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धारा 15

वेतन से कटौती या वेतन के भुगतान में देरी से उत्पन्न दावे तथा दुर्भावनापूर्ण या परेशान करने वाले दावों के लिए जुर्माना

धारा

धारा संख्या

15

अध्याय शीर्षक

अधिनियम

मजदूरी भुगतान अधिनियम, 1936

वर्ष

वेतन से कटौती या वेतन के भुगतान में देरी से उत्पन्न दावे तथा दुर्भावनापूर्ण या परेशान करने वाले दावों के लिए जुर्माना

वेतन से कटौती या वेतन के भुगतान में देरी से उत्पन्न दावे तथा दुर्भावनापूर्ण या परेशान करने वाले दावों के लिए जुर्माना

वेतन से कटौती या वेतन के भुगतान में देरी से उत्पन्न दावे तथा दुर्भावनापूर्ण या परेशान करने वाले दावों के लिए जुर्माना I

15.       [ (1) समुचित सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियुक्त कर सकती है-

  ( क )     कोई भी कर्मकार क्षतिपूर्ति आयुक्त; या

  ( ख)    केन्द्रीय सरकार का कोई अधिकारी जो निम्नलिखित रूप में कार्य करता है,—

    (i)    क्षेत्रीय श्रम आयुक्त; या

  (ii)    सहायक श्रम आयुक्त के पास कम से कम दो वर्ष का अनुभव हो; या

  (ग)    राज्य सरकार का कोई अधिकारी जो सहायक श्रम आयुक्त के पद से नीचे का न हो और जिसके पास कम से कम दो वर्ष का अनुभव हो; या

  (घ)    औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) या राज्य में लागू औद्योगिक विवादों की जांच और सेटलमेंट से संबंधित किसी भी समतुल्य कानून के तहत गठित किसी भी श्रम न्यायालय या औद्योगिक न्यायाधिकरण का पीठासीन अधिकारी; या

  (ड़)    सिविल न्यायालय के न्यायाधीश या न्यायिक मजिस्ट्रेट के रूप में अनुभव रखने वाला कोई अन्य अधिकारी,

किसी विनिर्दिष्ट क्षेत्र के लिए उस क्षेत्र में नियोजित या वेतन प्राप्त करने वाले व्यक्तियों की मजदूरी में कटौती या मजदूरी के भुगतान में विलम्ब से उत्पन्न होने वाले सभी दावों पर सुनवाई करने तथा उन पर निर्णय लेने के लिए प्राधिकारी के रूप में, जिसके अंतर्गत ऐसे दावों से आनुषंगिक सभी मामले भी हैं :

बशर्ते कि जहां समुचित सरकार ऐसा करना आवश्यक समझती है, वहां वह किसी विनिर्दिष्ट क्षेत्र के लिए एक से अधिक प्राधिकारी नियुक्त कर सकेगी और साधारण या विशेष आदेश द्वारा इस अधिनियम के अधीन उनके द्वारा निष्पादित किए जाने वाले कार्य के वितरण या आबंटन के लिए उपबंध कर सकेगी। ]

(2) जहां इस अधिनियम के प्रावधानों के विपरीत किसी नियोजित व्यक्ति की मजदूरी से कोई कटौती की गई है, या मजदूरी का भुगतान विलंबित किया गया है, ऐसा व्यक्ति स्वयं, या कोई विधि व्यवसायी या उसकी ओर से कार्य करने के लिए लिखित रूप से प्राधिकृत पंजीकृत ट्रेड यूनियन का कोई पदाधिकारी, या इस अधिनियम के तहत कोई निरीक्षक, या उप-धारा (1) के तहत नियुक्त प्राधिकारी की अनुमति से कार्य करने वाला कोई अन्य व्यक्ति, उप-धारा (3) के तहत निर्देश के लिए ऐसे प्राधिकारी को आवेदन कर सकता है :

