विभिन्न चूकों के लिये जुर्माना से अलग, आयकर विभाग ने विभन्न अपराधों के लिये करदाताओं के खिलाफ अभियोजन की कार्यवाही शुरू करने के लिये भी प्रावधानों को शामिल किया। इस भाग में आप आयकर कानून के तहत अभियोजन से सम्बन्धित विभिन्न प्रावधानों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते है।

अस्वीकरण:

इस दस्तोवज में मौजूद विषय केवल जानकारी के लिए है। इसका उद्देश्य जनता तक सूचना को जल्द और आसानी से पहुंचाना है और इसे कानूनी दस्तोवजों के तौर पर नही समझा जाना चाहिए।

 

जनता को सलाह दी जाती है कि विषय का सत्यापन सरकारी अधिनियमों/नियमों/अधिसूचनाओं आदि से करें।

 

 

“इस दस्तावेज़ में वित्त अधिनियम, 2026 द्वारा संशोधित आयकर अधिनियम, 1961 के प्रावधान शामिल हैं।”

 

 

 

आयकर कानून के तहत अभियोजन व दंड

 

विभिन्न चूक के लिए जुर्माने के अलावा, आयकर अधिनियम विभिन्न अपराधों के लिए करदाताओं के विरूद्ध अभियोजन की कार्यवाही शुरू करने का प्रावधान करता है। इस भाग में आप, आयकर कानून के तहत किये जा सकने वाले अभियोजनों से संबंधित विभिन्न प्रावधानों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

तलाश और जब्ती के मामले में धारा 132 (1) (दूसरे परंतुक) के तहत या धारा 132(3) के तहत किए गए आदेश का उल्लंघन

धारा 132 करदाता के परिसर में तलाश कार्यवाही आरंभ करने को कर प्राधिकारियों को अधिकृत करती है। तलाश के दौरान कर प्राधिकारियों को, पैसा, सोना, चांदी, आभूषण अथवा अन्य मूल्यवान वस्तु अथवा करदाता के पास से पाई गई वस्तु को जब्त करने का भी अधिकार दिया गया है। समान्यता : जब्त की गई राशि, सोना-चांदी आदि कर अधिकारियों द्वारा अपने कब्जे में ली जाती है (अर्थात् सरकार के कब्जे में) परंतु कर प्राधिकारियों के लिए उसकी मात्रा, वजन या अन्य भौतिक विशेषताओं के कारण या एक खतरनाक प्रकृति के होने के कारण यह संभव या व्यावहारिक नहीं है कि वे उसका भौतिक कब्जा ले सकें और उसे एक सुरक्षित स्थान के लिए वहां से हटा सकें।

ऐसे मामले में, धारा 132(1) का दूसरा परंतुक, करदाता के स्थान पर ही संपत्ति रखने के द्वारा कर प्राधिकारियों को संपत्ति जब्त करने के लिए अधिकृत करता है। ऐसे मामले में, संपत्ति को बिना भौतिक रूप से लिए हुए प्राधिकारियों द्वारा संपत्ति जब्त कर ली जाएगी। इस प्रयोजन के लिए प्राधिकृत अधिकारी, संपत्ति का तात्कालिक कब्जा या नियंत्रण रखने वाले स्वामी या व्यक्ति को एक आदेश जारी करेगा कि वह ऐसे प्राधिकारी की पूर्व अनुमति के बिना संपत्ति को नहीं हटायेगा, बांटेगा या सौदा करेगा। प्राधिकृत अधिकारी की यह कार्यवाही आयकर अधिनियम के तहत ऐसी बहुमूल्य वस्तु या चीज का जब्ती होना समझी जाएगी।

कई बार, तलाश के दौरान धारा 132 (1) के दूसरे परंतुक में उल्लिखित (जैसाकि ऊपर चर्चा की गयी है) से भिन्न कारणों से बही लेखों, अन्य दस्तावेजों, धन, सर्राफा, आभूषण या अन्य मूल्यवान वस्तु या चीज को जब्त करना साध्य नहीं हो सकता है। ऐसे मामलों में, धारा 132(3) के अनुसार, कर प्राधिकारी, संपत्ति का तात्कालिक कब्जा या नियंत्रण रखने वाले स्वामी या व्यक्ति को एक आदेश जारी करेगा कि वह ऐसे प्राधिकारी की पूर्व अनुमति के बिना संपत्ति को नहीं हटायेगा, बांटेगा या सौदा करेगा। धारा 132(3) के प्रावधानों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए ऐसा अधिकारी ऐसे आवश्यक कदम उठा सकता है

धारा 275क करदाताओं द्वारा ऊपर चर्चित किसी भी प्रावधान के उल्लंघन के मामले में मुकदमा चलाने का प्रावधान करती है। धारा 275क के अनुसार, उपरोक्त किसी भी प्रावधान का उल्लंघन 2 साल तक की अवधि तक के लिए साधारण कारावास है और जिसमें जुर्माना शामिल है ।

तलाशी के दौरान लेखा-पुस्तकों के निरीक्षण की सुविधा प्रदान करने में विफलता

जिस मामलेमें खोज कर प्राधिकारी द्वारा आयोजित किया जाता है, धारा 132(1)(iiख) के अनुसार कर प्राधिकारी को किसी व्यक्ति की आवश्यकता हो सकती हैं जो सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 (21 ऑफ 2000) की धारा 2 की उप-धारा (1) के वाक्यांश (न) में निर्दिष्टानुसार इलैक्ट्रानिक रिकार्ड के रूप में किसी बही खाते अथवा अन्य दस्तावेजों का अधिग्रहण अथवा नियंत्रण के लिए उपलब्ध हो, प्राधिकृत अधिकारी को वहन करने हेतु ऐसे बही खातों अथवा अन्य दस्तावेजों के निरीक्षण हेतु आवश्यक सुविधा प्रदान करनी होगी। ऐसा व्यक्ति जो ऐसी सुविधा प्रदान करने में विफल रहता है, वह ऐसे साधारण कारावास से दंडनीय होगा जिसकी अवधि छह माह तक हो सकती है, अथवा जुर्माना, अथवा दोनों हो सकते है।

