निर्धारण, पुन: निर्धारण और पुन: संगणना को पूरा करने के लिए समय-सीमा
27-54[निर्धारण, पुन: निर्धारण और पुन: संगणना को पूरा करने के लिए समय-सीमा
153. (1) उस निर्धारण वर्ष के अंत से, जिसमें आय पहली बार निर्धारणीय थी, इक्कीस मास की समाप्ति के पश्चात् किसी भी समय धारा 143 या धारा 144 के अधीन निर्धारण का कोर्इ आदेश नहीं किया जाएगा ।
(2) उस वित्तीय वर्ष के अंत से, जिसमें धारा 148 के अधीन सूचना की तामील की गर्इ थी, नौ मास की समाप्ति के पश्चात् धारा 147 के अधीन निर्धारण, पुन: निर्धारण और पुन: संगणना का कोर्इ आदेश नहीं किया जाएगा ।
(3) उपधारा (1) और उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए उस वित्तीय वर्ष की समाप्ति से, जिसमें धारा 254 के अधीन किसी निर्धारण को अपास्त या रद्द करने वाला आदेश, यथास्थिति, प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा प्राप्त किया गया था या प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा धारा 263 या धारा 264 के अधीन आदेश पारित किया गया था, से पहले किसी भी समय धारा 254 या धारा 263 या धारा 264 के अधीन किसी आदेश के अनुसरण में नए निर्धारण का आदेश किया जा सकेगा ।
(4) उपधारा (1), उपधारा (2) और उपधारा (3) में किसी बात के होते हुए भी उस दशा में जहां निर्धारण या पुन: निर्धारण के लिए कार्यवाहियों के प्रकरण के दौरान धारा 92गक की उपधारा (1) के अधीन कोर्इ निर्देश किया गया है वहां उक्त उपधारा (2) और उपधारा (3) के अधीन, यथास्थिति, निर्धारण या पुन: निर्धारण को पूरा करने के लिए उपलब्ध समयावधि को बारह मास के लिए बढ़ा दिया जाएगा।
(5) उस दशा में जहां निर्धारण अधिकारी द्वारा कोर्इ नया निर्धारण या पुन: निर्धारण करने से भिन्न धारा 250 या धारा 254 या धारा 260 या धारा 262 या धारा 263 या धारा 264 के अधीन आदेश को पूर्णत: या भागत: प्रभावी बनाया जाना है वहां ऐसे आदेश को उस मास के अंत से जिसमें, यथास्थिति, प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा धारा 250 या धारा 254 या धारा 260 या धारा 262 के अधीन आदेश प्राप्त किया गया था या प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा धारा 263 या धारा 264 के अधीन आदेश पारित किया गया था, तीन मास की अवधि के भीतर प्रभावी बनाया जाएगा :
परंतु उस दशा में जहां निर्धारण अधिकारी के लिए, उसके नियंत्रण से परे कारणों से, पूर्वोक्त समय के भीतर ऐसे आदेश को प्रभावी बनाना संभव नहीं है वहां प्रधान आयुक्त या आयुक्त, यदि उसका समाधान हो जाता है तो निर्धारण अधिकारी से लिखित में ऐसे कारणों की प्राप्ति पर ऐसे आदेश को प्रभावी बनाने के लिए छह मास का अतिरिक्त समय अनुज्ञात कर सकेगा ।
(6) उपधारा (1) और उपधारा (2) की कोर्इ बात निम्नलिखित वर्गों के निर्धारणों, पुन: निर्धारणों और पुन: संगणना को लागू नहीं होगी जो उपधारा (3) और उपधारा (5) के उपबंधों के अध्यधीन–
(i) जहां धारा 250, धारा 254, धारा 260, धारा 262, धारा 263 और धारा 264 के अधीन किसी आदेश या इस अधिनियम के अधीन अपील या निर्देश के रूप में किए जाने से भिन्न कार्यवाही में किसी न्यायालय के किसी आदेश के अनुसरण में या उसमें अंतर्विष्ट किसी निष्कर्ष या निदेश को प्रभावी बनाने के लिए किसी निर्धारिती या किसी व्यक्ति पर निर्धारण, पुन: निर्धारण और पुन: संगणना की जाती है, उस मास के अंत से, जिसमें ऐसा आदेश, यथास्थिति, प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा प्राप्त या पारित किया जाता है, बारह मास की समाप्ति पर या उससे पहले पूरा किया जाएगा ।
(ii) उस फर्म की दशा में, जहां धारा 147 के अधीन फर्म पर किए गए किसी निर्धारण के परिणामस्वरूप फर्म के किसी भागीदार पर निर्धारण किया जाता है वहां उस मास के अंत से, जिसमें फर्म के मामले में निर्धारण आदेश पारित किया गया है, बारह मास की समाप्ति पर या उससे पहले पूरा किया जाएगा।