बशर्ते कि ऐसा प्रत्येक आवेदन, यथास्थिति, उस तारीख से जिसको मजदूरी में से कटौती की गई थी या उस तारीख से जिसको मजदूरी का भुगतान किया जाना था, [बारह मास] के भीतर प्रस्तुत किया जाएगा :

आगे यह भी प्रावधान है कि कोई भी आवेदन उक्त [बारह मास] अवधि के पश्चात भी स्वीकार किया जा सकेगा, जब आवेदक प्राधिकारी को यह समाधान कर दे कि उसके पास ऐसी अवधि के भीतर आवेदन न करने का पर्याप्त कारण था।

[ (3) जब उपधारा (2) के अधीन कोई आवेदन ग्रहण किया जाता है, तब प्राधिकारी आवेदक और नियोजक या धारा 3 के अधीन मजदूरी के संदाय के लिए उत्तरदायी अन्य व्यक्ति को सुनेगा या उन्हें सुनवाई का अवसर देगा और ऐसी अतिरिक्त जांच के पश्चात्, यदि कोई हो, जो आवश्यक हो, किसी अन्य शास्ति पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, जिसके लिए ऐसा नियोजक या अन्य व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन उत्तरदायी है, नियोजित व्यक्ति को कटौती की गई रकम वापस करने या विलंबित मजदूरी के संदाय के साथ-साथ ऐसे प्रतिकर के संदाय का निर्देश दे सकेगा, जिसे प्राधिकारी ठीक समझे, जो पूर्व मामले में कटौती की गई रकम के दस गुने से अधिक नहीं होगा और बाद के मामले में तीन हजार रुपए से अधिक नहीं होगा, परंतु एक हजार पांच सौ रुपए से कम नहीं होगा और यहां तक ​​कि यदि कटौती की गई रकम या विलंबित मजदूरी का संदाय आवेदन के निपटारे से पहले कर दिया जाता है, तो ऐसे प्रतिकर के संदाय का निर्देश दे सकेगा, जिसे प्राधिकारी ठीक समझे, जो दो हजार रुपए से अधिक नहीं होगा:

बशर्ते कि इस अधिनियम के अधीन किसी दावे का निपटारा, प्राधिकरण द्वारा दावे के पंजीकरण की तारीख से तीन माह की अवधि के भीतर यथासम्भव किया जाएगा   :

आगे यह भी प्रावधान है कि तीन मास की अवधि बढ़ाई जा सकेगी यदि विवाद के दोनों पक्षकार, प्राधिकरण द्वारा अभिलिखित किए जाने वाले किसी सद्भावपूर्ण कारण से इस बात पर सहमत हों कि तीन मास की उक्त अवधि को ऐसी अवधि तक बढ़ाया जा सकेगा जो आवेदन का न्यायोचित ढंग से निपटान करने के लिए आवश्यक हो :

यह भी प्रावधान है कि विलंबित मजदूरी के मामले में प्रतिकर के भुगतान के लिए कोई निर्देश नहीं दिया जाएगा यदि प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि विलंब निम्नलिखित के कारण हुआ है-

  (क)    नियोजित व्यक्ति को देय राशि के संबंध में वास्तविक त्रुटि या वास्तविक विवाद; या

  (ख)    किसी आपातस्थिति की स्थिति में या असाधारण परिस्थितियों के कारण, मजदूरी के भुगतान के लिए जिम्मेदार व्यक्ति, उचित परिश्रम करने के बावजूद, भुगतान करने में असमर्थ था; या

  (ग)    नियोजित व्यक्ति द्वारा भुगतान के लिए आवेदन करने या भुगतान स्वीकार करने में विफलता। ]

[(4) यदि इस धारा के अधीन आवेदन पर सुनवाई करने वाला प्राधिकारी संतुष्ट हो जाता है कि-

