सूचना के लिए समय सीमा
सूचना के लिए समय सीमा
149. 17[(1) धारा 148 के अधीन कोर्इ सूचना सुसंगत निर्धारण वर्ष के लिए तब तक जारी18 नहीं की जाएगी यदि–
19[(क) सुसंगत निर्धारण वर्ष के अंत से चार वर्ष बीत चुके हैं, जब तक कि मामला खंड (ख) 19क[या खंड (ग)] के अंतर्गत न आता हो,
(ख) सुसंगत निर्धारण वर्ष के अंत से चार वर्ष किंतु अधिक से अधिक छह वर्ष बीत चुके हैं, जब तक कि कर से प्रभार्य आय, जो निर्धारण से छूट गर्इ थी, उस वर्ष के लिए एक लाख रुपए या अधिक की कोटि में नहीं आती या आनी संभाव्य नहीं है20।
20क[(ग) यदि सुसंगत निर्धारण वर्ष के अंत से चार वर्ष, किन्तु सोलह वर्ष से अनधिक वर्ष व्यपगत हो चुके हों तो जब तक कि भारत के बाहर स्थित किसी आस्ति के संबंध में (जिसके अंतर्गत किसी अस्तित्व में वित्तीय हित भी है) कर से प्रभार्य ऐसी आय, निर्धारण से छूट नहीं गर्इ है।]
स्पष्टीकरण–इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए कर से प्रभार्य उस आय का अवधारण करने के लिए जो निर्धारण से छूट गर्इ है, धारा 147 के स्पष्टीकरण 2 के उपबंध वैसे ही लागू होंगे जैसे वे उस धारा के प्रयोजनों के लिए लागू होते हैं।]
(2) उपधारा (1) के उपबंध, सूचना के जारी किए जाने के संबंध में धारा 151 के उपबंधों के अधीन होंगे।
(3) यदि वह व्यक्ति, जिस पर धारा 148 के अधीन सूचना की तामील की जानी है, ऐसा व्यक्ति है जो धारा 163 के अधीन अनिवासी का अभिकर्ता माना जाता है, और सूचना के अनुसरण में किया जाने वाला निर्धारण, पुन: निर्धारण या पुन: संगणना ऐसे अनिवासी के अभिकर्ता के रूप में उस पर की जानी है तो सूचना, सुसंगत निर्धारण वर्ष के अंत से 20ख[छह] वर्ष की कालावधि की समाप्ति के पश्चात् जारी नहीं की जाएगी।
20क[स्पष्टीकरण–शंकाओं को दूर करने के लिए यह स्पष्ट किया जाता है कि वित्त अधिनियम, 2012 द्वारा यथासंशोधित उपधारा (1) और उपधारा (3) के उपबंध, 1 अप्रैल, 2012 को या उसके पूर्व आरंभ होने वाले किसी निर्धारण वर्ष के लिए भी लागू होंगे।]
17. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से प्रतिस्थापित।
18. "जारी" पद के लिए सम्बंधित केस लाज़ देखिए।
19. वित्त अधिनियम, 2001 द्वारा 1.6.2001 से खंड (क) और (ख) प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व, प्रत्यक्ष कर विधि (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से यथा संशोधित खंड (क) और (ख) इस प्रकार थे :
‘‘(क) ऐसे मामले में, जिसमें धारा 143 की उपधारा (3) या धारा 147 के अधीन निर्धारण ऐसे निर्धारण वर्ष के लिए किया गया,–
(i) यदि सुसंगत निर्धारण वर्ष के अंत से चार वर्ष बीत चुके हैं, जब तक कि मामला उपखंड (ii) या उपखंड (iii) के अंतर्गत न आता हो;
(ii) यदि सुसंगत निर्धारण वर्ष के अंत से चार वर्ष किंतु ज्यादा से ज्यादा सात वर्ष बीत चुके हैं, तो जब तक कि कर से प्रभार्य आय, जो निर्धारण से रह गर्इ थी, उस वर्ष के लिए पचास हजार रुपए या अधिक की कोटि में न आती हो या आनी संभाव्य न हो;
(iii) यदि सुसंगत निर्धारण वर्ष के अंत से सात वर्ष किंतु ज्यादा से ज्यादा दस वर्ष बीत चुके हैं, जब तक कि कर से प्रभार्य आय, जो निर्धारण से रह गर्इ थी, एक लाख रुपए या अधिक की कोटि में न आती हो या आनी संभाव्य न हो;
(ख) किसी अन्य मामले में,–
(i) यदि सुसंगत निर्धारण वर्ष के अंत से चार वर्ष बीत चुके हैं, जब तक कि मामला उपखंड (ii) या उपखंड (iii) के अंतर्गत नहीं आता हो;
(ii) यदि सुसंगत निर्धारण वर्ष के अंत से चार वर्ष किंतु ज्यादा से ज्यादा सात वर्ष बीत चुके हैं, जब तक कि कर से प्रभार्य आय, जो निर्धारण से रह गर्इ थी, उस वर्ष के लिए पच्चीस हजार रुपए या अधिक की कोटि में न आती हो या आनी संभाव्य न हो;
(iii) यदि सुसंगत निर्धारण वर्ष के अंत से सात वर्ष किंतु ज्यादा से ज्यादा दस वर्ष बीत चुके हैं, जब तक कि कर से प्रभार्य आय, जो निर्धारण से रह गर्इ थी, उस वर्ष के लिए पचास हजार रुपए या अधिक की कोटि में न आती हो या आनी संभाव्य न हो।’’
19क. वित्त अधिनियम, 2012 द्वारा 1.7.2012 से अंत:स्थापित।
20. "एक लाख रुपए या अधिक की कोटि में नहीं आती या आनी संभाव्य नहीें है" पद के अर्थ के लिए सम्बंधित केस लाज़ देखिए।
20क. वित्त अधिनियम, 2012 द्वारा 1.7.2012 से अंत:स्थापित।
20ख. वित्त अधिनियम, 2012 द्वारा 1.7.2012 से "दो" के स्थान पर प्रतिस्थापित।
[वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2014 द्वारा संशोधित रूप में]

