निर्धारण के पूर्व जांच
निर्धारण के पूर्व जांच
142. (1) इस अधिनियम के अधीन निर्धारण करने के प्रयोजनों के लिए निर्धारण अधिकारी किसी निर्धारण के पूर्व, ऐसे व्यक्ति पर, जिसने धारा 115बध या धारा 139 के अधीन विवरणी दी है, या जिसके मामले में धारा 139 की उपधारा (1) के अधीन विवरणी देने के लिए अनुज्ञात समय समाप्त हो गया है, ऐसी सूचना की तामील कर सकेगा जिसमें उससे अपेक्षा की जाएगी कि वह उसमें विनिर्दिष्ट की जाने वाली तारीख को,–
(i) जहां ऐसे व्यक्ति ने धारा 139 की उपधारा (1) के अधीन अनुज्ञात समय के भीतर या सुसंगत निर्धारण वर्ष की समाप्ति से पूर्वविवरणी नहीं दी है, वहां अपनी आय की या किसी अन्य व्यक्ति की आय की, जिसकी बाबत वह इस अधिनियम के अधीन निर्धार्य है, विहित प्ररूप में और विहित रीति से सत्यापित तथा ऐसी अन्य विशिष्टियों को, जो विहित की जाएं, उल्लिखित करते हुए, एक विवरणी दे, या :
परंतु जहां किसी ऐसे व्यक्ति पर, जिसने धारा 139 की उपधारा (1) के अधीन अनुज्ञात समय के भीतर या सुसंगत निर्धारण वर्ष की समाप्ति से पूर्व विवरणी नहीं दी है, 1 अपै्रल, 1990 को या उसके पश्चात् प्रारंभ होने वाले सुसंगत निर्धारण वर्ष की समाप्ति के पश्चात् इस खंड के प्रयोजनों के लिए, इस उपधारा के अधीन किसी सूचना की तामील की गर्इ है, वहां उसे जारी की गर्इ किसी ऐसी सूचना के संबंध में यह समझा जाएगा कि उसकी इस उपधारा के उपबंधों के अनुसार तामील कर दी गर्इ है।
(ii) ऐसे लेखे या दस्तावेज पेश करे या पेश कराए जिनकी निर्धारण अधिकारी अपेक्षा करे, या
(iii) ऐसे प्ररूप में और ऐसे मुद्दों या विषयों पर (जिनके अंतर्गत निर्धारिती की सब आस्तियों और दायित्वों का विवरण भी है, चाहे वे लेखाओं में सम्मिलित हो या न हो) जिनकी कि निर्धारण अधिकारी अपेक्षा करे, लिखित रूप में और विहित रीति से सत्यापित जानकारी दे :
परन्तु–
(क) लेखाओं में सम्मिलित न की गर्इ सब आस्तियों और दायित्वों का विवरण देने के लिए निर्धारिती से अपेक्षा करने से पूर्व संयुक्त आयुक्त का पूर्व अनुमोदन अभिप्राप्त किया जाएगा;
(ख) निर्धारण अधिकारी पूर्ववर्ष से तीन वर्ष से अधिक पूर्व की कालावधि से सम्बद्ध कोर्इ लेखे पेश करने की अपेक्षा नहीं करेगा।
(2) किसी व्यक्ति की आय या हानि की बाबत पूरी जानकारी अभिप्राप्त करने के प्रयोजन के लिए निर्धारण अधिकारी ऐसी जांच कर सकेगा जैसी वह आवश्यक समझता है।
(2क) यदि अपने समक्ष कार्यवाहियों के किसी प्रक्रम पर निर्धारण अधिकारी की निर्धारिती के लेखाओं की प्रकृति और जटिलता, लेखाओं की मात्रा, लेखाओं की शुद्धता के बारे में शंकाओं, लेखाओं में संव्यवहारों की बहुलता या कारबार क्रियाकलाप की विशिष्ट प्रकृति को और राजस्व के हित को ध्यान में रखते हुए, यह राय है कि ऐसा करना आवश्यक है, तो वह प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त के पूर्व अनुमोदन से निर्धारिती को निदेश दे सकेगा कि वह धारा 288 की उपधारा (2) के नीचे के स्पष्टीकरण में यथा परिभाषित और इस निमित्त प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा नामनिर्देशित किसी लेखापाल से लेखाओं की संपरीक्षा कराए और विहित फार्म में ऐसी संपरीक्षा की ऐसे लेखापाल द्वारा सम्यक् रूप में हस्ताक्षरित और सत्यापित रिपोर्ट प्रस्तुत करे, जिसमें ऐसी विशिष्टियां हों, जो विहित की जाए; या ऐसी अन्य विशिष्टियां हों, जिनकी निर्धारण अधिकारी अपेक्षा करे:
परंतु निर्धारण अधिकारी निर्धारिती को लेखाओं को इस प्रकार संपरीक्षित कराने का तब तक निदेश नहीं देगा जब तक कि निर्धारिती को सुने जाने का युक्तियुक्त अवसर न दे दिया गया हो।
(2ख) उपधारा (2क) के उपबंध इस बात के होते हुए भी प्रभावी होंगे कि निर्धारिती के लेखाओं की तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन या अन्यथा संपरीक्षा की गर्इ है।
(2ग) उपधारा (2क) के अधीन प्रत्येक रिपोर्ट निर्धारिती द्वारा निर्धारण अधिकारी को इतनी कालावधि के अन्दर दी जाएगी जितनी निर्धारण अधिकारी द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए :
परन्तु निर्धारण अधिकारी स्वप्रेरणा से या इस निमित्त निर्धारिती द्वारा आवेदन किए जाने पर तथा किसी अच्छे और पर्याप्त कारण से उक्त कालावधि को इतनी अतिरिक्त कालावधि या कालावधियों तक बढ़ा सकेगा जितनी वह ठीक समझता है, किन्तु मूलत: नियत कालावधि और इस प्रकार बढ़ार्इ गर्इ कालावधि या कालावधियों का योग किसी भी दशा में उस तारीख से, जिसको उपधारा (2क) के अधीन निर्धारिती द्वारा निदेश प्राप्त किया जाता है, एक सौ अस्सी दिन से अधिक नहीं होगा।
(2घ) उपधारा (2क) के अधीन किसी संपरीक्षा के व्यय तथा उसके आनुषंगिक व्यय (जिनके अंतर्गत लेखापाल का पारिश्रमिक भी है) प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा अवधारित किए जाएंगे; (जो अवधारणा अंतिम होगा) और निर्धारिती द्वारा संदत्त किए जाएंगे तथा ऐसे संदाय में व्यतिक्रम होने पर निर्धारिती से उस रीति से वसूल किए जा सकेंगे जो कर के बकाया की वसूली के लिए अध्याय 17घ में उपबंधित है:
परंतु जहां उपधारा (2क) के अधीन संपरीक्षा के लिए कोर्इ ऐसा निदेश निर्धारण अधिकारी द्वारा 1 जून, 2007 को या उसके पश्चात् जारी किया जाता है, वहां किसी ऐसी संपरीक्षा के, और उसके आनुषंगिक, व्यय (जिनके अंतर्गत लेखाकार का पारिश्रमिक भी है), प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा ऐसे दिशानिर्देशों के अनुसार अवधारित किए जाएंगे, जो विहित किए जाएं और इस प्रकार अवधारित व्ययों का केंद्रीय सरकार द्वारा संदाय किया जाएगा।
(3) निर्धारिती को, वहां के सिवाय जहां निर्धारण धारा 144 के अधीन किया जाता है, किसी ऐसी सामग्री की बाबत सुनवार्इ का अवसर दिया जाएगा जो उपधारा (2) के अधीन किसी जांच के या उपधारा (2क) के अधीन किसी संपरीक्षा के आधार पर एकत्रित की गर्इ है और निर्धारण के प्रयोजनों के लिए जिसका उपयोग किया जाना प्रस्थापित है।
(4) इस धारा के उपबंध, जैसे कि वे प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 (1988 का 4) द्वारा उनके संशोधन के ठीक पूर्व थे, 1 अप्रैल, 1988 को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष या किसी पूर्वतर निर्धारण वर्ष के किसी निर्धारण को और उसके संबंध में लागू होंगे और इस धारा में इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के प्रति निदेशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे उन उपबंधों के प्रति निर्देश हैं जो तत्समय प्रवृत्त थे और सुसंगत निर्धारण वर्ष को लागू होते थे।
[वित्त अधिनियम, 2019 द्वारा संशोधित रूप में]