कर वसूली को विफल करने के लिए संपत्ति को निकालना, छिपाना, स्थानांतरित करना या सुपुर्द करना

यदि एक करदाता अपने कर दायित्व का निर्वहन करने में विफल रहता है, तो कर प्राधिकरी उसकी चल संपत्ति और अचल संपत्ति से बकाया कर राशि की वसूली कर सकता है। यदि करदाता धोखे से किसी संपत्ति या उसमें किसी हित को कर वसूली के लिए संबद्ध किए जाने को रोकने के लिए संपत्ति या उसमें हित को बाधित करने के उद्देश्य से हटाता है, छुपाता है या किसी अन्य के सुपुर्द अथवा स्थानांतरित करता है, तो धारा 276 के तहत अभियोजन की कार्यवाही शुरू की जा सकती है। धारा 276 के अनुसार,करदाता 2 साल तक की अवधि तक के लिए साधारण कारावास का दंड दिया जाएगा और जिसमें जुर्माना शामिल हैै

कंपनी परिसमापन से संबंधित धारा 178(1) और (3) के प्रावधानों का अनुपालन करने में विफलता

धारा 178(1) के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति:

(क) जो एक न्यायालय के आदेश के तहत या अन्यथा, परिसमाप्त की जाने वाली, किसी भी कंपनी का परिसमापक है; या

(ख) जो एक कंपनी की किसी भी संपत्ति का रिसीवर नियुक्त किया गया है,

ऐसे परिसमापक बनने के बाद 30 दिनों के भीतर, उस कर प्राधिकारी को जो कंपनी की आय निर्धारित करने के लिए प्राधिकृत है, अपनी नियुक्ति की नोटिस देगा।

धारा 178(3) के अनुसार, परिसमापक:-

(क) प्रधान मुख्य आयुक्त अथवा मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त अथवा आयुक्त, की अनुमति के बिना कंपनी की किसी भी संपत्ति का भाग या उसके हाथ में किसी भी संपत्ति को अलग नहीं करेगा जब तक कि उसे इस संबंध में निर्धारण अधिकारी द्वारा अधिसूचित नहीं किया गया है; और

(ख) अधिसूचित किये जाने पर, अधिसूचित की गयी राशि के बराबर, एक राशि अलग रखेगा और जब तक वह ऐसी राशि अलग नहीं रखता है उसके हाथ में कंपनी की संपत्ति या किसी भी संपत्ति को अलग नहीं करेगा:

उपरोक्त किसी भी बात के होते हुए भी, परिसमापक को, कंपनी द्वारा देय कर के भुगतान के प्रयोजन के लिए या सुरक्षित लेनदारों को किसी भी भुगतान के लिए जिनके कर्ज, परिसमापन तिथि को सरकार को देय ऋणों पर कानून के तहत प्राथमिकता के लिए अधिकृत हैं या कंपनी के परिसमापन के लिए ऐसी लागत व व्यय को वहन करने के लिए जैसा प्रधान प्रमुख आयुक्त अथवा मुख्य आयुक्त अथवा प्रधान आयुक्त मुख्य आयुक्त या आयुक्त की राय में उचित हैं, ऐसी आस्ति या परिसंपत्ति को अलग करने से नहीं रोकेगी।

धारा 276क, धारा 178(1)/178(3) के उपरोक्त प्रावधानों का अनुपालन करने में विफल होने के मामले में अभियोजन का प्रावधान करती है साथ ही धारा 178(3) के उपबंधों के उल्लंघन के मामले में कंपनी की किसी भी संपत्ति या उसके नियंत्रण में किसी भी संपत्ति को परिसमापक द्वारा अलग किये जाने के मामले में अभियोजन का प्रावधान करती है। इन प्रावधानों के अनुपालन में विफलता पर अभियोजन चलाया जा सकेगा जिसके परिणास्वरूप न्यूनतम 6 महीने परंतु 2 वर्ष के अनधिक अवधि के लिए कठोर कारावास की सजा हो सकती है।

वित्त अधिनियम 2023 ने समाप्ति तिथि प्रदान करके धारा 276क में संशोधन किया है कि 01-04-2023 को या उसके बाद इस प्रावधान के तहत कोई नई अभियोजन कार्यवाही शुरू नहीं की जाएगी।

सरकार के खाते में टीडीएस या डीडीटी का भुगतान करने/सुनिश्चित करने में विफलता

यदि कोई व्यक्ति विफल रहता हैः

(i) केंद्र सरकार के क्रेडिट के लिए भुगतान करें, उसके द्वारा काटा गया कर (यानी, टीडीएस); या

(ii) कर का भुगतान करें या केंद्र सरकार के क्रेडिट के लिए कर का भुगतान सुनिश्चित करें, जैसा कि या उसके तहत आवश्यक हैः

क. वीडीए के अंतरण के लिए प्रतिफल से संबंधित धारा 194ध(1) के परंतुक के अंतर्गत, ऐसे प्रतिफल को छोड़कर जो पूर्णतः वस्तुरूप में हो; अथवा

ख. जीत से संबंधित धारा 194खक(2) के अंतर्गत, ऐसी जीत को छोड़कर जो पूर्णतः वस्तुरूप में हो।

तो ऐसे व्यक्ति को

(क) ऐसे साधारण कारावास जिसकी अवधि दो वर्ष तक हो सकती है अथवा जुर्माना अथवा दोनों लगाया जाएगा जहाँ ऐसे कर की राशि रू. 50 लाख से अधिक हो; अथवा

(ख) ऐसे साधारण कारावास से जिसकी अवधि छह माह तक हो सकती है अथवा जुर्माना अथवा दोनों लगाया जाएगा जहाँ ऐसे कर की राशि रू.10 लाख से अधिक हो किंतु रू.50 लाख से अधिक न हो; अथवा

(ग) किसी अन्य मामले में जुर्माना

धारा 115ण(2) अथवा धारा 194 ख के दूसरे प्रावधान के तहत संदेय कर या स्रोत पर कटौती भुगतान करने में विफलता:

यदि एक व्यक्ति केन्द्र सरकार के ऋण हेतु भुगतान करने में विफल रहता है: (i) उसके द्वारा काटा गया कर (अर्थात, टीडीएस) या (ii) धारा 115-ण(2) के तहत लाभांश वितरण कर (डीडीटी), (iii) धारा 194 ख के अनुसार लाटरी अथवा वर्ग पहेली से जीत के संबध में कर तो ऐसे व्यक्ति को सश्रम कारावास की सजा हो सकती है। जिसके लिए न्यूनतम 3 माह का कारावास जो 7 वर्ष तक के लिए बढ़ाया जा सकता है

धारा 206ग के प्रावधानों के तहत एकत्र कर का भुगतान करने में विफलता

धारा 206ग स्रोत पर कर संग्रह के लिए संबंधित प्रावधानों को नियंत्रित करती है। यदि एक व्यक्ति उसके द्वारा काटे गये कर को केन्द्र सरकार के ऋण हेतु भुगतान करने में विफल रहता है, तो धारा 276खख के अनुसार, उसे

(क) ऐसे साधारण कारावास से जिसकी अवधि दो वर्ष तक हो सकती है अथवा जुर्माना अथवा दोनों लगाया जाएगा जहाँ ऐसे कर की राशि रू. 50 लाख से अधिक हो; अथवा

(ख) ऐसे साधारण कारावास से जिसकी अवधि छह माह तक हो सकती है अथवा जुर्माना अथवा दोनों लगाया जाएगा जहाँ ऐसे कर की राशि रू.10 लाख से अधिक हो किंतु रू.50 लाख से अधिक न हो; अथवा

(ग) किसी अन्य मामले में जुर्माना

टिप्पणी : इस धारा के प्रावधान लागू नही होंगे यदि टीसीएस के संबंध में भुगतान ऐसे भुगतान के संबंध में टीसीएस विवरण को दाखिल करने के लिए निर्धारित पर या उससे पहले किसी भी समय केंद्र सरकार को किया गया हो (01.04.2025 से प्रभावी)

कर, जुर्माना या ब्याज से बचने के लिए जानबूझकर प्रयास

धारा 276 ग के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति किसी कर, दंड अथवा ब्याज को छुपाने का जानबूझकर प्रयास करता है अथवा अपनी आय का अल्प-प्रतिवेदन करता है, या यदि कोई व्यक्ति किसी कर, दंड अथवा ब्याज के भुगतान को छुपाने का जानबूझकर प्रयास करता है, तो वह निम्नानुसार दंडनीय होगा :

(क) ऐसे साधारण कारावास जिसकी अवधि दो वर्ष तक हो सकती है, अथवा जुर्माना, अथवा दोनों से, जहाँ छुपाने जाने हेतु प्रयत्न की गई राशि अथवा अल्प-प्रतिवेदित आय पर कर रू 50 लाख से अधिक हो; अथवा

(ख) ऐसे साधारण कारावास जिसकी अवधि छह महीने तक हो सकती है, अथवा जुर्माना, अथवा दोनों, जहाँ छुपाने जाने हेतु प्रयत्न की गई राशि अथवा अल्प-प्रतिवेदित आय पर कर रू10 लाख से अधिक हो किंतु रू50 लाख से अधिक न हो; अथवा

(ग) किसी अन्य मामले में जुर्माना

आयकर विवरणी दाखिल करने में जानबूझकर विफलता

धारा 276गग आयकर विवरणी दाखिल करने में विफलता के मामले में कारावास का प्रावधान करती है। धारा 276गग, करदाता द्वारा निम्न में से किसी भी चूक के लिए लगायी जा सकेगी:

धारा 139(1) के अनुसार आय विवरणी दाखिल करने में विफलता ।

धारा 142(1)(i) या धारा 148 या धारा 153क के तहत जारी की गयी नोटिस के प्रत्युत्तर में आयकर विवरणी दाखिल करने में विफलता ।

उपरोक्त विफलताओं के लिए दंड निम्न अनुसार होगा:

• ऐसे साधारण कारावास जिसकी अवधि दो वर्ष तक हो सकती है, अथवा जुर्माना , अथवा दोनों, जहाँ वह कर राशि, जिसको छुपाया जाता यदि उक्त विफलता का पता न चलता, रू50 लाख से अधिक हो; अथवा

• ऐसे साधारण कारावास जिसकी अवधि छह महीने तक हो सकती है, अथवा जुर्माना ,अथवा दोनों से, जहाँ वह कर राशि, जिसको छुपाया जाता यदि उक्त विफलता का पता न चलता, रू10 लाख से अधिक हो किंतु रू50 लाख से अधिक न हो; अथवा

• किसी अन्य मामले में जुर्माने के साथ

करदाता धारा 139(1) के अंतर्गत आय के रिटर्न के नियत समय में प्रस्तुति की विफलता हेतु इस धारा के अंतर्गत प्रवृत्त नहीं किया जाएगा, यदि :

(क) विवरणी मूल्यांकन वर्ष की समाप्ति से पहले उसके द्वारा प्रस्तुत किया जाता है

(ख) नियमित मूल्यांकन पर निर्धारित कुल आय पर उसके द्वारा देययोग्य कर(एक कंपनी के तौर पर नही),अग्रिम कर को कम दिया जाता है तथा टीडीएस, यदि हो, रु. 10,000 से अधिक न हो

नोट:निर्धारण वर्ष 2022-23 से प्रभावी, यदि निर्धारिती द्वारा धारा 139(8क) में प्रदत्त समयावधि के भीतर अद्यतन विवरणी प्रस्तुत कर दी जाती है, तो धारा 139(1) के अधीन आय विवरणी प्रस्तुत करने में विफलता के लिए इस उपबंध के अधीन कोई अभियोजन प्रारंभ नहीं किया जाएगा। [वित्त अधिनियम, 2022 द्वारा संशोधन]

धारा 142(1) के तहत लेखों व दस्तावेजों के प्रस्तुत करने में जानबूझकर विफलता या धारा 142(2क) के तहत जारी निर्देशों के अनुपालन में विफलता।