(7) जहां उपधारा (5) या उपधारा (6) में निर्दिष्ट किसी आदेश, निष्कर्ष या निदेश को निर्धारण अधिकारी द्वारा उक्त उपधाराओं में विनिर्दिष्ट समय के भीतर प्रभावी बनाया जाना है और ऐसा आदेश उसमें विनिर्दिष्ट आय-कर प्राधिकारी द्वारा 1 जून, 2016 से पहले, यथास्थिति, प्राप्त या पारित किया गया है, वहां निर्धारण अधिकारी, 31 मार्च, 2017 को या उससे पहले ऐसे आदेश, निष्कर्ष या निदेश को प्रभावी बनाएगा या निर्धारिती की आय का निर्धारण, पुन: निर्धारण या पुन: संगणना करेगा।
(8) इस धारा, धारा 153क की उपधारा (2) और धारा 153ख की उपधारा (1) के पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी किसी भी निर्धारण वर्ष के संबंध में निर्धारण या पुन: निर्धारण का कोर्इ ऐसा आदेश, जो धारा 153क की उपधारा (2) के अधीन परिवर्तित हो गया है, ऐसे प्रवर्तित होने के मास के अंत से एक वर्ष के भीतर या इस धारा अथवा धारा 153ख की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर, इसमें जो भी पश्चात्वर्ती हो, पूरा किया जाएगा।
(9) इस धारा के उपबंध, जैसे ये वित्त अधिनियम, 2016 द्वारा उनके संशोधन से ठीक पूर्व थे, 1 जून, 2016 से पहले निर्धारण, पुन: निर्धारण या पुन: संगणना को या उनके संबंध में लागू होंगे।
स्पष्टीकरण 1–इस धारा के प्रयोजनों के लिए परिसीमा की अवधि की संगणना में निम्नलिखित को अपवर्जित कर दिया जाएगा–
(i) कार्यवाहियों के पूर्ण या उसके किसी भाग को पुन: आरंभ करने या धारा 129 के परंतुक के अधीन निर्धारिती को सुनवार्इ का अवसर देने में लगा समय, या
(ii) वह कालावधि, जिसके दौरान निर्धारण कार्यवाही किसी न्यायालय के किसी आदेश या व्यादेश द्वारा रोक दी गर्इ है, या
(iii) उस तारीख से प्रारंभ होने वाली, जिसको निर्धारण अधिकारी, केंद्रीय सरकार या विहित प्राधिकारी को, धारा 143 की उपधारा (3) के परंतुक के खंड (i) के अधीन धारा 10 के खंड (21) या खंड (22ख) या खंड (23क) या खंड (23ख) या खंड (23ग) के उपखंड (iv) या उपखंड (v) या उपखंड (vi) या उपखंड (viक) के उपबंधों के उल्लंघन की सूचना देता है और उस तारीख को समाप्त होने वाली, जिसको उन खंडों के अधीन, यथास्थिति, अनुमोदन को वापस लेने के आदेश या अधिसूचना के विखंडन के प्रति निर्धारण अधिकारी द्वारा प्राप्त की जाती है, कालावधि, या
(iv) उस तारीख को, जिसको निर्धारण अधिकारी निर्धारिती को अपने लेखाओं की संपरीक्षा धारा 142 की उपधारा (2क) के अधीन कराने का निदेश देता है, प्रारंभ होने वाली और,–
(क) उस अंतिम तारीख को समाप्त होने वाली अवधि, जिसको निर्धारिती से ऐसी संपरीक्षा की रिपोर्ट उस उपधारा के अधीन प्रस्तुत करने की अपेक्षा की जाती है; या
(ख) जहां ऐसे निदेश को किसी न्यायालय के समक्ष चुनौती दी जाती है, उस तारीख को समाप्त होने वाली अवधि, जिसको ऐसे निदेश को अपास्त किए जाने संबंधी ऐसा निदेश आयुक्त द्वारा प्राप्त किया जाता है; या
(v) उस तारीख से, जिसको निर्धारण अधिकारी धारा 142क की उपधारा (1) के अधीन मूल्यांकन अधिकारी को कोर्इ निर्देश करता है, प्रारंभ होने वाली और उस तारीख को, जिसको निर्धारण अधिकारी द्वारा मूल्यांकन अधिकारी की रिपोर्ट प्राप्त की जाती है, समाप्त होने वाली कालावधि; या
(vi) उस तारीख, जिसको निर्धारण अधिकारी धारा 158क की उपधारा (1) के अधीन घोषणा प्राप्त करता है, प्रारंभ होने वाली और उस तारीख को, जिसको उस धारा की उपधारा (3) के अधीन उसके द्वारा आदेश किया जाता है, समाप्त होने वाली (साठ दिन से अनधिक की) कालावधि, या
