कर कब देय होगा और निर्धारिती कब व्यतिक्रमी समझा जाएगा
घ–संग्रहण और वसूली
कर कब देय होगा और निर्धारिती कब व्यतिक्रमी समझा जाएगा
30220. (1) अग्रिम कर से भिन्न प्रकार की कोर्इ रकम जो धारा 156 के अधीन मांग की सूचना में देय के रूप में विनिर्दिष्ट है, सूचना की तामील के 31[तीस] दिन के भीतर सूचना में वर्णित स्थान पर और व्यक्ति को भुगतान की जाएगी :
परन्तु जहां 32[निर्धारण] अधिकारी के पास यह विश्वास करने के लिए कोर्इ कारण है कि यदि पूर्वोक्त 33[तीस] दिन की पूरी अवधि दी जाती है तो वह राजस्व के लिए अहितकर होगी, वहां वह 34[संयुक्त आयुक्त] के पूर्व अनुमोदन से यह निदेश दे सकेगा कि मांग की सूचना में विनिर्दिष्ट राशि 35[तीस] दिन की पूर्वोक्त अवधि से कम ऐसी अवधि के भीतर भुगतान की जाएगी, जो मांग की सूचना में उसके द्वारा विनिर्दिष्ट की गर्इ हो।
36(2) यदि धारा 156 के अधीन किसी सूचना में उल्लिखित रकम उपधारा (1) के अधीन परिसीमित अवधि के भीतर भुगतान नहीं की जाती है तो 37[निर्धारिती उपधारा (1) में उल्लिखित कालावधि के अंत के ठीक पश्चात्वर्ती दिन से प्रारंभ होने वाली और उस दिन को, जिस दिन उस रकम का भुगतान किया जाता है, समाप्त होने वाली अवधि में समाविष्ट प्रत्येक मास या मास के किसी भाग के लिए 38[एक] प्रतिशत की दर से :]
39[परन्तु यह कि जहां धारा 154 या धारा 155 या धारा 250 या धारा 254 या धारा 260 या धारा 262 या धारा 264 के अधीन दिए गए किसी आदेश 40[या धारा 245घ की उपधारा (4) के अधीन समझौता आयोग के किसी आदेश] के परिणामस्वरूप वह रकम जिस पर इस धारा के अधीन ब्याज संदेय था, कम कर दी गर्इ है, वहां ब्याज तदनुसार कम कर दिया जाएगा और दिया गया अधिक ब्याज, यदि कोर्इ हो, वापस कर दिया जाएगा :]
41[परन्तु यह और कि 31 मार्च, 1989 को या उसके पूर्व प्रारंभ होने वाली और उस तारीख के बाद समाप्त होने वाली किसी कालावधि के संबंध में ऐसा ब्याज, ऐसी अवधि के उतने भाग के संबंध में जो उस तारीख के पश्चात् पड़ता है, प्रत्येक मास या किसी मास के भाग के लिए डेढ़ प्रतिशत की दर से परिकलित किया जाएगा।]
42[(2क) उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी 43[44[मुख्य आयुक्त या आयुक्त] उक्त उपधारा के अंतर्गत किसी निर्धारिती द्वारा 45[संदत्त या] देय ब्याज की रकम को घटा सकेगा या उसका अधित्यजन कर सकेगा] यदि 46[उसका यह समाधान हो जाता है] कि–
(i) ऐसी रकम के भुगतान से निर्धारिती को वास्तव में कठिनार्इ 47[हुर्इ है या] होगी;
(ii) ऐसी रकम के, जिस पर ब्याज उक्त धारा के अंतर्गत 47[संदत्त किया गया है या] संदेय था, भुगतान में चूक निर्धारिती के नियंत्रण के बाहर की परिस्थितियों के कारण हुआ था; और
(iii) निर्धारिती ने निर्धारण से या उससे शोध्य किसी रकम की वसूली के लिए किसी कार्यवाही से संबंधित किसी जांच में सहयोग किया है।]
(3) उपधारा (2) में अंतर्विष्ट उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना48, उपधारा (1) के अंतर्गत देय होने की तारीख की समाप्ति के पूर्व निर्धारिती द्वारा आवेदन करने पर 49[निर्धारण] अधिकारी ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जैसी वह उस मामले की परिस्थितियों में अधिरोपित करना ठीक समझे, भुगतान का समय बढ़ा सकेगा या किस्तों द्वारा भुगतान अनुज्ञात कर सकेगा।
(4) यदि, वह रकम उक्त सूचना में वर्णित स्थान पर और व्यक्ति को, यथास्थिति, उपधारा (1) के अधीन सीमित किए गए या उपधारा (3) के अधीन बढ़ाए गए समय के भीतर संदत्त नहीं की जाती है तो निर्धारिती चूक करने वाला समझा जाएगा।
(5) यदि किसी मामले में, जिसमें उपधारा (3) के अधीन किस्तों द्वारा भुगतान अनुज्ञात है, निर्धारिती उस उपधारा के अंतर्गत नियत समय के भीतर किसी किस्त के भुगतान में चूक करता है, तो निर्धारिती उस समय परादेय संपूर्ण रकम के बारे में चूक करने वाला समझा जाएगा और अन्य किस्त या किस्तों के संबंध में यह समझा जाएगा कि वह या वे उसी तारीख को देय हो गर्इ थी जिसको वह किस्त, जिसके संबंध में वास्तव में चूक हुर्इ थी, देय थी।
(6) जहां निर्धारिती ने, धारा 246 50[या धारा 246क] के अंतर्गत अपील पेश की है वहां, 49[निर्धारण] अधिकारी भुगतान के समय के समाप्त हो जाने पर भी, स्वविवेक में और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जैसी वह उस मामले की परिस्थितियों में अधिरोपित करना ठीक समझे, निर्धारिती को तब तक के लिए जब तक ऐसी अपील का निपटारा नहीं हो जाता है, अपील में विवादग्रस्त रकम के संबंध में चूक न करने वाला मान सकेगा।