धारा 142(1) के निर्धारण से पूर्व जांच से संबंधित सामान्य प्रावधानों से संबंधित है। धारा 142(1) के तहत, निर्धारण अधिकारी करदाता को आयकर विवरणी दाखिल करने के लिए नोटिस जारी कर सकता है यदि उसने आय विवरणी दाखिल नहीं की है, या ऐसे लेखे या दस्तावेज प्रस्तुत करने या किये जाने के लिए जैसाकि वह आवश्यक समझे और ऐसे प्रारूप में सूचना लिखित रूप में और निर्दिष्ट तरीके से सत्यापित रूप में और ऐसे बिंदुओं व मामलों पर प्रस्तुत करने (करदाता की सभी परिसंपत्तियों और देनदारियों के विवरण सहित, चाहे वे लेखों में शामिल हो या नहीं) को कह सकता है जैसा वह उचित समझे।

धारा 142(2क) विशेष लेखा से संबंधित है। धारा 142(2क) के अनुसार यदि उचित शर्ते धारा 142(2क) में दिए गए विशेष लेखा को पूरा करती है तो मूल्यांकन अधिकारी प्रधान प्रमुख आयुक्त अथवा मुख्य आयुक्त अथवा प्रधान आयुक्त अथवा आयुक्त द्वारा नामांकित चार्टेड अकांउटेंट से करदाता के अपने खातों को अकथित अथवा पुन: अकथित करने तथा निर्धारित प्रपत्र में ऐसे अंकऋण की रिपोर्ट को प्रस्तुत करने का निर्देश दे सकते हैं।

धारा 276घ, धारा 142(1) के तहत लेखों और दस्तावेजों को प्रस्तुत करने में करदाता द्वारा जानबूझकर विफलता या धारा 142(2क) के तहत जारी निर्देशों का अनुपालन करने में विफलता के संबंध में अभियोजन का प्रावधान करती है। धारा 276घ के अनुसार यदि व्यक्ति जानबूझकर धारा 142(1) के अंतर्गत जारी किसी सूचना में आपेक्षितानुसार लेखा तथा दस्तावेज को प्रस्तुत करने में विफल रहता है अथवा जानबूझकर धारा 142 (2क) के अंतर्गत उसको जारी निर्देश के अनुसार प्रस्तुत करने में विफल रहता है तो उसे 6 महीनों तक की अवधि के लिए साधारण कारावास या जुर्माने या दोनों का दंड दिया जाएगा।

सत्यापन में गलत बयान या गलत लेखा प्रदान करना आदि

धारा 277, गलत बयान देने या गलत लेखों/दस्तावेजों को प्रस्तुत करने पर सजा का प्रावधान करती है। यदि एक करदाता अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी भी नियम के तहत किसी भी सत्यापन में झूठा बयान देता है, या ऐसा लेखा व विवरण प्रस्तुत करता है जो गलत है, और जो उसकी जानकारी या विश्वास में गलत है, उसके सही होने पर विश्वास नहीं है, तो वह करेगा निम्न प्रकार दंडनीय होगा:

• ऐसे साधारण कारावास जिसकी अवधि दो वर्ष तक हो सकती है, अथवा जुर्माना, अथवा दोनों, जहाँ वह कर राशि, जिसको, छुपाया जाता यदि लेखा अथवा विवरण को सत्य के रूप में स्वीकार कर लिया जाता, रू 50 लाख से अधिक हो; अथवा

• ऐसे साधारण कारावास जिसकी अवधि दो वर्ष तक हो सकती है, अथवा जुर्माना, अथवा दोनों, जहाँ वह कर राशि, जिसको, छुपाया जाता यदि लेखा अथवा विवरण को सत्य के रूप में स्वीकार कर लिया जाता, रू10 लाख से अधिक हो किंतु रू 50 लाख से अधिक न हो; अथवा

किसी अन्य मामले में जुर्माना।

तलाशी मामलों में आय विवरणी प्रस्तुत करने में विफलता के लिए अभियोजन

यदि धारा 132 के अंतर्गत तलाशी आरंभ की जाती है अथवा धारा 132क के अंतर्गत 01-09-2024 को अथवा उसके पश्चात मांग की जाती है और निर्धारिती धारा 158खग(1)(क) के अंतर्गत जारी नोटिस के प्रत्युत्तर में विवरणी दाखिल करने में विफल रहता है, तो धारा 276गगग के अंतर्गत अभियोजन प्रारंभ किया जा सकता है।

कारावास की अवधि

• 2 वर्षों तक की अवधि के लिए साधारण कारावास या जुर्माना या दोनो जहां कर की राशि रू. 50 लाख से अधिक हो

• 6 महीनों तक की अवधि के लिए साधारण कारावास या जुर्माना या दोनो जहां कर की राशि रू. 10 लाख से अधिक हो लेकिन रू. 50 लाख से अधिक न हो

• किसी अन्य मामले में जुर्माना

अधिनियम के तहत प्रभार्य/आरोप्य किसी कर, जुर्माना या ब्याज से बचने के लिए किसी भी अन्य व्यक्ति को सक्षम बनाने में बही लेखों या दस्तावेजों आदि का मिथ्याकरण

धारा 277क बही लेखों या दस्तावेजों आदि के मिथ्याकरण के मामले में अभियोजन का प्रावधान करती है। धारा 277क के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति (जिसे अब से पहला व्यक्ति कहा गया है) जान-बूझकर किसी अन्य व्यक्ति को (जिसे अब से दूसरा व्यक्ति कहा गया है) अधिनियम के तहत प्रभार्य और आरोप्य किसी कर, ब्याज या जुर्माने से बचने के लिए सक्षम बनाता है, अधिनियम के तहत पहले व्यक्ति या दूसरे व्यक्ति के विरूद्ध किसी भी कार्यवाही में प्रासंगिक या उपयोगी बही लेखे या अन्य दस्तावेज में, कोई प्रविष्टि करता है या करवाता है, या बयान देता है जो कि गलत है और जो कि पहला व्यक्ति या तो जानता है कि वह गलत है या उसके सही होने पर विश्वास नहीं रखता है, तो पहले व्यक्ति को 2 वर्षों तक की अवधि के लिए साधारण कारावास और जुर्माने का दंड दिया जाएगा।