(vii) उस दशा में जहां आय-कर समझौता आयोग के समक्ष किया गया आवेदन उसके द्वारा नामंजूर कर दिया गया है या उसके समक्ष कार्यवाही किए जाने के लिए उसके द्वारा अनुज्ञात नहीं किया है, वहां उस तारीख से जिसको धारा 245ग के अधीन समझौता आयोग के समक्ष आवेदन किया जाता है, आरंभ होने वाली और उस तारीख को, जिसको उस धारा की उपधारा (2) के अधीन प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा धारा 245घ की उपधारा (1) के अधीन आदेश प्राप्त किया जाता है, समाप्त होने वाली कालावधि, या
(viii) उस तारीख स,े जिसको धारा 245थ की उपधारा (1) के अधीन अग्रिम विनिर्णय के लिए प्राधिकरण के समक्ष कोर्इ आवेदन किया जाता है, प्रारंभ होने वाली और उस तारीख को, जिसको धारा 245द की उपधारा (3) के अधीन आवेदन को खारिज करने वाला आदेश आयुक्त द्वारा प्राप्त किया जाता है, समाप्त होने वाली कालावधि, या
(ix) उस तारीख से, जिसको धारा 245थ की उपधारा (1) के अधीन अग्रिम विनिर्णय के लिए प्राधिकरण के समक्ष कोर्इ आवेदन किया जाता है, प्रारंभ होने वाली और उस तारीख को, जिसको धारा 245द की उपधारा (7) के अधीन उसके द्वारा घोषित अग्रिम विनिर्णय आयुक्त द्वारा प्राप्त किया जाता है, समाप्त होने वाली कालावधि, या
(x) उस तारीख से, जिसको धारा 90 या धारा 90क में निर्दिष्ट किसी करार के अधीन किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा सूचना के आदान-प्रदान के लिए कोर्इ निर्देश या निर्देशों में से प्रथम निर्देश किया जाता है, प्रारंभ होने वाली और उस तारीख को, जिसको अनुरोध की गर्इ सूचना अंतिम रूप से आयुक्त द्वारा प्राप्त की जाती है, समाप्त होने वाली अवधि या एक वर्ष की कालावधि, इनमें से जो भी कम हो, या
(xi) उस तारीख से, जिसको धारा 144खक की उपधारा (1) के अधीन आयुक्त द्वारा किसी ठहराव को अननुज्ञेय परिवर्जन ठहराव घोषित किए जाने के लिए कोर्इ निर्देश प्राप्त किया जाता है, प्रारंभ होने वाली और उस तारीख को, जिसको निर्धारण अधिकारी द्वारा उक्त धारा की उपधारा (3) या उपधारा (6) के अधीन कोर्इ निदेश या उपधारा (5) के अधीन कोर्इ आदेश प्राप्त किया जाता है, समाप्त होने वाली कालावधि :
परंतु जहां पूर्वोक्त समय या अवधि के अपवर्जन के पश्चात् उपधारा (1), उपधारा (2), उपधारा (3) और उपधारा (7) के अधीन निर्दिष्ट वह परिसीमाकाल, जो निर्धारण अधिकारी को, यथास्थिति, निर्धारण, पुन: निर्धारण, पुन: संगणना का आदेश करने के लिए उपलब्ध है, साठ दिन से कम है, वहां ऐसी अवशिष्ट अवधि साठ दिन तक विस्तारित की जाएगी और पूर्वोक्त परिसीमाकाल तद्नुसार विस्तारित किया गया समझा जाएगा :
परंतु यह और कि जहां धारा 92गक की उपधारा (3क) के परंतुक के अनुसार अंतरण मूल्यांकन अधिकारी को उपलब्ध समयावधि साठ दिन बढ़ा दी जाती है, और, यथास्थिति, निर्धारण, पुन: निर्धारण या पुन: संगणना का आदेश करने के लिए निर्धारण अधिकारी को उपलब्ध परिसीमा की अवधि साठ दिन से कम है, वहां ऐसी अवशिष्ट अवधि साठ दिन तक विस्तारित की जाएगी और पूर्वोक्त परिसीमाकाल तद्नुसार विस्तारित किया गया समझा जाएगा :
परंतु यह भी कि जहां समझौता आयोग के समक्ष किसी कार्यवाही का धारा 245जक के अधीन उपशमन हो जाता है वहां, यथास्थिति, निर्धारण, पुन: निर्धारण या, पुन: संगणना का आदेश करने के लिए निर्धारण अधिकारी को उपलब्ध परिसीमा की अवधि धारा 245जक की उपधारा (4) के अधीन अवधि के अपवर्जन के पश्चात् एक वर्ष से कम की नहीं होगी; और जहां परिसीमा की ऐसी अवधि एक वर्ष से कम है, वहां वह एक वर्ष के लिए बढ़ार्इ गर्इ समझी जाएगी; और धारा 149, धारा 153ख, धारा 154, धारा 155 और धारा 158खड़ के अधीन परिसीमा की अवधि का अवधारण करने के प्रयोजनों के लिए और धारा 244क के अधीन ब्याज के संदाय के प्रयोजनों के लिए यह परंतुक भी तद्नुसार लागू होगा।
स्पष्टीकरण 2–इस धारा के प्रयोजनों के लिए, जहां उपधारा (6) के खंड (i) में निर्दिष्ट किसी आदेश द्वारा,–