(7) जहां निर्धारिती का ऐसी आय के संबंध में निर्धारण किया गया है, जो भारत के बाहर किसी ऐसे देश में उदभूत हुर्इ है, जिसकी विधियां भारत को धन भेजना प्रतिषिद्ध या निर्बंधित करती है वहां 51[निर्धारण] अधिकारी निर्धारिती को कर के उस भाग के संबंध में चूक करने वाला नहीं मानेगा जो उसकी आय की उस रकम के संबंध में देय है जो ऐसे प्रतिषेध या निर्बंधन के कारण भारत में नहीं लार्इ जा सकती है, और जब तक प्रतिषेध या निर्बंधन हटा नहीं दिया जाता, निर्धारिती को कर के ऐसे भाग के संबंध में चूक न करने वाला मानता रहेगा।
स्पष्टीकरण.–इस धारा के प्रयोजनों के लिए, आय के बारे में यह समझा जाएगा कि वह भारत में लार्इ गर्इ है यदि उस आय का उपयोग भारत के बाहर निर्धारिती द्वारा वास्तव में उपगत व्यय के प्रयोजनों के लिए किया गया है या किया जा सकता था, या यदि वह आय, भले ही वह पूंजीगत हो या न हो किसी रूप में भारत में लार्इ गर्इ है।
30. तारीख 3.4.1982 का परिपत्र सं. 334, तारीख 21.8.1969 का अनुदेश सं. 96 और तारीख 16.1.1991 के परिपत्र सं. 589 के साथ पठित तारीख 6.3.1989 का परिपत्र सं. 530 भी देखें। ब्यौरे के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।
31. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से ''पैंतीस'' के स्थान पर प्रतिस्थापित।
32. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से ''आय-कर'' के स्थान पर प्रतिस्थापित।
33. यथोक्त द्वारा 1.4.1989 से ''पैंतीस'' के स्थान पर प्रतिस्थापित।
34. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.10.1998 से ''उपायुक्त'' के स्थान पर प्रतिस्थापित। इससे पूर्व, ''उपायुक्त'' प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से ''सहायक आयुक्त (निरीक्षण)'' के स्थान पर प्रतिस्थापित किया गया था।
35. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से ''पैंतीस'' के स्थान पर प्रतिस्थापित।
36. नियम 119क देखिए।
37. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से ''उपधारा (1) में वर्णित कालावधि की समाप्ति के पश्चात् प्रारंभ होने वाले दिन से पंद्रह प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से'' के स्थान पर प्रतिस्थापित।
38. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 2003 द्वारा 8.9.2003 से ''सवा'' के स्थान पर प्रतिस्थापित। इससे पूर्व "सवा" शब्द वित्त अधिनियम, 2001 द्वारा 1.6.2001 से ''डेढ़'' के स्थान पर प्रतिस्थापित किया गया था।
39. वित्त अधिनियम, 1963 द्वारा 1.4.1962 से भूतलक्षी प्रभाव से अंत:स्थापित।
40. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से अंत:स्थापित।
41. यथोक्त द्वारा अंत:स्थापित।
42. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.10.1984 से अंत:स्थापित।
43. कराधान विधि (संशोधन और प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम, 1986 द्वारा 1.4.1987 से ''बोर्ड'' के स्थान पर प्रतिस्थापित।
44. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से ''आयुक्त'' के स्थान पर प्रतिस्थापित।
45. कराधान विधि (संशोधन और प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम, 1986 द्वारा 1.10.1984 से भूतलक्षी प्रभाव से अंत:स्थापित।
46. यथोक्त द्वारा 1.4.1987 से ''इस संबंध में, आयुक्त द्वारा की गर्इ सिफारिश पर, यदि उसका यह समाधान हो जाता है'' के स्थान पर प्रतिस्थापित।
47. कराधान विधि (संशोधन और प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम, 1986 द्वारा 1.10.1984 से भूतलक्षी प्रभाव से अंत:स्थापित।
48. ''उपधारा (2) में अंतर्विष्ट उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना'' पद के अर्थ के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ मैनुअल, खंड 3.
49. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से ''आय-कर'' के स्थान पर प्रतिस्थापित।
50. वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा 1.6.2000 से अंत:स्थापित।
51. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से ''आय-कर'' के स्थान पर प्रतिस्थापित।
[वित्त अधिनियम, 2005 तथा विशेष आर्थिक जोन अधिनियम, 2005 द्वारा संशोधित रूप में]

