आयकर विभाग

वित्त मंत्रालय, भारत सरकार

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धारा 10

आय कुल आय में शामिल नहीं

धारा

धारा संख्या

10

अध्याय शीर्षक

अध्याय III - आय जो कुल आय का हिस्सा नहीं है

अधिनियम

आय-कर अधिनियम, 1961

वर्ष

2000

आय कुल आय में शामिल नहीं

आय कुल आय में शामिल नहीं

अध्याय 3

आय जो कुल आय का भाग नहीं है

आय जो कुल आय के अंतर्गत नहीं आती है

10. किसी व्यक्ति की किसी पूर्ववर्ष की कुल आय संगणित करने में निम्नलिखित खंडों में से किसी में आने वाली कोर्इ आय सम्मिलित नहीं की जाएगी--

(1) कृषि आय;

42(2) 43[धारा 64 की उपधारा (2) के उपबंधों के अंतर्गत रहते हुए,] हिंदू अविभक्त कुटुम्ब के सदस्य के रूप में किसी व्यष्टि द्वारा प्राप्त कोर्इ राशि जहां ऐसी कोर्इ राशि का कुटुम्ब की आय में से भुगतान किया गया हो या किसी अविभाज्य संपदा की दशा में, जहां ऐसी राशि का कुटुम्ब की संपदा की आय में से भुगतान किया गया हो;

44[(2) किसी ऐसे व्यक्ति की दशा में, जो किसी ऐसी फर्म का भागीदार है जिसका उस रूप में पृथकत: निर्धारण किया जाता है, फर्म की कुल आय में उसका अंश।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए, उस रूप में पृथकत: निर्धारित किसी फर्म की कुल आय में किसी भागीदार का अंश किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, वह रकम होगा जिसका फर्म की कुल आय से वही अनुपात है जो भागीदारी विलेख के अनुसार, फर्म के लाभों में उसके अंश की रकम का ऐसे लाभों से है;]

45[46(3) 47कोर्इ प्राप्तियां48 जो आकस्मिक48 और अनावर्ती48 प्रकृति की है, 49[उस परिमाण तक जिस तक ऐसी प्राप्तियां कुल मिलाकर पांच हजार रुपए से अधिक नहीं है]:

50[परंतु जहां ऐसी प्राप्तियां51 दौड़ से, जिसके अंतर्गत घुड़दौड़ है, हुर्इ जीत से संबंधित हैं वहां इस खंड के उपबंध इस प्रकार प्रभावी होंगे मानो "पांच हजार रुपए" शब्दों के स्थान पर "दो हजार पांच सौ रुपए" शब्द रखे गए हों :

परंतु यह और कि] यह खंड निम्नलिखित को लागू नहीं होगा, अर्थात् :--

(i) धारा 45 के उपबंधों के अंतर्गत प्रभार्य पूंजी अभिलाभ; या

(ii) 52कारबार या वृत्ति52 या उपजीविका52 को चलाने से उद्भूत प्राप्तियां52; या

(iii) किसी कर्मचारी के पारिश्रमिक के परिवर्धन के तौर पर हुर्इ प्राप्तियां;] 53[***]

54[***]

55[(4) (i) किसी अनिवासी की दशा में, कोर्इ ऐसी आय, जो उन प्रतिभूतियों या बंधपत्रों पर ब्याज के रूप में हुर्इ हो, जिन्हें केन्द्रीय सरकार, राजपत्र56 में अधिसूचना द्वारा इस संबंध में उल्लिखित करे, जिसके अंतर्गत ऐसे बंधपत्रों के मोचन पर प्रीमियम के रूप में होने वाली आय है;]

57[58(ii) किसी व्यष्टि की दशा में, कोर्इ ऐसी आय, जो भारत में किसी बैंक में अनिवासी (विदेशी) खाते में विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973 (1973 का 46) और उसके अधीन बनाए गए नियमों के अनुसार, उसके खाते में जमा धन पर ब्याज के रूप में हुर्इ हो :

परन्तु यह तब जब कि ऐसा व्यष्टि, उक्त अधिनियम की धारा 2 के खंड ()59 में परिभाषित भारत के बाहर निवासी व्यक्ति है, अथवा वह व्यक्ति है जिसे भारतीय रिजर्व बैंक ने पूर्वोक्त खाता रखने की अनुमति दी है;]]

60[(4) भारत के ऐसे नागरिक या भारतीय उद्भव के ऐसे व्यष्टि की दशा में, जो अनिवासी है, कोर्इ ऐसी आय, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा पुरोधृत ऐसे बचत-पत्रों पर ब्याज से हुर्इ हो, जो वह सरकार राजपत्र61 में अधिसूचना द्वारा इस संबंध में उल्लिखित करे :

परन्तु यह तब जब कि उस व्यष्टि ने ऐसे बचत-पत्रों के लिए भारत में बाहर के किसी देश से विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973 (1973 का 46) और उसके अंतर्गत बनाए गए नियमों के उपबंधों के अनुूसार, संपरिवर्तनीय विदेशी मुद्रा में अभिदाय भेजा है।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए,–

() कोर्इ व्यक्ति भारतीय उद्भव का समझा जाएगा यदि वह या उसके माता-पिता या पितामह-पितामही, मातामह-मातामही में से कोर्इ अविभाजित भारत में जन्मा था;

() "संपरिवर्तनीय विदेशी मुद्रा" का अर्थ है ऐसी विदेशी मुद्रा जो उस समय भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973 (1973 का 46) और उसके अंतर्गत बनाए गए नियमों के प्रयोजनों के लिए संपरिवर्तनीय विदेशी मुद्रा मानी जाती है;]

62[(5) किसी व्यष्टि की दशा में–

() उसे भारत में किसी स्थान के लिए छुट्टी पर जाने के संबंध में अपने और अपने कुटुम्ब के लिए अपने नियोजक से;

() उसे सेवानिवृत्त होने के बाद या सेवा की समाप्ति के बाद भारत में किसी स्थान पर जाने के संबंध में अपने और अपने कुटुम्ब के लिए अपने नियोजक या पूर्व नियोजक से

ऐसी शर्तों के (जिनके अंतर्गत यात्राओं की संख्या और उस रकम के बारे में जो प्रति व्यक्ति छूट प्राप्त होगी, शर्तें भी हैं) अधीन रहते हुए जो केन्द्रीय सरकार के कर्मचारियों को मंजूर की गर्इ यात्रा रियायत या सहायता को ध्यान में रखते हुए, विहित63 की जाएं, प्राप्त या उसे देय किसी यात्रा रियायत या सहायता का मूल्य:

परन्तु इस खंड के अधीन छूट प्राप्त रकम किसी भी मामले में, ऐसी यात्रा के प्रयोजन के लिए वास्तव में उपगत व्यय की रकम से अधिक नहीं होगी।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए किसी व्यष्टि के संबंध में, "कुटुम्ब" का अर्थ है :--

(i) व्यष्टि का पति या पत्नी और संतान; और

(ii) व्यष्टि के माता-पिता, भार्इ और बहन या उनमें से कोर्इ जो व्यष्टि पर पूरी तरह या मुख्य रूप से आश्रित है;]

(5) 64[वित्त (सं.2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से लोप किया गया।]

65[(5) किसी व्यष्टि की दशा में, जो सरकार के, या किसी स्थानीय अधिकारी के, या किसी विशेष विधि के अधीन स्थापित किसी निगम के, या वैज्ञानिक अनुसंधान चलाने के लिए भारत में स्थापित किसी ऐसी संस्था या निकाय के, जो विहित प्राधिकारी66 द्वारा इस खंड 67[***] के प्रयोजनों के लिए अनुमोदित किया जाए (31 मार्च, 1993 के पश्चात् की तारीख से प्रारंभ होने वाले) नियोजन में या भारत में चलने वाले किसी कारबार68 में तकनीकी के रूप में सेवा करता है और वह व्यष्टि, उस वित्तीय वर्ष के, जिसमें वह भारत में पहुंचा, ठीक पूर्ववर्ती चार वित्तीय वर्षों में से किसी वर्ष में भारत में निवासी नहीं रहा है और ऐसी सेवाओं के लिए उसकी आय पर "वेतन" शीर्ष के अंतर्गत प्रभार्य कर का केन्द्रीय सरकार को उसके नियोजक द्वारा भुगतान किया जाता है (जो कर, नियोजक के कंपनी होने की दशा में, कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 20069 में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, भुगतान किया जा सकेगा), वहां उसके भारत पहुंचने की तारीख से प्रारंभ होने वाली अड़तालीस माह से अधिक अवधि के लिए नियोजक द्वारा इस प्रकार भुगतान किया गया कर :

परन्तु यदि केन्द्रीय सरकार लोक हित में ऐसा करना आवश्यक या समीचीन समझती है तो वह ऐसे किसी व्यष्टि की दशा में, जो भारत में किसी मशीनरी या संयंत्र के डिजाइन, परिनिर्माण या उसे प्रारंभ करने के लिए ऐसी डिजाइन परिनिर्माण या प्रारंभ करने से संबंधित क्रियाकलापों के अधीक्षण के लिए नियोजित है, भारत में अनिवास के संबंध में इस खंड में उल्लिखित शर्त का त्याग कर सकती है।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए "तकनीकी" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो,--

(i) सन्निर्माण या विनिर्माण संबंधी संक्रियाओं70 या खनन70 में या विद्युत या किसी अन्य प्रकार की शक्ति के उत्पादन में, या

(ii) कृषि, पशुपालन, डेरी उद्योग, गहरे समुद्र में मछली पकड़ने या पोत निर्माण में, या

(iii) ऐसे अन्य क्षेत्र में, जो केन्द्रीय सरकार, उसमें विशेषज्ञीय ज्ञान और अनुभव रखने वाले भारतीयों की उपलब्धता, देश की आवश्यकताओं और अन्य सुसंगत परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे71,

विशेषज्ञीय ज्ञान और अनुभव रखता है और जो भारत में किसी ऐसी हैसियत में नियोजित है जिसमें ऐसे विशेषज्ञीय ज्ञान और अनुभव का वास्तव में उपयोग होता है;]

(6) ऐसे व्यष्टि की दशा में, जो भारत का नागरिक नहीं है--

72[(i) ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो केन्द्रीय सरकार विहित73 करे, ऐसा यात्रा-व्यय, धन या ऐसी नि:शुल्क या रियायती यात्रा का मूल्य जो ऐसे व्यष्टि को--

() भारत के बाहर अपने घर के लिए छुट्टी पर जाने के संबंध में अपने, अपनी पत्नी या अपने पति और बच्चों के लिए अपने नियोजक से प्राप्त हो या उसके द्वारा देय हो;

(कक) 74[* * *]

() भारत में सेवानिवृत्त होने के पश्चात् या ऐसी सेवा से पर्यवसान के बाद भारत के बाहर अपने देश के लिए जाने के संबंध में अपने, अपनी पत्नी या अपने पति और बच्चों के लिए अपने नियोजक या पूर्व नियोजक से प्राप्त हो या उसके द्वारा देय हो;]

75[(ii) ऐसा पारिश्रमिक, जो उसे किसी विदेशी राज्य के राजदूतावास, उच्चायोग, दूतावास, आयोग, वाणिज्यिक दूतावास या व्यापार प्रतिनिधि के पदधारी के रूप में, चाहे वह किसी भी नाम से जाना जाता हो, या किसी पदधारी के कर्मचारिवृंद के सदस्य के रूप में, उसके द्वारा ऐसी हैसियत से सेवा के लिए प्राप्त हो :

परन्तु ऐसे पारिश्रमिक को, जो उसे भारत में किसी विदेशी राज्य की सरकार के व्यापार आयुक्त या अन्य शासकीय प्रतिनिधि के रूप में (जो उस पद को उस हैसियत में अवैतनिक रूप में धारण न करता हो) या उन पदधारियों में से किसी के कर्मचारिवृंद के सदस्य के रूप में प्राप्त हो वैसी ही छूट प्राप्त होगी जैसी कि यथास्थिति सरकार के तत्समान पदधारियों के या उनके कर्मचारिवृंद के सदस्यों, यदि कोर्इ हों, को संबंधित देश में वैसे प्रयोजनों के लिए निवासी है, और जिसे उस देश में उसी प्रकार की छूट प्राप्त है:

परन्तु यह और कि ऐसे कर्मचारिवृंद के सदस्य उस देश की जनता है जिसका प्रतिनिधित्व किया जा रहा है और ऐसे कर्मचारिवृंद के सदस्य से अन्यथा किसी रूप में किसी कारबार या वृत्ति या नियोजन में नहीं लगे हुए हैं;]

(vi) ऐसा पारिश्रमिक, जो उसे किसी विदेशी उद्यम के कर्मचारी के रूप में भारत में उसके रहने के दौरान उसके द्वारा की गर्इ सेवाओं के लिए प्राप्त हो किन्तु यह तब जब कि निम्नलिखित शर्तें पूरी हों,--

() ऐसा विदेशी उद्यम भारत में किसी व्यापार या कारबार में नहीं लगा हुआ है;

() भारत में उसका रहना उस पूर्व वर्ष में कुल मिलाकर नब्बे दिन की कालावधि से अधिक नहीं है; और

() ऐसे पारिश्रमिक की, नियोजक की ऐसी आय में से जो इस अधिनियम के अधीन प्रभार्य हो, कटौती नहीं की जा सकती;

(viक) 76[वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से लोप किया गया;]

(vii) 77[वित्त अधिनियम, 1993 द्वारा 1.4.1993 से लोप किया गया;]

(viiक) 78[वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से लोप किया गया;]

(viii) "वेतन" शीर्ष के अधीन प्रभार्य कोर्इ आय, जो किसी ऐसे व्यष्टि को जो अनिवासी है किसी विदेशी पोत में अपने नियोजन के संबंध में की गर्इ सेवाओं के लिए पारिश्रमिक के रूप में उसे प्राप्त या देय हो जब कि भारत में उसका रहना पूर्ववर्ष में कुल मिलाकर नब्बे दिन की अवधि से अधिक नहीं;

(ix) 79[वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से लोप किया गया;]

(x) 80[वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से लोप किया गया;]

81[(xi) ऐसा पारिश्रमिक, जो उसे भारत में अपने रहने के दौरान किसी विदेशी राज्य की सरकार के कर्मचारी के रूप में निम्नलिखित के किसी स्थापन कार्यालय में या निम्नलिखित के स्वामित्वाधीन किसी उपक्रम में अपने प्रशिक्षण के संबंध में प्राप्त हो,–

(i) सरकार; या

(ii) कोर्इ कंपनी जिसकी सारी समादत्त शेयर पूंजी केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार या किन्हीं राज्य सरकारों द्वारा या भागत: केन्द्रीय सरकार और भागत: एक या अधिक राज्य सरकारों द्वारा धारित है; या

(iii) कोर्इ कंपनी जो मद (ii) में उल्लिखित किसी कंपनी की समनुषंगी है; या

(iv) कोर्इ निगम जो केन्द्रीय, राज्य या प्रान्तीय अधिनियम द्वारा या उसके अंतर्गत स्थापित किया गया है; या

(v) कोर्इ सोसाइटी जो सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 14) या तत्समय प्रवृत्त किसी तत्समान विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत है और जिसका वित्त पोषण पूरी तरह से केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार या किन्हीं राज्य सरकारों द्वारा या भागत: केन्द्रीय सरकार और भागत:, एक या अधिक राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है;]

82[(6) जहां किसी विदेशी कंपनी की दशा में जिसे उस विदेशी कंपनी द्वारा सरकार या किसी भारतीय समुत्थान से 31 मार्च, 1976 के पश्चात् किए गए किसी करार के अनुसरण में, सरकार या भारतीय समुत्थान के स्वामिस्व या तकनीकी सेवाओं के लिए फीस के रूप में आय व्युत्पन्न होती है 83[और--

() जहां ऐसा करार भारत सरकार की तत्समय प्रवृत्त औद्योगिक नीति में सम्मिलित किसी विषय से संबंधित है वहां ऐसा करार उस नीति के अनुसार है; और

() किसी अन्य दशा में, ऐसा करार83क केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित83क है,

ऐसी आय पर कर, करार के निबंधनों के अधीन, सरकार या भारतीय समुत्थान द्वारा केन्द्रीय सरकार को संदेय है इस प्रकार संदत्त कर।

स्पष्टीकरण.–इस खंड 84[और खंड (6)] के प्रयोजनों के लिए--

() "तकनीकी सेवाओं के लिए फीस" का वही अर्थ है जो धारा 9 की उपधारा (1) के खंड (vii) के स्पष्टीकरण 2 में है;

() "विदेशी कंपनी" का वही अर्थ है जो धारा 80ख में है;

() "स्वामिस्व" का वही अर्थ है जो धारा 9 की उपधारा (1) के खंड (vi) के स्पष्टीकरण 2 में है;]

85[(6) जहां किसी अनिवासी की (जो कंपनी नहीं है) या किसी विदेशी कंपनी की दशा में जिसे केन्द्रीय सरकार द्वारा किसी विदेशी राज्य की सरकार या किसी अंतर्राष्ट्रीय संगठन से किए गए करार के अनुसरण में, सरकार या भारतीय समुत्थान से कोर्इ ऐसी आय व्युत्पन्न होती है (जो वेतन, स्वामिस्व या तकनीकी सेवाओं के लिए फीस के रूप में नहीं है), ऐसी आय पर कर सरकार या भारतीय समुत्थान द्वारा उस करार के या केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित किसी अन्य संबंधित करार के निबंधनों के अधीन केन्द्रीय सरकार को संदेय है, इस प्रकार संदत्त कर ;]

86[(6खख) जहां किसी विदेशी राज्य की सरकार या किसी विदेशी उद्यम की दशा में, जिसे किसी ऐसी भारतीय कंपनी के, जो वायुयान के प्रचालन के कारबार में लगी हुर्इ है, 31 मार्च, 1997 के बाद 87[किंतु 1 अप्रैल, 1999 से पूर्व] किए गए और इस संबंध में केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित करार के अधीन वायुयान या वायुयान इंजन के पट्टे पर अर्जित किए जाने के प्रतिफल के रूप में आय व्युत्पन्न होती है (जो पट्टे पर लिए गए वायुयान के प्रचालन के संबंध में फालतू पुर्जे, सुविधाएं या सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए संदाय से भिन्न है) तथा ऐसी आय पर कर ऐसी भारतीय कंपनी द्वारा उस करार के निबंधनों के अधीन केन्द्रीय सरकार को संदेय है, वहां इस प्रकार संदत्त कर।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए, "विदेशी उद्यम" पद से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो अनिवासी है;]

88[(6) ऐसी िवेदशी कंपनी को, जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना89 द्वारा इस संबंध में उल्लिखित करे भारत की सुरक्षा से संबंधित परियोजनाओं में भारत में या भारत से बाहर सेवाएं प्रदान करने के लिए उस सरकार के साथ हुए किसी करार के अनुसरण में, प्राप्त तकनीकी सेवाओं के लिए फीस के रूप में उत्पन्न कोर्इ आय;]

(7) कोर्इ भी ऐसे भत्ते या परिलब्धियां, जो भारत के बाहर सेवा करने के लिए सरकार द्वारा भारत के किसी नागरिक को भारत के बाहर भुगतान या इस प्रकार अनुज्ञात की गर्इ हों;

(8) ऐसे व्यष्टि की दशा में, जिसको केन्द्रीय सरकार और किसी विदेशी राज्य की सरकार द्वारा किए गए करार के अनुसार (जिसके निबंधनों में इस खंड द्वारा दी गर्इ छूट के लिए उपबंध है) किन्हीं सहकारी तकनीकी सहायता कार्यक्रमों और परियोजनाओं के संबंध में भारत में कर्तव्य सौंपे गए हैं :--

() ऐसा पारिश्रमिक, जो उसे ऐसे कर्तव्यों के लिए उस विदेशी राज्य की सरकार से प्रत्यक्षत: या अप्रत्यक्षत: प्राप्त हो; और

() ऐसे व्यष्टि की अन्य आय जो भारत के बाहर प्रोद्भूत या उत्पन्न हो और भारत में प्रोद्भूत या उत्पन्न हुर्इ न समझी जाए और जिसकी बाबत ऐसे व्यष्टि से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने उद्भव देश की सरकार को कोर्इ आय-कर या सामाजिक सुरक्षा कर का संदाय करे;

90[(8) किसी परामर्शी के मामले में--

() अभिकरण और विदेशी सरकार के बीच तकनीकी सहायता अनुदान करार के अधीन किसी अंतर्राष्ट्रीय संगठन [जिसे इस खंड में और खंड (8) में अभिकरण कहा गया है] को उपलब्ध करार्इ गर्इ निधियों में से उसके द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्राप्त कोर्इ पारिश्रमिक या फीस; और

() कोर्इ अन्य रकम जो उसे भारत के बाहर उद्भूत या उत्पन्न हो और भारत में उद्भूत या उत्पन्न न समझी जाए, जिसके संबंध में ऐसे परामर्शी से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने उद्भव देश की सरकार को कोर्इ आय-कर या सामाजिक सुरक्षा कर का संदाय करे।

स्पष्टीकरण.–इस खंड में, "परामर्शी" का अर्थ है,--

(i) कोर्इ व्यष्टि जो भारत का नागरिक नहीं है या जो भारत का नागरिक है किंतु भारत में साधारणत: निवासी नहीं है; या

(ii) कोर्इ अन्य व्यक्ति जो अनिवासी है,

और जिसे किसी तकनीकी सहायता कार्यक्रम या परियोजना के संबंध में भारत में तकनीकी सेवाएं देने के लिए अभिकरण द्वारा लगाया गया है, परंतु यह तब जबकि निम्नलिखित शर्तें पूरी हो जाएं, अर्थात् :--

(1) तकनीकी सहायता ऐसे करार के अनुसार है जो केन्द्रीय सरकार या अभिकरण द्वारा किया गया है, और

(2) परामर्शी को लगाए जाने से संबंधित करार का विहित प्राधिकारी91 ने इस खंड के प्रयोजनों के लिए अनुमोदन कर दिया है;

(8) किसी व्यष्टि की दशा में, जिसको केन्द्रीय सरकार और अभिकरण द्वारा किए गए किसी करार के अनुसार किसी तकनीकी सहायता कार्यक्रम और परियोजना के संबंध में भारत में कर्तव्य सौंपे जाते हैं,--

() ऐसा पारिश्रमिक जो उसे ऐसे कर्तव्यों के लिए खंड (8) में निर्दिष्ट किसी परामर्शी से प्रत्यक्षत: या अप्रत्यक्षत: प्राप्त हो; और

() ऐसे व्यष्टि की कोर्इ अन्य आय जो भारत के बाहर प्रोद्भूत या उत्पन्न हो और भारत में प्रोद्भूत या उत्पन्न हुर्इ न समझी जाए और जिसके संबंध में ऐसे व्यष्टि से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने उद्भव देश को कोर्इ आयकर या सामाजिक सुरक्षा कर का संदाय करे परंतु यह तब जब कि निम्नलिखित शर्तें पूरी हो जाएं अर्थात् :--

(i) ऐसा व्यष्टि खंड (8) में निर्दिष्ट परामर्शी का कर्मचारी है और जो भारत का नागरिक नहीं है या जो भारत का नागरिक तो है किंतु भारत में साधारणत: निवासी नहीं है; और

(ii) ऐसे व्यष्टि की सेवा की संविदा का विहित प्राधिकारी91 ने उसकी सेवा के आरंभ के पूर्व अनुमोदन कर दिया है;]

(9) किसी ऐसे व्यष्टि के जैसा, 92[यथास्थिति,] खंड (8) 92[या खंड (8) या (8) में] निर्दिष्ट है कुटुम्ब के किसी सदस्य की जो उसके साथ भारत में आया हो, ऐसी आय जो भारत के बाहर प्रोद्भूत या उत्पन्न हो और भारत में प्रोद्भूत या उत्पन्न हुर्इ न समझी जाए और जिसकी बाबत ऐसे सदस्य से यह अपेक्षा की जाती है कि 92[यथास्थिति,] उस विदेशी राज्य की सरकार 92क[या ऐसे सदस्य के उद्भव देश] को कोर्इ आय-कर या सामाजिक सुरक्षा कर का संदाय करे;

93[94(10) 95(i) कोर्इ ऐसा मृत्यु तथा निवृत्ति उपदान जो, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार के संशोधित पेंशन नियमों के या केन्द्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1972 के अधीन या संघ की सिविल सेवाओं के सदस्यों को या संघ के अधीन रक्षा से संबंधित पदों या सिविल पदों के धारकों को (जो सदस्य या धारक ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जो उक्त नियमों से शासित होते हैं) या अखिल भारतीय सेवाओं के सदस्यों को या राज्य की सिविल सेवाओं के सदस्यों को या राज्य के अंतर्गत सिविल पदों के धारण करने वालों या किसी स्थानीय प्राधिकारी के कर्मचारियों को लागू किसी समरूप स्कीम के अधीन प्राप्त किया गया हो या निवृत्ति उपदान का संदाय, जो रक्षा सेवाओं के सदस्यों को लागू पेंशन संहिता या विनियमों के अधीन प्राप्त किया गया हो;

(ii) कोर्इ ऐसा उपदान जो उपदान संदाय अधिनियम, 1972 (1972 का 39) के अधीन प्राप्त किया गया हो उस परिभाषा तक जहां तक वह उस अधिनियम की धारा 496 की उपधारा (2) और (3) के उपबंधों के अनुसार, परिकलित रकम से अधिक नहीं है;

(iii) कोर्इ अन्य उपदान जो किसी कर्मचारी द्वारा अपने सेवानिवृत्त होने पर या ऐसे सेवानिवृत्त होने के पूर्व असमर्थ हो जाने पर या अपने नियोजन के पर्यवसान पर प्राप्त किया गया हो या कोर्इ ऐसा उपदान जो उसकी विधवा बच्चों या आश्रितों द्वारा उसकी मृत्यु पर प्राप्त किया गया हो, दोनों दशाओं में, उस मात्रा तक जहां तक वह संपूरित सेवा के हर एक वर्ष97 के लिए आठ मास के वेतन से अधिक हो 98[जिसका परिकलन उस मास के, जिसमें ऐसी घटना घटती है, ठीक पूर्ववर्ती दस मास के औसत वेतन के आधार पर, ऐसी सीमा99 के अधीन रहते हुए किया गया है जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, उस सरकार के कर्मचारियों को इस निमित्त लागू सीमा को ध्यान में रखते हुए, उल्लेख करे] :

परन्तु जहां इस खंड99क के उल्लिखित उपदान किसी कर्मचारी द्वारा एक से अधिक नियोजक से एक ही पूर्ववर्ष में प्राप्त किए जाते हैं वहां इस खंड के अंतर्गत आय-कर की छूट प्राप्त कुल रकम 1[इस प्रकार विनिर्दिष्ट सीमा से अधिक नहीं होगी] :

परन्तु यह और कि जहां ऐसा एक या अधिक उपदान किसी एक या अधिक पूर्ववर्ती वर्षों में प्राप्त किया गया था और ऐसे एक या अधिक उपदान की रकम को पूरी तरह से भागत: ऐसे पूर्ववर्ष या वर्षों की निर्धारिती की कुल आय में शामिल नहीं किया गया था, वहां इस खंड के अंतर्गत आय-कर से छूट प्राप्त रकम 2[इस प्रकार विनिर्दिष्ट सीमा से अधिक नहीं होगी] जो ऐसे पूर्ववर्ष या वर्षों की कुल आय में शामिल न की गर्इ, यथास्थिति, रकम या कुल रकम को घटाने पर आती है.