  (क)    आवेदन दुर्भावनापूर्ण या तंग करने वाला था, तो प्राधिकारी यह निर्देश दे सकेगा कि आवेदन प्रस्तुत करने वाले व्यक्ति द्वारा नियोक्ता या मजदूरी के भुगतान के लिए जिम्मेदार अन्य व्यक्ति को [ तीन सौ पचहत्तर ] रुपये से अधिक का जुर्माना दिया जाए; या

  (ख)    किसी ऐसे मामले में, जिसमें उपधारा (3) के अधीन प्रतिकर दिए जाने का निर्देश दिया गया है, आवेदक को इस धारा के अधीन प्रतितोष लेने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए था, वहां प्राधिकारी निर्देश दे सकेगा कि नियोजक या मजदूरी के संदाय के लिए उत्तरदायी अन्य व्यक्ति द्वारा [ समुचित सरकार ] को [ तीन सौ पचहत्तर ] रुपए से अधिक का जुर्माना दिया जाए।

(4क) जहां किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के नियोक्ता या नियोजित व्यक्ति के विधिक प्रतिनिधि होने के संबंध में कोई विवाद हो, वहां ऐसे विवाद पर प्राधिकारी का निर्णय अंतिम होगा।

(4ख) इस धारा के अधीन कोई जांच   भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193, 219 और 228 के अर्थान्तर्गत न्यायिक कार्यवाही समझी जाएगी।

(5) इस धारा के अंतर्गत भुगतान के लिए निर्देशित कोई भी राशि वसूल की जा सकेगी -

  (क)    यदि प्राधिकारी मजिस्ट्रेट है, तो प्राधिकारी द्वारा इस प्रकार जुर्माना लगाया जाएगा मानो वह मजिस्ट्रेट के रूप में उसके द्वारा लगाया गया जुर्माना हो, तथा

  (ख)    यदि प्राधिकारी मजिस्ट्रेट नहीं है, तो किसी ऐसे मजिस्ट्रेट द्वारा, जिसे प्राधिकारी इस निमित्त आवेदन करता है, इस प्रकार जुर्माना लगाया जाएगा मानो वह उस मजिस्ट्रेट द्वारा लगाया गया जुर्माना हो।

राज्य संशोधन

आंध्र प्रदेश

धारा 15 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्:-

" 15क I धारा 15 के अंतर्गत कार्यवाही के संबंध में न्यायालय शुल्क में छूट। न्यायालय फीस का भुगतान करने का दायित्व नहीं होगा।—(1) धारा 15 के अधीन किसी कार्यवाही के संबंध में, आवेदक आदेशिका की तामील के लिए देय फीस के अलावा कोई न्यायालय फीस देने के लिए उत्तरदायी नहीं होगा:

बशर्ते कि जहां आवेदन निरीक्षक या धारा 15 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त प्राधिकारी की अनुज्ञा से कार्य करने वाले किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत किया जाता है, वहां वह आदेशिका की तामील के लिए फीस देने का भी उत्तरदायी नहीं होगा।

(2) जहां आवेदक ऐसी कार्यवाहियों में सफल हो जाता है, वहां आवेदन पर सुनवाई करने वाला प्राधिकारी, विहित रीति से न्यायालय फीस की रकम की गणना करेगा, जो उपधारा (1) के अभाव में आवेदक को देय होती और धारा 3 के अधीन मजदूरी के संदाय के लिए उत्तरदायी नियोजक या अन्य व्यक्ति को, वह रकम राज्य सरकार को संदाय करने का निर्देश देगा। जहां राशि इस प्रकार संदत्त नहीं की जाती है, वहां वह वसूली के किसी अन्य तरीके पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उसी प्रकार वसूल की जा सकेगी मानो वह भू-राजस्व का बकाया हो" - आंध्र प्रदेश अधिनियम संख्या 21, 1968।

गुजरात

धारा 15 की उपधारा (1क) में, "श्रम न्यायालय" शब्दों से प्रारंभ होने वाले और "न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्दों पर समाप्त होने वाले भाग के स्थान पर निम्नलिखित प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्: -

