कतिपय मामलों में लेखा पद्धति
96[कतिपय मामलों में लेखा पद्धति
145क. धारा 145 में अंतर्विष्ट किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी,-
(क) "कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ" शीर्ष के अधीन प्रभार्य आय के अवधारण के प्रयोजनों के लिए माल के क्रय और विक्रय तथा सूची का मूल्यांकन,–
(i) निर्धारिती द्वारा नियमित रूप से लागू की जाने वाली लेखा पद्धति के अनुसार होगा;
(ii) निर्धारिती द्वारा माल को उसके अवस्थान स्थल पर और मूल्यांकन की तारीख की स्थिति में लाने के लिए वास्तव में संदत्त या उपगत किसी कर, शुल्क, उपकर या फीस (चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो) की रकम को सम्मिलित करने के लिए समायोजित किया जाएगा।
स्पष्टीकरण- इस धारा के प्रयोजनों के लिए, तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन किसी कर, शुल्क, उपकर या फीस (चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो) के अंतर्गत, ऐसे संदाय के परिणामस्वरूप उद्भूत किसी अधिकार के होते हुए भी, सभी ऐसे संदाय आएंगे;
(ख) किसी निर्धारिती द्वारा, यथास्थिति प्रतिकर या वर्धित प्रतिकर पर प्राप्त ब्याज उस वर्ष की आय समझा जाएगा, जिसमें वह प्राप्त होता है।]
96. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2009 द्वारा 1.4.2010 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से अंत:स्थापित धारा 145क इस प्रकार थी :
"145क. कतिपय मामलों में लेखा पद्धति–धारा 145 में किसी बात के प्रतिकूल होते हुए भी ‘‘कारबार या वृत्ति से लाभ और अभिलाभ’’ शीर्ष के अधीन प्रभार्य आय अवधारित करने के प्रयोजनों के लिए माल के क्रय और विक्रय का मूल्यांकन तथा सूची–
(क) निर्धारिती द्वारा नियमित रूप से प्रयुक्त लेखा पद्धति के अनुसार होगी; और
(ख) माल को उसके स्थान पर और मूल्यांकन की तारीख की स्थिति में लाने के लिए निर्धारिती द्वारा वास्तव में अदा या उपगत कोर्इ कर, शुल्क, उपकर या फीस (उसका जो भी नाम हो) की राशि शामिल करने के लिए आगे समायोजित की जाएगी।
स्पष्टीकरण.–इस धारा के प्रयोजनों के लिए तत्समय लागू किसी विधि के अधीन किसी कर, शुल्क, उपकर या फीस (उसका जो भी नाम हो) में ऐसे भुगतान के परिणामस्वरूप उत्पन्न किसी अधिकार के होते हुए भी, ऐसे सब भुगतान शामिल होंगे।"
[वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2014 द्वारा संशोधित रूप में]