3[* * *]

स्पष्टीकरण.–4[इस खंड में और खंड (10कक) में] "वेतन" का वही अर्थ है जो चौथी अनुसूची के भाग क के नियम 2 के खण्ड () में है;]

5[6(10) 7(i) कोर्इ ऐसा संदाय जो केन्द्रीय सरकार के सिविल पेंशन (संराशीकरण) नियम के अंतर्गत 8[या संघ की सिविल सेवाओं के सदस्यों को या संघ के अंतर्गत रक्षा से संबंधित पदों या सिविल पदों को धारण करने वालों को (जो सदस्य या धारक ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जो उक्त नियमों से शासित होते हैं) या अखिल भारतीय सेवा के सदस्यों को या रक्षा सेवाओं के सदस्यों को या किसी राज्य की सिविल सेवाओं के सदस्यों को या राज्य के अंतर्गत सिविल पदों के धारकों को या किसी स्थानीय प्राधिकारी के कर्मचारियों को] या किसी केन्द्रीय, राज्य या प्रान्तीय अधिनियम द्वारा स्थापित निगम के कर्मचारियों को लागू किसी समरूप स्कीम के अधीन;

(ii) कोर्इ ऐसा भुगतान, जो किसी अन्य नियोजक की किसी स्कीम के अंतर्गत प्राप्त पेंशन के संराशीकरण के रूप में किया गया हो उस परिमाण तक जो निम्नलिखित से अधिक न हो--

() उस स्थिति में, जिसमें कर्मचारी कोर्इ उपदान प्राप्त करता है उस पेंशन के, जिसे प्राप्त करने का वह सामान्यत: हकदार है, एक तिहार्इ का संराशित मूल्य; और

() किसी अन्य स्थिति में, ऐसी पेंशन का आधा संराशित मूल्य

और ऐसे संराशित मूल्य का अवधारण प्राप्तिकर्ता की आयु, उसके स्वास्थ्य की स्थिति, ब्याज की दर तथा शासकीय मान्यताप्राप्त मरण सारणियों को ध्यान में रखकर किया गया हो;

9[* * *]

10[(iii) कोर्इ ऐसा भुगतान, जो खंड (23ककख) के अधीन निधि में से प्राप्त पेंशन के संराशीकरण के रूप में किया गया है;]

11[12(10कक) (i) कोर्इ ऐसा भुगतान, जो केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार के किसी कर्मचारी की 13सेवानिवृत्ति 14[चाहे] अधिवर्षिता पर या अन्यथा के समय उसके खाते में जमा अर्जित छुट्टी की अवधि के संबंध में छुट्टी वेतन के समतुल्य नकद के रूप में प्राप्त किया गया हो;

(ii) उपखंड (i) में उल्लिखित प्रकृति का कोर्इ ऐसा संदाय जो केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार के कर्मचारी से भिन्न किसी कर्मचारी को 15[चाहे] अधिवर्षिता पर या अन्यथा उसके सेवानिवृत्त होने के समय उसके खाते में जमा अर्जित छुट्टी की 16[दस] मास से अनधिक अवधि के संबंध में प्राप्त किया गया हो, उस कर्मचारी द्वारा अपनी 15[चाहे] अधिवर्षिता पर या अन्यथा अपनी सेवानिवृत्ति के ठीक पहले दस माह की अवधि के दौरान लिए गए औसत वेतन के आधार पर 17[ऐसी सीमा के अध्यधीन परिकलित किया गया हो, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, उस सरकार के कर्मचारियों को इस संबंध में लागू सीमा18 को ध्यान में रखते हुए, इस बाबत विनिर्दिष्ट करे] :

परन्तु जहां ऐसे कोर्इ भुगतान किसी कर्मचारी द्वारा एक ही पूर्ववर्ष में एक से अधिक नियोजक द्वारा प्राप्त किए जाते हैं वहां इस उपखंड के अंतर्गत आय-कर से छूट की कुल रकम 19[इस प्रकार विनिर्दिष्ट सीमा से अधिक नहीं होगी] :

परन्तु यह और कि जहां ऐसा भुगतान या ऐसे भुगतान किन्हीं एक या अधिक पूर्ववर्ती पूर्ववर्षों में भी प्राप्त किए गए हों और ऐसे भुगतान या भुगतानों की संपूर्ण रकम या उसका कोर्इ भाग ऐसे पूर्ववर्ष या पूर्ववर्षों की निर्धारिती की कुल आय में शामिल नहीं किया गया हो, वहां इस उपखंड के अधीन आयकर से छूट की कुल रकम 20[इस प्रकार विनिर्दिष्ट सीमा से अधिक नहीं होगी] जो यथास्थिति, वह रकम या उन रकमों का योग घटा कर आए, जो किसी पूर्ववर्ष या पूर्ववर्षों की कुल आय में सम्मिलित नहीं है।

21[* * *]

स्पष्टीकरण.–उपखंड (ii) के प्रयोजनों के लिए--

22[* * *] किसी कर्मचारी की अर्जित छुट्टी का हक उस नियोजक की जिसकी सेवा से वह सेवानिवृत्त हुआ है, की गर्इ वास्तविक सेवा के प्रत्येक वर्ष के लिए तीस दिन से अधिक नहीं होगा।

23[* * *]

24[(10) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) या किसी अन्य अधिनियम के अंतर्गत या तदधीन जारी किए गए नियमों, आदेशों या अधिसूचनाओं के अंतर्गत या किन्हीं स्थायी आदेशों के अंतर्गत या किसी अधिनिर्णय या सेवा की संविदा के अंतर्गत या अन्यथा किसी कर्मकार द्वारा 25[उसकी छंटनी के समय प्राप्त प्रतिकर :

परन्तु इस खंड के अंतर्गत छूट प्राप्त रकम,–

(i) वह रकम, जो औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) की धारा 25च के खंड ()26 के उपबंधों के अनुसार परिकलित की गर्इ है; या

27[(ii) पचास हजार रुपए से अन्यून ऐसी रकम, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना28 द्वारा इस संबंध में विनिर्दिष्ट करे,]

इनमें से जो भी कम हो, से अधिक नहीं होगी;

परन्तु यह और कि पूर्ववर्ती परंतुक किसी कर्मकार द्वारा किसी ऐसी स्कीम के अंतर्गत प्राप्त किसी प्रतिकार के संबंध में लागू नहीं होगा जो केन्द्रीय सरकार जिन उपक्रमों में ऐसी स्कीम लागू होती है के कर्मकारों को विशेष संरक्षण देने की आवश्यकता को और अन्य सुसंगत परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, इस संबंध में अनुमोदित करे।]

स्पष्टीकरण.इस खंड के प्रयोजनों के लिए,–

() किसी कर्मकार द्वारा उस उपक्रम के जिसमें वह नियोजित है बंद किए जाने के समय प्राप्त प्रतिकर उसकी छंटनी के समय प्राप्त होने वाला प्रतिकर समझा जाएगा;

() किसी कर्मचारी द्वारा उस उपक्रम के जिसमें वह नियोजित है के संबंध में नियोजक से नए नियोजक को उस उपक्रम के स्वामित्व या प्रबंध के अंतरण के समय (चाहे करार द्वारा या किसी विधि के लागू होने से) प्राप्त प्रतिकर उसकी छंटनी के समय प्राप्त प्रतिकर समझा जाएगा, यदि,--

(i) कर्मकार की सेवा ऐसे अंतरण के कारण विच्छिन्न हुर्इ है; या

(ii) ऐसे अंतरण के पश्चात् उस कर्मकार को लागू होने वाली सेवा की शर्तें और निबंधन अंतरण के ठीक पहले उसको लागू शर्तों और निबंधनों की अपेक्षा किसी बात में कम अनुकूल हैं; या

(iii) ऐसे अंतरण के निबंधनों के अधीन या अन्यथा नया नियोजक उस कर्मकार को उसकी छंटनी के मामले में, इस आधार पर प्रतिकर संदाय करने के लिए विधिक रूप से दायी नहीं है कि उसकी सेवा निरन्तर है और अंतरण से विच्छिन्न नहीं हुर्इ है;

29() "नियोजक" और "कर्मकार" शब्दों के वही अर्थ हैं जो औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) में उनके हैं;]

30[(10खख) भोपाल गैस विभीषिका (दावा कार्यवाही) अधिनियम, 1985 (1985 का 2) और उसके अंतर्गत बनार्इ किसी स्कीम के अंतर्गत किया गया कोर्इ भुगतान, भोपाल गैस विभीषिका के संबंध में, किसी निर्धारिती को किए गए भुगतान को छोड़कर, उस विस्तार तक जिस तक ऐसे निर्धारिती को ऐसी विभीषिका से हुर्इ हानि या नुकसान के कारण इस अधिनियम के अंतर्गत कटौती अनुज्ञात की गर्इ है;]

31[(10) 32कोर्इ भी राशि जो निम्नलिखित के किसी कर्मचारी द्वारा प्राप्त की गर्इ हो--

(i) किसी पब्लिक सेक्टर कंपनी; या

(ii) किसी अन्य कंपनी; या

(iii) किसी केन्द्रीय, राज्य या प्रांतीय अधिनियम के अंतर्गत स्थापित किसी प्राधिकरण; या

(iv) किसी स्थानीय 33[प्राधिकारी; या]

34[(v) किसी सहकारी सोसाइटी; या

(vi) किसी केन्द्रीय, राज्य या प्रांतीय अधिनियम द्वारा या उसके अंतर्गत स्थापित या निगमित किसी विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, 1956 (1956 का 3) की धारा 3 के अंतर्गत विश्वविद्यालय घोषित की गर्इ किसी संस्था; या

(vii) प्रौद्योगिकी संस्थान अधिनियम, 1961 (1961 का 59) की धारा 335 के खंड () के अर्थ में किसी भारतीय प्रौद्यौगिकी संस्थान; या

(viii) ऐसे प्रबंध संस्थान, जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में, अधिसूचना36 द्वारा, इस संबंध में विनिर्दिष्ट करे,]

के किसी कर्मचारी द्वारा अपनी 37[स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति या अपनी सेवा की समाप्ति के समय, स्वेच्छया सेवानिवृत्ति की किसी स्कीम या स्कीमों का उपखंड (i) में निर्दिष्ट पब्लिक सैक्टर कंपनी के मामले में, स्वेच्छया पृथक्करण स्कीम के अनुसार प्राप्त कोर्इ रकम उस परिमाण तक जो पांच लाख रुपए से अधिक नहीं है] :

परन्तु यथास्थिति, उक्त कंपनियों या प्राधिकारियों 38[या सोसाइटियों या विश्व- विद्यालयों, अथवा उपखंड (vii) और उपखंड (viii) में निर्दिष्ट संस्थानों] की, ऐसी रकम के भुगतान को शासित करने वाली स्कीमें ऐसे मार्गदर्शक सिद्धांतों के अनुसार, (जिनके अंतर्गत, अन्य बातों के साथ-साथ, आर्थिक सुदृढ़ता का मापदंड भी सम्मिलित है) बनार्इ जाएगी, जो विहित39 किए जाएं 40[और उपखंड (ii) में निर्दिष्ट कंपनियों या उपखंड (v) में निर्दिष्ट सहकारी सोसाइटियों के संबंध में ऐसी स्कीमें, यथास्थिति, मुख्य आयुक्त या महानिदेशक द्वारा इस निमित्त अनुमोदित की जाए] :

परन्तु यह और कि जहां किसी कर्मचारी को किसी निर्धारण वर्ष के लिए इस खंड के अंतर्गत छूट दी गर्इ है, वहां उसे उसके अधीन किसी अन्य निर्धारण वर्ष के संबंध में छूट नहीं दी जाएगी;]

41[(10) जीवन बीमा पालिसी के अधीन प्राप्त कोर्इ राशि जिसके अंतर्गत ऐसी पालिसी पर बोनस के रूप में आबंटित राशि है 42[और जो धारा 80घघक की उपधारा (3) के अधीन] 43[या प्रमुख व्यक्ति बीमा पालिसी के अधीन प्राप्त किसी राशि से भिन्न है।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए "प्रमुख व्यक्ति बीमा पालिसी" का अर्थ है किसी व्यक्ति द्वारा किसी ऐसे दूसरे व्यक्ति के जीवन के संबंध में, जो प्रथम वर्णित व्यक्ति का कर्मचारी है या था अथवा प्रथम वर्णित व्यक्ति के कारबार से किसी भी रीति से संबंधित है या था, ली गर्इ कोर्इ जीवन बीमा पालिसी है;]]

(11) कोर्इ संदाय जो ऐसी किसी भविष्य निधि में से किया गया हो जिसे भविष्य निधि अधिनियम, 1925 (1925 का 19) लागू होता है 44[अथवा केन्द्रीय सरकार द्वारा स्थापित और उसके द्वारा राजपत्र में इस संबंध में अधिसूचित45 किसी अन्य भविष्य निधि में से किया गया हो];

(12) कोर्इ ऐसा संचित अतिशेष जो किसी मान्यताप्राप्त भविष्य निधि में भाग लेने वाले कर्मचारी को देय हो तथा संदेय हो जाए, उस परिमाण तक जो चौथी अनुसूची के भाग क के नियम 8 में उपबंधित है;

46[(13) किसी अनुमोदित अधिवार्षिकी निधि में से ऐसा संदाय जो--

(i) किसी हिताधिकारी की मृत्यु पर किया गया हो; अथवा

(ii) किसी कर्मचारी को, उल्लिखित आयु का हो जाने पर या उसके पश्चात निवृत्ति पर या ऐसी निवृत्ति से पूर्व अशक्त हो जाने पर, वार्षिकी के बदले में उसके संराशीकरण के रूप में किया गया हो; अथवा

(iii) किसी हिताधिकारी की मृत्यु पर अभिदायों के प्रतिदाय के तौर पर किया गया हो, अथवा

(iv) किसी कर्मचारी को, उस दशा में, जिसमें उसने वह सेवा, जिसके संबंध में निधि स्थापित की है, उल्लिखित आयु का हो जाने या उसके पश्चात निवृत्त होने या ऐसे निवृत्त होने से पूर्व अशक्त हो जाने से छोड़ी है, अभिदायों के प्रतिदाय के तौर पर किया गया हो, उस परिमाण तक जिस तक कि ऐसा भुगतान इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व किए गए अभिदायों और उन पर के ब्याज से अधिक नहीं होता है;]

47[48(13) कोर्इ ऐसा विशेष भत्ता जो किसी निर्धारिती द्वारा उसके अधिभोग में निवास-स्थान के संबंध में किराए के (चाहे वह किसी भी नाम से जाना जाता हो) भुगतान पर वास्तव में हुए व्यय की पूर्ति के लिए उस निर्धारिती को उसके नियोजक द्वारा उल्लिखित रूप से दिया गया हो उस परिमाण तक 49[***] जिस तक कि50 वह उस क्षेत्र या स्थान को, जिसमें ऐसी जगह स्थित है और अन्य सुसंगत बातों को ध्यान में रखते हुए विहित50 किया जाए।]

51[स्पष्टीकरण.–शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि इस खंड की कोर्इ बात किसी दशा में लागू नहीं होगी जिसमें--

() निर्धारिती के अधिभोग में के निवास स्थान का वह स्वामी है; या

() निर्धारिती ने अपने अधिभोग में निवास स्थान की बाबत किराए के (चाहे वह किसी भी नाम से जाना जाता हो) भुगतान पर वास्तव में व्यय उपगत नहीं किया है;]

52[(14) (i) उन व्ययों की, जो लाभ के पद या नियोजन53 के कर्तव्यों के पालन में संपूर्णत:, आवश्यकत: और अनन्यत: उपगत53 किए गए हों, पूर्ति के लिए विनिर्दिष्ट रूप से दिया गया कोर्इ विशेष भत्ता या फायदा, जो धारा 17 के खंड (2) के अर्थ में परिलब्धि की प्रकृति का नहीं है और 54[जो विहित किया जाए] उस परिमाण तक जिस तक ऐसे व्यय उस प्रयोजन के लिए वास्तव में उपगत किए जाते हैं;

(ii) निर्धारिती को, उस स्थान पर जहां वह लाभ के पद या नियोजन55 के कर्तव्य सामान्तया करता है या जहां वह सामान्तया निवास करता है, उसके व्यक्तिगत खर्चे को चुकाने के लिए या बढ़े हुए निर्वाह व्यय को पूरा करने के लिए दिया गया कोर्इ ऐसा भत्ता56, उस मात्रा तक जो विहित किया जाए]:]

57[परंतु उपखंड (ii) की कोर्इ बात, निर्धारिती को उसके पद या नियोजन से संबंधित विशेष प्रकृति के कर्तव्यों का पालन करने के लिए उसे पारिश्रमिक देने या प्रतिकर देने के लिए मंजूर व्यक्तिगत भत्ते की प्रकृति के किसी भत्ते को तब तक लागू नहीं होगी जब तक ऐसा भत्ता उसकी तैनाती के स्थान या निवास-स्थान से संबंधित न हो;]

58[(14) कोर्इ आय जो किसी लोक वित्तीय संस्था द्वारा ऐसी संस्था से विदेशी करेंसी उधार लेने वाले किसी व्यक्ति से एक्सचेंज जोखिम प्रीमियम के रूप में प्राप्त की जाती है, परंतु यह तब जब कि ऐसी प्रीमियम की रकम, ऐसी संस्था द्वारा खंड (23) के अंतर्गत उल्लिखित किसी निधि में जमा की जाती है।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए--

(i) "लोक वित्तीय संस्था" पद का वही अर्थ है जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 4क59 में है;

(ii) "एक्सचेंज जोखिम प्रीमियम" पद का अर्थ ऐसी प्रीमियम है जिसका भुगतान किसी लोक वित्तीय संस्था से विदेशी करेंसी उधार लेने वाले किसी व्यक्ति द्वारा ऐसी जोखिम से रक्षा के लिए किया जाता है जिसे वह संस्था अपने (ऐसी संस्था) द्वारा उधार ली गर्इ विदेशी करेंसी की विनिमय दर से उतार-चढ़ाव के कारण उठाए;

(15) 60[(i) ऐसी प्रतिभूतियों, बंधपत्रों, वार्षिकी पत्रों, बचत पत्रों, केन्द्रीय सरकार द्वारा जारी किए गए अन्य पत्रों और निक्षेपों पर ब्याज के रूप में आय उनके मोचन पर प्रीमियम या उन पर अन्य भुगतान, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना61 द्वारा, ऐसी शर्तों और निबंधनों के अध्यधीन, जो उक्त अधिसूचना में उल्लिखित किए जाएं, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे;]

62[(iiख) 63[व्यष्टि या हिंदू अविभक्त कुटुम्ब की दशा में,] ऐसे पूंजी विनिधान बंधपत्र पर ब्याज जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना64 द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे;]

65-66[(iiग) व्यष्टि या हिंदू अविभक्त कुटुम्ब की दशा में, ऐसे राहत बंधपत्र पर ब्याज, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस संबंध में विनिर्दिष्ट करे;]

67[(iiघ) ऐसे बंधपत्रों पर ब्याज, जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना68 द्वारा उल्लिखित करे, जो निम्नलिखित से उत्पन्न हो--

() अनिवासी भारतीय, जो बंधपत्रों का स्वामी व्यष्टि है, या

() कोर्इ व्यष्टि जो किसी अनिवासी भारतीय के नामनिर्देशिती या उत्तरजीवी होने के आधार पर बंधपत्रों का स्वामी है; या

() कोर्इ व्यष्टि, जिसे अनिवासी भारतीय द्वारा बंधपत्र का दान किया गया है :

परन्तु यह तब जबकि पूर्वोक्त बंधपत्र अनिवासी भारतीय द्वारा विदेशी मुद्रा में क्रय किए गए हों और ऐसे बंधपत्रों के संबंध में प्राप्त ब्याज और मूलधन को, चाहे उनकी परिपक्वता पर या अन्यथा, भारत के बाहर ले जाने की अनुमति नहीं है :

परन्तु यह और कि जहां कोर्इ व्यष्टि, जो किसी ऐसे पूर्ववर्ष में, जिसमें बंधपत्रों को अर्जित किया गया है, अनिवासी भारतीय है, किसी पश्चात्वर्ती वर्ष में भारत का निवासी बन जाता है, वहां इस उपबंध के उपखंड ऐसे व्यष्टि के संबंध में लागू होते रहेंगे :

परन्तु यह भी कि ऐसे मामलों में जहां बंधपत्रों के परिपक्व होने के पहले किसी पूर्ववर्ष में बंधपत्रों को ऐसे व्यष्टि द्वारा भुना लिया जाता है, जो ऐसा करने का हकदार है, वहां इस उपखंड के उपबंध ऐसे पूर्ववर्ष से सुसंगत निर्धारण वर्ष के संबंध में ऐसे व्यष्टि को लागू नहीं होंगे।

स्पष्टीकरण.–इस उपखंड के प्रयोजनों के लिए "अनिवासी भारतीय" अभिव्यक्ति का वही अर्थ है जो उसका धारा 115ग के खंड () में है;]

(iii) सीलोन मानेटरी लॉ ऐक्ट, 1949 के अधीन गठित सेंट्रल बैंक ऑफ सीलोन के निर्गमन विभाग द्वारा धारित प्रतिभूतियों पर ब्याज;

69[(iiiक) भारत के बाहर किसी देश में निगमित और उस देश में केन्द्रीय बैंककारी कृत्य करने के लिए प्राधिकृत बैंक द्वारा भारतीय रिजर्व बैंक के अनुमोदन से किसी अनुसूचित बैंक में किए गए जमा पर उस बैंक को देय ब्याज।

स्पष्टीकरण.–इस उपखंड के प्रयोजनों के लिए "अनुसूचित बैंक" का वही अर्थ है जो 70[धारा 36 की उपधारा (1) के खंड (viiक) के स्पष्टीकरण के खंड (ii)] में उसका है;]

(iv) ऐसा ब्याज जो--

() सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी द्वारा उन धनराशियों पर, जो उसने भारत के बाहर स्रोतों से उधार ली हो 71[या उन ऋणों पर जिनकी उस पर भारत के बाहर स्रोतों की देनदारी हो] देय हो;

() भारत में किसी औद्योगिक उपक्रम द्वारा उन धनराशियों पर देय हो, जो उसने विदेश में ही किसी ऐसी वित्तीय संस्था के साथ, जैसी केन्द्रीय सरकार द्वारा साधारण या विशेष आदेश द्वारा इस संबंध में अनुमोदित72 की जाए, किए गए किसी उधार करार के अधीन उधार ली हो;

73() भारत में किसी औद्योगिक उपक्रम द्वारा किसी ऐसी धनराशियों या ऋण पर संदेय हो जो उसने भारत के बाहर कच्चे माल 74[या संघटक] या पूंजी संयंत्र और मशीनरी के क्रय के संबंध में विदेश में उधार ली है या प्राप्त की है जो 75[उस सीमा तक जिस तक ऐसा ब्याज, जो उस रकम से अधिक नहीं है जो उधार या ऋण के और इसके प्रतिसंदाय की शर्तों को ध्यान में रखकर केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त76 अनुमोदित दर पर संगणित किया गया हो।]

77[स्पष्टीकरण.–इस मद के प्रयोजनों के लिए "पूंजी संयंत्र और मशीनरी के क्रय" के अंतर्गत किसी भाड़े पर क्रय करने के लिए किसी करार के अंतर्गत ऐसे पूंजी संयंत्र और मशीनरी के क्रय के विक्रय के साथ पट्टा करार भी है;]

78[() औद्योगिक वित्त निगम अधिनियम, 1948 (1948 का 15) द्वारा स्थापित भारतीय औद्योगिक वित्त निगम, या भारतीय औद्योगिक विकास बैंक अधिनियम, 1964 (1964 का 18) के अंतर्गत स्थापित भारतीय औद्योगिक विकास बैंक 79[या भारतीय निर्यात-आयात बैंक अधिनियम, 1981 (1981 का 28) के अंतर्गत स्थापित भारतीय निर्यात-आयात बैंक] 80[या राष्ट्रीय आवास बैंक अधिनियम, 1987 (1987 का 53) की धारा 3 के अंतर्गत स्थापित राष्ट्रीय आवास बैंक] 81[या भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक अधिनियम, 1989 (1989 का 39) की धारा 3 के अंतर्गत स्थापित भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक] या भारतीय औद्योगिक प्रत्यय और निवेश निगम [जो भारतीय कंपनी अधिनियम, 1913 (1913 का 7) के अंतर्गत बनाया गया है और पंजीकृत कम्पनी है] द्वारा किन्हीं ऐसी रकमों पर संदेय है जो उसने भारत के बाहर स्रोतों से उधार ली हो, उस सीमा तक जिस तक कि ऐसा ब्याज, ब्याज की उस रकम से अधिक नहीं है जो उधार और उसके प्रतिसंदाय की शर्तों को ध्यान में रखकर केन्द्रीय सरकार द्वारा इस संबंध में अनुमोदित दर पर संगणित किया गया हो;]

82[() भारत में स्थापित किसी अन्य वित्त संस्था द्वारा या किसी बैंकिंग कम्पनी द्वारा जिसको बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) लागू होता है (जिसमें वह बैंक या बैंकिंग संस्था भी है जिसके लिए उस अधिनियम की धारा 51 में उल्लेख किया गया है) उन रकमों पर संदेय हो जिन्हें उसने भारत के बाहर स्रोतों से केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित उधार करार के अंतर्गत उधार लिया हो जहां रकम या तो भारत में औद्योगिक उपक्रमों को भारत के बाहर कच्चा माल या पूंजी संयंत्र और मशीनरी के क्रय के अथवा ऐसे किसी माल के आयात करने के प्रयोजन के लिए जिसका आयात करना केन्द्रीय सरकार लोकहित में आवश्यक समझे, उधार ली हो, उसी सीमा तक, जिस तक ऐसा ब्याज, ब्याज की उस रकम से अधिक नहीं है जिसको उधार और इसके प्रतिसंदाय की शर्तों को ध्यान में रखते हुए केन्द्रीय सरकार द्वारा इस संबंध में अनुमोदित दर पर संगणित की गर्इ है।

83[() भारत में के किसी औद्योगिक उपक्रम द्वारा उन रकमों पर संदेय हो जो भारत के बाहर के स्रोतों से केन्द्रीय सरकार द्वारा औद्योगिक विकास की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए अनुमोदित उधार करार के अंतर्गत विदेशी करेन्सी में उधार ली हो, उस सीमा तक जिस तक ऐसा ब्याज, ब्याज की उस रकम से अधिक नहीं है जिनका आधार और उसके प्रतिसंदाय की शर्तों को देखते हुए, केन्द्रीय सरकार द्वारा इस संबंध में अनुमोदित दर पर संगणित किया गया हो;]

84[(चक) किसी अनुसूचित बैंक द्वारा 85[किसी अनिवासी को या किसी ऐसे व्यक्ति को जो धारा 6 की उपधारा (6) के अर्थ में साधारण रूप से निवासी नहीं है] विदेशी मुद्रा में निक्षेपों पर वहां प्रतिसंदेय हो, जहां बैंक द्वारा किए गए ऐसे निक्षेपों को स्वीकार करना भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अनुमोदित किया गया हो।

स्पष्टीकरण.–इस मद के प्रयोजनों के लिए "अनुसूचित" बैंक पद का वही अर्थ है जो धारा 36 की उपधारा (1) के खंड (viiक) के स्पष्टीकरण के खंड (ii) में है;]

86[() भारत में बनार्इ गर्इ और पंजीकृत किसी पब्लिक कंपनी द्वारा जिसका मुख्य उद्देश्य भारत में आवासीय प्रयोजनों के लिए गृहों के निर्माण के या क्रय के लिए दीर्घकालिक वित्त उपलब्ध कराने का कारबार करना है, 87[ऐसी कंपनी है जो धारा 36 की उपधारा (1) के उपखंड (viii) के अंतर्गत कटौती के लिए पात्र है] उन रकमों पर प्रतिसंदेय है जिन्हें उसने भारत के बाहर के स्रोतों से केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित उधार करार के अंतर्गत, विदेशी करेन्सी में उधार लिया हो, उस सीमा तक जिस तक कि ऐसा ब्याज, ब्याज की उस रकम से अधिक नहीं है जिसकी उधार और उसके प्रतिसंदाय की शर्तों को देखते हुए केन्द्रीय सरकार द्वारा इस संबंध में अनुमोदित दर पर संगणना की गर्इ हो।]

स्पष्टीकरण.–88[मद (), 89[(चक)] और ()] के प्रयोजनों के लिए 90"विदेशी करेन्सी" पद का वही अर्थ है जो उसका विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973 (1973 का 46) में है।

91[() किसी पब्लिक सेक्टर कंपनी द्वारा बंध पत्र या डिबेंचरों के संबंध में और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए प्रतिसंदेय हो, जिनमें यह शर्त सम्मिलित है कि ऐसे बंध पत्रों या डिबेंचरों का धारक अपना नाम और धृति उस कंपनी में पंजीकृत कराएगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना92 द्वारा इस संबंध में विनिर्दिष्ट करे;]

93[() सरकार द्वारा ऐसे निक्षेपों पर संदेय हो, जो केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार 94[या पब्लिक सेक्टर कंपनी] के किसी कर्मचारी द्वारा जैसी केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना95 द्वारा इस निमित्त बनाए, स्कीम के अनुसार अपनी सेवा-निवृत्ति पर चाहे, अधिवर्षिता पर हो या अन्यथा, अपने शोध्य धन से किए गए हों।]

96[97[स्पष्टीकरण 1]-–इस उपखंड के प्रयोजनों के लिए "औद्योगिक उपक्रम" पद से कोर्इ ऐसा उपक्रम अभिप्रेत है जो निम्नलिखित में लगा हुआ है, अर्थात :

() माल का विनिर्माण या, प्रसंस्करण; अथवा

98[(कक) कम्प्यूटर साफ्टवेयर का विनिर्माण या किसी डिस्क, टेप, विछिद्रित मीडिया या किसी अन्य सूचना युक्ति पर कार्यक्रम की रिकार्डिंग; अथवा]

() विद्युत या किसी अन्य प्रकार की शक्ति का उत्पादन या वितरण का कारबार; अथवा

99[(खक) दूर संचार सेवाएं उपलब्ध कराने का कारबार; अथवा]