  "बॉम्बे औद्योगिक संबंध अधिनियम, 1946 के तहत गठित एक वजीफा पाने वाले न्यायिक मजिस्ट्रेट के रूप में (या श्रम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में या औद्योगिक न्यायालय के न्यायिक सदस्य के रूप में) या औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत गठित एक न्यायाधिकरण के पीठासीन अधिकारी के रूप में" - गुजरात अधिनियम संख्या 26, 1961।

हरियाणा

धारा 16 की उपधारा (1) के परन्तुक के पश्चात् निम्नलिखित परन्तुक जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-

" आगे यह भी प्रावधान है कि राज्य सरकार किसी भी मामले को एक प्राधिकरण से दूसरे प्राधिकरण को स्थानांतरित कर सकती है।" - हरियाणा अधिनियम संख्या 5, 1985।

कर्नाटक

धारा 15 में -

  (1)    उपधारा (2) में, "उपधारा (3)" शब्दों, कोष्ठकों और अंक के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-

         "और नियोजित व्यक्ति की मृत्यु की स्थिति में, उसके विधिक प्रतिनिधियों के लिए ऐसे निर्देश के लिए आवेदन करना वैध होगा";

  (2)    उपधारा (5) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा प्रतिस्थापित की जाएगी, अर्थात्:-

         "(5) इस धारा के अधीन भुगतान के लिए निर्देशित कोई रकम प्राधिकरण द्वारा भू-राजस्व के बकाया के रूप में वसूल की जा सकेगी और उस प्रयोजन के लिए प्राधिकरण को राजस्व वसूली अधिनियम, 1890 की धारा 5 के अर्थान्तर्गत लोक अधिकारी समझा जाएगा।" - कर्नाटक अधिनियम संख्या 2, 1977।

धारा 15 में, "वजीफाभोगी मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर, "न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे— मैसूर अधिनियम संख्या 13, 1965।

धारा 15 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्:-

" 15क I न्यायालय शुल्क के भुगतान का दायित्व। - (1) धारा 15 के अधीन किसी कार्यवाही में, आवेदक ऐसी कार्यवाही के संबंध में कोई न्यायालय फीस (आदेशिका की तामील के लिए देय फीस के अलावा) देने के लिए उत्तरदायी नहीं होगा:

बशर्ते कि जब आवेदन निरीक्षक द्वारा प्रस्तुत किया जाता है तो वह प्रक्रिया शुल्क का भुगतान करने के लिए भी उत्तरदायी नहीं होगा।

(2) जहां आवेदक ऐसी कार्यवाहियों में सफल हो जाता है, वहां आवेदन पर सुनवाई करने वाला प्राधिकारी न्यायालय फीस की रकम की गणना करेगा जो उपधारा (1) के अभाव में आवेदक को देय होती और धारा 3 के अधीन मजदूरी के संदाय के लिए उत्तरदायी नियोजक या अन्य व्यक्ति को राज्य सरकार को ऐसी रकम का संदाय करने का निर्देश देगा। ऐसी राशि, वसूली के किसी अन्य तरीके पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, भू-राजस्व के बकाया के रूप में वसूली योग्य होगी।

(3) जब धारा 15 के अधीन आवेदन करने वाले किसी व्यक्ति द्वारा धारा 17 के अधीन अपील की जाती है, तब उपधारा (1) और (2) के उपबंध यथावश्यक परिवर्तनों सहित इस उपांतरण के साथ लागू होंगे कि ऐसा व्यक्ति, जो निरीक्षक न हो, पांच रुपए की राशि का न्यायालय शुल्क देगा, किन्तु ऐसी राशि उसे अपील में सफल होने की दशा में वापस कर दी जाएगी - कर्नाटक अधिनियम संख्या 2, 1977।