(क) किसी निर्धारण वर्ष के लिए निर्धारिती की कुल आय में से किसी आय को अपवर्जित किया जाता है, वहां किसी अन्य निर्धारण वर्ष के लिए ऐसी आय का निर्धारण धारा 150 और इस धारा के प्रयोजनों के लिए उक्त आदेश में अंतर्विष्ट किसी निष्कर्ष या निदेश के परिणामस्वरूप या उसको प्रभावी करने के लिए किया गया निर्धारण समझा जाएगा;
(ख) कोर्इ आय किसी एक व्यक्ति की कुल आय में से अपवर्जित की जाती है और अन्य व्यक्ति की आय मानी जाती है वहां ऐसे अन्य व्यक्ति पर ऐसी आय का निर्धारण धारा 150 और इस धारा के प्रयोजनों के लिए उक्त आदेश में अंतर्विष्ट किसी निष्कर्ष या निदेश के परिणामस्वरूप या उसको प्रभावी करने के लिए किया गया निर्धारण समझा जाएगा यदि उक्त आदेश के पारित किए जाने के पूर्व ऐसे अन्य व्यक्ति को सुनवार्इ का अवसर दिया गया था।]
27-54.वित्त अधिनियम, 2016 द्वारा 1.6.2016 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व, प्रत्यक्ष कर (संशोधन) अधिनियम, 1964 द्वारा 6.10.1964 से, वित्त अधिनियम, 1968 द्वारा 1.4.1968 से, कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1970 द्वारा 1.4.1971 से, कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.1.1976/1.4.1976 से, कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.10.1984 से, कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988/1.4.1989 से, वित्त अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से, वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 27.9.1991 से, वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1996 द्वारा 1.4.1997 से, वित्त अधिनियम, 2001 द्वारा 1.6.2001 से, वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.4.2003 से, वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2004 द्वारा 1.10.2004 से, वित्त अधिनियम, 2005 द्वारा 1.4.2006 से, वित्त अधिनियम 2006 द्वारा 1.6.2006 से, वित्त अधिनियम, 2007 द्वारा 1.6.2007 से, वित्त अधिनियम, 2008 द्वारा भूतलक्षी प्रभाव से 1.6.2003/1.6.2007 से, वित्त अधिनियम, 2011 द्वारा 1.6.2011 से, वित्त अधिनियम, 2012 द्वारा 1.7.2012/1.4.2013 से, वित्त अधिनियम, 2013 द्वारा भूतलक्षी प्रभाव से 1.7.2012/1.4.2013, 1.6.2013 और 1.4.2016 से तथा वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2014 द्वारा भूतलक्षी प्रभाव से 1.6.2013/1.10.2014 से संशोधित धारा 153 निम्नानुसार थी:
"153. निर्धारण और पुन: निर्धारणों को पूरा करने के लिए समय-सीमा.–(1) धारा 143 या धारा 144 के अधीन कोर्इ निर्धारण आदेश निम्नलिखित अवधियों की समाप्ति के, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो, पश्चात् किसी समय नहीं किया जाएगा–
(क) जिस निर्धारण वर्ष में वह आय सर्वप्रथम निर्धारणीय थी उस निर्धारण वर्ष के अंत से दो वर्ष के पश्चात्, या
(ख) जिस वित्तीय वर्ष में धारा 139 की उपधारा (4) या उपधारा (5) के अधीन विवरणी या पुनरीक्षित विवरणी 1 अप्रैल, 1988 को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष या उसके पूर्ववर्ती निर्धारण वर्ष के संबंध में दाखिल की जाती है उसके अंत से एक वर्ष के पश्चात् :
परंतु यह कि यदि ऐसा निर्धारण वर्ष, जिसमें आय प्रथम बार निर्धारणीय थी, 1 अप्रैल, 2004 को या उसके पश्चात्, किन्तु 1 अप्रैल, 2010 के पूर्व प्रारंभ होने वाला निर्धारण वर्ष है तो खंड (क) के उपबंध इस प्रकार प्रभावी होंगे मानो "दो वर्ष" शब्दों के स्थान पर "इक्कीस मास" शब्द रख दिए गए हों:
परंतु यह और कि यदि वह निर्धारण वर्ष, जिसमें आय पहली बार निर्धारणीय थी, 1 अप्रैल, 2005 को या उसके पश्चात्, किन्तु 1 अप्रैल, 2009 के पूर्व प्रारंभ होने वाला निर्धारण वर्ष या कोर्इ पश्चात्वर्ती निर्धारण वर्ष है और कुल आय के निर्धारण से संबंधित कार्यवाही के दौरान धारा 92गक की उपधारा (1) के अधीन कोर्इ निर्देश–