() खनन; अथवा

() पोतों का सन्निर्माण; अथवा

1[() पोतों या विमानों का प्रचालन या रेल प्रणालियों का सन्निर्माण या प्रचालन।]

वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा 1.4.2001, धारा 10(15)(iv) के स्पष्टीकरण 1 के पश्चात् निम्नलिखित स्पष्टीकरण 1क अन्त:स्थापित किया जाएगा :

स्पष्टीकरण 1क.इस उपखंड के प्रयोजनों के लिए "ब्याज" पद के अंतर्गत उधार के विलंबित संदाय या व्यतिक्रम पर संदाय किया गया ब्याज सम्मिलित नहीं है।

2-3[स्पष्टीकरण 2.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए "ब्याज" पद के अंतर्गत करेन्सी के उतार चढ़ाव के मद्दे हैजिंग लेन-देन प्रभार सम्मिलित हैं;]

4[(v) निम्नलिखित पर--

() कल्याण आयुक्त, भोपाल गैस पीड़ित, भोपाल द्वारा रिजर्व बैंक के एसजीएल खाता सं. एस एल/डी एच 048 में धारित प्रतिभूतियों पर ब्याज;

() भारतीय रिजर्व बैंक या किसी पब्लिक सेक्टर बैंक में, जैसा केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना5 द्वारा विशेष रूप से विनिर्दिष्ट करे, ऐसे खाते में धारित भोपाल गैस रिसाव आपदा के पीड़ितों के फायदों के लिए निक्षेप चाहे वे भूतलक्षी रूप में हो या भविष्य लक्षी रूप में हो किन्तु इस संबंध में किसी भी दशा में 1 अप्रैल, 1994 से पहले न हो।

स्पष्टीकरण.–इस उपखंड के प्रयोजनों के लिए, "पब्लिक सेक्टर बैंक" पद का वही अर्थ होगा जो इसका खंड (23) के स्पष्टीकरण में है;]

6[(vi) केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित स्वर्ण जमा स्कीम, 1999 के अधीन जारी किए गए स्वर्ण जमा बंधपत्रों पर ब्याज;]

वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा 1.4.2001 से धारा 10(15) के उपखंड (vi) के पश्चात् निम्नलिखित उपखंड (vii) अन्त:स्थापित किया जाएगा :

(vii) ऐसे बंधपत्रों पर ब्याज:--

(क) जिन्हें स्थानीय प्राधिकारी द्वारा जारी किया जाए; और

(ख) जिन्हें केन्द्रीय सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए;

7-8[(15) ऐसा कोर्इ संदाय जो वायुयान के प्रचालन के कारबार में लगी किसी भारतीय कम्पनी द्वारा किसी विदेशी राज्य की सरकार या विदेशी उद्यम से जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस संबंध में अनुमोदित करार 9[10[जो 1 अप्रैल, 1997 और 31 मार्च, 1999 के बीच किया गया करार नहीं है], के अधीन पट्टे पर वायुयान या वायुयान इंजन (पट्टे पर दिए गए वायुयान के प्रचालन के संबंध में पुर्जे, सुविधाएं या सेवाएं प्रदान करने के लिए संदाय से भिन्न) अर्जित करने के लिए किया गया है।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए "विदेशी उद्यम" पद से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो अनिवासी है;]

11(16) 12शिक्षा खर्च को पूरा करने के लिए प्रदान की गर्इ छात्रवृत्तियां;

13[(17) निम्नलिखित के रूप में कोर्इ आय अर्थात--

(i) कोर्इ ऐसा दैनिक भत्ता जो किसी व्यक्ति द्वारा संसद या किसी विधानमंडल की या उसकी किसी समिति की सदस्यता के कारण प्राप्त किया गया है;

14[* * *]

15[(ii) कोर्इ ऐसा भत्ता जो किसी व्यक्ति द्वारा संसद की सदस्यता के कारण संसद सदस्य (निर्वाचन क्षेत्र भत्ता) नियम, 1986 के अंतर्गत प्राप्त किया गया है;

(iii) किसी व्यक्ति द्वारा किसी राज्य विधानमंडल या उसकी किसी समिति की सदस्यता के कारण प्राप्त किए गए कुल मिलाकर 16[दो हजार] रुपए प्रतिमास से अनधिक अन्य सभी भत्ते जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना17 द्वारा, इस निमित्त विशेष रूप से विनिर्दिष्ट करे;]]

18[(17) निम्नलिखित रूप में किया गया कोर्इ संदाय चाहे वह नकदी रूप में हो या वस्तु के रूप में--

(i) केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार द्वारा लोक हित में संस्थित अथवा किसी अन्य निकाय द्वारा संस्थित और केन्द्रीय सरकार द्वारा इस संबंध में अनुमोदित पुरस्कार के अनुसरण में; या

(ii) केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार द्वारा ऐसे प्रयोजनों के लिए जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस संबंध में लोक हित में अनुमोदित19 किए जाएं, पारितोषिक रूप में किया गया संदाय;]

20[(18) निम्नलिखित रूप में कोर्इ आय–

(i) ऐसे व्यक्ति द्वारा प्राप्त पेंशन जो केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार की सेवा में रहा है और "परमवीर चक्र" या "महावीर चक्र" या "वीर चक्र" अथवा अन्य कोर्इ वीरता पुरस्कार जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस संबंध में विशेष रूप से विनिर्दिष्ट करे;

(ii) उपखंड (i) में उल्लिखित किसी व्यक्ति के परिवार के सदस्य द्वारा प्राप्त कुटुम्ब पेंशन।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए "कुटुम्ब" पद का वही अर्थ होगा जो इसके खंड (5) के स्पष्टीकरण में है;]

(18) 21[वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से लोप किया गया;]

(19) 22[* * *]

23[(19) किसी शासक के अधिभोगाधीन किसी महल का वार्षिक मूल्य जो ऐसा महल है जिसके वार्षिक मूल्य को, संविधान (छब्बीसवां संशोधन) अधिनियम, 1971 के प्रारंभ के पहले, यथास्थिति, विलयित राज्य (कराधान रियायत) आदेश, 1949 के या भाग ख राज्य (कराधान रियायत) आदेश, 1950 के या जम्मू-कश्मीर (कराधान रियायत) आदेश, 1958 के उपबंधों के आधार पर आयकर से छूट प्राप्त थी:

परन्तु एक अप्रैल, 1972 से आरंभ होने वाले निर्धारण वर्ष के लिए ऐसे शासक के अधिभोगाधीन24 प्रत्येक महल का वार्षिक मूल्य, सुसंगत पूर्ववर्ष के दौरान आयकर से छूट प्राप्त होगा;]

25(20) किसी स्थानीय प्राधिकारी की ऐसी आय जो 26[* * *] "गृह सम्पत्ति से आय", "पूंजी अभिलाभ" या "अन्य स्रोतों से आय" शीर्ष के अधीन प्रभार्य है या उसके द्वारा चलाए गए व्यापार या कारबार से होने वाली ऐसी आय जो किसी वस्तु के प्रदाय या सेवा से 27[(जो जल या विद्युत नहीं है) अपनी ही अधिकारिता वाले क्षेत्र के भीतर या अपनी अधिकारिता वाले क्षेत्र के भीतर या बाहर जल या विद्युत के प्रदाय से प्रोद्भूत या उद्भूत होता है];

28[29(20) या तो निवास स्थान के विषय में कार्यवाही करने और उसकी आवश्यकता की पूर्ति करने के लिए या नगरों, कस्बों और ग्रामों के नियोजन, विकास30 या सुधार के प्रयोजन के लिए या दोनों के लिए अधिनियमित किसी विधि द्वारा या उसके अधीन भारत में गठित किसी प्राधिकरण की कोर्इ आय;]

31[32(21) 33धारा 35 की उपधारा (1) के खंड (ii) के प्रयोजन के लिए तत्समय अनुमोदित किसी वैज्ञानिक अनुसंधान संगम की कोर्इ आय :

परन्तु यह तब जबकि वैज्ञानिक अनुसंधान संगम--

() अपनी आय का, उन उद्देश्यों के लिए जिनके लिए उसकी स्थापना की गर्इ है, पूर्णतया और अनन्य रूप से उपयोग करता है या उपयोग करने के लिए संचय करता है और धारा 11 की उपधारा (2) और उपधारा (3) के उपबंध, ऐसे संचय के संबंध में निम्नलिखित उपांतरणों के अधीन रहते हुए लागू होंगे, अर्थात् :--

(i) उपधारा (2) में,--

(1) "उपधारा (1) के स्पष्टीकरण के साथ पठित उस उपधारा के खंड () या खंड () में उल्लिखित" शब्दों, कोष्ठकों, अंकों और अक्षरों का लोप किया जाएगा;

(2) "पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों में" शब्दों के स्थान पर "वैज्ञानिक अनुसंधान के प्रयोजनों के लिए" शब्द रखे जाएंगे;

(3) उसके खंड () में "निर्धारण अधिकारी" के संदर्भ में यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह धारा 35 की उपधारा (1) के खंड (ii) में उल्लिखित "विहित प्राधिकारी" के संदर्भ में है;

(ii) उपधारा (3) में, खंड () में, "पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों" शब्दों के स्थान पर "वैज्ञानिक अनुसंधान के प्रयोजनों" शब्द रखे जाएंगे; और

34[() अपनी निधियों का जो निम्नलिखित से भिन्न है, अर्थात :--

(i) वैज्ञानिक अनुसंधान संगम द्वारा धारित कोर्इ आस्तियां जहां ऐसी आस्तियां 1 जून, 1973 को संगम की निधि की सम्पत्ति का भाग थीं;

(ii) 1 मार्च, 1983 के पूर्व वैज्ञानिक अनुसंधान संगम द्वारा अर्जित कोर्इ आस्तियां (जो किसी कम्पनी या निगम द्वारा या उसकी पुरोधृत डिबेंचर हैं);

(iii) वैज्ञानिक अनुसंधान संगम को आबंटित बोनस शेयरों के रूप में ऐसे शेयरों की कोर्इ अनुवृद्धि जो उपखंड (i) में उल्लिखित निधि की सम्पत्ति का भाग है;

(iv) आभूषण, फर्नीचर या ऐसी किसी अन्य वस्तु के रूप में जो बोर्ड राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विशेष रूप से विनिर्दिष्ट करे, प्राप्त किए गए और रखे गए स्वैच्छिक अंशदान,

पूर्ववर्ष के दौरान किसी अवधि के लिए धारा 11 की उपधारा (5) में विशेष रूप से उल्लिखित एक या अधिक रूपों या पद्धतियों से अन्यथा निवेश या निक्षेप नहीं करता है:]

35[परन्तु यह और कि नकद रूप में स्वैच्छिक अंशदान या इस खंड के पहले परन्तुक के खंड () में उल्लिखित प्रकृति के स्वैच्छिक अंशदान से भिन्न स्वैच्छिक अंशदान के संबंध में इस खंड के अधीन छूट से इंकार नहीं किया जाएगा किंतु यह इस शर्त के अधीन होगा कि ऐसा स्वैच्छिक अंशदान वैज्ञानिक अनुसंधान संगम द्वारा पूर्ववर्ष के अंत से, जिसमें ऐसी आस्ति अर्जित की जाती है या 31 मार्च, 1992 से, इनमें जो भी पश्चातवर्ती हो, एक वर्ष की समाप्ति के पश्चात, धारा 11 की उपधारा (5) में विशेषत: उल्लिखित रूप या पद्धतियों से अन्यथा किसी रूप या पद्धतियों से धारित नहीं किया जाता:

परन्तु यह और भी कि] इस खंड की कोर्इ बात, वैज्ञानिक अनुसंधान संगम की ऐसी किसी आय के बारे में, जो कारबार के लाभ या अभिलाभ है, तब तक लागू नहीं होगी जब तक कि वह कारबार उसके उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए आनुषंगिक न हो और उसके द्वारा ऐसे कारबार के बारे में पृथक लेखा बहियां नहीं रखी जाती;]

(22) 36[वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से लोप किया गया;]

(22) 37[वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से लोप किया गया;]

38[(22) केवल समाचारों के संग्रहण और वितरण के लिए भारत में स्थापित किसी ऐसी समाचार एजेंसी की आय जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना39 द्वारा इस संबंध में विशेषत: उल्लिखित करे:

परन्तु यह और कि इस खंड के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा जारी की गर्इ कोर्इ अधिसूचना, किसी एक समय पर, ऐसे निर्धारण वर्ष या वर्षों के लिए जो तीन निर्धारण वर्षों से (जिनमें उस तारीख के, जिसको ऐसी अधिसूचना निकाली जाती है; पूर्व प्रारंभ होने वाला निर्धारण वर्ष या होने वाले निर्धारण वर्ष सम्मिलित हैं) अधिक न हों, जैसा अधिसूचना में विशेषत: विनिर्दिष्ट किया जाए, प्रभावी होगी;]

40[41(23) 42भारत में स्थापित किसी ऐसे संगम या संस्था की आय जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए राजपत्र में अधिसूचित43 की जाए कि संगम या संस्था का उद्देश्य भारत में क्रिकेट, हॉकी, फुटबाल, टैनिस के खेल या ऐसे अन्य खेल या क्रीड़ाओं का, जिसे केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस संबंध में विशेषत: विनिर्दिष्ट करे, नियंत्रण, पर्यवेक्षण, विनियमन या प्रोत्साहन करना है :

परन्तु यह कि वह संगम या संस्था को, इस खंड के अंतर्गत छूट देने या उसे जारी रखने के प्रयोजन के लिए विहित प्राधिकारी44 को विहित प्ररूप45 और रीति में आवेदन करेगी:

परन्तु यह और कि केन्द्रीय सरकार इस खंड के अंतर्गत संगम या संस्था को अधिसूचित करने के पूर्व संगम या संस्था से ऐसे दस्तावेज (जिनमें संपरीक्षित वार्षिक लेखा भी हैं) या जानकारी मंगा सकेगी, जो वह संगम या संस्था के क्रियाकलापों की असलियत के बारे में अपना समाधान करने के लिए आवश्यक समझे, और वह सरकार ऐसी जांच कर सकेगी जो वह इस संबंध में आवश्यक समझे:

परन्तु यह और भी कि संगम या संस्था,--

() अपनी आय का, उन उद्देश्यों के लिए, जिनके लिए उसकी स्थापना की गर्इ है, पूर्णत: या अनन्यत: उपयोग करती है या उपयोग के लिए संचय करती है, और धारा 11 की उपधारा (2) और उपधारा (3) के उपबंध ऐसे संचय के संबंध में निम्नलिखित उपांतरणों के अधीन रहते हुए लागू होंगे, अर्थात् :--

(i) उपधारा (2) में,--

(1) "उपधारा (1) के स्पष्टीकरण के साथ पठित उस उपधारा के खण्ड () या खण्ड () में "निर्दिष्ट" शब्दों, कोष्ठकों, अंकों और अक्षरों का लोप किया जाएगा;

(2) "पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के" शब्दों के स्थान पर "खेलों या क्रीड़ाओं के प्रयोजनों के लिए" शब्द रखे जाएंगे;

(3) उसके खण्ड () में "निर्धारण अधिकारी" के संदर्भ में यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह इस खंड के पहले परन्तुक में उल्लिखित "विहित प्राधिकारी" के संदर्भ में है;

(ii) उपधारा (3) के खण्ड () में, "पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों" के स्थान पर "खेलों या क्रीड़ाओं के प्रयोजनों" शब्द रखे जाएंगे; और

46[() अपनी निधियों का, जो निम्नलिखित से भिन्न है, अर्थात्--

(i) संगम या संस्था द्वारा धारित कोर्इ आस्तियां, जहां ऐसी आस्तियां 1 जून, 1973 को संगम या संस्था की निधि की संपत्ति का भाग थीं;

(ii) 1 मार्च, 1983 के पूर्व संगम या संस्था द्वारा अर्जित कोर्इ आस्तियां (जो किसी कंपनी या निगम द्वारा या उसकी ओर से पुरोधृत डिबेंचर हैं);

(iii) संगम या संस्था को आबंटित बोनस शेयरों के रूप में ऐसे शेयरों की कोर्इ अनुवृद्धि, जो उपखंड (i) में उल्लिखित निधि संपत्ति का भाग है;

(iv) आभूषण, फर्नीचर या ऐसी किसी अन्य वस्तु के रूप में, जो बोर्ड राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विशेष रूप से विनिर्दिष्ट करे और रखे गए स्वैच्छिक अभिदाय,

पूर्ववर्ष के दौरान किसी अवधि के लिए धारा 11 की उपधारा (5) में विशेष रूप से विनिर्दिष्ट एक या अधिक रूप या पद्धतियों से अन्यथा निवेश या निक्षेप नहीं करती; और]

() अपनी आय के किसी भाग का उससे संबंधित किसी संगम या संस्था को दिए जाने वाले अनुदानों के रूप में किये जाने के सिवाय अपने सदस्यों के बीच किसी रीति में वितरित नहीं करती है;

वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा 1.4.2001 से धारा 10(23) के तीसरे परन्तुक मे मद (ग) के पश्चात् निम्नलिखित मद (घ) अन्त:स्थापित की जाएगी :

(घ) भारत में खेल या क्रीड़ा के लिए अवसंरचना के विकास के प्रयोजनों के लिए या, भारत में खेल या क्रीड़ाओं को प्रायोजित करने के लिए धारा 80छ की उपधारा (2) के खंड (ग) के संदर्भ में दोनों के रूप में प्राप्त आय का उपयोग करती है:

परन्तु यह भी कि इस खंड के अधीन छूट निधियों के 1 अप्रैल, 1989 के पूर्व, धारा 11 की उपधारा (5) में विनिर्दिष्ट किसी एक या अधिक रूप या पद्धतियों से अन्यथा किए गए निवेश और निक्षेप के रूप में नामंजूर नहीं की जाएगी, यदि ऐसी निधियां 30 मार्च, 47-48[1993] के पश्चात् इस प्रकार विनिहित या निक्षिप्त नहीं बनी रहती है]:

49[परन्तु यह भी नकद रूप में स्वैच्छिक अंशदान या इस खंड के पहले परन्तुक के खंड () में उल्लिखित प्रकृति के स्वैच्छिक अंशदान के संबंध में इस खंड के अन्तर्गत छूट से इंकार नहीं किया जाएगा। किन्तु यह इस शर्त के अधीन होगा कि ऐसा स्वैच्छिक अभिदाय, संगम या संस्था द्वारा उस पूर्ववर्ष के अंत से ऐसी आस्ति अर्जित की जाती है या 31 मार्च, 1992 से, इनमें जो पश्चातवर्ती हो, एक वर्ष की समाप्ति के पश्चात् धारा 11 की उपधारा (5) में विशेष रूप से उल्लिखित रूप या पद्धतियों से भिन्न किसी रूप या पद्धति से धारित नहीं किया जाता है]:

परन्तु यह भी कि इस खंड की कोर्इ बात संगम या संस्था की किसी ऐसी आय की बाबत, जो कारबार का लाभ या अभिलाभ है, तब तक लागू नहीं होगी जब तक कि वह कारबार उसके उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए आनुषंगिक नहीं है और उसके द्वारा ऐसे कारबार की बाबत पृथक् लेखा बहियां नहीं रखी जाती हैं :

परन्तु यह भी कि इस खंड के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा किसी संगम या संस्था की बाबत जारी की गर्इ कोर्इ अधिसूचना किसी एक समय में, ऐसे निर्धारण वर्ष या वर्षों के लिए, जो तीन निर्धारण वर्षों से अधिक नहीं होंगे (जिसमें ऐसी अधिसूचना निकाले जाने की तारीख के पूर्व प्रारम्भ होने वाले निर्धारण वर्ष भी है या हैं) प्रभावी होगी जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं;]

50[51(23) भारत में स्थापित ऐसे संगम या संस्था की आय जिसका उद्देश्य, विधि, चिकित्सा, लेखाकर्म, इंजीनियरी या स्थापत्यकला की वृति या ऐसी अन्य वृति52 का जिसे केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा समय-समय पर इस संबंध में विनिर्दिष्ट करे, नियंत्रण पर्यवेक्षण, विनियमन या प्रोत्साहन हो, (जो 53[* * *] "गृह संपत्ति से आय" शीर्ष के अंतर्गत प्रभार्य आय का किन्हीं उल्लिखित सेवाओं को करने से प्राप्त आय या उसके निवेश से उत्पन्न ब्याज या लाभों के रूप में आय से भिन्न हों) :

परन्तु यह तब जबकि--

(i) वह संगम या संस्था अपनी आय को केवल उन उद्देश्यों में ही जिनके लिए वह स्थापित की गर्इ है, प्रयुक्त करती है या प्रयुक्त करने के लिए उसे संचित करती है; और

(ii) वह संगम या संस्था केन्द्रीय सरकार द्वारा साधारण या विशेष आदेश द्वारा इस खंड के प्रयोजन के लिए तत्समय 54अनुमोदित है;]

55[(23कक) संघ के सशस्त्र बलों द्वारा ऐसे बलों के भूतपूर्व और वर्तमान सदस्यों के या उनके आश्रितों के कल्याण के लिए स्थापित रेजिमेंट निधि के या असार्वजनिक निधि के संबंध में किसी व्यक्ति द्वारा प्राप्त कोर्इ आय;]

56[(23ककक) कर्मचारियों या उनके आश्रितों के कल्याण के लिए ऐसे प्रयोजनों के लिए, जो राजपत्र में बोर्ड द्वारा अधिसूचित57 किए जाएं, स्थापित निधि की ओर से किसी व्यक्ति द्वारा प्राप्त कोर्इ आय और जिस निधि के ऐसे कर्मचारी सदस्य हैं, यदि ऐसी निधि निम्नलिखित शर्तों को पूरा करती है, अर्थात्:–

() निधि--

(i) अपनी आय का पूर्णत: या अनन्यत: केवल उन उद्देश्यों के लिए प्रयुक्त करती है या प्रयुक्त करने के लिए उसे संचित करती है; और

(ii) धारा 11 की उपधारा (5) में विनिर्दिष्ट एक या अधिक रूप या पद्धतियों में अपनी निधियों तथा अभिदायों तथा इसके द्वारा प्राप्त राशियों का निवेश करती है;

() इस संबंध में बनाए गए नियमों58 के अनुसार निधि आयुक्त द्वारा अनुमोदित की जाती है:

परन्तु ऐसे किसी अनुमोदन का किसी एक समय ज्यादा से ज्यादा तीन निर्धारण वर्षों के लिए, जो अनुमोदन आदेश में विनिर्दिष्ट किए जाएं, प्रभाव होगा;]

59[(23ककख) किसी पेंशन स्कीम के अधीन 1 अगस्त, 1996 को या उसके पश्चात भारतीय जीवन बीमा निगम द्वारा स्थापित किसी निधि चाहे, वह किसी भी नाम से ज्ञात हो, की कोर्इ आय--

(i) जिसमें ऐसी निधि से पेंशन प्राप्त करने के प्रयोजन के लिए किसी व्यक्ति द्वारा अभिदाय किया जाता है;

(ii) जिसे यथास्थिति, बीमा नियंत्रक द्वारा अनुमोदित किया जाता है।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए "बीमा नियंत्रक" का वही अर्थ है जो बीमा अधिनियम, 1938 (1938 का 4) की धारा 2 के खंड (5) में है;]

60[(23) सार्वजनिक पूर्त न्यास के रूप में या सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) या भारत के किसी भाग में, प्रवृत्त इस अधिनियम के तत्समान किसी विधि के अधीन और केवल खादी या ग्रामोद्योग या दोनों के विकास के लिए अस्तित्व में है और जो लाभ के प्रयोजनार्थ नहीं है, गठित किसी संस्था की आय उस विस्तार तक जहां तक ऐसी आय खादी के उत्पादन, विक्रय या विपणन या ग्रामोद्योग के उत्पादों से मानी जा सकती है:

परन्तु यह तब जबकि–

(i) वह संस्था अपनी आय को केवल खादी या ग्रामोद्योग या दोनों के विकास के लिए ही प्रयुक्त करती है या प्रयुक्त किए जाने के लिए संचित करती है; और

(ii) वह संस्था इस खंड के प्रयोजन के लिए खादी और ग्रामोद्योग आयोग द्वारा तत्समय अनुमोदित है:

परन्तु यह और कि आयोग एक बार में उस वित्तीय वर्ष से, जिसमें अनुमोदन किया जाता है, ठीक बाद के निर्धारण वर्ष से प्रारंभ होने वाले तीन निर्धारण वर्षों से अधिक के लिए अनुमोदन नहीं देगा।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए--

(i) "खादी और ग्रामोद्योग आयोग" से खादी और ग्रामोद्योग आयोग अधिनियम, 1956 (1956 का 61) के अधीन स्थापित खादी और ग्रामोद्योग आयोग अभिप्रेत है;

(ii) 61"खादी" और "ग्रामोद्योग"61 के वही अर्थ हैं जो उनके उस अधिनियम में हैं;]

62[(23खख) किसी राज्य या प्रान्तीय अधिनियम द्वारा या उसके अधीन किसी राज्य में, खादी या ग्रामोद्योग के विकास के लिए उस राज्य में स्थापित प्राधिकरण (चाहे खादी और ग्रामोद्योग बोर्ड के नाम से ज्ञात हो या किसी अन्य नाम से की आय)।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए 61"खादी" और "ग्रामोद्योग"61 का क्रमश: वही अर्थ है जो उनका खादी और ग्रामोद्योग आयोग अधिनियम, 1956 (1956 का 61) में है;]

62[(23खखक) किसी केन्द्रीय, राज्य या प्रान्तीय अधिनियम द्वारा या उसके अधीन स्थापित, गठित या नियुक्त किसी निकाय या प्राधिकरण की आय (चाहे वह निगम निकाय या एकल निगम हो या नहीं) जिसमें निम्नलिखित में से एक या अधिक के प्रशासन के लिए उपबंध किया गया है, अर्थात् सार्वजनिक धार्मिक या पूर्त न्यास या विन्यास (जिसके अन्तर्गत मठ, मन्दिर, गुरुद्वारा, वक्फ, गिरजाघर, सेनेगाग, अगियारी या सार्वजनिक धार्मिक उपासना के अन्य स्थान हैं) या सोसायटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) या तत्समय प्रवृत किसी अन्य विधि के अधीन इस प्रकार धार्मिक या पूर्त प्रयोजनों के लिए पंजीकृत सोसायटी :

परन्तु इस खंड की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह उसमें उल्लिखित किसी न्यास, विन्यास या सोसायटी की आय को कर से छूट देती है;]

63[(23खखख) यूरोपीय आर्थिक समुदाय की कोर्इ आय, जो ऐसी स्कीम64 के अंतर्गत, जिसे केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस संबंध में विनिर्दिष्ट करे, उसकी निधियों में से किए गए विनिधानों से ब्याज, लाभांश, या पूंजी अभिलाभों के रूप में भारत में प्राप्त हुर्इ है।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए "यूरोपीय आर्थिक समुदाय" से 25 मार्च, 1957 की रोम संधि द्वारा स्थापित यूरोपीय आर्थिक समुदाय अभिप्रेत है;]

65[(23खखग) दक्षिण एशियार्इ क्षेत्रीय सहयोग संगम के चार्टर द्वारा 8 दिसम्बर, 1985 को स्थापित दक्षिण एशियार्इ क्षेत्रीय सहयोग संगम के सदस्य देशों के राज्य या सरकार के अध्यक्षों द्वारा 21 दिसम्बर, 1991 को जारी कोलम्बो घोषणा द्वारा स्थापित क्षेत्रीय परियोजनाओं के लिए सार्क निधि की कोर्इ आय;]

66[67(23) किसी व्यक्ति द्वारा निम्नलिखित की ओर से प्राप्त कोर्इ आय--

(i) प्रधानमंत्री राष्ट्रीय सहायता कोष; या

(ii) प्रधानमंत्री कोष (लोक कला विकास); या

(iii) प्रधानमंत्री विद्याथ्र्ाी सहायता कोष, 68[या]

69[(iiiक) राष्ट्रीय साम्प्रदायिक सद्भाव प्रतिष्ठान; या]

70[(iiiकख) केवल 71शैक्षणिक प्रयोजनों के लिए न कि लाभ के प्रयोजनों के लिए, विद्यमान71 कोर्इ विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था71 जो पूर्णत: या सारत: सरकार द्वारा पोषित है; या

(iiiकग) बीमारी या मानसिक दोष से ग्रस्त व्यक्तियों के दाखिले और उपचार के लिए या आरोग्य स्थापन के दौरान व्यक्तियों के या चिकित्सीय देखभाल या पुनर्वासन की अपेक्षा करने वाले व्यक्तियों के दाखिले और उपचार करने वाला अस्पताल या अन्य संस्था, जो केवल परोपकार के प्रयोजनार्थ विद्यमान है न कि लाभ के प्रयोजन के लिए है और जो पूर्णत: या सारत: सरकार द्वारा वित्तपोषित है; या