मध्य प्रदेश

धारा 15 में, -

   (i)    उपधारा (1) में, "कर्मकार प्रतिकर आयुक्त या सिविल न्यायालय के न्यायाधीश या वजीफा पाने वाले मजिस्ट्रेट के रूप में अनुभव रखने वाला कोई अन्य अधिकारी जो प्राधिकारी होगा" शब्दों के स्थान पर, "एक या एक से अधिक व्यक्ति जो प्राधिकारी या प्राधिकारी होंगे" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;

  (ii)    उपधारा (1) के पश्चात् निम्नलिखित उपधाराएं अंतःस्थापित की जाएंगी, अर्थात्:-  

         "(1क) कोई व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन प्राधिकारी के रूप में नियुक्ति के लिए तब तक अर्हित नहीं होगा, जब तक कि वह कर्मकार प्रतिकर आयुक्त या कोई अन्य अधिकारी न हो, जिसे मध्य प्रदेश औद्योगिक संबंध अधिनियम, 1960 (क्रमांक 27, 1960) के अधीन गठित सिविल न्यायालय या श्रम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में अनुभव हो।"

         (1ख) जहां किसी विनिर्दिष्ट क्षेत्र के लिए उपधारा (1) के अधीन एक से अधिक व्यक्ति प्राधिकारी के रूप में नियुक्त किए जाते हैं, वहां राज्य सरकार, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, इस प्रकार नियुक्त प्राधिकारियों के बीच कार्य के वितरण के लिए ऐसी व्यवस्था कर सकेगी, जैसी वह ठीक समझे।";

(iii)    उपधारा (2) में, -

  (क)    "उसकी ओर से कार्य करने के लिए" शब्दों के पश्चात्, "या मध्य प्रदेश औद्योगिक संबंध अधिनियम, 1960 (क्रमांक 27 सन् 1960) के अधीन उस रूप में मान्यता प्राप्त प्रतिनिधि संघ" शब्द, अंक और कोष्ठक अंत:स्थापित किए जाएंगे;

  (ख)    उपधारा (3) शब्दों, कोष्ठकों और अंक के पश्चात्, "और नियोजित व्यक्ति की मृत्यु की स्थिति में, उसके विधिक प्रतिनिधि के लिए ऐसे निदेश के लिए आवेदन करना वैध होगा" शब्द अंत:स्थापित किए जाएंगे;

   (ग)    दोनों परन्तुकों में "छह मास" शब्दों के स्थान पर "एक वर्ष" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;

(iv)    उपधारा (3) में, -

  (क)    "नियोजित व्यक्ति" शब्दों के पश्चात् "या उसका विधिक प्रतिनिधि, जैसा भी मामला हो," शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे;

  (ख)    "उत्तरार्द्ध में दस रुपए" शब्दों के स्थान पर, "उत्तरार्द्ध मामले में पच्चीस रुपए और प्राधिकरण ऐसे मामलों में, जहां कटौती की गई राशि या विलंबित मजदूरी का भुगतान नियोक्ता द्वारा आवेदन के निपटारे से पहले किया जाता है, ऐसे मुआवजे का भुगतान नियोजित व्यक्ति या उसके विधिक प्रतिनिधि को करने का निर्देश दे सकता है" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;

   (ग)    परंतुक में, "नियोजित व्यक्ति" शब्दों के दो बार आने के पश्चात, "या उसका विधिक प्रतिनिधि" शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे; तथा

  (v)    उपधारा (4) के स्थान पर निम्नलिखित उपधाराएं प्रतिस्थापित की जाएंगी, अर्थात्:-

         “(4) यदि इस धारा के अधीन किसी आवेदन पर सुनवाई करने वाला प्राधिकारी इस बात से संतुष्ट है कि, -

   (i)    आवेदन दुर्भावनापूर्ण या तंग करने वाला था, तो प्राधिकारी यह निर्देश दे सकता है कि आवेदन प्रस्तुत करने वाले व्यक्ति द्वारा नियोक्ता या मजदूरी के भुगतान के लिए जिम्मेदार अन्य व्यक्ति को पचास रुपये से अधिक का जुर्माना दिया जाए; या

