मान्यताप्राप्त भविष्य निधियां
चौथी अनुसूची
भाग क
मान्यताप्राप्त भविष्य निधियां
[धारा 2(38), 10(12), 10(25), 36(1)(iv), 87(1)(घ), 111, 192(4) देखिए]
इस भाग का लागू होना
1. यह भाग किसी ऐसी भविष्य निधि को लागू नहीं होगा जिसे भविष्य निधि अधिनियम, 1925 (1925 का 19) लागू होता है।
परिभाषाएं
2. इस भाग में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो–
(क) ''नियोजक'' से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो अपने कर्मचारियों के लिए भविष्य निधि रखता है, और जो–
(i) हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब, कंपनी, फर्म या व्यक्तियों का संगम है, अथवा
(ii) किसी ऐसे कारबार या वृत्ति में लगा हुआ व्यष्टि है, जिसके लाभ और अभिलाभ ''कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ'' शीर्ष के अधीन आय-कर से प्रभार्य हैं;
(ख) "कर्मचारी" से भविष्य निधि में भाग लेने वाला कर्मचारी अभिप्रेत है किंतु इसके अंतर्गत निजी या घरेलू नौकर नहीं है;
(ग) ''अभिदाय'' से कोर्इ ऐसी राशि अभिप्रेत है जो किसी कर्मचारी द्वारा या उसकी ओर से उसके वेतन में से या किसी नियोजक द्वारा अपने धन में से कर्मचारी के निजी खाते में जमा की गर्इ हो किंतु इसके अंतर्गत ब्याज के रूप में खाते में जमा की गर्इ राशि नहीं आती है;
(घ) ''कर्मचारी के जमा खाते में अतिशेष'' से ऐसी कुल रकम अभिप्रेत है जो भविष्य निधि में किसी समय उसके खाते में जमा हो;
(ड़) कर्मचारी के जमाखाते में अतिशेष के संबंध में ''वार्षिक अनुवृद्धि'' से ऐसे अतिशेष में किसी वर्ष में वृद्धि अभिप्रेत है जो अभिदायों और ब्याज से उद्भूत होती है;
(च) ''किसी कर्मचारी को देय संचित अतिशेष" से उसके खाते में जमा अतिशेष या इसका ऐसा भाग अभिप्रेत है जिसका उसके द्वारा निधि के विनियमों के अधीन दावा किया जा सकेगा जब वह निधि रखने वाले नियोजक का कर्मचारी नहीं रह जाता है;
(छ) ''निधि के विनियम'' से किसी विशिष्ट भविष्य निधि संगठन और प्रशासन को लागू होने वाले विनियमों का विशेष निकाय अभिप्रेत है; और
(ज) ''वेतन'' के अंतर्गत महंगार्इ भत्ता भी सम्मिलित है यदि नियोजन की शर्तों में वैसा उपबंधित हो किंतु अन्य सभी भत्ते और परिलब्धियां इसमें शामिल नहीं हैं।
मान्यता देना और वापस लेना
3. (1) प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त किसी ऐसी भविष्य निधि को मान्यता दे सकेगा जो उसकी राय में नियम 4 में विहित शर्तों और बोर्ड द्वारा इस निमित्त बनाए गए नियमों को पूरा करती है, तथा किसी भी समय ऐसी मान्यता को वापस ले सकेगा यदि उसकी राय में ऐसी भविष्य निधि उन शर्तों में से किसी का उल्लंघन करती है:
परंतु जहां किसी भविष्य निधि को 31 मार्च, 2006 को या उसके पूर्व मान्यता प्रदान की गर्इ है और ऐसी भविष्य निधि नियम 4 के खंड (ड़क) में वर्णित शर्तों को पूरा नहीं करती है तो ऐसी निधि की मान्यता को, यदि ऐसी निधि 31 मार्च, 2014 को या उससे पूर्व उक्त खंड में वर्णित शर्तों और ऐसी किसी अन्य शर्त को, जो बोर्ड इस निमित्त नियमों द्वारा विनिर्दिष्ट करे, पूरा नहीं करती है, वापस ले लिया जाएगा:
परन्तु यह और कि पहले परंतुक में अंतर्विष्ट कोर्इ बात ऐसे किसी स्थापन की भविष्य निधि को लागू नहीं होगी जिसकी बाबत केंद्रीय सरकार द्वारा कर्मचारी भविष्य निधि और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 (1952 का 19) की धारा 16 की उपधारा (2) के अधीन अधिसूचना जारी कर दी गर्इ है।
(2) मान्यता देने वाला आदेश ऐसी तारीख को प्रभावी होगा जैसी प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त उन नियमों में से किसी के अनुसार, जिन्हें बोर्ड इस निमित्त बनाए, नियत करे, ऐसी तारीख उस वित्तीय वर्ष के, जिसमें आदेश किया जाता है, अन्तिम दिन के पश्चात् की नहीं होगी।
(3) मान्यता वापस लेने वाला आदेश उस तारीख से प्रभावी होगा जिसको वह किया जाता है।
(4) भविष्य निधि को मान्यता देने वाले आदेश पर, जब तक कि प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त अन्यथा निदेश न दे, इस तथ्य के कारण केार्इ प्रभाव नहीं पड़ेगा कि ऐसी निधि का उन उपक्रमों जिनके संबंध में दो निधियां रखी जाती हैं का समामेलन हो जाने पर बाद में किसी अन्य भविष्य निधि में समामेलन हो गया या यह कि यह किसी उपक्रम की ऐसी संपूर्ण भविष्य निधि या उसके भाग को आमेलित कर लेती है जो प्रथम वर्णित निधि रखने वाले नियोजक के उपक्रम को पूर्णत: या भागत: अन्तरित हो जाती है या उसमें विलीन हो जाती है।
मान्यताप्राप्त भविष्य निधियों द्वारा पूरी की जाने वाली शर्तें
4. भविष्य निधि मान्यताप्राप्त कर सके और वह उसे रखे रख सके, इस के लिए उसे नियम 5 के उपबंधों के अधीन रहते हुए नीचे वर्णित शर्तें और ऐसी कोर्इ अन्य शर्तें जो बोर्ड, नियमों द्वारा विनिर्दिष्ट करे, पूरी करनी होंगी–
(क) सभी कर्मचारी भारत में नियोजित किए जाएंगे, या ऐसे नियोजक द्वारा नियोजित किए जाएंगे जिसके कारबार का मुख्य स्थान भारत में है;
(ख) किसी वर्ष में कर्मचारी का अभिदाय उस वर्ष के लिए उसके वेतन का निश्चित अनुपात होगा, और उस वर्ष में ऐसे वेतन के प्रत्येक नियत-कालिक संदाय पर, कर्मचारी के वेतन से उस अनुपात में नियोजक द्वारा काट लिया जाएगा तथा उस निधि में कर्मचारी के निजी खाते में जमा किया जाएगा;
(ग) किसी वर्ष में कर्मचारी के निजी खाते में नियोजक के अभिदाय उस वर्ष के अभिदायों की रकम से अधिक नहीं होंगे और ऐसे अन्तराल पर जो एक वर्ष से अधिक नहीं होंगे कर्मचारी के निजी खाते में जमा किए जाएंगे;
(घ) निधि दो या अधिक न्यासियों में या शासकीय न्यासी में न्यास के अधीन निहित होगी और यह सभी हिताधिकारियों की सहमति के बिना प्रतिसंहरणीय नहीं होगी;
(ड़) निधि न्यासियों द्वारा प्राप्त ऊपर वर्णित अभिदायों से उनके संचयनों से, और ऐसे अभिदायों और संचयनों की बाबत जमा ब्याज से, और उनसे खरीदी गर्इ प्रतिभूतियों से और निधि की पूंजी आस्तियों के अन्तरण से उद्भूत किन्हीं पूंजी अभिलाभों से, न कि किसी अन्य राशि से मिलकर बनेगी;
