतान का समय बढ़ा सकेगा या किस्तों द्वारा भुगतान अनुज्ञात कर सकेगा।

(4) यदि, वह रकम उक्त सूचना में वर्णित स्थान पर और व्यक्ति को, यथास्थिति, उपधारा (1) के अधीन सीमित किए गए या उपधारा (3) के अधीन बढ़ाए गए समय के भीतर संदत्त नहीं की जाती है तो निर्धारिती चूक करने वाला समझा जाएगा।

(5) यदि किसी मामले में, जिसमें उपधारा (3) के अधीन किस्तों द्वारा भुगतान अनुज्ञात है, निर्धारिती उस उपधारा के अंतर्गत नियत समय के भीतर किसी किस्त के भुगतान में चूक करता है, तो निर्धारिती उस समय परादेय संपूर्ण रकम के बारे में चूक करने वाला समझा जाएगा और अन्य किस्त या किस्तों के संबंध में यह समझा जाएगा कि वह या वे उसी तारीख को देय हो गर्इ थी जिसको वह किस्त, जिसके संबंध में वास्तव में चूक हुर्इ थी, देय थी।

(6) जहां निर्धारिती ने, धारा 246 या धारा 246क के अंतर्गत अपील पेश की है वहां, निर्धारण अधिकारी भुगतान के समय के समाप्त हो जाने पर भी, स्वविवेक में और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जैसी वह उस मामले की परिस्थितियों में अधिरोपित करना ठीक समझे, निर्धारिती को तब तक के लिए जब तक ऐसी अपील का निपटारा नहीं हो जाता है, अपील में विवादग्रस्त रकम के संबंध में चूक न करने वाला मान सकेगा।

(7) जहां निर्धारिती का ऐसी आय के संबंध में निर्धारण किया गया है, जो भारत के बाहर किसी ऐसे देश में उदभूत हुर्इ है, जिसकी विधियां भारत को धन भेजना प्रतिषिद्ध या निर्बंधित करती है वहां निर्धारण अधिकारी निर्धारिती को कर के उस भाग के संबंध में चूक करने वाला नहीं मानेगा जो उसकी आय की उस रकम के संबंध में देय है जो ऐसे प्रतिषेध या निर्बंधन के कारण भारत में नहीं लार्इ जा सकती है, और जब तक प्रतिषेध या निर्बंधन हटा नहीं दिया जाता, निर्धारिती को कर के ऐसे भाग के संबंध में चूक न करने वाला मानता रहेगा।

स्पष्टीकरण.–इस धारा के प्रयोजनों के लिए, आय के बारे में यह समझा जाएगा कि वह भारत में लार्इ गर्इ है यदि उस आय का उपयोग भारत के बाहर निर्धारिती द्वारा वास्तव में उपगत व्यय के प्रयोजनों के लिए किया गया है या किया जा सकता था, या यदि वह आय, भले ही वह पूंजीगत हो या न हो किसी रूप में भारत में लार्इ गर्इ है।

 

 

 

[वित्त अधिनियम, 2023 द्वारा संशोधित रूप में]

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