(i) 1 जून, 2007 से पूर्व किया गया था, किंतु उस धारा की उपधारा (3) के अधीन कोर्इ आदेश ऐसी तारीख से पूर्व नहीं किया गया है; या
(ii) 1 जून, 2007 को या उसके पश्चात् किया गया है,
तो खंड (क) के उपबंध, पहले परंतुक में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, इस प्रकार प्रभावी होंगे मानो "दो वर्ष" शब्दों के स्थान पर "तैंतीस मास" शब्द रखे गए हों:
परंतु यह भी कि यदि वह निर्धारण वर्ष, जिसमें आय पहले निर्धारणीय थी, 1 अप्रैल, 2009 को प्रारंभ होने वाला निर्धारण वर्ष या कोर्इ पश्चात्वर्ती निर्धारण वर्ष है और कुल आय का निर्धारण करने संबंधी कार्यवाही के दौरान धारा 92गक की उपधारा (1) के अधीन कोर्इ निर्देश किया जाता है, तो खंड (क) के उपबंध, पहले परंतुक में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, इस प्रकार प्रभावी होंगे, मानो "दो वर्ष" शब्दों के स्थान पर, "तीन वर्ष" शब्द रखे गए हों;
(1क) धारा 115बड़ या धारा 115बच के अधीन, निर्धारण का कोर्इ आदेश, उस निर्धारण वर्ष के, जिसमें अनुषंगी फायदे सर्वप्रथम निर्धारणीय थे, अंत से इक्कीस मास के पश्चात् किसी समय नहीं किया जाएगा।
(1ख) धारा 115बछ के अधीन निर्धारण या पुनर्निर्धारण का कोर्इ आदेश, उस वित्तीय वर्ष के, जिसमें धारा 115बज के अधीन सूचना की तामील की गर्इ थी, अंत से नौ मास की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा।
(2) धारा 147 के अधीन निर्धारण, पुन:निर्धारण या पुन:संगणना का कोर्इ आदेश, उस वित्तीय वर्ष के, जिसमें धारा 148 के अधीन सूचना की तामील की गर्इ थी, अंत से एक वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा :
परन्तु जहां धारा 148 के अधीन सूचना की तामील 1 अप्रैल, 1999 को या उसके पश्चात् किंतु 1 अप्रैल, 2000 से पूर्व की गर्इ थी, वहां ऐसा निर्धारण, पुन:निर्धारण या पुन:संगणना 31 मार्च, 2002 तक किसी भी समय की जा सकेगी :
परंतु यह और कि जहां धारा 148 के अधीन सूचना की तामील 1 अप्रैल, 2005 को या उसके पश्चात् किन्तु 1 अप्रैल, 2011 के पूर्व की गर्इ थी, वहां इस उपधारा के उपबंध इस प्रकार प्रभावी होंगे मानो "एक वर्ष" शब्दों के स्थान पर, "नौ मास" शब्द रख दिए गए हों :
परंतु यह भी कि जहां धारा 148 के अधीन सूचना की तामील 1 अप्रैल, 2006 को या उसके पश्चात् किन्तु 1 अप्रैल, 2010 के पूर्व की गर्इ थी और कुल आय के निर्धारण या पुनर्निधारण या पुन: संगणना करने संबंधी कार्यवाहियों के दौरान, धारा 92गक की उपधारा (1) के अधीन कोर्इ निर्देश–
(i) 1 जून, 2007 से पूर्व किया गया था, किंतु उस धारा की उपधारा (3) के अधीन कोर्इ आदेश ऐसी तारीख से पूर्व नहीं किया गया है; या
(ii) 1 जून, 2007 को या उसके पश्चात् किया गया है,
वहां इस उपधारा के उपबंध, दूसरे परंतुक में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी इस प्रकार प्रभावी होंगे, मानो "एक वर्ष" शब्दों के स्थान पर "इक्कीस मास" शब्द रखे गए हों:
परंतु यह भी कि जहां धारा 148 के अधीन सूचना की तामील 1 अप्रैल, 2010 को या उसके पश्चात् की गर्इ हो और कुल आय का निर्धारण या पुन:निर्धारण या पुनर्संगणना करने संबंधी कार्यवाही के दौरान धारा 92गक की उपधारा (1) के अधीन कोर्इ निर्देश किया जाता है, वहां इस उपधारा के उपबंध दूसरे परंतुक में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, इस प्रकार प्रभावी होंगे, मानो "एक वर्ष" शब्दों के स्थान पर, "दो वर्ष" शब्द रखे गए हों,