  (ii)    किसी ऐसे मामले में, जिसमें उपधारा (3) के अधीन प्रतिकर दिए जाने का निर्देश दिया गया है, आवेदक को इस धारा के अधीन प्रतितोष लेने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए था, वहां प्राधिकारी निर्देश दे सकता है कि पचास रुपए से अधिक की शास्ति भी नियोजक या मजदूरी के संदाय के लिए उत्तरदायी अन्य व्यक्ति द्वारा दी जाए, जो संदत्त या वसूल किए जाने पर राज्य सरकार के खाते में जमा कर दी जाएगी।

         (4क) जहां यह प्रश्न उठता है कि कोई व्यक्ति मृतक नियोजित व्यक्ति का विधिक प्रतिनिधि है या नहीं, वहां ऐसे प्रश्न का अवधारण उपधारा (1) के अधीन नियुक्त प्राधिकारी द्वारा किया जाएगा और उसका विनिश्चय अंतिम होगा।

         (4ख) इस धारा के अधीन, यथास्थिति, नियोजित व्यक्ति या उसके विधिक प्रतिनिधि को भुगतान की जाने वाली निर्दिष्ट रकम का भुगतान, इस अधिनियम के अधीन ऐसा भुगतान करने के दायित्व से नियोजक की पूर्ण और सम्पूर्ण उन्मुक्ति होगी और उसके संबंध में नियोजक के विरुद्ध कोई और दावा नहीं किया जा सकेगा।" - मध्य प्रदेश अधिनियम क्रमांक 2 सन् 1964।

महाराष्ट्र

उक्त अधिनियम की धारा 15 में, -

  (क)    उपधारा (1) में, "किसी को नियुक्त करना" शब्दों से प्रारंभ होने वाले और "प्राधिकरण होना" शब्दों पर समाप्त होने वाले शब्दों और अंकों के स्थान पर, "एक या अधिक व्यक्तियों को प्राधिकरण या प्राधिकरणों के रूप में नियुक्त करना" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;

(कक)   उपधारा (1) में, "सिविल न्यायालय" शब्दों के पश्चात् "या बम्बई औद्योगिक संबंध अधिनियम, 1946 के अधीन गठित श्रम न्यायालय" शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे;

  (ख)    उपधारा (1) के पश्चात् निम्नलिखित नई उपधाराएं अंतःस्थापित की जाएंगी,   अर्थात्   :-

         "(1क) कोई व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन प्राधिकारी के रूप में नियुक्ति के लिए तब तक योग्य नहीं होगा जब तक कि वह कर्मकार प्रतिकर आयुक्त या सिविल न्यायालय के    न्यायाधीश के रूप में अनुभव रखने वाला कोई अन्य अधिकारी न हो, या;

         वेतनभोगी न्यायिक मजिस्ट्रेट के रूप में, या श्रम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में, या बॉम्बे औद्योगिक संबंध अधिनियम, 1946 के अंतर्गत गठित औद्योगिक न्यायालय के न्यायिक सदस्य के रूप में, या औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अंतर्गत गठित अधिकरण के अध्यक्ष के रूप में।

         (1ख) जहां किसी विनिर्दिष्ट क्षेत्र के लिए उपधारा (1) के अधीन एक से अधिक व्यक्ति प्राधिकारी के रूप में नियुक्त किए जाते हैं, वहां राज्य सरकार, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, इस प्रकार नियुक्त प्राधिकारियों के बीच कार्य के वितरण के लिए ऐसी व्यवस्था कर सकेगी, जैसी वह ठीक समझे।";

  ( घ)    उपधारा (2) में, -

   (i)    "उसकी ओर से कार्य करने के लिए" शब्दों के पश्चात् "या बम्बई औद्योगिक संबंध अधिनियम, 1946 के अधीन उस रूप में पंजीकृत प्रतिनिधि संघ" शब्द और अंक अंतःस्थापित किए जाएंगे;