(ड़क) निधि ऐसे स्थापन की निधि होगी, जिसे कर्मचारी भविष्य निधि और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 (1952 का 19) की धारा 1 की उपधारा (3) के उपबंध लागू होते हैं या ऐसे स्थापन की निधि होगी जिसे उक्त अधिनियम की धारा 1 की उपधारा (4) के अधीन केंद्रीय भविष्य निधि आयुक्त द्वारा अधिसूचित किया गया है और ऐसा स्थापन उस धारा में वर्णित किसी स्कीम के सभी या किन्हीं उपबंधों के प्रवर्तन से उक्त अधिनियम की धारा 17 के अधीन छूट अभिप्राप्त करेगा;
(च) नियोजक ऐसी दशाओं में के सिवाय जिनमें कर्मचारी अवचार के कारण पदच्युत कर दिया जाता है, या निधि के विनियमों में इस निमित्त विनिर्दिष्ट सेवा की अवधि की समाप्ति के पूर्व स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण या अन्य अपरिहार्य कारण से भिन्न रूप में अपना नियोजन स्वेच्छा से छोड़ देता है निधि से किसी भी प्रकार की कोर्इ राशि वसूल करने का हकदार नहीं होगा :
परन्तु ऐसी दशाओं में नियोजक द्वारा की गर्इ वसूलियां उन अभिदायों तक जो उसने कर्मचारी के वैयक्तिक खाते में किए हैं और ऐसे ब्याज तक जो ऐसे अभिदायों की बाबत निधि के विनियमों के अनुसार जमा किया गया है और उसके संचयनों तक परिसीमित रहेंगी;
(छ) कर्मचारी को देय संचित अतिशेष उस दिन संदेय होगा जिसको वह निधि रखने वाले नियोजक का कर्मचारी नहीं रह जाता है;
(ज) कर्मचारी के जमा खाते में अतिशेष का कोर्इ भाग, खण्ड (छ) में यथा उपबंधित के सिवाय या ऐसी शर्तों और निबंधनों के सिवाय, जिन्हें बोर्ड नियमों द्वारा विनिर्दिष्ट करे, उसे संदेय नहीं होगा।
शर्तों का शिथिलीकरण
5. (1) नियम 4 के खण्ड (क) में की किसी बात के होते हुए भी, प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त यदि वह उचित समझे और ऐसी शर्तों के, यदि कोर्इ हों, अधीन जो वह मान्यता से संलग्न करना उचित समझे ऐसे नियोजक द्वारा जिसके कारबार का मुख्य स्थान भारत में नहीं है रखी गर्इ निधि को मान्यता दे सकेगा, परन्तु तब जबकि भारत के बाहर नियोजित कर्मचारियों का अनुपात दस प्रतिशत से अधिक नहीं है।
(2) नियम 4 के खंड (ख) में की किसी बात के होते हुए भी, ऐसा कर्मचारी जो संघ के सशस्त्र बलों में सेवा करते हुए या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन राष्ट्रीय सेवा में लिए जाने पर या नियोजित होने पर अपना नियोजन कायम रखता है वह चाहे नियोजक से कोर्इ वेतन प्राप्त करता है या नहीं, संघ के सशस्त्र बलों में अपनी सेवा के दौरान या राष्ट्रीय सेवा में लिए जाने पर या नियोजित होने पर निधि में ऐसी रकम से अनधिक राशि का अभिदाय कर सकेगा जो यदि वह नियोजक की सेवा में रहा होता तो अभिदाय करता।
(3) नियम 4 के खंड (ड़) या खंड (छ) में की किसी बात के होते हुए भी–
(क) ऐसे कर्मचारी द्वारा जो निधि रखने वाले नियोजक का कर्मचारी नहीं रहता है, लिखित रूप में प्रार्थना करने पर निधि के न्यासी कर्मचारी को देय संपूर्ण संचित अतिशेष या उसका कोर्इ भाग रखे रखने के लिए सम्मति दे सकेंगे जो उसके द्वारा मांग पर किसी भी समय निकाला जा सकेगा;