(2क) उपधारा (1) उपधारा (1क), उपधारा (1ख) और उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी 1 अप्रैल, 1971 को प्रारम्भ होने वाले निर्धारण वर्ष और उसके पश्चात् के किसी निर्धारण वर्ष के संबंध में धारा 250, धारा 254, धारा 263 या धारा 264 के अधीन, किसी निर्धारण को अपास्त या रद्द करने वाले आदेश के अनुसरण में नए सिरे से निर्धारण का आदेश, उस वित्तीय वर्ष के, जिसमें धारा 250 या धारा 254 के अधीन आदेश यथास्थिति, प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा प्राप्त किया जाता है या प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा धारा 263 या धारा 264 के अधीन पारित किया जाता है, अंत से एक वर्ष की समाप्ति के पूर्व किसी भी समय किया जा सकेगा :
परन्तु जहां धारा 250 या धारा 254 के अधीन आदेश, यथास्थिति, प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा प्राप्त किया जाता है, या धारा 263 या धारा 264 के अधीन आदेश प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा 1 अप्रैल, 1999 को या उसके पश्चात् किंतु 1 अप्रैल, 2000 से पूर्व पारित किया जाता है वहां नए सिरे से निर्धारण का ऐसा कोर्इ आदेश 31 मार्च, 2002 तक किसी भी समय किया जा सकेगा :
परंतु यह और कि जहां, यथास्थिति, धारा 254 के अधीन आदेश प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा प्राप्त किया जाता है या धारा 263 या धारा 264 के अधीन आदेश प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा 1 अप्रैल, 2005 को या उसके पश्चात् किन्तु 1 अप्रैल, 2011 के पूर्व पारित किया जाता है, वहां इस उपधारा के उपबंध इस प्रकार प्रभावी होंगे मानो "एक वर्ष" शब्दों के स्थान पर "नौ मास" शब्द रख दिए गए हों:
परंतु यह भी कि जहां धारा 254 के अधीन आदेश, यथास्थिति, प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा प्राप्त किया जाता है, या धारा 263 या धारा 264 के अधीन आदेश, 1 अप्रैल, 2006 को या उसके पश्चात् किन्तु 1 अप्रैल, 2010 के पूर्व प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा पारित किया जाता है और कुल आय का नए सिरे से निर्धारण करने संबंधी कार्यवाहियों के दौरान धारा 92गक की उपधारा (1) के अधीन कोर्इ निर्देश–
(i) 1 जून, 2007 से पूर्व किया गया था, किंतु धारा 92गक की उपधारा (3) के अधीन कोर्इ आदेश ऐसी तारीख से पूर्व नहीं किया गया है; या
(ii) 1 जून, 2007 को या उसके पश्चात् किया गया है,
वहां इस उपधारा के उपबंध, दूसरे परंतुक में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी इस प्रकार प्रभावी होंगे, मानो "एक वर्ष" शब्दों के स्थान पर "इक्कीस मास" शब्द रखे गए हों:
परंतु यह भी कि जहां 1 अप्रैल, 2010 को या उसके पश्चात् यथास्थिति, धारा 254 के अधीन आदेश, प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा प्राप्त किया जाता है या धारा 263 या धारा 264 के अधीन आदेश प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा पारित किया जाता है, और कुल आय का नए सिरे से निर्धारण करने संबंधी कार्यवाही के दौरान धारा 92गक की उपधारा (1) के अधीन कोर्इ निर्देश किया जाता है, वहां इस उपधारा के उपबंध दूसरे परंतुक में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, इस प्रकार प्रभावी होंगे, मानो "एक वर्ष" शब्दों के स्थान पर "दो वर्ष" शब्द रखे गए हों;
(3) उपधारा (1) उपधारा (1क), उपधारा (1ख) और उपखण्ड (2) के उपबंध निम्नलिखित निर्धारणों, पुन:निर्धारणों और पुन: संगणनाओं के वर्गों को लागू नहीं होंगे जिनको उपधारा (2क) के उपबंधों के अधीन रहते हुए किसी भी समय पूरा किया जा सकेगा–
(i) [***]
(ii) जहां निर्धारिती या किसी व्यक्ति की बाबत निर्धारण, पुन: निर्धारण या पुन: संगणना धारा 250, 254, 260, 262, 263 या 264 के अधीन आदेश में या इस अधिनियम के अधीन अपील या निर्देश के रूप में कार्यवाही से भिन्न किसी कार्यवाही में किसी न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश में अंतर्विष्ट किसी निष्कर्ष या निदेश के परिणामस्वरूप या उसको प्रभावी करने के लिए की जाती है;