गलत विवरणी, आदि करने के लिए उकासाना

धारा 278 के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को कर प्रभार्य किसी भी आय के संबंध में गलत लेखा या विवरण या घोषणा करने के लिये शह प्रदान करता है या प्रेरित करता है और जो उसकी जानकारी या विश्वास में गलत है, उसके सही होने पर विश्वास नहीं है, या धारा 276ग(1) के तहत अपराध करने के लिए प्रेरित करता है, तो वह करेगा निम्न प्रकार दंडनीय होगा:

• ऐसे साधारण कारावास जिसकी अवधि दो वर्ष तक हो सकती है, अथवा जुर्माना, अथवा दोनों, जहाँ वह कर राशि जुर्माना या ब्याज की राशि, जिसको, छुपाया जाता यदि घोषणा, लेखा अथवा विवरण को सत्य के रूप में स्वीकार कर लिया जाता, अथवा जिसको जानबूझकर छुपाने का प्रयास किया गया, रू 50 लाख से अधिक हो; अथवा

• ऐसे साधारण कारावास जिसकी अवधि छह महीने तक हो सकती है, अथवा जुर्माना, अथवा दोनों, जहाँ वह कर राशि जुर्माना या ब्याज की राशि, जिसको, छुपाया जाता यदि घोषणा, लेखा अथवा विवरण को सत्य के रूप में स्वीकार कर लिया जाता, अथवा जिसको जानबूझकर छुपाने का प्रयास किया गया, रू 10 लाख से अधिक हो लेकिन रू. 50 लाख से अधिक न हो ; अथवा

• किसी अन्य मामले में जुर्माना

धारा 276ख, 276ग(1), 276गग, 277 या 278 के तहत द्वितीय और उत्तरगामी अपराध

धारा 276ख, 276खख, 276ग(1), 276गग, 277 या 278 के प्रावधानों की चर्चा पहले ही की जा चुकी है। धारा 278क उन धाराओं के तहत तहत द्वितीय और उत्तरगामी अपराधों के मामले में अभियोजन का प्रावधान करती है। धारा 278क के अनुसार, एक व्यक्ति को 6 माह से अन्यून अवधि के साधारण कारावास से दंडित किया जा सकता है जिसे 3 वर्ष तक के लिए और जुर्माने के साथ बढ़ाया जा सकता है।

एक कंपनी द्वारा अपराध के मामले में सजा

धारा 278ख, के अनुसार, जहां आयकर अधिनियम के तहत एक अपराध एक कंपनी (*) द्वारा किया गया है, तो प्रत्येक व्यक्ति जो अपराध के घटित होने के समय प्रभारी था और कंपनी के व्यवसाय के संचालन के लिए कंपनी के लिए उत्तरदायी था के साथ-साथ कंपनी को अपराध का दोषी समझा जाएगा और तदनुसार अभियोजन चलाये जाने और दंडित किए जाने के लिये दायी होगा।

हालांकि यदि ऐसा व्यक्ति यह सिद्ध कर देता है कि अपराध उनकी जानकारी के बिना हुआ या उसने इस तरह के अपराध के घटित होने को रोकने के लिए सभी समुचित उपाय किया था तो उसे अपराध का दोषी नहीं समझा जाएगा।

जहां अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि यह अपराध किसी भी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या कंपनी के अन्य अधिकारी की सहमति या मिलीभगत के साथ घटित किया गया है तो ऐसे निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी को उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और उनके खिलाफ कार्यवाही करते हुये तदनुसार दंडित किया जा सकेगा।

जहां आयकर अधिनियम के तहत अपराध एक व्यक्ति द्वारा किया गया है जो एक कंपनी है तो, ऐसी कंपनी को अर्थ दंड से दंडित किया जायेगा है और ऊपर उल्लिखित प्रत्येक व्यक्ति या निदेशक, प्रबंधक, सचिव या ऊपर उल्लिखित कंपनी के अन्य अधिकारी अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार उनके विरूद्ध कार्यावाही किये जाने या दंडित किये जाने के लिये उत्तरदायी होंगे।

(*) इस धारा के प्रयोजनों के लिए:

() ''कंपनी'' से अभिप्रेत एक निगमित निकाय से है, जिसमें शामिल हैं: -

(i) एक फर्म; और

(ii) निगमित या गैर निगमित व्यक्तियों का एक संघ या निकाय; और

() निम्न के संबंध में ''निदेशक'' :-

(i) एक फर्म, से अभिप्रेत फर्म में भागीदार से है;

(ii) लोगों के संगठन या व्यक्तियों के निकाय, से उसके मामलों को नियंत्रित करने के लिए किसी भी सदस्य से अभिप्रेत है।

हिंदू अविभाजित परिवार द्वारा अपराध के मामले में सजा

धारा 278ग, के अनुसार, जहां आयकर अधिनियम के तहत एक अपराध एक हिन्दू अविभाजित परिवार द्वारा किया गया है, कर्ता को अपराध का दोषी समझा जाएगा और तदनुसार उसके खिलाफ कार्यवाही की जा सेकगी और उसे दंडित किया जा सकेगा।

बशर्ते, कर्ता को दण्डित नहीं किया जा सकेगा यदि वह साबित कर देता है अपराध उसकी जानकारी के बिना हुआ या उसने इस तरह के अपराध को घटित होने से रोकने के लिए सभी संभव प्रयास किये थे।

जहां अपराध एक हिन्दू अविभाजित परिवार द्वारा किया गया है और यह सिद्ध हो जाता है कि अपराध हिंदू अविभाजित परिवार के किसी भी सदस्य की ओर से किसी भी उपेक्षा के कारण या उसकी सहमति या मिलीभगत के साथ किया गया है, ऐसे सदस्य को भी उस अपराध के दोषी समझा जायेगा और तदनुसार कार्यवाही किये जाने और दंडित किए जाने के लिए उत्तरदायी होगा।