  (ii)    "उपधारा (3)" शब्दों, कोष्ठकों और अंक के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-

         "और नियोजित व्यक्ति की मृत्यु की स्थिति में, उसके विधिक प्रतिनिधि के लिए ऐसे निर्देश के लिए आवेदन करना वैध होगा";

(iii)    दोनों परन्तुकों में, "छह मास" शब्दों के स्थान पर "एक वर्ष" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;

  ( ड़ )    उपधारा (3) में, -

   (i)    "नियोजित व्यक्ति को धन वापसी" शब्दों के स्थान पर "नियोजित व्यक्ति या उसके विधिक प्रतिनिधि को धन वापसी, जैसा भी मामला हो" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;

  (ii)    "उत्तरार्द्ध में पच्चीस रुपए" शब्दों के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-

         "और प्राधिकरण ऐसे मामलों में ऐसे मुआवजे के भुगतान का निर्देश दे सकता है, जहां कटौती की गई राशि या विलंबित मजदूरी का भुगतान नियोक्ता द्वारा आवेदन के निपटान से पहले नियोजित व्यक्ति या उसके कानूनी प्रतिनिधि को किया जाता है";

(iii)    उपधारा (3) में, "दस रुपए" शब्दों के स्थान पर "पच्चीस रुपए" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;

  (iv)    परंतुक में, "नियोजित व्यक्ति" शब्दों के पश्चात्, जहां भी वे आते हैं, वहां "या उसका विधिक प्रतिनिधि" शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे;

  (च)    उपधारा (4) के स्थान पर निम्नलिखित प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:—

                “(4) यदि धारा के अधीन किसी आवेदन पर सुनवाई करने वाला प्राधिकारी इस बात से संतुष्ट हो जाता है कि,—

    ( i )     आवेदन दुर्भावनापूर्ण या तंग करने वाला था, तो प्राधिकारी यह निर्देश दे सकेगा कि आवेदन प्रस्तुत करने वाले व्यक्ति द्वारा नियोक्ता या मजदूरी के भुगतान के लिए जिम्मेदार अन्य व्यक्ति को पचास रुपए से अधिक का जुर्माना दिया जाए; या

  ( ii )     किसी ऐसे मामले में, जिसमें उपधारा (3) के अधीन प्रतिकर दिए जाने का निर्देश दिया गया है, आवेदक को इस धारा के अधीन प्रतितोष लेने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए था, वहां प्राधिकारी निर्देश दे सकेगा कि नियोक्ता या मजदूरी के संदाय के लिए उत्तरदायी अन्य व्यक्ति द्वारा पचास रुपए से अधिक का जुर्माना भी दिया जाए। ऐसे जुर्माने की राशि जब अदा कर दी जाएगी या वसूल कर ली जाएगी तो वह राज्य सरकार के खाते में जमा कर दी जाएगी।"

    ( छ )     उपधारा (5) के स्थान पर निम्नलिखित प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:—

                "(5) इस धारा के अधीन भुगतान किए जाने के लिए निर्देशित कोई भी राशि प्राधिकरण द्वारा भू-राजस्व के बकाया के रूप में वसूल की जा सकेगी और उस प्रयोजन के लिए प्राधिकरण को राजस्व वसूली अधिनियम, 1890 की धारा 5 के अर्थान्तर्गत लोक अधिकारी समझा जाएगा।"

  ( ज )     उपधारा (5) के पश्चात् निम्नलिखित जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-

                (6) "(6) जहां यह प्रश्न उठता है कि कोई व्यक्ति मृतक नियोजित व्यक्ति का विधिक प्रतिनिधि है या नहीं, ऐसे प्रश्न का निर्धारण प्राधिकारी द्वारा किया जाएगा और प्राधिकारी का निर्णय अंतिम होगा।" - महाराष्ट्र अधिनियम संख्या 48, 1955, 13, 1961, 63, 1953 और 70, 1954।

 
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