(iii) जहां किसी फर्म की दशा में धारा 147 के अधीन फर्म के संबंध में किए गए निर्धारण के परिणामस्वरूप फर्म के किसी भागीदार के संबंध में निर्धारण किया जाता है।
(4) इस धारा, धारा 153क की उपधारा (2) और धारा 153ख की उपधारा (1) के पूर्वगामी उपबंधों में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, किसी निर्धारण वर्ष के संबंध में निर्धारण या पुनर्निर्धारण का आदेश, जो धारा 153क की उपधारा (2) के अधीन पुन:प्रवर्तित हो गया है, ऐसे पुन:प्रवर्तन के मास के अंत से एक वर्ष के भीतर या इस धारा अथवा धारा 153ख की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो, किया जाएगा।
स्पष्टीकरण 1.–इस धारा के प्रयोजनों के लिए परिसीमाकाल की गणना करने में–
(i) सम्पूर्ण कार्यवाही या उसके किसी भाग को पुन: शुरू करने में या धारा 129 के परन्तुक के अधीन निर्धारिती को पुन: से सुनवार्इ का अवसर देने में लगे समय को; या
(ii) उस अवधि को, जिसके दौरान निर्धारण की कार्यवाही पर किसी न्यायालय के आदेश या व्यादेश द्वारा रोक लगा दी जाती है; या
(iiक) उस तारीख को, जिसको निर्धारण अधिकारी, केन्द्रीय सरकार या विहित प्राधिकारी को, धारा 143 की उपधारा (3) के परन्तुक के खंड (i) के अधीन धारा 10 के खंड (21) या खंड (22ख) या खंड (23क) या खंड (23ख) या खंड (23ग) के उपखंड (iv) या उपखंड (v) या उपखंड (vi) या उपखंड (viक) के उपबंधों के उल्लंघन की सूचना देता है प्रारंभ होने वाली और उस तारीख को, जिसको उन खंडों के अधीन, यथास्थिति, अनुमोदन को वापस लेने के आदेश या अधिसूचना के विखंडन की प्रति निर्धारण अधिकारी द्वारा प्राप्त की जाती है, समाप्त होने वाली अवधि;
(iii) उस तारीख को, जिसको निर्धारण अधिकारी निर्धारिती को धारा 142 की उपधारा (2क) के अधीन अपने लेखाओं की संपरीक्षा कराने का निदेश देता है, प्रारंभ होने वाली और–
(क) उस अंतिम तारीख को समाप्त होने वाली अवधि, जिसको निर्धारिती से ऐसी संपरीक्षा की रिपोर्ट उस उपधारा के अधीन प्रस्तुत करने की अपेक्षा की जाती है; या
(ख) जहां ऐसे निदेश को न्यायालय के समक्ष चुनौती दी जाती है, उस तारीख को समाप्त होने वाली अवधि, जिसको ऐसे आदेश को अपास्त किए जाने संबंधी ऐसा निदेश प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा प्राप्त किया जाता है; या
(iv) उस तारीख से प्रारंभ होने वाली, जिसको निर्धारण अधिकारी धारा 142क की उपधारा (1) के अधीन मूल्यांकन अधिकारी को कोर्इ निर्देश करता है और उस तारीख को समाप्त होने वाली, जिसको निर्धारण अधिकारी द्वारा मूल्यांकन अधिकारी की रिपोर्ट प्राप्त की जाती है, अवधि; या
(ivक) उस तारीख से, जिसको निर्धारण अधिकारी धारा 158क की उपधारा (1) के अधीन घोषणा प्राप्त करता है, प्रारंभ होने वाली और उस तारीख को, जिसको उस धारा की उपधारा (3) के अधीन उसके द्वारा आदेश किया जाता है, समाप्त होने वाली (साठ दिन से अनधिक) की अवधि; या
(v) ऐसे मामले में, जिसमें धारा 245ग के अधीन आय-कर समझौता आयोग के समक्ष किया गया आवेदन उसके द्वारा नामंजूर कर दिया जाता है, अथवा उसके द्वारा उस पर कार्यवाही करने की अनुज्ञा नहीं दी जाती है, उस तारीख से, जिसको ऐसा आवेदन किया जाता है, प्रारम्भ होने वाली और उस तारीख को जिसको धारा 245घ की उपधारा (1) के अधीन आदेश उस धारा की उपधारा (2) के अधीन प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा प्राप्त किया जाता है, समाप्त होने वाली कालावधि; या
(vi) उस तारीख से, जिसको धारा 245थ की उपधारा (1) के अधीन अग्रिम विनिर्णय संबंधी प्राधिकरण के समक्ष कोर्इ आवेदन किया जाता है, प्रारंभ होने वाली और उस तारीख को, जिसको धारा 245द की उपधारा (3) के अधीन आवेदन को नामंजूर करने वाला आदेश प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा प्राप्त किया जाता है, समाप्त होने वाली अवधि; या