(iiiकघ) कोर्इ विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था72 जो केवल72 शैक्षणिक प्रयोजनों के लिए विद्यमान है न कि लाभ के प्रयोजनों के लिए है यदि ऐसे विश्वविद्यालय या संस्था की समग्र वार्षिक प्राप्तियां, वार्षिक प्राप्तियों की रकम जो विहित73 की जाए, से अधिक नहीं है; या

(iiiकड़) बीमारी या मानसिक दोष से ग्रस्त व्यक्तियों के दाखिले और उपचार के लिए या आरोग्य स्थापन के दौरान व्यक्तियों के या चिकित्सीय देखभाल या पुनर्वासन की अपेक्षा करने वाले व्यक्तियों के दाखिले और उपचार करने वाला अस्पताल या अन्य संस्था, जो केवल परोपकार के प्रयोजनार्थ विद्यमान है न कि लाभ के प्रयोजन के लिए, यदि ऐसे अस्पताल या संस्था की समग्र वार्षिक प्राप्तियां, वार्षिक प्राप्तियों की रकम जो विहित73 की जाए, से अधिक नहीं है;]

74[(iv) पूर्त प्रयोजनों के लिए स्थापित कोर्इ अन्य निधि या संस्था, जिसे केन्द्रीय सरकार उस निधि या संस्था के उद्देश्य को और समस्त भारत में या किसी समस्त राज्य या राज्यों में उसके महत्त्व को ध्यान रखते हुए राजपत्र में अधिसूचित75 करे; या

(v) कोर्इ न्यास (जिसके अन्तर्गत कोर्इ विधिक बाध्यता भी है) या संस्था जो पूर्णत: सार्वजनिक धार्मिक प्रयोजनों के लिए है अथवा पूर्णत: सार्वजनिक धार्मिक और पूर्त प्रयोजनों के लिए है, जिसे केन्द्रीय सरकार उस रीति को ध्यान में रखते हुए राजपत्र में अधिसूचित76 करे जिससे उस न्यास या संस्था के कामकाज का प्रशासन या पर्यवेक्षण यह सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है कि उसको प्रोद्भूत होने वाली आय उसके उद्देश्यों के लिए उचित रूप से प्रयोग की जाती है;

77[(vi) केवल शैक्षणिक प्रयोजनों के लिए न कि लाभ के प्रयोजनों के लिए केवल78 विद्यमान78 कोर्इ विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्थान78 जो उनसे भिन्न है जिन्हें उपखंड (iiiकख) या उपखंड (iiiकघ) में वर्णित किया गया है और विहित प्राधिकारी80 द्वारा अनुमोदित79 किया जाए; या

(viक) बीमारी या मानसिक दोष से ग्रस्त व्यक्तियों के दाखिले और उपचार के लिए अस्पताल या अन्य संस्था या आरोग्य स्थापन के दौरान व्यक्तियों के या चिकित्सीय देखभाल या पुनर्वासन की अपेक्षा करने वाले व्यक्तियों के दाखिले और उपचार करने के लिए है जो केवल परोपकार के प्रयोजनार्थ विद्यमान है न कि लाभ के प्रयोजन के लिए, जो उनसे भिन्न है जिन्हें उपखंड (iiiकग) या उपखंड (iiiकड़) में वर्णित किया गया है और विहित प्राधिकारी80 द्वारा अनुमोदित81 किया जाए:]

परन्तु यह कि उपखंड (iv) या उपखंड (v) 82[या उपखंड (vi) या उपखंड (viक)] में उल्लिखित निधि या न्यास या संस्था 82[या कोर्इ विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था83 या कोर्इ अस्पताल या अन्य चिकित्सीय संस्था] उपखंड (iv) या उपखंड (v) 82[या उपखंड (vi) या उपखंड (viक)] के अधीन छूट देने या उसे जारी रखने के प्रयोजन के लिए विहित प्राधिकारी84 को विहित प्ररूप85 और रीति में आवेदन करेगी] :

86[परन्तु यह और कि केन्द्रीय सरकार, उपखंड (iv) या उपखंड (v) या उपखंड (vi) या उपखंड (viक) के अन्तर्गत निधि या न्यास या संस्था से या विहित प्राधिकारी किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल अन्य चिकित्सीय संस्था को अनुमोदित करने से पूर्व ऐसे दस्तावेज (जिनके अंतर्गत संपरीक्षित वार्षिक लेखा भी है) या जानकारी निधि या न्यास या संस्था या यथास्थिति किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सीय संस्था से मंगा सकेगी जो वह निधि या न्यास या संस्था या यथास्थिति किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सीय संस्था के क्रियाकलापों की प्रमाणिकता के बारे में अपना समाधान करने के लिए आवश्यक समझे और यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या विहित प्राधिकारी ऐसी जांच भी कर सकेगा जो वह इस संबंध में आवश्यक समझे :]

परन्तु यह भी कि उपखंड (iv) या उपखंड (v) 87[या उपखंड (vi) या उपखंड (viक)] में उल्लिखित निधि या न्यास या संस्था 87[या कोर्इ विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था88 या कोर्इ अस्पताल या अन्य चिकित्सीय संस्था]--

() अपनी आय का उन उद्देश्यों के लिए जिनके लिए उसकी स्थापना की गर्इ है, पूर्णत: और अनन्यत: उपयोग करती है या उपयोग करने के लिए संचय करती है

89[() अपनी निधियों का, जो निम्नलिखित से भिन्न हैं, अर्थात्:--

(i) निधि, न्यास या संस्था 90[या विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था91 या अस्पताल या अन्य चिकित्सीय संस्था] द्वारा धारित कोर्इ आस्तियां, जहां ऐसी आस्तियां 1 जून, 1973 को निधि, न्यास या संस्था 90[या किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था91 या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सीय संस्था] की संपत्ति का भाग थी;

(ii) निधि, न्यास या संस्था 90[या किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था91 या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सीय संस्था] द्वारा 1 मार्च, 1983 के पूर्व अर्जित कोर्इ आस्तियां (जो किसी कंपनी या निगम द्वारा या उसकी ओर से पुरोधृत डिबेंचर हैं);

(iii) निधि, न्यास या संस्था 90[या किसी विश्वविद्यालय या किसी अन्य शैक्षणिक संस्था91 या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सीय संस्था] को आबंटित बोनस शेयरों के रूप में ऐसे शेयरों की कोर्इ अनुवृद्धि जो उपखंड (i) उल्लिखित सम्पत्ति का भाग है;

(iv) आभूषण, फर्नीचर या ऐसी किसी वस्तु के रूप में जो बोर्ड, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे, प्राप्त किए गए और रखे गए स्वैच्छिक अभिदाय,

पूर्ववर्ष के दौरान किसी अवधि के लिए धारा 11 की उपधारा (5) में विनिर्दिष्ट एक या अधिक रूप या पद्धतियों से अन्यथा निवेश या निक्षेप नहीं करती है:]

परन्तु यह भी कि उपखंड (iv) या उपखंड (v) के अंतर्गत कोर्इ निधियों के 1 अप्रैल, 1989 के पूर्व धारा 11 की उपधारा (5) में विनिर्दिष्ट एक या अधिक रूप या पद्धतियों से अन्यथा किए गए निवेशों और निक्षेपों के संबंध में छूट से इंकार नहीं किया जाएगा। यदि ऐसी निधियां 30 मार्च, 92[1993] के पश्चात् इस प्रकार निवेश की हुर्इ या निक्षिप्त नहीं बनी रहती हैं]:

93[परन्तु यह भी कि उपखंड (vi) या उपखंड (viक) के अंतर्गत, निधियों के 1 जून, 1998 के पूर्व धारा 11 की उपधारा (5) में विनिर्दिष्ट एक या अधिक रूप या पद्धतियों से अन्यथा किए गए निवेशों और निक्षेपों के संबंध में छूट से इंकार नहीं किया जाएगा, यदि ऐसी निधियां 30 मार्च, 2001] के पश्चात इस प्रकार निवेश की हुुर्इ और निक्षिप्त नहीं बनी रहती है:]

94[परन्तु यह भी कि नकद रूप में स्वैच्छिक अभिदाय या इस उपखंड के तीसरे परंतुक में खंड () में उल्लिखित प्रकृति के स्वैच्छिक अभिदाय से भिन्न स्वैच्छिक अभिदाय के संबंध में उपखंड (iv) या उपखंड (v) 95[या उपखंड (vi) या उपखंड (viक)] के अंतर्गत छूट से इंकार नहीं किया जाएगा किंतु यह इस शर्त के अधीन होगा कि ऐसा स्वैच्छिक अभिदाय न्यास या संस्था 95[या किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या किसी अन्य चिकित्सीय संस्था] द्वारा उस पूर्ववर्ष के अंत से जिसमें ऐसी आस्ति अर्जित की जाती है या 31 मार्च, 1992 से, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो, एक वर्ष की समाप्ति के पश्चात धारा 11 की उपधारा (5) में विशेष रूप से उल्लिखित रूप या पद्धतियों से भिन्न किसी रूप या पद्धति से धारित नहीं किया जाता है:]

परन्तु यह भी कि उपखण्ड (iv) या उपखण्ड (v) 95[या उपखंड (vi) या उपखंड (viक)] की कोर्इ बात, निधि या न्यास या संस्था 95[या किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सीय संस्था] की किसी ऐसी आय के बारे में, जो कारबार के लाभ या अभिलाभ हैं; तब तक लागू नहीं होगी जब तक कि यह कारबार उसके उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए आनुषंगिक नहीं है और इसके द्वारा ऐसे कारबार के बारे में पृथक् लेखा बहियां नहीं रखी जाती:

परन्तु यह भी कि उपखंड (iv) या उपखंड (v) के अंतर्गत केन्द्रीय सरकार द्वारा जारी की गर्इ कोर्इ अधिसूचना, किसी एक समय में ऐसे निर्धारण वर्ष या वर्षों के लिए जो तीन निर्धारण वर्षों से अधिक नहीं होंगे, (जिसके अन्तर्गत ऐसी अधिसूचना जारी की जाने की तारीख के पूर्व प्रारम्भ होने वाले निर्धारण वर्ष भी है या हैं) प्रभावी होगी जो अधिसूचना में उल्लिखित किए जाएं.]

96[(23) 97[98[अध्याय 12ड़ के उपबंधों के अधीन रहते हुए निम्नलिखित की कोर्इ आय--]

(i) भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) के अधीन या तदधीन बनाए गए विनियमों के अधीन पंजीकृत पारस्परिक निधि;

(ii) किसी पब्लिक सेक्टर बैंक या किसी लोक वित्तीय संस्था द्वारा स्थापित या भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा प्राधिकृत और जो ऐसी शर्तों के अधीन है जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में इस संबंध में अधिसूचना99 द्वारा विनिर्दिष्ट करे, ऐसी अन्य पारस्परिक निधि।]

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए--

() "पब्लिक सेक्टर बैंक" पद से भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम, 1955 (1955 का 23) के अधीन गठित भारतीय स्टेट बैंक, भारतीय स्टेट बैंक (समनुषंगी बैंक) अधिनियम, 1959 (1959 का 38) में परिभाषित समनुषंगी बैंक, बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) की धारा 3 के अधीन या बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1980 (1980 का 40) की धारा 3 के अधीन गठित तत्स्थानी नया बैंक अभिप्रेत है;

() "लोक वित्तीय संस्था" पद का वही अर्थ है जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 4क1 में है;]

2[() 3"भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड" पद का वही अर्थ है जो भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) की धारा 2 की उपधारा (1) के खण्ड () में है;]

4[(23) लोक वित्तीय संस्थाओं द्वारा संयुक्त या पृथक रूप से स्थापित विनिमय जोखिम प्रशासन निधि की कोर्इ आय जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना5 द्वारा इस संबंध में विनिर्दिष्ट करे :

परन्तु जहां कोर्इ ऐसी रकम जो निधि में जमा है और किसी पूर्ववर्ष के दौरान आय-कर से प्रभारित नहीं की गर्इ है, किसी लोक वित्तीय संस्था के साथ पूर्णत: या भागत: बांटी जाती है, वहां इस प्रकार बांटी गर्इ सम्पूर्ण रकम, ऐसे पूर्ववर्ष की आय समझी जाएगी जिसमें ऐसी रकम इस प्रकार बांटी जाती है और तदनुसार आय कर से प्रभार्य होगी।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए "लोक वित्तीय संस्था" पद का वही अर्थ है जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 4क6 में है;

वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा 1.4.2001 से धारा 10 के खंड (23ड़) के पश्चात् निम्नलिखित खंड (23ड़क) अन्त:स्थापित किया जाएगा :

(23ड़क) भारत में मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज द्वारा संयुक्त रूप से या पृथक् रूप से स्थापित ऐसे विनिधानकर्ता संरक्षण निधि की कोर्इ आय जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे :

परन्तु जहां ऐसी कोर्इ रकम जो निधि में जमा है और किसी पूर्ववर्ष के दौरान आय-कर से प्रभारित नहीं की गर्इ है किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज के साथ पूर्णत: या भागत: बांटी जाती है वहां इस प्रकार बांटी गर्इ सम्पूर्ण रकम ऐसे पूर्ववर्ष की आय समझी जाएगी जिसमें ऐसी रकम इस प्रकार बांटी जाती है और तदनुसार आय-कर से प्रभार्य होगी;

7-8[(23) किसी जोखिम पूंजी निधि या जोखिम पूंजी कंपनी द्वारा किसी जोखिम पूंजी उपक्रम में साधारण शेयरों के रूप में किए गए निवेश से लाभांश या दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभ के रूप में आय :

परंतु यह तब जबकि ऐसी जोखिम पूंजी निधि या जोखिम पूंजी कम्पनी इस निमित्त बनाए गए नियमों9 के अनुसार विहित प्राधिकारी10 द्वारा इस खंड के प्रयोजनों के लिए अनुमोदित की जाती है और विहित शर्तों को पूरी करती है :

परन्तु यह और कि विहित प्राधिकारी द्वारा कोर्इ अनुमोदन किसी एक बार में, ऐसे निर्धारण वर्ष या वर्षों के लिए प्रभावी होगा, जो तीन निर्धारण वर्षों से अधिक नहीं है, जो अनुमोदन आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए :

11[परन्तु यह भी कि इस खंड की कोर्इ बात 31 मार्च, 1999 के पश्चात् किए गए किसी निवेश के संबंध में लागू नहीं होगी।]

12[* * *]

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए,--

() "जोखिम पूंजी निधि" से ऐसी निधि अभिप्रेत है जो रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) के उपबंधों के अधीन रजिस्ट्रीकृत न्यास विलेख के अधीन कार्य कर रही है जो मुख्यत: विहित मार्गदर्शक सिद्धांतों के अनुसार किसी जोखिम पूंजी उपक्रम के साधारण शेयरों को अर्जित करने के रूप में निवेशों के लिए न्यासियों द्वारा धन एकत्रित करने के लिए स्थापित किया गया है;

() "जोखिम पूंजी कंपनी" से ऐसी कंपनी अभिप्रेत है जिसने विहित मार्गदर्शक सिद्धान्तों के अनुसार जोखिम पूंजी उपक्रम की साधारण शेयरों को अर्जित करने के रूप में निवेश किया है;

13[() "जोखिम पूंजी उपक्रम" से ऐसी देशी कंपनी अभिप्रेत है जिसके शेयर भारत में किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में सूचीबद्ध नहीं हैं और जो विद्युत या किसी अन्य प्रकार की शक्ति के उत्पादन या वितरण करने के कारबार में लगी हुर्इ है या किसी अवसंरचना सुविधा को विकसित करने, बनाए रखने और दूरसंचार सेवाएं प्रदान करने के कारबार में लगी हुर्इ हैं या ऐसी वस्तुओं या चीजों के (जिसके अंतर्गत कम्प्यूटर साफ्टवेयर भी है) जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस संबंध में अधिसूचित14 की जाएं, निर्माण या उत्पादन में लगी हुर्इ हैं; और

() "अवसंरचनात्मक सुविधा" से कोर्इ सड़क, राजमार्ग, पुल, विमानपत्तन, पत्तन, रेल प्रणाली, जल प्रदाय परियोजना, सिंचार्इ परियोजना, सफार्इ या मलव्ययन प्रणाली या उसी प्रकार की कोर्इ अन्य सार्वजनिक सुविधा अभिप्रेत है जो राजपत्र में इस संबंध में बोर्ड द्वारा अधिसूचित की जाए और जिससे धारा 80झक की उपधारा (4क) में विनिर्दिष्ट शर्तों को पूरा करती है;

15[(23चक) धारा 115ण में निर्दिष्ट लाभांशों से भिन्न लाभांशों या किसी जोखिम पूंजी निधि के या किसी जोखिम पूंजी उपक्रम में साधारण शेयरों के माध्यम से किए गए निवेशों से किसी जोखिम पूंजी कंपनी दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभ के माध्यम से आय :

परन्तु ऐसी जोखिम पूंजी निधि या जोखिम पूंजी कंपनी इस संबंध में बनाए गए नियमों16 के अनुसार केन्द्रीय सरकार द्वारा इसे किए गए आवेदन पर, इस खंड के प्रयोजनों के लिए अनुमोदित की जाती है और जो विहित शर्तों को पूरा करती है :

परन्तु यह और कि केन्द्रीय सरकार द्वारा दिया गया कोर्इ अनुमोदन एक ही बार में ऐसे निर्धारण वर्ष या वर्षों के लिए प्रभावी होगा जो तीन निर्धारण वर्षों से अधिक नहीं होंगे, जो अनुमोदन आदेश में विशेष रूप से उल्लिखित किया जाए :

वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा 1.4.2001 से धारा 10 के खंड (23चक) के दूसरे परन्तुक के पश्चात् निम्नलिखित तीसरा परन्तुक अन्त:स्थापित किया जाएगा:

परन्तु यह भी कि इस खंड में की कोर्इ बात 31 मार्च, 2000 के पश्चात किए गए किसी विनिधान की बाबत लागू नहीं होगी।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए--

(क) "जोखिम पूंजी निधि" से ऐसी निधि अभिप्रेत है जो रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) के उपबंधों के अधीन रजिस्ट्रीकृत न्यास विलेख के अधीन कार्य कर रही है जो मुख्यत: विहित मार्गदर्शक सिद्धान्तों के अनुसार जोखिम पूंजी को साधारण शेयर अर्जित करने के रूप में निवेशों के लिए न्यासियों द्वारा धन एकत्रित करने के लिए स्थापित की गर्इ है;

(ख) "जोखिम पूंजी कंपनी" से ऐसी कंपनी अभिप्रेत है जिसने विहित मार्गदर्शक सिद्धान्तों के अनुसार जोखिम पूंजी उपक्रम के साधारण शेयरों को अर्जित करने के रूप में निवेश किया है; और

(ग) "जोखिम पूंजी उपक्रम" से ऐसी देशी कंपनी अभिप्रेत है जिसके शेयर भारत में मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में सूचीबद्ध नहीं है और जो निम्नलिखित के--

(i) (क) सॉफ्टवेयर;

(ख) सूचना प्रौद्योगिकी;

(ग) फार्मास्यूटिकल सेक्टर में मूल औषधियों के उत्पादन;

(घ) जैव-प्रौद्योगिकी;

(ड़) कृषि या सहबद्ध सेक्टर; या

(च) ऐसे अन्य सेक्टर, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इन निमित्त अधिसूचित17 किया जाए,

के कारबार में लगी हुर्इ है; या

(ii) किसी वस्तु या पदार्थ के उत्पादन या विनिर्माण जिसके लिए पेटेंट, राष्ट्रीय अनुसंधान प्रयोगशाला या विज्ञान या प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा अनुमोदित किसी अन्य वैज्ञानिक अनुसंधान संस्था को दिया गया है;]

वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा 1.4.2001 से धारा 10 के खंड (23चक) के पश्चात् निम्नलिखित खंड (23चख) रखा जाएगा :

(23चख) किसी जोखिम पूंजी उपक्रम में निवेश के लिए निधियां एकत्रित करने के लिए स्थापित जोखिम पूंजी कंपनी या जोखिम पूंजी निधि की आय।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए–

(क) "जोखिम पूंजी कंपनी" से ऐसी कंपनी अभिप्रेत है--

(i) जिसे भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) और तदधीन बनाए गए विनियमों के अधीन पंजीकरण प्रमाण पत्र प्रदान कर दिया है;

(ii) जो ऐसी शर्तों को पूरा करती है जो इस संबंध में राजपत्र में अधिसूचना द्वारा भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड द्वारा केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन से विनिर्दिष्ट की जाएं;

(ख) "जोखिम पूंजी निधि" से ऐसी निधि अभिप्रेत है--

(i) जो रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) के उपबंधों के अंतर्गत पंजीकृत किसी न्यास विलेख के अंतर्गत कार्य कर रहे हैं।

(ii) जिसे भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) और तदधीन बनाए गए विनियमों के अधीन पंजीकरण प्रमाणपत्र प्रदान कर दिया है;

(iii) जो ऐसी शर्तों को पूरा करती है जो इस संबंध में राजपत्र में अधिसूचना द्वारा भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड द्वारा केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन से विनिर्दिष्ट की जाएं;

(ग) "जोखिम पूंजी उपक्रम" से ऐसी देशी कंपनी अभिप्रेत है--

(i) जिसके शेयर भारत में मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में सूचीबद्ध नहीं हैं;

(ii) जो सेवाएं प्रदान करने या किसी वस्तु या चीज़ के उत्पादन या विनिर्माण के कारबार में लगी हुर्इ है किन्तु जिसमें ऐसी गतिविधियों का क्षेत्र सम्मिलित नहीं है जो इस संबंध में राजपत्र में अधिसूचना18 द्वारा भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड द्वारा केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन से विनिर्दिष्ट की जाती है।

19[20(23) धारा 115ण में उल्लिखित लाभांशों को छोड़कर लाभांशों, ब्याज या दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभ के रूप में आय जो किसी अवसंरचना पूंजी निधि या किसी अवसंरचना पूंजी कंपनी के निवेशों से, जो 1 जून, 1998 को या इसके पश्चात् शेयरों के रूप में किए गए हैं या किसी उद्यम में, जो पूर्णत: किसी अवसंरचनात्मक सुविधा के 21[(i) विकास (ii) रखरखाव और प्रचालन, या (iii) विकास, रखरखाव और प्रचालन के कारबार में लगा है] और जिसे केन्द्रीय सरकार द्वारा इस संबंध में बनाए गए नियमों22 के अनुसार इसका आवेदन करने पर अनुमोदित23 कर दिया है और जो विहित शर्तों को पूरा करती है, दीर्घकालिक वित्त के रूप में किए गए निवेशों से प्राप्त हो।

24[स्पष्टीकरण 1].–इस खंड के प्रयोजनों के लिए,--

() "अवसंरचनात्मक पूंजी कंपनी" से ऐसी कंपनी अभिप्रेत है जिसने शेयर अर्जित करके या दीर्घकालिक वित्त देने के रूप में उस उद्यम को निवेश किया है जो पूर्णतया 25[किसी अवसंरचनात्मक सुविधा के–

(i) विकास; या

(ii) रखरखाव और प्रचालन; या

(iii) विकास, रखरखाव और प्रचालन के कारबार में लगा हुआ है।]

() "अवसंरचनात्मक पूंजी निधि" से ऐसी निधि अभिप्रेत है जो रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) के अधीन रजिस्ट्रीकृत न्यास विलेख के अधीन कार्य कर रही है, जो शेयरों को अर्जित कर के निवेश के लिए न्यासियों द्वारा धन एकत्रित करने के लिए स्थापित है या 25क[किसी अवसंचरनात्मक सुविधा के–

(i) विकास; या

(ii) रखरखाव और प्रचालन; या

(iii) विकास, रखरखाव और प्रचालन;

कारबार में पूर्णत: लगे किसी उद्यम को दीर्घकालिक वित्त देने के लिए है;]

(ग) "अवसंरचनात्मक सुविधा से" अभिप्रेत है--

(i) सड़क, राजमार्ग, विमान पत्तन, पत्तन25ख, रेल प्रणाली, जल प्रदाय परियोजना, सिंचार्इ परियोजना 26[जल उपचार प्रणाली, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली] सफार्इ और मलव्ययन प्रणाली या वैसी प्रकृति की कोर्इ अन्य सार्वजनिक सुविधा जो बोर्ड द्वारा राजपत्र में इस संबंध में अधिसूचित27 की जाए और जो धारा 80झक की 28[उपधारा (4) के खंड (i)] में विशेषत: उल्लिखित शर्तों को पूरा करती है;

29[(ii) कोर्इ औद्योगिक उपक्रम,–

(क) जो विद्युत के उत्पादन या उत्पादन या वितरण के लिए भारत के किसी भाग में स्थापित है यदि 1 अप्रैल, 1993 से आरंभ होने वाली और 31 मार्च, 2003 को समाप्त होने वाली अवधि के दौरान किसी भी समय विद्युत उत्पादन करना आरंभ करता है;

(ख) 1 अप्रैल, 1999 से आरंभ होने वाली और 31 मार्च, 2003 को समाप्त होने वाली अवधि के दौरान किसी भी समय नर्इ पारेषण या वितरण लाइनों के नेटवर्क बिछा कर पारेषण या वितरण आरंभ करता है;]

(iii) 1 अप्रैल, 1995 को या इसके पश्चात दूरसंचार सेवाएं प्रदान करने वाली कोर्इ परियोजना;

30[(iv) आवास के लिए कोर्इ परियोजना जो धारा 80झख की उपधारा (10) में विनिर्दिष्ट उल्लिखित शर्तों को पूरा करती है;

(v) किसी औद्योगिक पार्क के विकास, विकास और प्रचालन या रखरखाव या प्रचालन के लिए कोर्इ उपक्रम जो धारा 80झक की उपधारा (4) के खंड (iii) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाता है;]

() "दीर्घकालिक वित्त" का वही अर्थ होगा जो उसका धारा 36 की उपधारा (1) के खंड (viii) में है।]

31[स्पष्टीकरण 2.–शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषणा की जाती है कि लाभांश, ब्याज या अवसंरचनात्मक पूंजी निधि के दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभ या शेयर के रूप में आय 1 जून, 1998 से पूर्व किए गए विनिधान से अवसंरचनात्मक पूंजी कंपनी या किसी अवसंरचना का विकास करने, रखरखाव और प्रचालन के कारबार करने वाले किसी उद्यम में दीर्घकालिक वित्त सम्मिलित नहीं की जाएगी, और इस खंड के उपबंध जैसे ये वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 (1998 का 21) द्वारा संशोधन किए जाने से पूर्व थे, ऐसी आय को लागू होंगे;]

32[33(24) कोर्इ आय जो निम्नलिखित "गृह सम्पत्ति से आय" और "अन्य स्रोतों से आय" शीर्षकों के अंतर्गत प्रभार्य है--

() व्यवसाय संघ अधिनियम, 1926 (1926 का 16) के अर्थ में ऐसी किसी पंजीकृत संघ की, जो मुख्यत: कर्मकारों और नियोजकों या कर्मकारों के बीच के संबंधों को विनियमित करने के प्रयोजन के लिए बनाया गया है;

() उपखंड () में उल्लिखित पंजीकृत संघों का संगम;]

(25) (i) उन प्रतिभूतियों पर ब्याज जो किसी ऐसी भविष्य निधि द्वारा जिसको भविष्य निधि अधिनियम, 1925 (1925 का 19) लागू होता है धारित है या उसकी सम्पत्ति है या उस निधि के ऐसे कोर्इ पूंजी अभिलाभ, जो ऐसी प्रतिभूतियों के विक्रय, विनिमय या अन्तरण से उत्पन्न हो;

(ii) कोर्इ ऐसी आय जो किसी मान्यताप्राप्त भविष्य निधि की ओर से न्यासियों द्वारा प्राप्त की गर्इ हो;

(iii) कोर्इ ऐसी आय जो किसी अनुमोदित अधिवार्षिकी निधि की ओर से न्यासियों द्वारा प्राप्त की गर्इ हो;

34[(iv) कोर्इ ऐसी आय जो किसी अनुमोदित उपदान निधि की ओर से न्यासियों द्वारा प्राप्त की गर्इ हो;]

35[(v) कोर्इ आय जो--

() कोयला खान भविष्य निधि और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1948 (1948 का 46) के अंतर्गत गठित न्यासी बोर्ड द्वारा उस अधिनियम की धारा 3छ के अधीन स्थापित निक्षेप सहबद्ध बीमा निधि की ओर से प्राप्त की गर्इ हो; या

() कर्मचारी भविष्य निधि और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 (1952 का 19) के अंतर्गत गठित न्यासी बोर्ड द्वारा उस अधिनियम की धारा 6ग के अंतर्गत स्थापित निक्षेप सहबद्ध बीमा निधि की ओर से प्राप्त की गर्इ हो;]

36[(25) कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 (1948 का 34) के उपबंधों के अंतर्गत स्थापित कर्मचारी राज्य बीमा निधि की कोर्इ आय;]