(ख) जहां ऐसे कर्मचारी को देय संचित अतिशेष, जो कर्मचारी नहीं रहा है, पूर्वगामी खंड के अनुसार निधि में रखा जाता है, वहां उस निधि में ऐसे संचित अतिशेष की बाबत ब्याज भी समाविष्ट हो सकेगा।
(ग) निधि ऐसी रकम और उस पर ब्याज से मिलकर भी बन सकती है जो किसी कर्मचारी के पूर्व नियोजक द्वारा रखी जाने वाली मान्यताप्राप्त भविष्य निधि में उस कर्मचारी के निजी खाते से अन्तरित की जाए।
(4) ऐसे किन्हीं नियमों के अधीन जिन्हें बोर्ड इस निमित्त बनाए प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त किसी विशिष्ट निधि की बाबत नियम 4 के खंड (ग) के उपबंधों को शिथिल कर सकेगा–
(क) जिससे ऐसे कर्मचारियों के, जिनका वेतन हर दशा में प्रति मास पांच सौ रुपए से अधिक नहीं होता है, निजी खाते में नियोजक द्वारा अधिक बड़े अभिदाय देना अनुज्ञात किया जा सके; और
(ख) जिससे नियोजकों द्वारा कर्मचारियों के वैयक्तिक खातों में कालिक बोनस या आकस्मिक प्रकार के अन्य अभिदायों का जमा किया जाना अनुज्ञात किया जा सके जहां कि ऐसे बोनस या अन्य अभिदायों का परिकलन और संदाय निधि के विनियमों द्वारा निश्चित सिद्धांतों के आधार पर उपबंधित है।
(5) नियम 4 के खंड (ज) में की किसी बात के होते भी, इस दृष्टि से कि कोर्इ कर्मचारी नियम 11 के उपनियम (4) के अधीन अवधारित अपनी कुल आय पर निर्धारित कर की रकम का संदाय कर सके वह मान्यताप्राप्त भविष्यनिधि में अपने खाते के अतिशेष से उतनी राशि निकालने का हकदार होगा जो ऐसी रकम और उस रकम के अन्तर से अधिक नहीं है जिससे वह निर्धारित किया गया होता यदि नियम 11 के उपनियम (2) में निर्दिष्ट अन्तरित अतिशेष उसकी कुल आय में सम्मिलित न किया जाता।
नियोजक के वार्षिक अभिदाय कब कर्मचारी द्वारा प्राप्त आय समझे जाएंगे
6. मान्यताप्राप्त भविष्य निधि में भाग लेने वाले कर्मचारी के जमा खाते में अतिशेष में किसी पूर्ववर्ष की वार्षिक अनुवृद्धि का वह भाग, जिसमें–
(क) नियोजक द्वारा किए गए वे अभिदाय समाविष्ट हैं जो कर्मचारी के वेतन के बारह प्रतिशत से अधिक हैं; और
(ख) कर्मचारी के जमा खाते में अतिशेष में जमा ब्याज जहां तक वह ऐसी दर से अधिक दर पर अनुज्ञात किया जाता है जो केन्द्रीय सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त नियत की जाए,
कर्मचारी द्वारा उस पूर्ववर्ष में प्राप्त किया गया समझा जाएगा और उस पूर्ववर्ष के लिए उसकी कुल आय में सम्मिलित किया जाएगा तथा उस पर आय-कर प्रभारित किया जाएगा।
कर्मचारी के अभिदायों के लिए छूट
7. किसी मान्यताप्राप्त भविष्य निधि में भाग लेने वाला कर्मचारी अपनी कुल आय की संगणना में पूर्ववर्ष में निधि में अपने निजी खाते में अपने स्वयं के अभिदायों की बाबत इतनी रकम की कटौती का हकदार होगा जितनी धारा 80ग के अनुसार अवधारित हो।
संचित अतिशेष का कुल आय में शामिल न किया जाना
8. मान्यताप्राप्त भविष्य निधि में भाग लेने वाले कर्मचारी को देय और संदेय होने वाला संचित अतिशेष उसकी कुल आय की संगणना से अपवर्जित किया जाएगा–
(i) यदि उसने अपने नियोजक पांच वर्ष या उससे अधिक अवधि के लिए निरन्तर सेवा की है, अथवा