(vii) उस तारीख से, जिसको धारा 245थ की उपधारा (1) के अधीन अग्रिम विनिर्णय संबंधी प्राधिकरण के समक्ष कोर्इ आवेदन किया जाता है, प्रारंभ होने वाली और उस तारीख को, जिसको धारा 245द की उपधारा (7) के अधीन उसके द्वारा घोषित अग्रिम विनिर्णय प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा प्राप्त किया जाता है, समाप्त होने वाली अवधि; या
(viii) उस तारीख से, जिसको धारा 90 या धारा 90क में निद्रिष्ट किसी करार के अधीन किसी प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा सूचना के आदान-प्रदान के लिए कोर्इ निर्देश या निर्देशों में से प्रथम निर्देश किया जाता है, प्रारंभ होने वाली और उस तारीख को, जिसको अनुरोध की गर्इ अंतिम सूचना प्राप्त की जाती है, समाप्त होने वाली अवधि या एक वर्ष की अवधि, इनमें से जो भी कम हो; या
(ix) उस तारीख से, जिसको धारा 144खक की उपधारा (1) के अधीन प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा किसी ठहराव को अननुज्ञेय परिवर्जन ठहराव घोषित किए जाने के लिए कोर्इ निर्देश प्राप्त किया जाता है, प्रारंभ होने वाली और उस तारीख को, जिसको निर्धारण अधिकारी द्वारा उक्त धारा की उपधारा (3) या उपधारा (6) के अधीन कोर्इ निदेश या उपधारा (5) के अधीन कोर्इ आदेश प्राप्त किया जाता है, समाप्त होने वाली अवधि,
को छोड़ दिया जाएगा :
परन्तु जहां पूर्वोक्त समय या अवधि को छोड़े जाने के ठीक पश्चात्, उपधारा (1), उपधारा (1क), उपधारा (1ख), उपधारा (2), उपधारा (2क) और उपधारा (4) में निर्दिष्ट वह परिसीमाकाल, जो निर्धारण अधिकारी को यथास्थिति, निर्धारण, पुन: निर्धारण या पुन: संगणना का आदेश करने के लिए उपलब्ध है, साठ दिन से कम है, वहां ऐसी शेष अवधि साठ दिन बढ़ार्इ जाएगी और पूर्वोक्त परिसीमाकाल तदनुसार बढ़ाया गया समझा जाएगा:
परंतु यह और कि जहां समझौता आयोग के समक्ष किसी कार्यवाही का धारा 245जक के अधीन उपशमन हो जाता है वहां, यथास्थिति, निर्धारण, पुनर्निर्धारण या पुन: संगणना का आदेश करने के लिए निर्धारण अधिकारी को इस धारा के अधीन उपलब्ध परिसीमा की अवधि, धारा 245जक की उपधारा (4) के अधीन की अवधि के अपवर्जन करने के पश्चात्, एक वर्ष से कम की नहीं होगी; और जहां परिसीमा की ऐसी अवधि एक वर्ष से कम है वहां यह समझा जाएगा कि वह एक वर्ष के लिए बढ़ा दी गर्इ है; और धारा 149, 153ख, 154, 155, 158खड़ और 231 के अधीन परिसीमा की अवधि का अवधारण करने के प्रयोजनों के लिए और, यथास्थिति, धारा 243 या धारा 244 या धारा 244क के अधीन ब्याज का संदाय करने के प्रयोजनों के लिए, यह परन्तुक भी तदनुसार लागू होगा।
स्पष्टीकरण 2.–जहां उपधारा (3) के खंड (ii) में निर्दिष्ट किसी आदेश द्वारा किसी निर्धारण वर्ष के लिए निर्धारिती की कुल आय में से किसी आय को अपवर्जित किया जाता है, वहां किसी अन्य निर्धारण वर्ष के लिए ऐसी आय का निर्धारण, धारा 150 और इस धारा के प्रयोजनों के लिए, उक्त आदेश में अन्तर्विष्ट किसी निष्कर्ष या निदेश के परिणामस्वरूप या उसको प्रभावी करने के लिए किया गया निर्धारण समझा जाएगा।
स्पष्टीकरण 3.–जहां उपधारा (3) के खंड (ii) में निर्दिष्ट किसी आदेश द्वारा कोर्इ आय किसी एक व्यक्ति की कुल आय में से अपवर्जित की जाती है और अन्य व्यक्ति की आय मानी जाती है; वहां ऐसे अन्य व्यक्ति पर ऐसी आय का निर्धारण धारा 150 और इस धारा के प्रयोजनों के लिए, उक्त आदेश में अन्तर्विष्ट किसी निष्कर्ष या निदेश के परिणामस्वरूप या उसको प्रभावी करने के लिए किया गया निर्धारण समझा जाएगा, परन्तु यह तब जबकि उक्त आदेश के पारित किए जाने के पूर्व ऐसे अन्य व्यक्ति को सुनवार्इ का अवसर दिया गया था।"
[वित्त अधिनियम, 2016 द्वारा संशोधित रूप में]