37[(26) संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड (25) में यथा परिभाषित अनुसूचित जनजाति38 के ऐसे सदस्य की दशा में39 जो संविधान की छठी अनुसूची के पैरा 20 से संलग्न सारणी के भाग 1 या भाग 2 में विनिर्दिष्ट उल्लिखित किसी क्षेत्र में या 40[अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा राज्यों में] [जैसा कि वह पूर्वोत्तर क्षेत्र (पुनर्गठन) अधिनियम, 1971 के प्रारंभ होने के ठीक पूर्व विधान था] के अधीन असम के राज्यपाल द्वारा जारी की गर्इ अधिसूचना सं. टीएडी/आर/35/50/109, तारीख 23 फरवरी, 1951 के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में निवास कर रहा है 41[या जम्मू-कश्मीर राज्य के लद्दाख क्षेत्र में] कोर्इ ऐसी आय जो उसको--

()42[पूर्वोक्त क्षेत्रों या राज्यों] में किसी स्रोत से प्रोदभूत या उदभूत होती है; या

() प्रतिभूतियों पर लाभांश या ब्याज के रूप में प्रोदभूत या उदभूत होती है;]

43[(26) कोर्इ ऐसी आय जो किसी व्यक्ति को 44[* * *] 1 अप्रैल, 45[1989] के पूर्व प्रारम्भ होने वाले किसी निर्धारण वर्ष से सुसंगत किसी पूर्ववर्ष में लद्दाख जिले में या भारत के बाहर किसी स्रोत से प्रोदभूत या उदभूत हो, उस दशा में जिसमें ऐसा व्यक्ति उस पूर्ववर्ष में उक्त जिले में निवासी हो :

परन्तु यह खंड किसी ऐसे व्यक्ति की दशा में तब तक लागू नहीं होगा जब तक कि वह 1962 के अप्रैल के प्रथम दिन को आरम्भ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष में उस जिले में निवासी न रहा हो।

46[स्पष्टीकरण 1 ].–इस खंड के प्रयोजनों के लिए, किसी व्यक्ति के बारे में यह समझा जाएगा कि वह लद्दाख जिले में निवासी है, यदि वह धारा 6 की, यथास्थिति, उपधारा (1)* या उपधारा (2) या उपधारा (3) या उपधारा (4) की अपेक्षाओं को इन उपान्तरणों के अधीन रहते हुए पूरा करता है कि--

(i) उन उपधाराओं में भारत के संदर्भों में ऐसा अर्थ लगाया जाएगा मानो वह उक्त जिले के संदर्भ में हो; और

(ii) उपधारा (3) के खंड (i) में भारतीय कंपनी के संदर्भ में ऐसा अर्थ लगाया जाएगा मानो वह ऐसी कंपनी के संदर्भ में है जो जम्मू-कश्मीर राज्य में तत्समय लागू किसी विधि के अधीन बनार्इ गर्इ और पंजीकृत है और उसका पंजीकृत कार्यालय उस वर्ष उस जिले में है।

47[स्पष्टीकरण.–इस खंड में लद्दाख जिले के संदर्भ में यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह 30 जून, 1979 को उक्त जिले में सम्मिलित क्षेत्रों के संदर्भ में है;]

(26कक) 48[* * *]

49[(26) किसी केन्द्रीय, राज्य या प्रान्तीय अधिनियम द्वारा स्थापित किसी निगम की या किसी अन्य निकाय, संस्था या संगम की आय (जो सरकार द्वारा पूर्णतया वित्तपोषित निकाय, संस्था या संगम है) जहां ऐसा निगम या अन्य निकाय या संस्था या संगम 50[अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जन जातियों या पिछड़े वर्गों के या उनमें से किन्हीं दो के या सभी के सदस्यों] के हितों के प्रोन्नयन के लिए संस्थापित किया गया है, या बनाया गया है।]

51[स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए,--

() 52"अनुसूचित जातियां" और 53"अनुसूचित जनजातियां" का वही अर्थ है जो संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड (24) और खंड (25) में है;

() "पिछड़े वर्गों" से अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों से भिन्न, नागरिकों के ऐसे वर्ग अभिप्रेत हैं, जो यथास्थिति,--

(i) केन्द्रीय सरकार द्वारा; या

(ii) किसी राज्य सरकार द्वारा,

समय-समय पर, अधिसूचित किए जाएं;]

54[(26खख) किसी अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों के हितों के प्रोन्नयन करने के लिए केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार द्वारा स्थापित किसी निगम की आय।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजन के लिए "अल्पसंख्यक समुदाय" से ऐसा अल्पसंख्यक समुदाय अभिप्रेत है जो इस संबंध में राजपत्र में केन्द्रीय सरकार द्वारा उस रूप में अधिसूचित55 है;]

56[(27) खंड (26) में उल्लिखित अनुसूचित जातियों के या अनुसूचित जनजातियों के या दोनों के सदस्यों के हितों का प्रोन्नयन करने के लिए बनार्इ किसी सहकारी सोसाइटी की कोर्इ आय :

परन्तु यह तब जबकि सहकारी सोसाइटी के सदस्य वैसे ही प्रयोजनों के लिए बनार्इ गर्इ अन्य सहकारी सोसाइटियां ही हों, और सोसाइटी का वित्त, सरकार और ऐसी अन्य सोसाइटियों द्वारा उपलब्ध कराया जाता है;]

(28) 57[* * *]

58[(29) वस्तुओं के विपणन के तत्समय प्रवृत किसी विधि के अधीन गठित किसी प्राधिकारी59 की दशा में60 कोर्इ ऐसी आय जो वस्तुओं के भंडारकरण, प्रसंस्करण या उनके विपणन59 को सुविधाजनक बनाने के लिए गोदामों या भण्डारों के किराए पर दिए जाने से प्राप्त हो;]

61[(29) निम्नलिखित को प्रोदभूत या उदभूत कोर्इ आय--

() 1 अप्रैल, 1962 को या इसके पश्चात् प्रारंभ होने वाले किसी निर्धारण वर्ष से सुसंगत किसी पूर्ववर्ष में कॉफी अधिनियम, 1942 (1942 का 7) की धारा 4 के अधीन गठित कॉफी बोर्ड या किसी ऐसे पूर्ववर्ष जिसमें ऐसा बोर्ड गठित किया गया था इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो;

() 1 अप्रैल, 1962 को या इसके पश्चात् प्रारंभ होने वाले किसी निर्धारण वर्ष से सुसंगत किसी पूर्ववर्ष में रबर बोर्ड अधिनियम, 1947 (1947 का 24) की धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन गठित रबर बोर्ड या किसी ऐसे पूर्ववर्ती वर्ष में जिसमें ऐसा बोर्ड गठित किया गया था, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो;

() 1 अप्रैल, 1962 को या इसके पश्चात् प्रारंभ होने वाले किसी निर्धारण वर्ष से सुसंगत किसी पूर्ववर्ष में चाय अधिनियम, 1953 (1953 का 29) की धारा 4 के अधीन स्थापित चाय बोर्ड या किसी ऐसे पूर्ववर्ती वर्ष में जिसमें ऐसा बोर्ड गठित किया गया था, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो;

() 1 अप्रैल, 1975 को या इसके पश्चात् प्रारंभ होने वाले किसी निर्धारण वर्ष से सुसंगत किसी पूर्ववर्ती वर्ष में तम्बाकू बोर्ड अधिनियम, 1975 (1975 का 4) के अधीन गठित तम्बाकू बोर्ड या ऐसे पूर्ववर्ती वर्ष जिसमें ऐसा बोर्ड गठित किया गया था, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो;

() 1 अप्रैल, 1972 को या इसके पश्चात् प्रारंभ होने वाले किसी निर्धारण वर्ष से सुसंगत किसी पूर्ववर्ष में सामुद्रिक उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1972 (1972 का 13) की धारा 4 के अधीन स्थापित सामुद्रिक उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण या ऐसे पूर्ववर्ती वर्ष जिसमें ऐसा बोर्ड गठित किया गया था, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो;

() 1 अप्रैल, 1985 को या इसके पश्चात् प्रारंभ होने वाले किसी निर्धारण वर्ष से सुसंगत किसी पूर्ववर्ती वर्ष में कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास अधिनियम, 1985 (1986 का 2) की धारा 4 के अधीन स्थापित कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण या ऐसे पूर्ववर्ती वर्ष जिसमें प्राधिकरण का गठन किया गया था, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो;

() 1 अप्रैल, 1986 को या इसके पश्चात् प्रारंभ होने वाले किसी निर्धारण वर्ष से सुसंगत किसी पूर्ववर्ती वर्ष में मसाला बोर्ड अधिनियम, 1986 (1986 का 10) की धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन गठित मसाला बोर्ड या ऐसे पूर्ववर्ती वर्ष में जिसमें ऐसा बोर्ड गठित किया गया था, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो;

62[(30) ऐसे निर्धारिती की दशा में63, जो भारत में चाय उत्पादन या इसके निर्माण में लगा हुआ है चाय की झाड़ियों के पुन:रोपण या प्रतिस्थापन 64[अथवा चाय की खेती के लिए प्रयुक्त क्षेत्रों को पुनरुज्जीवित या समेकित करने की] ऐसी स्कीम65 के अधीन जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट चाय बोर्ड से या उसके माध्यम से प्राप्त सहायिकी की रकम :

परन्तु जब तक जबकि निर्धारिती संबंधित निर्धारण वर्ष की आय की अपनी विवरणी के साथ, या ऐसी अतिरिक्त कालावधि के भीतर जो 66[निर्धारण] अधिकारी अनुज्ञात करे पूर्ववर्ष के दौरान निर्धारिती को दी गर्इ ऐसी सहायिकी की रकम की बाबत चाय बोर्ड का प्रमाणपत्र 66[निर्धारण] अधिकारी को प्रस्तुत करता है।

स्पष्टीकरण.–इस खंड में "चाय बोर्ड" से चाय अधिनियम, 1953 (1953 का 29) की धारा 4 के अधीन स्थापित चाय बोर्ड अभिप्रेत है;]

67[(31) ऐसे निर्धारिती की दशा में जो भारत के रबड़, कॉफी, इलायची या ऐसी अन्य वस्तु के, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस संबंध में विशेषत: उल्लेख करे, उत्पादन और निर्माण का कारबार करता है, रबड़ के पौधों, कॉफी के पौधों, इलायची के पौधों या ऐसी अन्य वस्तु का उत्पादन करने के लिए पौधों के पुन:रोपण या प्रतिस्थापन की अथवा रबड़, कॉफी, इलायची या ऐसी अन्य वस्तु की खेती करने के लिए प्रयुक्त क्षेत्रों को पुनरुज्जीवित या समेकित करने की ऐसी स्कीम के अंतर्गत जो केन्द्रीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विशेष रूप से उल्लेख करे, सम्बद्ध बोर्ड या किसी माध्यम से प्राप्त साहायिकी की रकम :

परन्तु यह तब जबकि निर्धारिती, संबंधित निर्धारण वर्ष की आय की अपनी विवरणी के साथ या ऐसी अतिरिक्त अवधि के भीतर जो निर्धारण अधिकारी अनुज्ञात करे, पूर्ववर्ष के दौरान निर्धारिती को दी गर्इ ऐसी सहायिकी की रकम के बारे में संबद्ध बोर्ड का प्रमाण पत्र निर्धारण अधिकारी को प्रस्तुत करता है।

स्पष्टीकरण.–इस खंड में, "संबद्ध बोर्ड" से निम्नलिखित अभिप्रेत है :--

(i) रबड़ के संबंध में रबड़ अधिनियम, 1947 (1947 का 24) की धारा 4 के अंतर्गत गठित बोर्ड,

(ii) कॉफी के संबंध में, कॉफी अधिनियम, 1942 (1942 का 7) की धारा 4 के अंतर्गत गठित कॉफी बोर्ड,

(iii) इलायची के संबंध में, मसाला बोर्ड अधिनियम, 1986 (1986 का 10) की धारा 3 के अधीन गठित मसाला बोर्ड,

(iv) इस खंड के अंतर्गत विनिर्दिष्ट किसी अन्य वस्तु के संबंध में, तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अंतर्गत स्थापित कोर्इ बोर्ड या अन्य प्राधिकरण जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस संबंध में विनिर्दिष्ट करे;]

68[(32) धारा 64 की उपधारा (1क) में उल्लिखित किसी निर्धारिती की दशा में, उस उपधारा के अंतर्गत उसकी कुल आय में सम्मिलित किए जाने योग्य कोर्इ आय, उस सीमा तक जिस तक ऐसी आय ऐसी प्रत्येक अवयस्क संतान के बारे में, जिसकी आय इस प्रकार सम्मिलित किए जाने योग्य है, एक हजार पांच सौ रुपए से अधिक नहीं;]

69[(33) निम्नलिखित रूप में कोर्इ आय--

(i) धारा 115ण में निर्दिष्ट लाभांश; या

(ii) भारतीय यूनिट ट्रस्ट अधिनियम, 1963 (1963 का 52) के अधीन स्थापित भारतीय यूनिट ट्रस्ट से यूनिटों की बाबत प्राप्त आय; या

(iii) खंड (23) के अधीन विनिर्दिष्ट पारस्परिक निधि की यूनिटों की बाबत प्राप्त आय.]

 

42. सुसंगत केस लाज़ के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

43. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1970 द्वारा 1.4.1971 से अंत:स्थापित।

44. वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1993 से अंत:स्थापित। इससे पूर्व खंड (2क) प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से अंत:स्थापित किया गया था और प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा इसी तारीख से लोप किया गया था।

45. वित्त अधिनियम, 1972 द्वारा 1.4.1972 से प्रतिस्थापित।

46. परिपत्र सं. 158, तारीख 27.12.1974, पत्र फा.सं. 24/42/66-आर्इटी(ए-1), तारीख 3.2.1966 और परिपत्र सं. 22(XXIII-22), तारीख 12.9.1960 भी देखें। ब्यौरे के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

47. सुसंगत केस लाज़ के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

48. "प्राप्तियां", "आकस्मिक" और "अनावर्ती" के अर्थ के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ मैनुअल, खंड 3.

49. "उस परिमाण तक जिस तक ऐसी प्राप्तियां जो लाटरी से जीत नहीं है कुल मिलाकर एक हजार रुपए से अधिक नहीं हैं" के स्थान पर वित्त अधिनियम, 1986 द्वारा 1.4.1987 से प्रतिस्थापित।

50. "परंतु यह" के स्थान पर वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1992 से प्रतिस्थापित।

51. "प्राप्तियां" पद के अर्थ के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ मैनुअल, खंड 3.

52. "कारबार या वृत्ति और उपजीविका से उद्भूत प्राप्तियां" पद के अर्थ के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेजश् मैनुअल, खंड 3.

53. "या" शब्द का वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1992 से लोप किया गया। इससे पूर्व, "या" शब्द वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.10.1991 से अंत:स्थापित किया गया था।

54. वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1992 से लोप किया गया। लोप से पहले, वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.10.1991 से यथा अंत:स्थापित खंड (iv) निम्नलिखित रूप में था :

"(iv) दौड़, जिसमें घुड़दौड़ भी सम्मिलित है, से जीत।"

55. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से खंड (4) और (4क) के स्थान पर प्रतिस्थापित। इनके प्रतिस्थापन से पूर्व, वित्त अधिनियम, 1964 द्वारा 1.4.1964 से यथा अंत:स्थापित खंड (4), और वित्त अधिनियम, 1964 द्वारा 1.4.1965 से यथा अंत:स्थापित और तत्पश्चात् वित्त अधिनियम, 1968 द्वारा 1.4.1969 से संशोधित और वित्त अधिनियम, 1982 द्वारा 1.4.1982 से प्रतिस्थापित खंड (4क) निम्नलिखित रूप में है :

'(4) किसी अनिवासी की दशा में, कोर्इ ऐसी आय जो उन प्रतिभूतियों पर ब्याज से हुर्इ हो जिन्हें केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे या ऐसी कोर्इ आय जो केन्द्रीय सरकार और पुनर्निर्माण और विकास के लिए अंतर्राष्ट्रीय बैंक के बीच उधार-करार के अधीन या केन्द्रीय सरकार और संयुक्त राज्य अमेरिका की विकास उधार निधि के बीच उधार-करार के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा जारी किए गए या, यथास्थिति, उक्त बैंक या निधि के साथ ऐसे उधार-करार के अधीन, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा प्रत्याभूत किया गया हो, भारत में किसी औद्योगिक उपक्रम या वित्तीय निगम द्वारा जारी किए गए किन्हीं बंधपत्रों पर ब्याज से या उनके मोचन पर प्रीमियम से हुर्इ हो;

(4क) किसी अनिवासी की दशा में, कोर्इ ऐसी आय जो विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1947 और तदाधीन बनाए गए किन्हीं नियमों के अनुसार भारत में किसी बैंक से किसी अनिवासी (विदेशी) खाते में उसके नाम जमा धनों पर ब्याज से हो।

स्पष्टीकरण.इस खंड में "भारत के बाहर निवासी व्यक्ति" का वही अर्थ है जो विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973 (1973 का 46) की धारा 2 के खंड () में है;'

56. विनिर्दिष्ट प्रतिभूति के लिए, देखिए अधिसूचना सं. का.आ. 3331, तारीख 19.10.1965। ब्यौरे के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

57. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.4.1991 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व, उपखंड (ii) निम्नलिखित रूप में था :–

"(ii) किसी ऐसे व्यष्टि की दशा में, जो विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973 (1973 का 46) की धारा 2 के खंड () में यथापरिभाषित भारत के बाहर निवासी व्यक्ति है, कोर्इ ऐसी आय जो भारत में किसी बैंक में अनिवासी (विदेशी) खाते में उक्त अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों के अनुसार, उसके खाते में जमा धन पर ब्याज के रूप में हुर्इ हो;"

58. परिपत्र सं. 592, तारीख 4.2.1991 और परिपत्र सं. 604, तारीख 11.6.1991 भी देखें। ब्यौरे के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

59. विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973 की धारा 2 का खंड () में "भारत के बाहर निवासी व्यक्ति" को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया गया है :

'() "भारत के बाहर निवासी व्यक्ति" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो भारत में निवासी नहीं है।'

60. वित्त अधिनियम, 1982 द्वारा 1.4.1983 से अंत:स्थापित।

61. विनिर्दिष्ट बचत प्रमाणपत्रों के लिए देखिए अधिसूचना सं. का. आ. 653(र्इ), तारीख 8.9.1982। ब्यौरे के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

62. प्रत्यक्ष कर विधि (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से प्रतिस्थापित। इससे पूर्व खंड (5) का वित्त अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1975, कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1970 द्वारा 1.4.1962 और प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से संशोधन किया गया था।

63. नियम 2ख छूट की शर्तें और मात्रा विहित करता है जो निम्नानुसार है:

शर्तों का पूरा किया जाना--पूरी की जाने वाली शर्तें निम्नानुसार हैं--

• किसी यात्रा रियायत या सहायता के मूल्य पर या (i) भारत में किसी स्थान में छुट्टी जाने; या (ii) सेवा से सेवानिवृत्त होने के पश्चात् भारत में किसी स्थान पर जाने; या (iii) अपनी सेवा से पदच्युति के पश्चात्, भारत में किसी स्थान पर जाने के संबंध में अपने और अपने कुटुम्ब के लिए, यथास्थिति, अपने नियोजक या पूर्व नियोजक से निर्धारिती को प्राप्त या उसे देय सहायता पर छूट अनुज्ञात है।

• निर्धारिती के कुटुम्ब द्वारा की गर्इ यात्रा, न कि स्वयं उसके द्वारा, के लिए वास्तव में लागत व्यय की बाबत छूट अनुज्ञात है।

इस प्रयोजन के लिए 'कुटुम्ब' से अभिप्रेत है (i) निर्धारिती के पति या पत्नी या बच्चे; और (ii) निर्धारिती के माता-पिता, भार्इ, और बहिनें परंतु वे पूर्णत: या मुख्यत: निर्धारिती पर आश्रित हों। 1.10.1997 से इस बाबत केन्द्रीय सिविल सेवा छुट्टी यात्रा रियायत नियम संशोधित किए गए हैं :--

चार कलेंडर वर्ष के ब्लाक में की गर्इ दो यात्रा की बाबत ही छूट प्राप्त की जा सकती है। इस प्रयोजन के लिए, पहला चार वर्ष ब्लाक कलेंडर वर्ष 1986 से आरंभ हुआ। इस प्रकार, चार वर्षीय ब्लाक 1986-89, 1990-93, 1994-97, 1998-2001 और इसी प्रकार आगे होंगे।

• यदि निर्धारिती दो अनुज्ञात अवसरों में से किसी भी अवसर पर या दोनों अवसरों पर किसी विनिर्दिष्ट चार वर्ष की ब्लाक अवधि के दौरान यात्रा रियायत या सहायता प्राप्त नहीं करता है तो छूट का दावा किया जा सकता है परंतु यह तब जब वह उस ब्लाक के ठीक आगामी कलेंडर वर्ष में रियायत या सहायता ले। यह साधारणत: "अग्रनीत करना" रियायत के नाम से जाना जाता है। ऐसे मामलों में, इस प्रकार ली गर्इ छूट की चार वर्ष के उत्तरवर्ती ब्लाक के लिए अनुज्ञात भावी छूट को विनियमित करने के लिए गणना नहीं की जाएगी।

छूट की मात्रा--मूल नियम यह है कि छूट की मात्रा यात्रा पर उपगत वास्तविक व्यय के लिए सीमित होगी। इस से यह पूर्वकल्पित है कि कोर्इ यात्रा और उस पर कोर्इ व्यय उपगत किए बिना कोर्इ भी छूट का दावा नहीं किया जा सकता है।

ऊपर साधारण सीमाओं के अतिरिक्त, छूट की मात्रा, उपयोग किए गए या उपलब्ध परिवहन के साधन पर निर्भर करते हुए, निम्नलिखित अधिकतम सीमा के अधीन रहते हुए भी होगी :--

क. 1.10.1997 से पूर्व की गर्इ यात्रा

• रेल द्वारा की गर्इ यात्रा के लिए • गंतव्य स्थान को निकटतम मार्ग द्वारा वातानुकूलित द्वितीय श्रेणी किराया
• जहां यात्रा का मूल स्थान और गंतव्य स्थान रेल से जुड़े हों किंतु यात्रा परिवहन के किसी अन्य साधनों द्वारा की जाती है • गंतव्य स्थान को निकटतम मार्ग द्वारा वातानुकूलित द्वितीय श्रेणी किराया
• जहां यात्रा का मूल स्थान और गंतव्य या उसका कोर्इ भाग रेल से जुड़े न हों और ऐसे स्थानों के मध्य यात्रा परिवहन के अन्य साधनों द्वारा की जाती है • यदि ऐसे स्थानों के मध्य मान्यता प्राप्त सार्वजनिक परिवहन प्रणाली मौजूद हो तो निकटतम मार्ग द्वारा ऐसे परिवहन के लिए प्रथम श्रेणी या डीलक्स श्रेणी किराया। अन्य मामलों में, निकटतम मार्ग द्वारा यात्रा की दूरी के लिए वातानुकूलित द्वितीय श्रेणी किराया उसी प्रकार मानों कि यात्रा रेल द्वारा की गर्इ है।

ख. 1.10.1997 को या उसके पश्चात् की गर्इ यात्रा

• वायुयान द्वारा की गर्इ यात्रा के लिए • गंतव्य स्थान को निकटतम मार्ग द्वारा राष्ट्रीय वाहक (इंडियन एयरलाइन्स या एयर इंडिया) का वायु मितव्ययी किराया
• जहां यात्रा का मूल स्थान और गंतव्य स्थान रेल से जुड़े हों और यात्रा वायु से भिन्न परिवहन के अन्य साधनों से की जाती है। • गंतव्य स्थान को निकटतम मार्ग द्वारा वातानुकूलित द्वितीय श्रेणी किराया।
• जहां यात्रा का मूल स्थान और गंतव्य स्थान या उसका कोर्इ मार्ग रेल से न जुड़े हों • (i) जहां मान्यता प्राप्त सार्वजनिक परिवहन प्रणाली उपलब्ध हो, वहां गंतव्य स्थान के लिए निकटतम मार्ग द्वारा ऐसे परिवहन पर प्रथम श्रेणी या डीलक्स श्रेणी किराया
(ii) जहा कोर्इ भी मान्यताप्राप्त सार्वजनिक परिवहन प्रणाली उपलब्ध न हो, तो निकटतम मार्ग द्वारा यात्रा की दूरी के लिए वातानुकूलित प्रथम श्रेणी किराया उसी प्रकार मानो कि यात्रा रेल द्वारा की गर्इ हो।

बच्चों के लिए निर्बंधित दर--1.10.1997 से अंत:स्थापित नियम 2ख के उपनियम (4) के अधीन यात्रा रियायत पर छूट 1.10.1998 के पश्चात् पैदा हुए व्यष्टि के जीवित दो बच्चों से अधिक को अनुज्ञेय नहीं होगी। तथापि यह निर्बंधन 1.10.1998 से पूर्व हुए बच्चों की बाबत लागू नहीं होगा, और यह उस दशा में भी लागू नहीं होगा जहां व्यष्टि के एक बच्चा पैदा करने के पश्चात दूसरे अवसर पर अनेक बच्चे (जुड़वा/तीन/चार आदि) पैदा होते हैं। इस निर्बंधन की विवक्षा निम्नलिखित रूप में होगी:--

• 1.10.1998 को या इसके पूर्व की गर्इ यात्रा की बाबत छूट व्यष्टि के सभी जीवित बच्चों की बाबत अनुज्ञेय होगी।

• 1.10.1998 के पश्चात् की गर्इ यात्रा की बाबत,--

- 1.10.1998 से पूर्व पैदा हुए सभी जीवित बच्चों को छूट अनुज्ञेय होगी।

- इसके अतिरिक्त, 1.10.1998 को या उसके पश्चात पैदा हुए केवल दो जीवित बच्चों को ही यह छूट अनुज्ञेय होगी। दो बच्चों की इस सीमा की गणना करने में, पहले बच्चे के पश्चात् पैदा हुए अनेक बच्चों में से प्रथम बच्चा केवल "एक बच्चा" माना जाएगा।

यह उल्लेख किया जा सकता है कि अधिनियम की धारा 3(15ख) "बच्चे" को परिभाषित करती है जिसमें व्यष्टि का "सौतेला बच्चा और गोद लिया हुआ बच्चा" भी सम्मिलित है। इसलिए पूर्वोक्त निर्बंधन सौतेले बच्चों और गोद लिए बच्चों की बाबत लागू होगा परन्तु यह तब जबकि वे 1.10.1998 को या उसके पश्चात् पैदा हुए हों।

64. इसके लोप से पूर्व खंड (5क), जो काराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.4.1982 से अंत:स्थापित किया गया निम्नलिखित रूप में था :

"(5क) किसी ऐसे व्यष्टि की दशा में, जो भारत का नागरिक नहीं है और अनिवासी है, जो भारत में धारा 9 की उपधारा (1) के खंड (i) के स्पष्टीकरण के खंड () में निर्दिष्ट किसी व्यष्टि, फर्म या कंपनी द्वारा भारत में केवल किसी चलचित्र फिल्म की शूटिंग के संबंध में आता है, ऐसी शूटिंग के संबंध में कोर्इ सेवा करने के लिए उसको प्राप्त कोर्इ पारिश्रमिक;"

65. वित्त अधिनियम, 1993 द्वारा 1.4.1994 से अंत:स्थापित।

66. नियम 16क के अधीन विहित प्राधिकारी, वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान विभाग, भारत सरकार का सचिव है।

67. "या खंड (6) के उपखंड (viiक)" शब्दों का वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.4.1999 से लोप किया गया।

68. "भारत में चलने वाले किसी कारबार" पद के अर्थ के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ मैनुअल, खंड 3.

69. कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 200 के मूल पाठ के अर्थ के लिए देखिए परिशिष्ट एक

70. "सनिमार्ण या विनिर्माण संबंधी संक्रियाओं", "खनन" पद के अर्थ के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ मैनुअल खंड 3.