लोक सेवक द्वारा ब्यौरे का प्रकटीकरण

धारा 138 (1) कर प्राधिकारियों द्वारा अन्य अधिकारियों आदि को सूचना के प्रकटीकरण से संबंधित है। धारा 138 (2) लोक सेवक द्वारा जानकारी घोषित करने पर प्रतिबंध से संबंधित है। धारा 280 धारा 138 (2) के उल्लंघन में लोक सेवक द्वारा सूचना के प्रकटीकरण के मामले में अभियोजन का प्रावधान करती है। ऐसे मामले में लोक सेवक को एक महीने तक का साधारण कारावास या जुर्माना या दोनो लगाया जाएगा।

हालांकि, लोक सेवक के खिलाफ उपरोक्त चर्चित कोई भी अभियोजन केन्द्र सरकार की पूर्व अनुमति के बिना नहीं चलाया जाएगा।

विफलता का उचित कारण होने पर कोई कारावास नहीं

धारा 278कक के अनुसार, कोई भी व्यक्ति धारा 276क और 276ख के तहत किसी भी विफलता के लिए दंडनीय नहीं होगा यदि वह ऐसी विफलता का उचित कारण साबित कर देता है।

कर प्राधिकारियों की पूर्व अनुमति से अभियोजन शुरु करना

धारा 279 के अनुसार, धारा 275क, धारा 275ख, धारा 276, धारा 276क, धारा 276ख, धारा 276खख, धारा 276ग, धारा 276गग, धारा 276घ, धारा 277, धारा 277क और धारा 278 के तहत अपराध के लिए अभियोजन प्रधान आयुक्त अथवा आयुक्त अथवा की पूर्व सहमति से संस्थापित किया जाता है, आयुक्त (अपील) या प्रधान प्रमुख आयुक्त अथवा मुख्य आयुक्त अथवा जो भी स्थिति हो अथवा प्रधान महानिदेशक या महानिदेशक उक्त कथित प्राधिकारी, जिसे वह इस उप-धारा के अंतर्गत कार्यवाही के संस्थापन के लिए उचित समझे, को ऐसे निर्देश अथवा ओदश जारी कर सकते हैं

अभियोजन से उन्मुक्ति

धारा 278कख के अनुसार, एक व्यक्ति, अभियोजन से उन्मुक्ति के लिए प्रमुख आयुक्त अथवा आयुक्त को आवेदन कर सकता है यदि उसने धारा 245ग के तहत निपटान के लिए आवेदन किया है और धारा 245जक के तहत कार्यवाही को रोक दिया गया है। हालांकि, उन्मुक्ति के लिए आवेदन अभियोजन की कार्यवाही शुरू करने के बाद नहीं किया जा सकेगा।

अपराध व अभियोजन से संबंधित अन्य प्रावधान

अपराध संयोजित करने, संज्ञेय और गैर-संज्ञेय अपराध, तकनीकी और गैर-तकनीकी अपराध आदि जैसे प्रावधानों की चर्चा ''अपराध और अभियोजन'' विषय के तहत अलग से की गयी है।

 

आयकर कानून के अंतर्गत अभियोजन तथा सजा पर एमसीक्यू

 

प्रश्न 1. धारा 276ख के अनुसार, यदि एक व्यक्ति केंद्र सरकार के ऋण हेतु भुगतान करने में असफल रहता है (i) उसके द्वारा कर कटौती (अर्थात् टीडीएस) अथवा (ii) धारा 115ण(2) के अनुसार लाभांश वितरण कर (डीडीटी) अथवा (iii) धारा 194ख के अनुसार लॉटरी अथवा वर्ग पहेली से जीत के संबंध में कर तो ऐसे व्यक्ति जुर्माने सहित कम से कम 3 महीने की अवधि जिसे 1 वर्ष तक के लिए बढ़ाया जा सकता हैं, के कठोर कारावास सहित सजा दी जाएगी

(क) सही (ख) गलत

सही उत्तर : (ख)

सही उत्तर की प्रमाणिकता :

यदि कोई व्यक्ति विफल रहता हैः

(i) केंद्र सरकार के क्रेडिट के लिए भुगतान करें, उसके द्वारा काटा गया कर (यानी, टीडीएस); या

(ii) कर का भुगतान करें या केंद्र सरकार के क्रेडिट के लिए कर का भुगतान सुनिश्चित करें, जैसा कि या उसके तहत आवश्यक हैः

क. धारा 115-ण(2) - लाभांश वितरण कर (डीडीटी);

ख. धारा 194ख - लॉटरी या वर्ग पहेली से जीत पर कर;

ग. धारा 194द - व्यवसाय या पेशे के संबंध में लाभ या अनुलाभ पर कर;

घ. धारा 194ध - आभासी डिजिटल संपत्ति के हस्तांतरण पर भुगतान पर कर;

ङ. धारा 194खक - ऑनलाइन गेम से जीतने पर कर।

तो ऐसे व्यक्ति को सश्रम कारावास की सजा दी जाएगी जो 3 महीने से कम नहीं होगा लेकिन जो 7 साल तक और जुर्माने के साथ हो सकता है।

चूंकि प्रश्न में दिया गया विवरण गलत है तथा इसलिए विकल्प (ख) सही विकल्प है

प्रश्न 2. धारा 206ग के अनुसार, यदि व्यक्ति सरकार के ऋण हेतु उसके द्वारा एकत्रित कर का भुगतान करने में विफल रहता है तो धारा 276खख के अनुसार वह जुर्माने सहित कम से कम 3 महीने जिसे 7 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है की अवधि के लिए कठोर कारावास दिया जाएगा

(क) सही (ख) गलत

सही उत्तर : (क)

सही उत्तर की प्रमाणिकता :

धारा 206ग स्त्रोत पर कर एकत्रीकरण से संबंधित प्रावधानों का संचालन करता हैं। धारा 206ग के अनुसार, यदि व्यक्ति सरकार के ऋण हेतु उसके द्वारा एकत्रित कर का भुगतान करने में विफल रहता हैं तो धारा 276खख के अनुसार वह जुर्माने सहित कम से कम 3 महीने जिसे 7 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता हैं की अवधि के लिए कठोर कारावास दिया जाएगा इसके अलावा इस धारा के प्रावधान लागू नही होंगे यदि टीसीएस के संबंध में भुगतान ऐसे भुगतान के संबंध में टीसीएस विवरण को दाखिल करने के लिए निर्धारित पर या उससे पहले किसी भी समय केंद्र सरकार को किया गया हो (01.04.2025 से प्रभावी)

चूंकि प्रश्न में दिया गया विवरण सही है इसलिए विकल्प (क) सही विकल्प है

प्रश्न 3. धारा............... कर चोरी, जुर्माने अथवा ब्याज के जानबूझ कर किए गए प्रयास की स्थिति में सजा का प्रावधान करता है

(क) 276ख (ख) 276ग

(ग) 276घ (घ) 276ड

सही उत्तर : (ख)

सही उत्तर की प्रमाणिकता :

धारा 276ग कर चोरी, जुर्माने अथवा ब्याज के जानबूझ कर किए गए प्रयास की स्थिति में सजा का प्रावधान करता है। धारा 276ग के अनुसार यदि व्यक्ति कर चोरी, जुर्माने अथवा ब्याज से बचने का जानबूझकर प्रयास करता है तो उसे निम्नानुसार सजा होगी

• जहां मांगे गए कर की चोरी रू. 25 लाख से अधिक हो (30.06.2012 तक रू. 1 लाख तक), जुर्माने सहित कम से कम 6 महीने की अवधि के लिए कठोर कारावास के लिए उत्तरदायी होगा जिसे 7 साल तक की आवधि के लिए बढ़ाया जा सकता है

• अन्य मामलों में जुर्माने सहित कम से कम 3 महीने की अवधि के लिए कठोर कारावास के लिए उत्तरदायी होगा जिसे 2 साल (30-6-2012 तक 3 वर्ष) तक की अवधि के लिए बढ़ाया जा सकता है

इसलिए विकल्प (ख) सही विकल्प है

प्रश्न 4. धारा ............ आय के विवरणी को फाइल करने की विफलता की स्थिति में कारावास प्रदान करता है

(क) 276कक (ख) 276खख

(ग) 276गग (घ) 276घघ

सही उत्तर : (ग)

सही उत्तर की प्रमाणिकता :

धारा 276गग आय के विवरणी को फाइल करने की विफलता की स्थिति में कारावास प्रदान करता है। धारा 276गग करदाता द्वारा निम्नलिखित किसी भी कमी के लिए होती है

धारा 139(1) के अनुसार आय के विवरणी को दाखिल करने में विफलता

धारा 142(1)(i) अथवा धारा 148 अथवा धारा 153क के अंतर्गत जारी सूचना हेतु प्रतिवेदन में आय के विवरणी को दाखिल करने में विफलता

उक्त विफलता के लिए सजा निम्नानुसार हैं

• जहां मांगे गए कर की चोरी रू. 25 लाख से अधिक हो (30.06.2012 तक रू. 1 लाख तक), जुर्माने सहित कम से कम 6 महीने की अवधि के लिए कठोर कारावास के लिए उत्तरदायी होगा जिसे 7 साल तक की आवधि के लिए बढ़ाया जा सकता है

• अन्य मामलों में जुर्माने सहित कम से कम 3 महीने की अवधि के लिए कठोर कारावास के लिए उत्तरदायी होगा जिसे 2 साल (30-6-2012 तक 3 वर्ष) तक की अवधि के लिए बढ़ाया जा सकता है

इसलिए विकल्प (ग) सही विकल्प है

प्रश्न 5. धारा 142(1) के अंतर्गत लेखा तथा दस्तावेज प्रस्तुत करने हेतु करदाता द्वारा जानबूझकर की गई विफलता की स्थिति में अभियोजन हेतु धारा 276घ उपलब्ध कराई गई है

(क) सही (ख) गलत

सही उत्तर : (ख)

सही उत्तर की प्रमाणिकता :

धारा 142(1) के अंतर्गत लेखा तथा दस्तावेज प्रस्तुत करने हेतु करदाता द्वारा जानबूझकर की गई विफलता की स्थिति में अभियोजन हेतु अथवा धारा 142(2क) के अंतर्गत जारी निर्देशों के अनुसार उपलब्ध कराई गई है। धारा 276घ के अनुसार यदि व्यक्ति धारा 142(1) के अंतर्गत जारी किसी सूचना में आपेक्षितानुसार लेखा तथा दस्तावेज प्रस्तुत करने में जानबूझकर विफल अथवा धारा 142(2क) के अंतर्गत उसे जारी निर्देशों के अनुसार जानबूझकर विफल रहता हैं तो वह कठोर करावास के लिए उत्तरदायी होगा जिसे जुर्मान सहित एक साल तक बढ़ाया जा सकता है।

चूंकि प्रश्न में दिया गया विवरण गलत हैं इसलिए विकल्प (ख) सही विकल्प है

प्रश्न 6. धारा 277 बही खातो अथवा दस्तावेजों आदि की जालसाजी की स्थिति में अभियोजन हेतु उपलब्घ कराई गई है

(क) सही (ख) गलत

सही उत्तर : (ख)

सही उत्तर की प्रमाणिकता :

धारा 277 बही खातो अथवा दस्तावेजों आदि की जालसाजी की स्थिति में अभियोजन हेतु उपलब्घ कराई गई है। धारा 277क के अनुसार यदि कोई व्यक्ति (इसके बाद पहले व्यक्ति के तौर पर संदर्भित) जानबूझकर तथा किसी अन्य व्यक्ति को (जिसे अब दूसरे व्यक्ति के तौर पर संदर्भित) अधिनियम के तहत प्रभार्य और आरोप्य किसी कर, ब्याज अथवा जुर्माने से बचने के लिए सक्षम बनाता है। अधिनियम के तहत पहला व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के विरूद्ध किसी भी कार्यवाही में प्रासंगिक अथवा अन्य बही खाते अथवा अन्य दस्तावेज में कोई प्रविष्टि करता अथवा करवाता है जो कि गलत है जिसे पहला व्यक्ति जानता भी हो तो वह (पहला व्यक्ति) अवधि के लिए कठोर कारावास की सजा दी जा सकती है जो जुर्माने सहित कम से कम 3 महीने होगी लेकिन जिसे 2 वर्षों तक बढ़ाया जा सकता है (30-6-2012 तक 3 वर्ष)