71. विनिर्दिष्ट "ऐसे अन्य क्षेत्र" के लिए देखें तारीख 27.3.1993 की अधिसूचना सं. का.आ. 569(र्इ)। ब्यौरे के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

72. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1970 द्वारा 1.4.1962 से प्रतिस्थापित।

73. विहित शर्तों के लिए देखें तारीख 10.2.1977 की अधिसूचना सं. सा.का.नि. 72(र्इ.)। ब्यौरे के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

74. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से लोप किया गया। इसके लोप किए जाने से पूर्व, मद (कक), जिसे वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1977 द्वारा 1.4.1972 से अंत:स्थापित किया गया, निम्नलिखित रूप में थी :

"(कक) दीर्घावकाश के दौरान भारत आने के संबंध में अपने उन बच्चों के लिए, जो भारत से बाहर किसी शिक्षा संस्था में पूर्णकालिक शिक्षा पा रहे हैं, अपने नियोजक से प्राप्त हों;"

75. वित्त अधिनियम, 1988 द्वारा 1.4.1988 से विद्यमान उपखंड (ii) से (v) के स्थान पर प्रतिस्थापित। इसके प्रतिस्थापन से पूर्व, उपखंड (ii) से (v) निम्नानुसार थे :

"(ii) ऐसा पारिश्रमिक जो उसे राजदूत, उच्चायुक्त, दूत, मंत्री, कार्यदूत, आयुक्त, पार्षद, सचिव, सलाहकार या दूतावास के अटैची, उच्च आयोग, किसी विदेशी राज्य के दूतावास या आयोग में उसके द्वारा ऐसी हैसियत से सेवा के लिए प्राप्त हो;

(iii) ऐसा पारिश्रमिक जो उसे वृत्ति के कौंसल चाहे जो विदेशी राज्य के महाकौंसल, उप कौंसल, कौंसलीय अभिकर्ता, या किसी अन्य नाम से जाना जाता हो, में उसके द्वारा ऐसी हैसियत से सेवा के लिए प्राप्त हो;

(iv) ऐसा पारिश्रमिक जो उसे भारत में किसी विदेशी राज्य की सरकार के व्यापार आयुक्त या अन्य शासकीय प्रतिनिधि के रूप में (जो उस पद को उस हैसियत में अवैतनिक रूप से धारण न करता हो) सरकार के तत्समान पदधारियों के, यदि कोर्इ हों, पारिश्रमिक को जो संबंधित देश में वैसे ही प्रयोजनों के लिए निवासी है, उस देश में वैसे ही छूट प्राप्त है;

(v) ऐसा पारिश्रमिक जो उसे खंड (ii), खंड (iii) या खंड (iv) में निर्दिष्ट किसी शासकीय कर्मचारिवृंद के सदस्य के रूप में प्राप्त हो, यदि सदस्य--

() देश के प्रतिनिधित्व के अध्यधीन हो;

() ऐसे कर्मचारिवृंद के सदस्य के रूप से भिन्न भारत में किसी कारबार या वृत्तिक या नियोजित नहीं है।

और इसके अतिरिक्त, जहां व्यष्टिक खंड (iv) में निर्दिष्ट किसी शासकीय कर्मचारिवृंद का सदस्य है वहां यदि प्रतिनिधि देश ने सरकार के तत्स्थानी शासकीय कर्मचारिवृंद के सदस्यों की दशा में वैसे ही छूट के लिए तत्समान उपबंध किए हों;"

76. इसके लोप किए जाने से पूर्व, कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.10.1975 से यथा अंत:स्थापित उपखंड (viक) निम्नलिखित रूप में था :

"(viक) ऐसा पारिश्रमिक जो उसे भारत के बाहर केवल परोपकारी प्रयोजनों के लिए स्थापित या बनार्इ गर्इ संस्था या संगम या निकाय के कर्मचारी या परामर्शी के रूप में ऐसे प्रयोजनों के संबंध में भारत में उसके द्वारा की गर्इ सेवाओं के लिए प्राप्त हो : परंतु यह तब जब कि ऐसी संस्था या संगम या निकाय और वे प्रयोजन जिनके लिए उसके द्वारा सेवाएं, भारत में की जाती हैं, केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित हों;"

77. लोप से पूर्व, उपखंड (vii), जो वित्त अधिनियम, 1964 द्वारा 1.4.1964, से कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1970 द्वारा 1.4.1971 और वित्त अधिनियम, 1965 द्वारा 1.4.1965 से संशोधित किया गया, निम्नानुसार था :

'(vii) सरकार या स्थानीय प्राधिकारी या किसी विशेष विधि द्वारा गठित निगम के नियोजन (1 अप्रैल, 1971 से पूर्व की तारीख से प्रारंभ) में तकनीकी के रूप में की गर्इ सेवा के लिए "वेतन" शीर्ष के अधीन या भारत में किए गए किसी कारबार में प्रभार्य उसके द्वारा प्राप्त या उसे देय पारिश्रमिक यदि वह किन्हीं चार वित्तीय वर्ष में ठीक पूर्ववर्ती उस वित्तीय वर्ष में निवास नहीं करता था जिसमें वह नीचे उल्लिखित समय में भारत में पहुंचा :--

() जहां उसकी सेवा की संविदा उसकी सेवा के प्रारंभ से पूर्व या ऐसे प्रारंभ के एक वर्ष के भीतर केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित की जाती है--

(i) तकनीकी की दशा में, जिसके पास औद्योगिक या कारबार प्रबंधन तकनीकी में विशेष ज्ञान और अनुभव हो, भारत में उसके पहुंचने की तारीख से प्रारंभ होने वाले छह मास की अवधि के दौरान उसके द्वारा प्राप्त या उसे देय ऐसा पारिश्रमिक;

(ii) किसी अन्य तकनीक में, भारत में उसके पहुंचने की तारीख से प्रारंभ होने वाले छत्तीस मास के दौरान उसके द्वारा प्राप्त या उसे देय ऐसा पारिश्रमिक और जहां ऐसा व्यक्ति पूर्वोक्त छत्तीस मास की समाप्ति के पश्चात भारत में पुन: नियोजन जारी रखने के लिए सुसंगत निर्धारण वर्ष के पहली अक्तूबर से पूर्व भारत सरकार से अनुमोदन प्राप्त करता है और "वेतन" शीर्ष के अधीन प्रभार्य उसकी आय पर कर केन्द्रीय सरकार [जो कर नियोजक होने की दशा में कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 200 में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए, कंपनी द्वारा संदत्त किया जाएगा] को नियोजक द्वारा संदत्त किया जाएगा, नियोजक द्वारा इस प्रकार संदत्त कर पूर्वोक्त छत्तीस मास की समाप्ति के आगामी साठ मास से अनधिक अवधि के लिए होगा;

() किसी अन्य मामले में, तकनीकी न होने के नाते जिसके पास औद्योगिक या कारबार प्रबंधन तकनीक में विशेष ज्ञान और अनुभव हो, भारत में उसके पहुंचने की तारीख से प्रांरभ होने वाले तीन सौ साठ दिन की अवधि के लिए उसके द्वारा प्राप्त या उसे देय ऐसा पारिश्रमिक।

स्पष्टीकरण.–इस उपखंड के प्रयोजनों के लिए "तकनीकी" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसके पास निम्नलिखित में विशेषज्ञीय ज्ञान और अनुभव है,--

(i) सन्निर्माण या विनिर्माण संबंधी संक्रियाओं में या खनन में या विद्युत या किसी अन्य प्रकार की शक्ति के उत्पादन में; या

(ii) औद्योगिक या कारबार प्रबंधन तकनीक में,

जो भारत में किसी ऐसी हैसियत में नियोजित है जिसमें ऐसे विशेषज्ञीय ज्ञान और अनुभव का वास्तव में उपयोग होता है।'

78. इसके लोप किए जाने से पूर्व, उपखंड (viiक) जिसे कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1970 द्वारा 1.4.1971 से अंत:स्थापित किया गया और इसके बाद प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1974 द्वारा 1.4.1973 से, वित्त अधिनियम, 1979 द्वारा 1.6.1979 से, वित्त अधिनियम, 1988 द्वारा 1.4.1988 से, वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.6.1992 से और वित्त अधिनियम, 1993 द्वारा 1.4.1993 से संशोधित किया गया, निम्नलिखित रूप में था :

'(viiक) जहां ऐसा व्यक्ति सरकार के, या किसी स्थानीय प्राधिकारी के या किसी विशेष विधि के अंतर्गत स्थापित किसी निगम के, या वैज्ञानिक अनुसंधान चलाने के लिए भारत में स्थापित किसी ऐसी संस्था या निकाय के, जो विहित प्राधिकारी द्वारा उस उपखंड के प्रयोजनों के लिए अनुमोदित किया जाए, नियोजन में या भारत में चलने वाले किसी कारबार में तकनीकी के रूप में सेवा करता है और वह व्यष्टि उस वित्तीय वर्ष के, जिसमें वह भारत में पहुंचा, ठीक पूर्ववर्ती चार वित्तीय वर्षों में से किसी वर्ष में भारत में निवासी नहीं था, वहां ऐसी सेवा के लिए उसे देय या उसके द्वारा प्राप्त ऐसा पारिश्रमिक जो "वेतन" शीर्षक के अधीन प्रयार्य है, उस मात्रा तक जो नीचे वर्णित है, अर्थात् :

(I) जहां ऐसी सेवाएं 31 मार्च, 1971 के पश्चात् किंतु 1 अप्रैल, 1988 के पूर्व किसी तारीख से आरंभ होती है, वहां

() उसके भारत पहुंचने की तारीख से शुरू होने वाली चौबीस माह की अवधि के दौरान उसे देय या उसके द्वारा प्राप्त ऐसा पारिश्रमिक, जहां तक वह पारिश्रमिक चार हजार रुपए प्रतिमाह की दर से परिकलित रकम से अधिक नहीं है और जहां पूर्वोक्त अवधि के लिए इस प्रकार परिकलित रकम के ऊपर उस पारिश्रमिक के आधिक्य पर यदि कोर्इ हो, कर केन्द्रीय सरकार को नियोजक द्वारा दिया जाता है (जो कर, नियोजक के कंपनी होने की दशा में, कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 200 में किसी बात के होते हुए भी, दिया जाता है), वहां नियोजक द्वारा इस प्रकार दिया गया कर भी है; तथा

() जहां वह सुसंगत निर्धारण वर्ष के अक्तूबर के पहले दिन के पूर्व अभिप्राप्त केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन से, पूर्वोक्त चौबीस माह की अवधि की समाप्ति के बाद भारत में नियोजन में बना रहता है और उसकी आय पर "वेतन" शीर्ष के अंतर्गत प्रभार्य कर केन्द्रीय सरकार को उसके नियोजक द्वारा दिया जाता है (जो कर नियोजक के कंपनी होने की दशा में, कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 200 में दी गर्इ किसी बात के होते हुए भी दिया जा सकता है), वहां पहले उल्लिखित चौबीस माह की समाप्ति के ठीक बाद के चौबीस माह से अधिक अवधि के लिए नियोजक द्वारा इस प्रकार दिया गया कर;

(II) जहां ऐसी सेवाएं 31 मार्च, 1988 के बाद किन्तु 1 अप्रैल, 1993 से पहले किसी तारीख से प्रारंभ होती है और उसी आय पर "वेतन" शीर्षक के अंतर्गत प्रभार्य कर केन्द्रीय सरकार को नियोजक द्वारा दिया जाता है जो कर, नियोजक के कंपनी होने की दशा में, कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 200 में दी गर्इ किसी बात के होते हुए भी, दिया जा सकेगा, वहां उसके भारत पहुंचने की तारीख से आरंभ होने वाले अड़तालीस माह से अनधिक अवधि के लिए नियोजक द्वारा इस प्रकार दिया गया कर :

परन्तु यदि केन्द्रीय सरकार लोकहित में ऐसा करना आवश्यक या समीचीन समझती है तो वह ऐसे व्यष्टि की दशा में, जो भारत में किसी मशीनरी या संयंत्र के डिजाइन, परिनिर्माण या उसे प्रारंभ करने के लिए ऐसी डिजाइन, परिनिर्माण या उसे प्रारंभ करने से संबंधित क्रियाकलापों के अधीक्षण के लिए नियोजित है, भारत में अनिवास के संबंध में इस उपखंड में उल्लिखित शर्त का त्याग कर सकती है।

स्पष्टीकरण.इस उपखंड के प्रयोजनों के लिए "तकनीकी" से ऐसा व्यक्ति है जो--

(i) सन्निर्माण या विनिर्माण संबंधी संक्रियाओं में या खनन में या विद्युत या किसी अन्य प्रकार की शक्ति के उत्पादन में, या

(ii) कृषि, पशुपालन, डेरी उद्योग, गहरे समुद्र में मछली पकड़ने या पोत निर्माण में, या

(iii) ऐसे अन्य क्षेत्र में, जो केन्द्रीय सरकार, उसमें विशेषज्ञीय ज्ञान और अनुभव रखने वाले भारतीयों की उपलभ्यता, देश की आवश्यकताओं और अन्य सुसंगत परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे,

विशेषज्ञीय ज्ञान और अनुभव रखने वाला है, और जो भारत में किसी ऐसी हैसियत में नियोजित है जिसमें ऐसे विशेषज्ञीय ज्ञान और अनुभव का वास्तव में उपयोग होता है।'

79. इसके लोप किए जाने से पूर्व, उपखंड (ix), जो वित्त अधिनियम, 1964 द्वारा 1.4.1964 से अंत:स्थापित किया गया था, निम्नलिखित रूप में था :

'(ix) "वेतन" शीर्ष के अधीन प्रभार्य कोर्इ आय जो भारत में पहुंचने की तारीख से प्रारंभ होने वाले छत्तीस माह के दौरान, किसी विश्वविद्यालय या अन्य शिक्षा संस्था में प्राचार्य या अन्य अध्यापक के रूप में की गर्इ सेवा के लिए उसे प्राप्त या देय हो और जहां ऐसा कोर्इ व्यष्टि पूर्वोक्त छत्तीस माह की समाप्ति के बाद भारत में नियोजन में बना रहता है और "वेतन" शीर्ष के अंतर्गत प्रभार्य उसकी आय पर कर संबंधित विश्वविद्यालय या अन्य शिक्षा संस्था द्वारा केन्द्रीय सरकार को भुगतान किया जाता है, वहां पूर्वोक्त छत्तीस माह की समाप्ति के पश्चात् के चौबीस माह की अनधिक की अवधि के लिए इस प्रकार संदत्त कर, परन्तु यह तब जबकि हर हालत में ये शर्तें पूरी कर दी जाएं, अर्थात् :--

(i) ऐसा व्यष्टि उस वित्तीय वर्ष के, जिसमें वह भारत में पहुंचा, ठीक पूर्ववर्ती चार वित्तीय वर्षों में से किसी वर्ष में निवासी नहीं था; और

(ii) उसकी सेवा संविदा का केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदन--

() ऐसे प्राचार्य या अन्य अध्यापकों की दशा में, जिसकी सेवा, 1964 के अप्रैल के प्रथम दिन से पूर्व हुर्इ हो, 1964 के अक्तूबर के पहले दिन को या उससे पूर्व कर दिया गया हो;

() किसी अन्य दशा में, उसकी सेवा के प्रारंभ होने के पूर्व या ऐसे प्रारंभ होने के एक वर्ष के भीतर कर दिया गया हो;'

80. इसके लोप किए जाने से पूर्व, उपखंड (x), जो वित्त अधिनियम, 1964 द्वारा 1.4.1964 से अंत:स्थापित किया गया, निम्नलिखित रूप में था:

"(x) कोर्इ ऐसी राशि जो भारत में अनुसंधान कार्य करने के लिए भारत में उसके पहुंचने की तारीख से शुरू होने वाले चौबीस माह के दौरान उसे देय या प्राप्त हो परंतु यह तब जबकि निम्नलिखित शर्तें पूरी हो जाएं, अर्थात् :--

() वह अनुसंधान कार्य सुसंगत निर्धारण वर्ष के अक्तूबर के पहले दिन को या उसके पूर्व केन्द्रीय सरकार द्वारा इस संबंध में अनुमोदित किसी अनुसंधान स्कीम के संबंध में किया जाए, और

() ऐसी राशि जो किसी विदेशी राज्य की सरकार द्वारा या भारत के बाहर स्थापित किसी संस्था या संगम या अन्य निकाय द्वारा प्रत्यक्षत: या अप्रत्यक्षत: संदेय है या संदत्त की गर्इ;"

81. वित्त अधिनियम, 1976 द्वारा 1.4.1976 से अंत:स्थापित।

82. वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1984 से अंत:स्थापित।

83. वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.6.1992 से "और केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित, ऐसी आय पर कर, ऐसे करार के निबंधनों के अधीन, सरकार या भारतीय समुत्थान द्वारा केन्द्रीय सरकार को देय है, वहां इस प्रकार संदत्त कर" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।

83क. अनुमोदित करार के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

84. वित्त अधिनियम, 1988 द्वारा 1.4.1988 से अंत:स्थापित।

85. वित्त अधिनियम, 1988 द्वारा 1.4.1988 से अंत:स्थापित।

86. वित्त अधिनियम, 1997 द्वारा 1.4.1998 से अंत:स्थापित।

87. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.4.2000 से अंत:स्थापित।

88. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से अंत:स्थापित।

89. अधिसूचित कंपनियों के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

90. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.4.1991 से अंत:स्थापित।

91. नियम 16ख के अधीन विहित प्राधिकारी, सदस्य (आय-कर), केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड, की सहमति से, आर्थिक कार्य विभाग, वित्त मंत्रालय, भारत सरकार का अपर सचिव है।

92. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.4.1991 से अंत:स्थापित।

92क. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1-4-1991 से अंत:स्थापित।

93. वित्त अधिनियम, 1974 द्वारा 1.4.1975 से विद्यमान खंड (10) के स्थान पर प्रतिस्थापित। मूल खंड पहली बार वित्त अधिनियम, 1972 द्वारा 1.4.1973 से संशोधित किया गया था और तत्पश्चात् वित्त अधिनियम, 1974 द्वारा 1.6.1972/1.4.1962 से भूतलक्षी प्रभाव से संशोधित किया गया था।

94. देखें तारीख 13.12.1962 का पत्र सं. 1(179)-62/टीपीएल और तारीख 19.6.1973 का पत्र सं. 194/6/73-आर्इ टी (ए-1)। ब्यौरे के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

95. सुसंगत केस लाज़ के लिए, देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

96. उपदान संदाय अधिनियम की धारा 4 की उपधारा (2) और (3) के मूल पाठ के लिए देखिए परिशिष्ट एक

उपदान संदाय अधिनियम, 1972 [उपदान संदाय (संशोधन) अधिनियम, 1998 द्वारा 24.9.1997 से यथा संशोधित] की धारा 4(3) के अधीन अधिकथित सीमा 3,50,000 रुपए है।

97. "संपूरित सेवा का हर एक वर्ष" पद के अर्थ के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सज़ मैनुअल, खंड 3.

98. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से "जिसका परिकलन उस वर्ष के, जिसमें उपदान का संदाय, ठीक पूर्ववर्ती तीन वर्ष के औसत वेतन के आधार पर इस प्रकार परिकलित अधिकतम छत्तीस हजार रुपए* या बीस मास का वेतन, जो भी कम हो,' के अध्ययीन किया जाए" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

* वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1982 से "तीस हजार रुपए" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

99. 3,50,000 रुपए को तारीख 20.1.1999 की अधिसूचना सं. 10772 [फा. सं. 200/77/97-आर्इ.टी. (ए-1)], द्वारा 24.9.1997 को या उसके पश्चात सेवानिवृत्ति, आदि की दशा में, सीमा के रूप में विनिर्दिष्ट किया गया है। ब्यौरे के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

99क. "इस खंड" पद के अर्थ के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ मैनुअल, खंड 3.

1. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से "*छत्तीस हजार रुपए से अधिक नहीं होगी" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

* वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1982 से "तीस हजार रुपए" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

2. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से "*छत्तीस हजार रुपए से अधिक नहीं होगी" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

* वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1982 से "तीस हजार रुपए" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

3. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से लोप किया गया। मूल तीसरे और चौथे परंतुक, जिन्हें वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1982 से भूतलक्षी प्रभाव से अंत:स्थापित किया गया था, निम्नलिखित रूप में थे :

'परन्तु यह भी कि केन्द्रीय सरकार, उस अधिकतम रकम, जिसे उपखंड (i) के अधीन तत्समय छूट दी जा सकेगी, को ध्यान में रखते हुए, ऐसे सभी तीन प्रयोजनों के लिए जिनके लिए उसे इस खंड के पूर्वगामी उपबंधों में उल्लिखित किया गया है, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा छत्तीस हजार रुपए की ऐसी अधिकतम रकम तक की सीमा में वृद्धि कर सकेगी :

परन्तु यह भी कि ऐसे मामलों के संबंध में, जिनमें ऐसी घटना (अर्थात्, यथास्थिति, कर्मचारी की सेवानिवृत्ति या उसकी अयोग्यता या उसके नियोजन से पदच्युति या उसकी मृत्यु) जिस पर 13 जनवरी, 1982 से पूर्व उपदान प्राप्त करना था, इस परंतुक का ठीक पूर्ववर्ती परंतुक लागू नहीं होगा। इस खंड के शेष उपबंध तब प्रभावी होंगे मानो "छत्तीस हजार रुपए" शब्दों के स्थान पर तीनों स्थानों पर जहां-जहां वे आते हैं "तीस हजार रुपए" शब्द रखे गए हों।'

4. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से "इस खंड में" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

5. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1965 द्वारा 1.4.1962 से अंत:स्थापित।

6. तारीख 17.11.1980 का परिपत्र सं. 286 और तारीख 6.1.1992 का परिपत्र सं. 623 भी देखें। ब्यौरे के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

7. सुसंगत केस लाज़ के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

8. वित्त अधिनियम, 1974 द्वारा 1.4.1962 से "रक्षा सेवाओं के सदस्यों को या किसी राज्य सरकार स्थानीय, प्राधिकारी के कर्मचारियों को" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

9. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से लोप किया गया। मूल परंतुक निम्नलिखित रूप में था :

"परन्तु यह कि उपखंड (ii)() या उपखंड (ii)() में विनिर्दिष्ट भुगतान की अधिकतम सीमा ऐसे भुगतान को लागू नहीं होगी जो 19 अगस्त, 1965 के पूर्व किया गया है;"

10. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1996 द्वारा 1.4.1997 से अंत:स्थापित।

11. वित्त अधिनियम, 1982 द्वारा 1.4.1978 से अंत:स्थापित।

12. सुसंगत केस लाज़ के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

13. "सेवानिवृत्ति" पद के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ मैनुअल, खंड 3.

14. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.4.1978 से भूतलक्षी प्रभाव से अंत:स्थापित।

15. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.4.1978 से भूतलक्षी प्रभाव से अंत:स्थापित।

16. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.4.1998 से "आठ" के स्थान पर प्रतिस्थापित। इससे पूर्व "आठ" प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.7.1986 से भूतलक्षी प्रभाव से "छह" के स्थान पर प्रतिस्थापित किया गया था।

17. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.7.1986 से "या तीस हजार रुपए इनमें से जो भी कम हो" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

18. विनिर्दिष्ट छूट सीमा के लिए [1. 1.4.1995 से 30.6.1995 : रुपए 1,30,320/2. 1.7.1995 से 30.6.1997 : रुपए 1,35,360/3. 1.7.1997 से आगे : रुपए 2,40,000] देखिए तारीख 27.11.1998 की अधिसूचना सं. 10749 [फा. सं. 200/23/98-आर्इ.टी.(ए-I)]। ब्यौरे के लिए देखिए टैक्समेन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

19. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.7.1986 से "तीस हजार रुपए से अधिक नहीं होगी" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

20. यथोक्त द्वारा "तीस हजार रुपए से अधिक नहीं होगी" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

21. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.7.1986 से तीसरे और चौथे परन्तुक का लोप किया गया। उनका लोप किए जाने से पूर्व तीसरा और चौथा परन्तुक, जिनका कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.4.1978 से संशोधन किया गया था, निम्नानुसार थे :

'परन्तु यह भी कि केन्द्रीय सरकार उस अधिकतम रकम को, जिसे उपखंड (i) के अधीन तत्समय छूट दी जा सकेगी, ध्यान में रखते हुए ऐसे सभी तीनों प्रयोजनों के, जिनके लिए वह इस उपखंड के पूर्वगामी उपबंधों में उल्लेख किया गया है, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा तीस हजार रुपए की ऐसी अधिकतम रकम तक की सीमा में वृद्धि कर सकेगी।'

परन्तु यह भी कि 1 जनवरी, 1982 से पूर्व सेवानिवृत्त होने वाले कर्मचारियों चाहे वे अधिवर्षिता प्राप्त करते हों या अन्यथा के संबंध में इस परंतुक का ठीक पूर्ववर्ती परन्तुक लागू नहीं होगा और इस उपखंड के शेष उपबंध तब प्रभावी होंगे मानो यदि "तीस हजार रुपए" शब्दों के स्थान पर तीनों स्थान पर जहां-जहां वे आते हैं, "पच्चीस हजार पांच सौ रुपए" शब्द रखे गए हों।'

22. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.7.1986 से "(i)" का लोप किया गया।

23. यथोक्त द्वारा खंड (ii) का लोप किया गया। इसके लोप किए जाने से पूर्व, खंड (ii) निम्नानुसार था :

'(ii) "वेतन" का वही अर्थ होगा जो चौथी अनुसूची के भाग क के नियम 2 के खंड () में है।'

24. वित्त अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1976 से अंत:स्थापित।

25. वित्त अधिनियम, 1985 द्वारा 1.4.1986 से निम्नलिखित के स्थान पर प्रतिस्थापित :

"उसकी छंटनी के समय, ऐसे प्रतिकर की सीमा जो निम्नलिखित से अधिक नहीं होगी,--

(i) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) की धारा 25च के खंड () के उपबंधों के अनुसार, संगणित कोर्इ रकम; या

(ii) बीस हजार रुपए;

इनमें से जो भी कम हो।"

26. औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 25च का खंड (ख) निम्नलिखित अनुसार है :

"(ख) कर्मकार को छंटनी के समय ऐसा प्रतिकर दे दिया गया हो जो निरंतर सेवा के हर संपूरित वर्ष के लिए या छह मास से अधिक के उसके किसी भाग के लिए पंद्रह दिन के औसत वेतन के बराबर हो; और"

27. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से प्रतिस्थापित। मूल खंड (ii) निम्नलिखित रूप में था :

"(ii) पचास हजार रुपए,"

28. जहां छंटनी 1.1.1977 को या इसके पश्चात् की जाती है वहां अधिकतम सीमा 5,00,000 रुपए है-- अधिसूचना सं. 10969 [एफ. सं. 200/21/97-आर्इटी (ए-1)], तारीख 25.6.1999.

29. औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2 के खंड () और खंड () जो क्रमश: "नियोजक" और "कर्मकार" शब्दों को परिभाषित करते हैं, के पाठ के लिए देखिए परिशिष्ट एक

30. वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1992 से अंत:स्थापित।

31. वित्त अधिनियम, 1993 द्वारा 1.4.1993 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व, खंड (10ग), जिसे वित्त अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1987 से अंत:स्थापित किया और बाद में वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1993 से प्रतिस्थापित किया गया, निम्नलिखित रूप में था :

"(10ग) किसी पब्लिक सेक्टर कंपनी या किसी अन्य कंपनी के किसी कर्मचारी द्वारा अपनी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के समय, स्वैच्छया सेवानिवृत्ति की किसी स्कीम या स्कीमों के अनुसार प्राप्त कोर्इ रकम:

परन्तु उन कंपनियों की ऐसी रकम के संदाय को शासित करने वाली स्कीमें ऐसे मार्गदर्शक सिद्धान्तों के अनुसार बनार्इ जाएंगी जो पब्लिक सेक्टर कंपनियों या अन्य कंपनियों के लिए विहित किए जाएं और ऐसे मार्गदर्शक सिद्धांतों के अंतर्गत, अन्य बातों के साथ-साथ, आर्थिक सुदृढ़ता का मापदंड भी सम्मिलित होगा और (पब्लिक सेक्टर कंपनियों से भिन्न) कंपनियों के संबंध में ऐसी स्कीमों का, यथास्थिति, मुख्य आयुक्त या महानिदेशक द्वारा इस निमित्त अनुमोदन किया जाए :"

32. तारीख 26.11.1992 का परिपत्र सं. 640 भी देखें। ब्यौरे के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

33. वित्त अधिनियम, 1994 द्वारा 1.4.1995 से "प्राधिकारी" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

34. वित्त अधिनियम, 1994 द्वारा 1.4.1995 द्वारा अंत:स्थापित।

35. प्रौद्योगिक संस्थान अधिनियम, 1961 की धारा 3 के खंड () "संस्थान" पद को निम्नलिखित रूप में परिभाषित करता है :--

'() "संस्थान" का अर्थ धारा 2 में उल्लिखित कोर्इ भी संस्थान है और इसमें भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (खड़गपुर) के अंतर्गत समामेलित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, खड़गपुर भी सम्मिलित है;'

36. अधिसूचित प्रबंध संस्थान के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

37. वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा 1.4.2001 से "स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के समय स्वेच्छया सेवानिवृत्ति की किसी स्कीम या स्कीमों के अनुसार प्राप्त कोर्इ रकम, उस परिमाण तक जो पांच लाख रुपए से अधिक नहीं है" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित किये जाएगें।

38. वित्त अधिनियम, 1994 द्वारा 1.4.1995 से अंत:स्थापित।

39. नियम 2(खक) स्वेच्छया सेवानिवृत्ति की स्कीम के लिए अपेक्षाएं विहित करती है, जो निम्नलिखित हैं :

(1) यह ऐसे कर्मचारियों को लागू होता है जिन्होंने सेवा के दस वर्ष पूरे कर लिए हों या 40 वर्ष की आयु पूरी कर ली हो। यह शर्त पब्लिक सेक्टर कंपनी के कर्मचारियों द्वारा उक्त विरचित स्वेच्छया पृथक्करण की स्कीम के अधीन प्राप्त रकम की दशा में लागू नहीं होती है। (2) यह सभी कर्मचारियों (चाहे किसी भी नाम से जाने जाते हों) जिसमें कंपनी/प्राधिकरण/सहकारी सोसाइटी के कर्मकारों और कार्यपालकों, कंपनी/सहकारी सोसाइटी के निदेशकों को छोड़कर, को लागू होती है। (3) स्वेच्छया सेवानिवृत्ति/पृथक्करण स्कीम से कर्मचारियों की विद्यमान संख्या में कमी आएगी। (4) स्वेच्छया सेवानिवृत्ति/पृथक्करण द्वारा खाली हुर्इ रिक्तियां भरी नहीं जानी हैं और न ही सेवानिवृत्त हुए कर्मचारी को उसी प्रबंधन से संबंधित दूसरी कंपनी या समुत्थान में नियोजित किया जाएगा। (5) कर्मचारियों को स्वेच्छया सेवानिवृत्ति/पृथक्करण के मद्दे प्राप्त रकम सेवा के प्रत्येक पूरे वर्ष के लिए तीन मास की समतुल्य रकम या अधिवर्षिता पर उसकी सेवानिवृत्ति की तारीख से पूर्व छोड़ी गर्इ सेवा के अतिशेष मास द्वारा गुणा करके सेवानिवृत्ति के समय वेतन से अधिक नहीं होगी।

40. "और उपखंड (ii) में निर्दिष्ट कंपनियों या उपखंड (v) में निर्दिष्ट सहकारी सोसाइटियों के संबंध में ऐसी स्कीमें, यथास्थिति, मुख्य आयुक्त या महानिदेशक द्वारा इस निमित्त अनुमोदित की जाएं" शब्दों का वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा 1.4.2001 से लोप किया जाएगा। इससे पूर्व, कोट किए गए शब्द वित्त अधिनियम, 1994 द्वारा 1.4.1995 से संशोधित किए गए थे।

41. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.4.1962 से अंत:स्थापित।

42. वित्त अधिनियम, 1995 द्वारा 1.4.1996 से अंत:स्थापित।

43. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1996 द्वारा 1.10.1996 से अंत:स्थापित।

44. वित्त अधिनियम, 1968 द्वारा 1.4.1969 से अंत: स्थापित।

45. अधिसूचित लोक भविष्य निधि के लिए देखिए तारीख 2.7.1968 की अधिसूचना सं. का.आ. 2430. ब्यौरे के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

46. वित्त अधिनियम, 1965 द्वारा 1.4.1962 से प्रतिस्थापित।

47. प्रत्यक्ष कर (संशोधन) अधिनियम, 1964 द्वारा 6.10.1964 से अंत:स्थापित।

48. परिपत्र सं. 90, तारीख 26.6.1972, पत्र फा.सं. 12/19/64-आर्इ.टी. (ए.आर्इ.), तारीख 2.1.1967 और परिपत्र सं. 798, तारीख 30.10.2000 भी देखें। ब्यौरे के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

49. "(चार सौ रुपए प्रतिमास से अधिक नहीं)" शब्दों, कोष्टकों का वित्त अधिनियम, 1986 द्वारा 1.4.1987 से लोप किया गया। इससे पूर्व इस लोप किए गए पद में "चार" वित्त अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1975 से "तीन" के स्थान पर प्रतिस्थापित किया गया था।

50. नियम 2क उपलब्ध छूट की मात्रा विहित करता है, जो यथासंभव निम्नलिखित रूप में होगा :

मुंबर्इ/कलकत्ता/दिल्ली/मद्रास अन्य शहर
• वास्तविक रूप में प्राप्त भत्ता • वास्तविक रूप में प्राप्त भत्ता
• वेतन का 10 प्रतिशत से अधिक संदत्त किराया • वेतन का 10 प्रतिशत से अधिक संदत्त किराया
• वेतन का 50 प्रतिशत • वेतन का 40 प्रतिशत

इस प्रयोजन के लिए "वेतन" में मूल वेतन और महंगार्इ भत्ता तब सम्मिलित है यदि नियोजन के निबंधनों के लिए इस प्रकार उपबंध हों। इसमें नियोजन की संविदा के निबंधनों के अनुसार कर्मचारी द्वारा प्राप्त आवर्त की नियत प्रतिशतता पर आधारित कमीशन भी सम्मिलित है किंतु दूसरे अन्य भत्ते और परिलब्धियां सम्मिलित नहीं हैं। नियम 2क के स्पष्टीकरण की दृष्टि से, मूल वेतन, महंगार्इ भत्ता और कमीशन उस अवधि के दौरान की बाबत 'देय' आधार पर अवधारित किया जाता है जिस अवधि में किराया आवास का कर्मचारी द्वारा पूर्ववर्ष में अभियोग किया जाता है। इस प्रकार, पूर्ववर्ष से भिन्न अवधि की उपलब्धियों पर विचार नहीं किया जाता है यद्यपि ऐसी रकम पूर्ववर्ष के दौरान प्राप्त की (और कराधेय) होती है। पुन: उस अवधि के दौरान की उपलब्धियां, जिस अवधि में पूर्ववर्ष में किराया आवास का अधिभोग में नहीं किया जाता है, संगणना के लिए छोड़ दी जाती है। यह उल्लेख करना महत्त्वपूर्ण है कि जहां संदत्त किराया वेतन का 10 प्रतिशत या 10 प्रतिशत से कम हो, वहां कोर्इ भी छूट अनुज्ञेय नहीं होगी। पुन: छूट वहां नहीं मिलेगी जहां कर्मचारी अपने स्वयं के मकान या उस मकान में रहता है जिसके लिए वह किराए का संदाय नहीं करता है।

51. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.4.1976 से अंत:स्थापित।

52. प्रत्यक्ष-कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से प्रतिस्थापित। इसके प्रतिस्थापन से पूर्व, खंड (14), जिसे वित्त अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1962 से संशोधित किया गया था निम्नलिखित रूप में था :

"(14) उन व्ययों की जो लाभ के किसी पद या नियोजन के कर्तव्यों के पालन में पूर्णत:, आवश्यकत: और अनन्यत: उपगत किए गए हों, पूर्ति के लिए उल्लिखित रूप से दिया गया कोर्इ विशेष भत्ता या फायदा जो धारा 17 के खंड (2) के अर्थ में मनोरंजन भत्ता और अन्य परिलब्धि की प्रकृति का नहीं है और जो उस परिमाण तक उस प्रयोजन के लिए वास्तव में उपगत किए गए हों।

स्पष्टीकरण.–शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि निर्धारिती को उस स्थान पर, जहां उसके द्वारा लाभ के पद या नियोजन के कर्तव्य का पालन मामूली रूप से किया जाता है या जहां वह मामूली तौर पर निवास करता है, उसके व्यक्तिगत व्यय को पूरा करने के लिए दिया गया कोर्इ भत्ता इस खंड के प्रयोजन के लिए ऐसे कर्तव्यों के पालन में संपूर्णत:, आवश्यकत: और अनन्यत: व्ययों को देने के लिए विशेष भत्ते के रूप में ध्यान में नहीं रखा जाएगा।"

53. "उपगत" और "लाभ का पद या नियोजन" पद के अर्थ के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ मैनुअल, खंड 3.

54. वित्त अधिनियम, 1995 द्वारा 1.7.1995 से, "जैसा केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे" के स्थान पर प्रतिस्थापित। विहित भत्ते के लिए देखें नियम 2खख(1)। नियम 2खख के विश्लेषण के लिए देखें परिशिष्ट दो.

55. "लाभ का पद या नियोजन" के पद के अर्थ के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ मैनुअल, खंड 3.

56. वित्त अधिनियम, 1995 द्वारा 1.7.1995 से "जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे, उस परिमाण तक जिस तक वह अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।

विहित भत्ते के लिए देखिए नियम 2खख(2)। नियम 2खख के विश्लेषण के लिए देखें परिशिष्ट दो.

57. प्रत्यक्ष कर विधि (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से अंत:स्थापित।

58. वित्त अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से अंत:स्थापित।

59. कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 4क और उसके अधीन अधिसूचित संस्थाओं के लिए देखिए परिशिष्ट एक

60. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से उपखंड (i), (iक), (iख), (ii) और (iiक) के स्थान पर प्रतिस्थापित। मूल उपखंड (iक) और (iख) क्रमश: कराधान विधि (संशोधन और प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम, 1965 द्वारा 4.12.1965 से और विशेष वाहक बंधपत्र (उन्मुक्ति और छूट) अधिनियम, 1981 द्वारा 12.1.1981 से अंत:स्थापित किए गए थे; उपखंड (ii) वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1965 द्वारा 11.9.1965 से, वित्त अधिनियम, 1979 द्वारा 1.4.1980 से और वित्त अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1983 से भूतलक्षी प्रभाव से संशोधित किया गया था; उपखंड (iiक) वित्त अधिनियम, 1968 द्वारा 1.4.1969 से अंत:स्थापित किया गया था। उक्त उपखंड, प्रतिस्थापन से पूर्व, निम्नानुसार थे :

"(i) केन्द्रीय सरकार द्वारा या उसके प्राधिकार के अधीन जारी 15 वर्षीय वार्षिकी प्रमाण पत्र या उस सरकार द्वारा या उसके प्राधिकार के अधीन जारी ऐसे अन्य वार्षिकी प्रमाण पत्र उस परिमाण तक जिस तक प्रमाणपत्र की ऐसी रकम प्रत्येक मामले में, उससे अधिक न हो जो इसमें विनिहित किए जाने के लिए अनुज्ञात है और जो वह सरकार इस निमित्त राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे;

(iक) राष्ट्रीय रक्षा स्वर्ण बंधपत्र, 1980 पर वार्षिक संदाय;

(iख) विशेष वाहक बंधपत्र, 1991 के उन्मोचन पर प्रीमियम;

(ii) राजकोष बचत प्रमाणपत्र, डाकघर नकद प्रमाणपत्र, राष्ट्रीय डाकघर बचत प्रमाणपत्र, राष्ट्रीय योजना प्रमाणपत्र, बारह-वर्षीय राष्ट्रीय योजना बचत प्रमाण पत्र पर ब्याज जो केन्द्रीय सरकार द्वारा जारी किए जाएं, जैसा वह सरकार इस निमित्त राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे; डाकघर सावधिक संचयी जमा नियम, 1981 के अधीन निक्षेप की बाबत डाकघर बचत बैंक में निक्षेप और बोनस पर ब्याज जो उस परिमाण तक जिस तक ऐसे प्रमाणपत्रों या निक्षेप की रकम प्रत्येक मामले में उस अधिकतम रकम से अधिक न हो जो उनमें विनिहित या निक्षेप किए जाने के लिए अनुज्ञात है :

परन्तु जहां निर्धारिती की दशा में, डाकघर बचत लेखा नियम, 1981 के नियम 4 के नीचे की सारणी के मद (6) में निर्दिष्ट प्रकृति के लोक लेखा में निक्षेपों पर ब्याज दो हजार दो सौ पचास रुपए से अधिक हो जाता  है,  वहां ऐसे निक्षेपों पर ब्याज की रकम निर्धारिती की कुल आय में सम्मिलित नहीं किया जाएगा इस उपखंड के अधीन दो हजार दो सौ पचास रुपए होगी।

(iiक) केन्द्रीय सरकार द्वारा विरचित किसी स्कीम के अधीन नियत निक्षेप पर ब्याज इस निमित्त राजपत्र में अधिसूचित उस परिमाण तक जिस तक ऐसे निक्षेपों की रकम प्रत्येक मामले में उस अधिकतम रकम से अधिक नहीं होगी, जो इसमें निक्षेप किए जाने के लिए अनुज्ञात है।"

61. अधिसूचित प्रतिभूतियों, बंधपत्रों, वार्षिक प्रमाणपत्रों, बचत प्रमाणपत्रों, आदि के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

62. वित्त अधिनियम, 1982 द्वारा 1.4.1983 से अंत:स्थापित।

63. वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1983 से अंत:स्थापित।

64. अधिसूचित पूंजी विनिधान बंधपत्र के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

65-66. वित्त अधिनियम, 1988 द्वारा 1.4.1989 से अंत:स्थापित।

67. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से अंत:स्थापित।

68. विनिर्दिष्ट अनिवासी भारतीय बंधपत्र के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

69. वित्त अधिनियम, 1985 द्वारा 1.4.1985 से अंत:स्थापित।

70. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से "धारा 11 की उपधारा (5) के खंड (iii) के स्पष्टीकरण" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

71. वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1983 से अंत:स्थापित।

72. अनुमोदित संस्थाओं के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

73. 24.8.1964 का पत्र [फा.सं.21/221/64-आर्इ.टी.(ए-1)] देखें। ब्यौरों के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट। छूट प्राप्त करने संबंधी आवेदन फार्म के लिए देखें टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ सर्कुलर्स, 1999 संस्करण, खंड 1, पृष्ठ 1.183-1.185.

74. वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1983 से अन्त:स्थापित।

75. वित्त अधिनियम, 1964 द्वारा 1.4.1964 से "सामान्यत: इसकी शर्तों तथा विशिष्ट रूप से इसके संदाय की शर्तों को ध्यान में रख कर ऐसे किसी मामले में जहां उधार या ऋण का केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदन किया जाता है" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।

76. "इस निमित्त" पद के अर्थ के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ मैनुअल, खंड 3।

77. वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1983 से अन्त:स्थापित।

78. प्रत्यक्ष कर (संशोधन) अधिनियम, 1974 द्वारा 1.4.1973 से अन्त:स्थापित।

79. वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1983 से अंत:स्थापित।

80. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.4.1991 से अन्त:स्थापित।

81. वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1992 से अन्त:स्थापित।

82. प्रत्यक्ष कर (संशोधन) अधिनियम, 1974 द्वारा 1.4.1973 से अन्त:स्थापित।

83. वित्त अधिनियम, 1976 द्वारा 1.6.1976 से अन्त:स्थापित।

84. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.4.1991 से अन्त:स्थापित।

85. वित्त अधिनियम, 1993 द्वारा 1.4.1993 से अन्त:स्थापित।

86. वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1983 से अन्त:स्थापित।

87. वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा 1.4.2000 से "धारा 36 की उपधारा (1) के खंड (viii) के प्रयोजनों के लिए एक कम्पनी जो केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित है" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

'खंड' पढ़ा जाना चाहिए।

88. वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1983 से "इस मद" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

89. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.4.1991 से अन्त:स्थापित।

90. विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973 की धारा 2 का खंड () "विदेशी करेंसी" को निम्नलिखित रूप में परिभाषित करता है :

'() "विदेशी करेन्सी" से *भारतीय करेन्सी से भिन्न कोर्इ करेन्सी अभिप्रेत है।

* "भारतीय करेन्सी" को खंड () में परिभाषित किया गया है। आगे पृष्ठ 1.302 पर पाद टिप्पण 40 देखें।

91. वित्त अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1987 से अन्त:स्थापित।

92. पब्लिक सेक्टर कम्पनियों के विनिर्दिष्ट बंधपत्रों/डिबेंचरों के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स एक्ट।

93. वित्त अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1990 से अन्त:स्थापित।

94. वित्त अधिनियम, 1990 द्वारा 1.4.1991 से अन्त:स्थापित।

95. सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों/पब्लिक सेक्टर कम्पनियों के कर्मचारियों के लिए अधिसूचित निक्षेप स्कीमों के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ सर्कुलर्स, 1999 संस्करण, खंड 1, पृष्ठ 1.195-1.211।

96. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.4.1991 से अन्त:स्थापित।

97. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.4.2000 से स्पष्टीकरण, स्पष्टीकरण 1 के रूप में पुन: संख्यांकित।

98. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से अन्त:स्थापित।

99. वित्त अधिनियम, 1997 द्वारा 1.4.1998 से अन्त:स्थापित।

1. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1996 द्वारा 1.4.1997 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व खंड () जो वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.4.1991 से अन्त:स्थापित किया गया था, निम्नलिखित रूप में था :

"() पोतों या विमानों का प्रचालन;"

2-3. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.4.2000 से अन्त:स्थापित।

4. वित्त अधिनियम, 1995 द्वारा 1.4.1995 से प्रतिस्थापित। इस प्रतिस्थापन से पूर्व उपखंड (v), जो वित्त अधिनियम, 1990 द्वारा 1.4.1989 से अन्त:स्थापित किया गया और पश्चात्वर्ती वित्त अधिनियम, 1993 द्वारा 2.11.1992 से संशोधित किया गया था, निम्नलिखित रूप में था :

"(v) कल्याण आयुक्त, भोपाल गैस पीड़ित, भोपाल द्वारा रिजर्व बैंक के एसजीएल खाते सं. एसएल/डीएच 048 द्वारा धारित प्रतिभूतियों पर ब्याज;"

5. अधिसूचित लेखाओं के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

6. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.4.2000 से अन्त:स्थापित।

7-8. वित्त अधिनियम, 1995 द्वारा 1.4.1996 से प्रतिस्थापित। इस प्रतिस्थापन से पूर्व, खंड (15क), जिसे आय-कर (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 24.1.1989 से अन्त:स्थापित किया गया था, निम्नलिखित रूप में था :--

'(15क) "केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त अनुमोदित करार के अधीन विदेशी सरकार या विदेशी उद्यम से विमान अर्जित करने के लिए विमान कारबार में लगी किसी भारतीय कंपनी द्वारा किया गया कोर्इ भुगतान।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए "विदेशी उद्यम" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जो अनिवासी है;'

9. वित्त अधिनियम, 1997 द्वारा 1.4.1998 से अन्त:स्थापित।

10. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.4.2000 से "1 अप्रैल, 1997 से पूर्व किया गया" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

11. साथ ही पत्र [फा. सं. 24/35/66 आर्इटी(ए-1)], तारीख 4.10.1966, पत्र [फा. सं. 24/2/69-आर्इटी(ए-1)], तारीख 14.1.1968, पत्र [फा.सं. 24/25/68 आर्इटी (ए-1)], तारीख 18.9.1969, पत्र [फा.सं. 24/22/67 आर्इटी (ए-1)], तारीख 7.7.1967, पत्र [फा.सं. 25/37/66-आर्इटी(ए-1)], तारीख 2.12.1966, पत्र [फा.सं. 24/7/64-आर्इटी (ए-1)], तारीख 24.3.1964, पत्र [फा.सं. 24/4/66 आर्इटी(ए-1)], तारीख 12.2.1964, पत्र [फा.सं. 24/34/62 आर्इटी (ए-1)], तारीख 25.1.1963, परिपत्र 3(XXIII-23), तारीख 12.1.1961, परिपत्र सं. 49 (XXIII-12), तारीख 13.12.1956 निरीक्षण (अनुसंधान आंकड़ा और प्रकाशन) निदेशालय, 1968, संस्करण पृष्ठ 89 पर प्रकाशित आयकर परिपत्र सं. 11 (XXIII-24), तारीख 4.4.1961 भी देखिए। ब्यौरे के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

12. सुसंगत केस लाज़ के लिए, देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

13. कराधान विधि (संशोधन और प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम, 1986 द्वारा 1.4.1986 से प्रतिस्थापित। इस प्रतिस्थापन से पूर्व वित्त अधिनियम, 1976 द्वारा 1.4.1976 से यथा-संशोधित खंड (17) निम्नलिखित रूप में था :

"(17) कोर्इ ऐसा दैनिक भत्ता जो किसी व्यक्ति द्वारा संसद या किसी राज्य विधानमंडल की या उसकी किसी समिति की सदस्यता के कारण प्राप्त किया गया है या कोर्इ भत्ता जो संसद सदस्य (अतिरिक्त सुविधा) नियम, 1975 के अन्तर्गत संसद के किसी भी सदन के सदस्य द्वारा प्राप्त किया गया है;"

14. वित्त अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1986 से "और" शब्द का लोप किया गया है।

15. वित्त अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1986 से निम्नलिखित उपखंड (ii) [पूर्व के कराधान विधि (संशोधन और प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम, 1986 द्वारा 1.4.1986 से संशोधित], के स्थान पर प्रतिस्थापित :

"(ii) किसी व्यक्ति द्वारा संसद का या इसकी किसी समिति की सदस्यता के कारण प्राप्त किए गए सभी अन्य भत्ते कुल मिलाकर बारह सौ पचास रुपए प्रति मास से अनधिक है, या किसी व्यक्ति द्वारा किसी राज्य विधान मंडल या उसकी किसी समिति की सदस्यता के कारण प्राप्त किए गए अन्य सभी भत्ते जो कुल मिलाकर छह सौ रुपए प्रतिमास से अनधिक हैं, जिन्हें केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करें;"

16. वित्त अधिनियम, 1997 द्वारा 1.4.1998 से "छह सौ" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

17. अधिसूचित भत्तों के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

18. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से खंड (17क), खंड (17ख) और (18) के स्थान पर प्रतिस्थापित। मूल खंड (17क) और (17ख) प्रत्यक्ष कर (संशोधन) अधिनियम, 1974 द्वारा 1.4.1973 भूतलक्षी प्रभाव से प्रतिस्थापित। खंड (17क) बाद में वित्त अधिनियम, 1980 द्वारा 1.4.1980 से संशोधित किया गया। पूर्वोक्त खंड, उनके प्रतिस्थापन से पूर्व निम्नलिखित रूप में थे :

"(17क) साहित्यिक, वैज्ञानिक या कलात्मक कृति या निर्धनों, कमजोर और रोगी व्यक्तियों के दु:खों का उन्मूलन करने के लिए सेवाओं या खेल और क्रीड़ाओं में निपुणता के लिए, पुरस्कारों, के जो केन्द्रीय सरकार द्वारा या किसी राज्य सरकार द्वारा संस्थित या केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त अनुमोदित किए जाएं, अनुसरण में किया गया कोर्इ संदाय, चाहे वह नकद रूप में या वस्तुओं में :

परन्तु केन्द्रीय सरकार द्वारा प्रदत्त अनुमोदन, ऐसे निर्धारण वर्ष या वर्षों (जिसमें वह निर्धारण वर्ष सम्मिलित है जो उस तारीख से पूर्व आरंभ होता है/होते हैं जिसको ऐसा अनुमोदन अनुदत्त किया जाता है) के लिए प्रभावी होगा जो अनुमोदन अनुदत्त करने वाले आदेश में विशेषत: विनिर्दिष्ट किए जाएं;

(17ख) केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार द्वारा ऐसे प्रयोजनों के लिए जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त लोक हित में अनुमोदित किए जाएं, पारितोषिक के रूप में किया गया संदाय, चाहे नकद रूप में हो या वस्तु रूप में;]

(18) केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार द्वारा केन्द्रीय सरकार द्वारा संस्थित या अनुमोदित वीरता पुरस्कारों के अनुसरण में किया गया संदाय, चाहे वह नकद रूप में हो या वस्तु रूप में;"

19. अधिसूचित पुरस्कारों/पारितोषकों के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

20. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.4.2000 से अन्त:स्थापित।

21. इसके लोप से पूर्व, खंड (18क), देशी राज्य शासक (विशेषाधिकारों की समाप्ति) अधिनियम, 1972 द्वारा 9.9.1972 से यथा अंत:स्थापित, निम्नलिखित रूप में था :

"(18क) निजी थैली की समाप्ति के परिणामस्वरूप केन्द्रीय सरकार द्वारा किया गया कोर्इ अनुदान;"

22. देशी राज्य शासक (विशेषाधिकारों की समाप्ति) अधिनियम, 1972 द्वारा 2.4.1973 से लोप किया गया।

23. देशी राज्य शासक (विशेषाधिकारों की समाप्ति) अधिनियम, 1972 द्वारा 28.12.1971 से अन्त:स्थापित।

24. "अधिभोगाधीन" पद के अर्थ के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ मैनुअल, खंड 3।

25. सुसंगत केस लाज़ के लिए, देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

26. वित्त अधिनियम, 1988 द्वारा 1.4.1989 से "प्रतिभूतियों पर ब्याज" शब्दों का लोप किया गया।

27. "अपनी ही अधिकारिता वाले क्षेत्र के भीतर" के स्थान पर वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1971 द्वारा 1.4.1972 से प्रतिस्थापित।

28. वित्त अधिनियम, 1970 द्वारा 1.4.1962 से अन्त:स्थापित।

29. सुसंगत केस लाज़ के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

30. "विकास" पद के अर्थ के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ मैनुअल, खंड 3।

31. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1990 से प्रतिस्थापित। इससे पूर्व खंड (21) वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1984 से, प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से और प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से यथा संशोधित निम्नलिखित रूप में था :

"(21) धारा 35 की उपधारा (1) के खंड (ii) के प्रयोजनों के लिए तत्समय अनुमोदित किसी वैज्ञानिक अनुसंधान संगम की कोर्इ आय जो केवल उस संगम के प्रयोजनों के लिए उपयोजित होती है :

परन्तु इस खंड की कोर्इ बात लागू नहीं होगी यदि पूर्ववर्ष की किसी अवधि के दौरान,--

(i) किसी संगम द्वारा प्राप्त अंशदानों के रूप में रकम 28 फरवरी, 1983 के पश्चात धारा 11 की उपधारा (5) में विशेष रूप से उल्लिखित एक या अधिक रूपों या पद्धतियों से अन्यथा निवेश की जाती है या निक्षेप की जाती है; या

(ii) धारा 11 की उपधारा (5) में विशेष रूप से उल्लिखित एक या अधिक रूपों या पद्धतियों से अन्यथा 1 मार्च, 1983 से पूर्व निवेश या निक्षिप्त की गर्इ संगम की निधियां 30 नवम्बर, 1983 के पश्चात इस प्रकार निवेश या निक्षेप रहना बना रहता है; या

(iii) किसी कम्पनी [जो कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 में यथा परिभाषित एक सरकारी कम्पनी नहीं है या केन्द्रीय, राज्य या प्रान्तीय अधिनियम द्वारा या इसके अन्तर्गत स्थापित कोर्इ निगम नहीं है] में कोर्इ शेयर 30 नवम्बर, 1983 के पश्चात् किसी संगम द्वारा धारित किए जाते हैं;"

32. 19.10.1984 के परिपत्र सं. 400 और 13.11.1990 के परिपत्र सं. 584 भी देखिए। ब्यौरे के लिए देखिये टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

33. देखें पूर्त न्यास या संस्था द्वारा आय के संचयन की सूचना के लिए नियम 17 और प्रारूप 10 देखिए [जो 139(1) के अंतर्गत अनुज्ञात समय की समाप्ति से पूर्व दिया जाएगा]।

34. वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1990 से प्रतिस्थापित। इसके प्रतिस्थापन से पूर्व, खंड () निम्नलिखित रूप में था :

"() अपनी निधियों का (आभूषण, फर्नीचर या किसी अन्य वस्तु जैसी बोर्ड राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे, के रूप में प्राप्त किए गए और अनुरक्षित स्वैच्छिक अभिदानों से भिन्न) धारा 11 की उपधारा (5) में विशेषत: उल्लिखित एक या अधिक रूपों या पद्धतियों से अन्यथा पूर्ववर्ष के दौरान किसी अवधि के लिए निवेश या निक्षेप नहीं करता है।"

35. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.4.1990 से "परन्तु यह और कि" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।

36. इसके लोप से पूर्व, खंड (22) निम्नलिखित रूप में था :

"(22) केवल शैक्षणिक प्रयोजनों के लिए ही, न कि लाभ के प्रयोजनों के लिए विद्यमान विश्वविद्यालय या अन्य शिक्षण संस्था की कोर्इ आय;"

37. खंड (22क) का लोप किए जाने से पूर्व वित्त अधिनियम, 1970 द्वारा 1.4.1970 से यथा अन्त:स्थापित खंड (22क) निम्नलिखित रूप में था :

"(22क) किसी बीमारी या मानसिक रोग से ग्रस्त किसी व्यक्ति के दाखिले और इलाज के लिए या उल्लाव के दौरान या चिकित्सा देख-रेख या पुनर्वास हेतु दाखिले या इलाज के लिए जो अनन्य रूप से परोपकारी कार्यों के लिए है न कि लाभ के प्रयोजनों के लिए काम में लगे अस्पताल या किसी अन्य संस्थान की आय;"

38. वित्त अधिनियम, 1994 द्वारा 1.4.1994 से अन्त:स्थापित।

39. अधिसूचित समाचार एजेंसियों के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

40. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1990 से प्रतिस्थापित। इससे पूर्व खंड (23), प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 और प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से यथा संशोधित, निम्नलिखित रूप में था,--