चूंकि प्रश्न में दिया गया विवरण गलत हैं इसलिए विकल्प (ख) सही विकल्प है

प्रश्न 7. यदि व्यक्ति किसी भी तरह से किसी अन्य व्यक्ति को कर जो गलत है हेतु वसूलनीय किसी आय से संबंधित विवरण अथवा घोषणा अथवा लेखा को बनाने तथा सुपुर्द करने के लिए उकसाता अथवा प्रेरित करता है तथा जिसे वह जानता है कि यह गलत है अथवा भरोसा नही हैं कि यह सही है अथवा धारा 276ग(1) के अंतर्गत उल्लंघन करता हैं तो वह धारा 278 के अंतर्गत सजा के लिए उत्तरदायी होगा

(क) सही (ख) गलत

सही उत्तर : (क)

धारा 278 के अनुसार यदि व्यक्ति किसी भी तरह से किसी अन्य व्यक्ति को कर जो गलत है हेतु वसूलनीय किसी आय से संबंधित विवरण अथवा घोषणा अथवा लेखा को बनाने तथा सुपुर्द करने के लिए उकसाता अथवा प्रेरित करता है तथा जिसे वह जानता है कि यह गलत है अथवा भरोसा नही हैं कि यह सही है अथवा धारा 276ग(1) के अंतर्गत उल्लंघन करता हैं तो वह निम्नानुसार सजा के लिए उत्तरदायी होगा

• जहां मांगे गए कर की चोरी रू. 25 लाख से अधिक हो (30.06.2012 तक रू. 1 लाख तक), जुर्माने सहित कम से कम 6 महीने की अवधि के लिए कठोर कारावास के लिए उत्तरदायी होगा जिसे 7 साल तक की आवधि के लिए बढ़ाया जा सकता है

• अन्य मामलों में जुर्माने सहित कम से कम 3 महीने की अवधि के लिए कठोर कारावास के लिए उत्तरदायी होगा जिसे 2 साल (30-6-2012 तक 3 वर्ष) तक की अवधि के लिए बढ़ाया जा सकता हैं

चूंकि प्रश्न में दिया गया विवरण सही हैं इसलिए विकल्प (क) सही विकल्प है

प्रश्न 8. धारा 278क, धारा 276ख, 276ग(1), 276गग, 277 अथवा 278 के अंतर्गत द्वितीय अथवा अनुवर्ती उल्लंघन की स्थिति में अभियोजन हेतु उपलब्ध कराई गई है

(क) सही (ख) गलत

सही उत्तर : (क)

सही उत्तर की प्रमाणिकता :

धारा 278क, धारा 276ख, 276ग(1), 276गग, 277 अथवा 278 के अंतर्गत द्वितीय अथवा अनुवर्ती उल्लंघन की स्थिति में अभियोजन हेतु उपलब्ध कराई गई है। धारा 278क के अनुसार, जुर्माने सहित कम से कम 6 महीने की अवधि के लिए कठोर कारावास के लिए उत्तरदायी होगा जिसे 7 साल तक की आवधि के लिए बढ़ाया जा सकता है

चूंकि प्रश्न में दिया गया विवरण सही है तथा इसलिए विकल्प (क) सही विकल्प है

प्रश्न 9. धारा 278ख के अनुसार, जहां कंपनी द्वारा उल्लंघन आयकर अधिनियम के अंतर्गत किया जाता हैं तो निदेशक उल्लंघन के लिए दोषी के तौर पर समझा जाएगा तथा तद्नुसार सजा तथा उसके खिलाफ कार्यवाही के लिए उत्तरदायी होगा

(क) सही (ख) गलत

सही उत्तर : (ख)

सही उत्तर की प्रमाणिकता :

धारा 278ख के अनुसार, जहां कंपनी द्वारा उल्लंघन आयकर अधिनियम के अंतर्गत किया जाता है तो प्रत्येक व्यक्ति जो उल्लंघन किए जाने के समय कंपनी के व्यापार के आयोजन के लिए प्रभारी तथा कंपनी का उत्तरदायी व्यक्ति साथ ही साथ कंपनी था के लिए उल्लंघन के लिए दोषी के तौर पर समझा जाएगा तथा तद्नुसार सजा तथा उसके खिलाफ कार्यवाही के लिए उत्तरदायी होगा

चूंकि प्रश्न में दिया गया विवरण गलत है तथा इसलिए विकल्प (ख) सही विकल्प है

प्रश्न 10. सूचना के अनुचित प्रकटीकरण के लिए लोक सेवक के विरूद्ध कोई अभियोग नहीं चलाया जाएगा

(क) सही (ख) गलत

सही उत्तर : (ख)

सही उत्तर की प्रमाणिकता :

धारा 138(1) अन्य अधिकारी, प्राधिकरण आदि हेतु कर प्राधिकारी द्वारा सूचना के प्रकटीकरण के साथ व्यवहार करता हैं। धारा 138(2) लोक सेवक द्वारा सूचना की घोषणा पर प्रतिबंध से संबंधित हैं। धारा 280, धारा 138(2) के उल्लंघन में लोक सेवक द्वारा सूचना के प्रकटीकरण की स्थिति में अभियोजन उपलब्ध कराता हैं। ऐसी स्थिति में लोक सेवक जुर्माने सहित एक अवधि जिसे 6 महीने तक बढ़ाया जा सकता हैं के कारावास की सजा दी जाएगी।

हालांकि केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति के बिना उक्त चर्चितानुसार लोक सेवक के विरूद्ध अभियोजन संस्थापित नहीं किया जा सकता।

चूंकि प्रश्न में दिया गया विवरण गलत हैं तथा इसलिए विकल्प (ख) सही विकल्प है