"(23) भारत में स्थापित किसी ऐसे संगम या संस्था की आय जिसका उद्देश्य क्रिकेट, हॉकी, फुटबाल, टैनिस के खेल या ऐसे अन्य खेल या क्रीड़ाओं का, जिसे केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस संबंध में विशेषत: विनिर्दिष्ट करे, नियंत्रण, पर्यवेक्षण, विनियमन या प्रोत्साहन करना है;

परन्तु यह और कि–

(i) संगम या संस्था अपनी आय का केवल उन उद्देश्यों के लिए जिनके लिए यह स्थापित की गर्इ है, उपयोग करती है या उपयोग करने के लिए संचय करती है;

(ii) संगम या संस्था की आय का कोर्इ भाग, उससे संबंधित किसी संगम या संस्था को दिए जाने वाले अनुदानों के सिवाय, किसी रीति में अपने सदस्यों के बीच वितरित नहीं करती है; और

(iii) केन्द्रीय सरकार के साधारण या विशेष आदेश द्वारा इस खंड के प्रयोजनों के लिए तत्समय अनुमोदित संगम या संस्था है,"

41. 17.10.1984 के परिपत्र सं. 398 और 13.11.1990 के परिपत्र सं. 584 देखें। ब्यौरे के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

सुसंगत केस लाज़ के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

42. किसी पूर्त न्यास या संस्था द्वारा आय के संचय की सूचना, [जो धारा 139(1) के अंतर्गत अनुज्ञात समय की समाप्ति से पहले प्रस्तुत की जाएगी, के लिए नियम 17 और फार्म सं. 10 देखें।

43. अधिसूचित खेल और खेल संगमों/संस्थाओं के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

44. नियम 2ग(1) के अधीन विहित प्राधिकारी, महानिदेशक, आय-कर (छूट) है।

45. धारा 10(23) के अंतर्गत खेल, संगम या संस्था द्वारा आवेदन करने के लिए नियम 2ग और प्रारूप सं. 55 देखें। 19.3.1990 का परिपत्र सं. 557 भी देखिए

46. वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1990 से प्रतिस्थापित। इस प्रतिस्थापन से पूर्व, खंड () निम्नलिखित रूप में था :

"() अपनी निधियों का (आभूषण, फर्नीचर या ऐसी किसी अन्य वस्तु के रूप में जो बोर्ड, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विशेष रूप से उल्लेख करें प्राप्त किए गए और रखे गए स्वैच्छिक अभिदाय से भिé) पूर्ववर्ष के दौरान किसी अवधि के लिए धारा 11 की उपधारा (1) में विशेषत: विनिर्दिष्ट एक या अधिक रूपों या पद्धतियों से अन्यथा निवेश या निक्षेप नहीं करती है; और"

47-48. वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1992 से "1992" अंकों के स्थान पर प्रतिस्थापित। इसके पूर्व वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.4.1990 से "1990" के स्थान पर "1992" प्रतिस्थापित किया गया था।

49. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.4.1990 से अन्त:स्थापित।

50. वित्त (सं. 2) अधिनियम 1965 द्वारा 1.4.1962 से अन्त:स्थापित।

51. 13.11.1990 के परिपत्र सं. 584 भी देखें। ब्यौरे के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

52. विनिर्दिष्ट वृत्तियों के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

53. वित्त अधिनियम, 1988 द्वारा 1.4.1989 से "प्रतिभूतियों पर ब्याज या" का लोप किया गया।

54. विनिर्दिष्ट संगमों/संस्थाओं के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

55. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1980 द्वारा 1.4.1962 से अन्त:स्थापित।

56. वित्त अधिनियम, 1995 द्वारा 1.4.1996 से अन्त:स्थापित।

57. अधिसूचित प्रयोजनों के लिए, देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

58. नियम 16ग और प्ररूप सं. 19 देखें।

59. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1996 द्वारा 1.4.1997 से अन्त:स्थापित।

60. वित्त अधिनियम, 1974 द्वारा 1.6.1974 से अंत:स्थापित।

61. खादी और ग्रामोद्योग आयोग अधिनियम, 1956 की धारा 2 के खंड () और खंड () में "खादी" और "ग्रामोद्योग" को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया गया है :--

() "खादी" से भारत में हाथ से काते हुए सूत, रेशमी या ऊनी धागे से अथवा ऐसे सब धागों या उनमें से किसी दो के मिश्रण से भारत में हथकरघों पर बुना कोर्इ कपड़ा अभिप्रेत है;

() "ग्रामोद्योग' से अनुसूची में विनिर्दिष्ट सभी या कोर्इ उद्योग अभिप्रेत है और जिनके अन्तर्गत कोर्इ अन्य उद्योग भी है जो धारा 3 के अधीन किसी अधिसूचना द्वारा अनुसूची में विनिर्दिष्ट किया गया समझा जाए।'

62. वित्त अधिनियम, 1979 द्वारा 1.4.1962 से अन्त:स्थापित।

63. वित्त अधिनियम, 1993 द्वारा 1.4.1994 से अन्त:स्थापित।

64. अधिसूचित स्कीमों के लिए, देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

65. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1996 द्वारा 1.4.1992 से अन्त:स्थापित।

66. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1976 से अन्त:स्थापित।

67. परिपत्र सं. 557, तारीख 19.3.1990, परिपत्र सं. 580, तारीख 14.9.1990, परिपत्र सं. 584, तारीख 13.11.1990 और परिपत्र सं. 745, तारीख 19.7.1996 भी देखें। ब्यौरे के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

68. प्रत्यक्ष कर विधि (ंसंशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से पुन:पुर:स्थापित। इससे पूर्व, इसका प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा उसी तारीख से लोप किया गया था।

69. वित्त अधिनियम, 1993 द्वारा 1.4.1993 से अन्त:स्थापित।

70. उपखंड (iiiकख) से उपखंड (iiiकड़) तक वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से अन्त:स्थापित।

71. "शिक्षा" "शैक्षणिक संस्था" "अन्य शैक्षणिक संस्था", "विद्यमान" और "केवल", पदों के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ मैनुअल, खंड 3।

72. "अन्य शैक्षणिक संस्था", "विद्यमान" और "केवल" पदों के अर्थ के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ मैनुअल खंड 3 देखें।

73. नियम 2खग के अनुसार विहित रकम एक करोड़ रुपए है।

74. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से प्रतिस्थापित। इससे पूर्व, उपखंड (iv) और (v) का प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 और प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से संशोधन किया गया था।

75. अनुमोदित निधियां/संस्थाओं की सम्पूर्ण सूची के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ सर्कुलर्स, 1999 संस्करण, खंड 1, पृष्ठ 1.237-1.324क और टैक्समैन्स इयरली टैक्स डायजेस्ट एंड रेफरेंसर, 2000 संस्करण, पृष्ठ 5.16- 5.21।

76. अनुमोदित न्यासों/संस्थाओं की सम्पूर्ण सूची के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज सर्कुलर्स 1999 संस्करण, खण्ड 1 पृष्ठ 1.324ख-1.386 और टैक्समैन्स इयरली टैक्स डायजेस्ट एंड रेफरेंसर, 2000 संस्करण, पृष्ठ 5.21-5.23।

77. उपखंड (vi) और (viक), वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से अन्त:स्थापित।

78. "अन्य शैक्षणिक संस्था", "विद्यमान" और "केवल" पदों के अर्थ के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ मैनुअल, खंड 3।

79. अधिसूचित विश्वविद्यालयों/शैक्षणिक संस्थानों के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज सरकुलर्स, 1999 संस्करण, खंड 1, पृष्ठ 1.387 और टैक्समैन्स इयरली टैक्स डाइजेस्ट एंड रेफरेंसर, 2000 संस्करण, पृष्ठ 5.24।

80. विहित प्राधिकारी मुख्य आयुक्त है, नियम 2गक और फार्म सं. 56घ देखें।

81. अधिसूचित अस्पतालों/संस्थाओं के लिए, देखिए टैक्समैन्स इयरली टैक्स डायजेस्ट एंड रेफरेंसर, 2000 संस्करण, पृष्ठ 5.25।

82. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1988 द्वारा 1.4.1999 से अन्त:स्थापित।

83. "अन्य शैक्षणिक संस्था" पद के अर्थ के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज मैनुअल, खंड 3।

84. नियम 2ग(1) के अधीन विहित प्राधिकारी महानिदेशक (आय-कर छूट) है।

85. नियम 2ग(3) और प्ररूप सं. 56 देखें।

86. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.4.1999 से प्रतिस्थापित। इसके प्रतिस्थापन से पूर्व वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से यथा संशोधित दूसरा परन्तुक निम्नलिखित रूप में था :

"परन्तु यह और कि केन्द्रीय सरकार उपखंड (iv) या उपखंड (v) या उपखंड (vi) या उपखंड (viक) के अधीन किसी निधि या न्यास या संस्था या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सीय संस्था को अधिसूचित करने से पूर्व निधि या न्यास या संस्था या किसी विश्वविद्यालय या किसी अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या किसी चिकित्सीय संस्था से ऐसे दस्तावेज (जिनके अंतर्गत संपरीक्षित लेखा भी है), जैसा वह निधि या न्यास या संस्था या किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या किसी चिकित्सीय संस्था के क्रियाकलापों की असलियत के बारे में अपना समाधान करने के लिए आवश्यक समझे, माँग सकेगी और सरकार ऐसी जाँच भी कर सकेगी जिसे वह इस बारे में आवश्यक समझें :"

87. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से अन्त:स्थापित।

88. "अन्य शैक्षणिक संस्था" पद के अर्थ के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ मैनुअल, खंड 3।

89. वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1990 से प्रतिस्थापित।

90. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से अन्त:स्थापित।

91. "अन्य शैक्षणिक संस्था" पद के अर्थ के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ मैनुअल, खंड 3।

92. वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1992 से "1992" के स्थान पर प्रतिस्थापित। इसके पहले "1992", वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.4.1990 से, "1990" के स्थान पर रखा गया।

93. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से अन्त:स्थापित।

94. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.4.1990 से अन्त:स्थापित।

95. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से अन्त:स्थापित।

96. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से अंत:स्थापित।

97. "किसी पब्लिक सेन्टर बैंक" शब्दों से आरंभ होने वाले और "इस निमित्त विनिर्दिष्ट करें" शब्दों पर समाप्त होने वाले भाग के लिए वित्त अधिनियम, 1995 द्वारा 1.7.1995 से प्रतिस्थापित। इस प्रतिस्थापन से पूर्व वित्त अधिनियम, 1988 द्वारा 1.4.1988 से, प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1988 से और वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1993 से यथा संशोधित उक्त भाग निम्नलिखित रूप में था :

"किसी पब्लिक सेक्टर बैंक या लोक वित्तीय संस्था द्वारा स्थापित अथवा भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड या भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा प्राधिकृत ऐसी पारस्परिक निधि की कोर्इ ऐसी आय जो ऐसी शर्तों के अधीन होगी जिन्हें केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे।"

98. "की कोर्इ आय–" के स्थान पर वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.4.2000 से प्रतिस्थापित।

99. अधिसूचित पारस्परिक निधियों के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

1. कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 4क के पाठ के लिए और इसके अंतर्गत अधिसूचित संस्थाओं के लिए देखिए परिशिष्ट एक

2. वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1993 से अन्त:स्थापित।

3. भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 की धारा 2(1) के खंड () में "बोर्ड" को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया गया है :

'(क) "बोर्ड" से धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अभिप्रेत है;'

4. वित्त अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से अन्त:स्थापित।

5. विनिर्दिष्ट विनिमय जोखिम प्रशासन निधि के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

6. कम्पनी अधिनियम, 1956 की धारा 4क के पाठ और इसके अंतर्गत अधिसूचित संस्थाओं के लिए देखिए परिशिष्ट एक

7-8. वित्त अधिनियम, 1995 द्वारा 1.4.1996 से अन्त:स्थापित।

9. नियम 2घ और प्ररूप सं. 56क, 56ख और 56ग देखें।

10. विहित प्राधिकारी आय-कर निदेशक (आय-कर छूट) है।

11. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.4.2000 से अन्त:स्थापित।

12. तीसरे और चौथे परन्तुकों का वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से लोप किया गया। लोप से पूर्व वित्त अधिनियम, 1995 द्वारा 1.4.1996 से यथा अन्त:स्थापित तीसरा और चौथा परन्तुक निम्नलिखित रूप में था :

"परन्तु यह भी कि यदि पूर्वोक्त साधारण शेयर भारत में किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में सूचीबद्ध किए जा रहे उक्त शेयरों की दशा से भिन्न किसी जोखिम पूंजी निधि या किसी जोखिम पूंजी कंपनी द्वारा किसी व्यक्ति को किसी भी समय उनके अर्जन की तारीख से तीन वर्ष के भीतर अन्तरित किए जाते हैं, ऐसे साधारण शेयरों पर लाभांश के रूप में आय की कुल रकम, जिसे पूर्ववर्ती वर्ष या पूर्ववर्ती वर्ष से पूर्ववर्ष की जिसमें अन्तरण किया गया है, कुल आय में सम्मिलित नहीं किया गया है, जोखिम पूंजी निधि या जोखिम पूंजी कम्पनी की पूर्ववर्ती वर्ष की, जिसमें ऐसा अन्तरण हुआ है, आय समझी जाएगी:

परन्तु यह भी कि यह छूट तीसरे परन्तुक में यथाउल्लिखित साधारण शेयरों के ऐसे अन्तरण से उद्भूत दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभों, यदि कोर्इ हो, के संबंध में अनुज्ञात नहीं की जाएगी।"

13. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से खंड () के स्थान पर खंड () और खंड () प्रतिस्थापित। इस प्रतिस्थापन से पूर्व, वित्त अधिनियम, 1997 द्वारा 1.4.1998 से यथा संशोधित खंड () निम्नलिखित रूप में था :

'() "जोखिम पूंजी उपक्रम" से ऐसी देशी कंपनी अभिप्रेत है जिनके शेयर भारत में मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में सूचीबद्ध नहीं हैं और जो विद्युत या अन्य शक्ति के उत्पादन, उत्पादन या वितरण के कारबार में दूरसंचार सेवाओं को प्रदान करने या ऐसी वस्तुओं या चीजों के (जिनके अन्तर्गत कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर भी हैं), जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस संबंध में अधिसूचित की जाएं, निर्माण या उत्पादन के कारबार में लगी हुर्इ है।'

14. अधिसूचित वस्तुओं या चीजों के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

15. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.4.2000 से अन्त:स्थापित।

16. नियम 2घ और प्ररूप सं. 56कक, 56खक और 56गक देखिए।

17. धारा 10(23च) के अन्तर्गत जारी की गर्इ अधिसूचना भी देखिए। ब्यौरे के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

18. धारा 10(23च) के अधीन जारी की गर्इ अधिसूचना भी देखिए। ब्यौरे के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

19. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से प्रतिस्थापित। इसके प्रतिस्थापन से पूर्व वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1996 द्वारा 1.4.1997 से अंत:स्थापित और इसके पश्चात् वित्त अधिनियम, 1997 द्वारा 1.4.1998 से संशोधित खंड (23छ) निम्नलिखित रूप में था :

'(23छ) किसी अवसरंचनात्मक पूंजी निधि या दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभ शेयरों के रूप में किए गए निवेश से किसी अवसंरचनात्मक पूंजी कंपनी या किसी अवसंरचनात्मक सुविधा के विकास, रखरखाव और प्रचालन के कारबार करने वाले किसी उद्यम में दीर्घकालिक वित्त के लाभांश या ब्याज के रूप में आय।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए,–

() "अवसंरचनात्मक पूंजी कंपनी" से ऐसी कंपनी अभिप्रेत है जिसने शेयर अर्जित करके या अवसंरचनात्मक सुविधा के विकास, रखरखाव और प्रचालन का कारबार करने वाले उद्यम के दीर्घकालिक वित्त प्रदान देने के रूप में प्रवेश किया है;

() "अवसंरचनात्मक पूंजी निधि" से ऐसी निधि अभिप्रेत है जो रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) के उपबंधों के अधीन रजिस्ट्रीकृत एक न्यास विलेख के अधीन कार्य कर रही है जो शेयर अर्जित करके विनिधान के लिए न्यासियों द्वारा धन एकत्रित करने के लिए या अवसरंचनात्मक सुविधा के विकास, रखरखाव और प्रचालन के कारबार करने वाले उद्यम को दीर्घकालिक वित्त देने के लिए स्थापित है;

() "अवसंरचनात्मक सुविधा" से निम्नलिखित अभिप्रेत है :--

(i) सड़क, राजमार्ग, पुल, विमान पत्तन, पत्तन, रेल प्रणाली या उसी प्रकार की कोर्इ अन्य सार्वजनिक सुविधा जो राजपत्र में बोर्ड द्वारा इस निमित्त अधिसूचित की जाएं जो धारा 80झक की उपधारा (4क) में विनिर्दिष्ट शर्तों को पूरा करती है;

(ii) जलप्रदाय परियोजना, सिंचार्इ परियोजना, सफार्इ और मलव्ययन प्रणाली जो धारा 80झक की उपधारा (4क) में विनिर्दिष्ट शर्तों को पूरा करती है;

(iii) विद्युत या किसी अन्य प्रकार की शक्ति के उत्पादन या उत्पादन या वितरण के लिए परियोजना जहां ऐसी परियोजना 1 अप्रैल, 1993 को इसके पश्चात् शक्ति का उत्पादन करना आरंभ करती है;

(iv) 1 अप्रैल, 1995 को या उसके पश्चात् संचार सेवा प्रदान करने की परियोजना;

() "दीर्घकालिक वित्त" का वही अर्थ है जो इसका धारा 36 की उपधारा (1) के खंड (viii) में है।'

20. परिपत्र सं. 780, तारीख 4.10.1999 और परिपत्र सं. 793, तारीख 23.6.2000 भी देखें। ब्यौरे के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

21. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.4.2000 से "विकास, रखरखाव और प्रचालन के कारबार में लगा है" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

22. नियम 2ड़ और प्ररूप 56ड़ देखिए।

23. अधिसूचित अवसंरचनात्मक पूंजी/उद्यम के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेस सर्कुलर्स, 1999 संस्करण, खंड 1, पृष्ठ 1.393-1.395 और टैक्समैन्स र्इयरली टैक्स डाइजेस्ट एंड रेफरेंसर, 2000 संस्करण, पृष्ठ 5.31-5.42 और 5.188।

24. स्पष्टीकरण आय-कर (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से स्पष्टीकरण 1 के रूप में पुन: संख्यांकित।

25. वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा 1.4.2000 से "विकास, अवसंरचनात्मक सुविधा के रखरखाव और प्रचालन के कारबार में" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।

25क. वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा 1.4.2000 से "विकास अवसंरचनात्मक सुविधा का रखरखाव और प्रचालन के कारबार में" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।

25ख. "पत्तन" की परिभाषा के लिए, परिपत्र सं. 793, तारीख 23.6.2000 देखिए। ब्यौरे के लिए, टैक्समैन मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

26. इटैलिक शब्द वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा 1.4.2001 से अन्त:स्थापित किए जाएगें।

27. अधिसूचित अवसंरचनात्मक सुविधा के लिए, देखिए टैक्समैन मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

28. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.4.2000 से "उपधारा (4क)" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

29. यथोक्त द्वारा प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व, उपखंड (ii) निम्नलिखित रूप में था :

"(ii) विद्युत या किसी अन्य प्रकार की शक्ति के उत्पादन या उत्पादन या वितरण के लिए परियोजना जहाँ ऐसी परियोजना 1 अप्रैल, 1993 को इसके पश्चात शक्ति का उत्पादन करना आरंभ करती है;"

30. उपखंड (iv) और (v) वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.4.2000 से उपखंड (iv) के स्थान पर प्रतिस्थापित। इस प्रतिस्थापन से पूर्व वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से यथा प्रतिस्थापित उपखंड (iv) निम्नलिखित रूप में था :

"(iv) आवास के लिए परियोजना जो धारा 80झक की उपधारा (4च) में विनिर्दिष्ट शर्तों को पूरा करती है।"

31. आय-कर (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से अन्त:स्थापित।

32. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1996 द्वारा 1.4.1997 से प्रतिस्थापित। इसके प्रतिस्थापन से पूर्व वित्त अधिनियम, 1988 द्वारा 1.4.1989 से यथा संशोधित खंड (24) निम्नलिखित रूप में था :

"(24) व्यवसाय संघ अधिनियम, 1926 (1926 का 16) के अर्थ में ऐसी किसी पंजीकृत संघ की जो मुख्यत: कर्मकारों और नियोजकों या कर्मकारों के बीच के संबंधों को विनियमित करने के लिए प्रयोजन के लिए बनाया गया हो, ऐसी आय जो "गृह सम्पत्ति से आय" और "अन्य स्रोतों से आय" शीर्षकों के अधीन प्रभार्य हो;"

33. सुसंगत केस लाज़ के लिए, देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

34. वित्त अधिनियम, 1972 द्वारा 1.4.1973 से अन्त:स्थापित।

35. श्रमिक भविष्य निधि विधि (संशोधन) अधिनियम, 1976 द्वारा 1.8.1976 से अन्त:स्थापित।

36. वित्त अधिनियम, 1995 द्वारा 1.4.1962 से अन्त:स्थापित।

37. पूर्वोत्तर क्षेत्र (पुनर्गठन) (संघीय विषयों से संबंधित विधियों का अनुकूलन) आदेश, 1974 द्वारा 21.1.1972 से भूतलक्षी प्रभाव से प्रतिस्थापित पूर्वतन, खंड (26) नागालैंड (संघीय विषयों से संबंधित विधियों का अनुकूलन) आदेश, 1965 द्वारा 1.12.1963 से भूतलक्षी प्रभाव से संशोधित और फिर कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1970 द्वारा 1.4.1962 से भूतलक्षी प्रभाव से संशोधित।

38. संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड (25) में "अनुसूचित जनजातियों" को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया गया है :

'(25) "अनुसूचित जनजातियों" से ऐसी जनजातियाँ या जनजातीय समुदाय अथवा ऐसी जनजातियों या जनजाति समुदायों के भाग या उनमें के यूथ अभिप्रेत हैं जिन्हें इस संविधान के प्रयोजनों के लिए अनुच्छेद 342 के अधीन अनुसूचित जनजातियां समझा जाता है;'

39. सुसंगत केस लाज़ के लिए, देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

40. वित्त अधिनियम, 1994 द्वारा 1.4.1995 से "नागालैण्ड, मणिपुर और त्रिपुरा राज्यों या अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम संघ राज्यक्षेत्रों में" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।

41. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से अन्त:स्थापित।

42. वित्त अधिनियम, 1994 द्वारा 1.4.1995 से "पूर्वोक्त राज्यों या संघ राज्यक्षेत्रों" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।

43. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1965 द्वारा 1.4.1962 से अन्त:स्थापित।

44. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1971 द्वारा 1.4.1962 से "(जो ऐसा व्यक्ति नहीं है जो सरकार की सेवा में है)" का लोप किया गया।

45. वित्त अधिनियम, 1985 द्वारा 1.4.1985 से "1986" के स्थान पर प्रतिस्थापित। इससे पूर्व वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1983 से "1983" के स्थान पर "1986" वित्त अधिनियम, 1980 द्वारा 1.4.1980 से "1980" के स्थान पर "1983" वित्त (सं. 2) अधिनियम 1977 द्वारा 1.4.1975 से भूतलक्षी प्रभाव से "1975" के स्थान पर "1980", और वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1971 द्वारा 1.4.1970 से "1970" के स्थान पर "1975" प्रतिस्थापित किया गया था।

46. विद्यमान स्पष्टीकरण वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1980 से स्पष्टीकरण 1 के रूप में पुन:संख्यांकित।

47. वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1980 से अन्त:स्थापित।

48. वित्त अधिनियम, 1997 द्वारा 1.4.1998 से लोप किया गया। इस लोप से पूर्व, वित्त अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1990 से यथा अंत:स्थापित खंड (26कक) निम्नलिखित रूप में था :

"(26कक) कोर्इ ऐसी आय जो किसी व्यक्ति को किसी ऐसी लाटरी के रूप में होती है जो सिक्किम राज्य सरकार और ऐसी लाटरी के संचालन के अभिकर्ता के बीच 28 फरवरी, 1989 को या उसके पूर्व किए गए करार के अनुसरण में निकाली जाती है और जहां ऐसा व्यक्ति किसी पूर्ववर्ष में सिक्किम राज्य में निवासी है।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए कोर्इ व्यक्ति सिक्किम राज्य का निवासी समझा जाएगा यदि वह धारा 6 के खंड (1) या खंड (2) या खंड (3) या खंड (4) की अपेक्षाओं को निम्नलिखित उपांतरणों के अधीन रहते हुए पूरा करता है, अर्थात् :--

(i) उन खंडों में भारत के प्रति निर्देशों का अर्थ सिक्किम राज्य के प्रति निर्देशों के रूप में लगाया जाएगा; और

(ii) खंड (3) के उपखंड (i) में "भारतीय कंपनी" के प्रति निर्देश का अर्थ ऐसी कंपनी के रूप में लगाया जाएगा जो सिक्किम राज्य में तत्समय प्रवृत किसी विधि के अधीन बनार्इ जाती है और रजिस्टर की जाती है और जिसका उस वर्ष में उस राज्य में रजिस्ट्रीकृत कार्यालय है।"

49. वित्त अधिनियम, 1980 द्वारा 1.4.1972 से अन्त:स्थापित।

50. वित्त अधिनियम, 1994 द्वारा 1.4.1993 "अनुसूचित जातियों के या अनुसूचित जनजातियों में से कोर्इ एक या दोनों के सदस्य" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।

*खंड (1) आदि के रूप में पढ़ा जाना चाहिए।

51. वित्त अधिनियम, 1994 द्वारा 1.4.1993 से प्रतिस्थापित। इससे पूर्व वित्त अधिनियम, 1980 द्वारा 1.4.1972 से यथा अंत:स्थापित स्पष्टीकरण निम्नलिखित रूप में था :

"स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए "अनुसूचित जातियां" या "अनुसूचित जनजातियां" का क्रमश: वही अर्थ होगा जो उनका संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड (24) और (25) में है;"

52. संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड (24) में "अनुसूचित जातियों" को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया गया है :

'(24) "अनुसूचित जातियों" से ऐसी जातियों, मूलवंश या जनजातियां अथवा ऐसी जातियों, मूलवंशों या जनजातियों के भाग या उनमें के यूथ अभिप्रेत हैं जिन्हें इस संविधान के प्रयोजनों के लिए अनुच्छेद 341 के अधीन अनुसूचित जनजातियां समझा जाता है।'

53. "अनुसूचित जनजातियों" की परिभाषा के लिए पूर्व पृष्ठ 1.110 पर पाद टिप्पण 38 देखिए

54. वित्त अधिनियम, 1995 द्वारा 1.4.1995 से अन्त:स्थापित।

55. अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदाय के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

56. वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1989 से अन्त:स्थापित। इससे पूर्व खंड (27) का वित्त अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1976 से लोप किया गया और उपांतरण सहित धारा 80ञञ में पुन: अधिनियमित। मूलत: खंड (27) वित्त अधिनियम, 1964 द्वारा 1.4.1964 से अन्त:स्थापित किया गया था और तत्पश्चात् वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1967 द्वारा 1.4.1967 से संशोधित किया गया।

57. वित्त अधिनियम, 1997 द्वारा 1.4.1998 से लोप किया गया। इस लोप से पूर्व वित्त अधिनियम, 1965 द्वारा 1.4.1965 से अंत:स्थापित और वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1965 द्वारा 11.9.1965 से प्रतिस्थापित खंड (28) निम्नलिखित रूप में था :

"(28) अध्याय 17ख की बनार्इ गर्इ किसी स्कीम के अधीन कर क्रेडिट की बाबत समायोजित या अदा की गर्इ कोर्इ रकम।"

58. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1967 द्वारा 1.4.1968 से अन्त:स्थापित।

59. "प्राधिकारी" और "वस्तुओं का विपणन" पदों के अर्थ के लिए, देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ मैनुअल, खंड 3।

60. सुसंगत केस लाज़ के लिए, देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

61. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 11.5.1999 से अन्त:स्थापित।

62. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1970 द्वारा 1.4.1969 से अन्त:स्थापित।

63. देखिए नियम 8(2)।

64. वित्त अधिनियम, 1984 द्वारा 1.4.1985 से अन्त:स्थापित।

65. विनिर्दिष्ट स्कीम के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

66. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से "आय-कर" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

67. वित्त अधिनियम, 1988 द्वारा 1.4.1989 से अन्त:स्थापित।

68. वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1993 से अन्त:स्थापित।

69. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.4.2000 से प्रतिस्थापित। इसके प्रतिस्थापन से पूर्व, वित्त अधिनियम, 1997 द्वारा 1.4.1998 से यथा अन्त:स्थापित खंड (33), निम्नलिखित रूप में था :

"(33) धारा 115ण में निर्दिष्ट लाभांशों के रूप में कोर्इ आय।"

 

 

[वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा संशोधित रूप में]

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