(ii) यद्यपि उसने ऐसी निरन्तर सेवा नहीं की है, तो भी यदि सेवा कर्मचारी का स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण नियोजक के कारबार के अंतविरोधों के कारण या बंद हो जाने के कारण या कर्मचारी के नियंत्रण से परे के अन्य कारणवश समाप्त की गर्इ है, अथवा
(iii) यदि कर्मचारी अपने नियोजन के समाप्त होने पर किसी अन्य नियोजक द्वारा नियोजित किया जाता है, तो, उस विस्तार और वहां तक उसको देय और संदेय होने वाला संचित अतिशेष किसी अन्य नियोजक द्वारा रखी जाने वाली मान्यताप्राप्त भविष्य निधि में उसके निजी खाते में जमा किया जाता है; अथवा
(iv) यदि कर्मचारी के खाते में संपूर्ण अतिशेष धारा 80गगघ में निर्दिष्ट और केंद्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित पेंशन स्कीम के अधीन उसके खाते में अंतरित किया जाता है।
स्पष्टीकरण – जहां किसी कर्मचारी को, जो अपने नियोजक द्वारा रखी जाने वाली किसी मान्यताप्राप्त भविष्य निधि में भाग लेता है, देय और संदेय होने वाले संचित अतिशेष में उसके पूर्व नियोजक या नियोजकों द्वारा रखी जाने वाली किसी अन्य मान्यताप्राप्त भविष्य निधि या निधियों से उसके निजी खाते में अन्तरित कोर्इ रकम सम्मिलित है, वहां खंड (i) या खंड (ii) के प्रयोजनों के लिए निरन्तर सेवा की अवधि की संगणना करने में वह अवधि या अवधियां भी सम्मिलित की जाएंगी जिनमें ऐसे कर्मचारी ने अपने पूर्वोक्त पूर्व नियोजक या नियोजकों के अधीन निरन्तर सेवा की थी।
संचित अतिशेष पर कर
9. (1) जहां मान्यताप्राप्त भविष्य निधि में भाग लेने वाले कर्मचारी को देय संचित अतिशेष नियम 8 के उपबंधों के लागू न होने के कारण उसकी कुल आय में सम्मिलित कर लिया जाता है, वहां निर्धारण अधिकारी ऐसे कर की विभिन्न राशियों का योग परिकलित करेगा जो यदि निधि मान्यताप्राप्त निधि नहीं होती तो कर्मचारी द्वारा संबंधित वर्षों में से प्रत्येक के लिए उसकी कुल आय की बाबत संदेय होता, और वह रकम जिसमें ऐसा योग ऐसे कर्मचारी द्वारा या की ओर से ऐसे वर्षों के लिए कर के रूप में संदत्त सभी राशियों के योग से अधिक हो जाता है, कर्मचारी द्वारा किसी अन्य ऐसे कर के अतिरिक्त संदेय होगी जिससे वह उस पूर्ववर्ष के लिए दायित्वाधीन है जिसमें उसको देय संचित अतिशेष संदेय होता है।
(2) जहां मान्यताप्राप्त भविष्य निधि में भाग लेने वाले कर्मचारी को देय संचित अतिशेष, जो नियम 8 के उपबंधों के अधीन कुल आय में सम्मिलित नहीं किया गया है संदेय हो जाता है, वहां वार्षिक अनुवृद्धियों पर, जो यदि भारतीय आय-कर (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1933 (1933 का 18) 15 मार्च, 1930 को प्रवृत्त हो गया होता तो निर्धारण वर्ष 1932-33 तक और उसके सहित किसी निर्धारण वर्ष के लिए भारतीय आय-कर अधिनियम, 1922 (1922 का 11) की धारा 58ड़ के अधीन संदेय होतीं, अधि-कर की रकमों के योग के बराबर रकम कर्मचारी द्वारा ऐसे पूर्ववर्ष के लिए, जिसमें वह अतिशेष संदेय हो जाता है, अपने द्वारा संदेय किसी अन्य कर के अतिरिक्त संदेय होगी।
संचित अतिशेष पर संदेय कर की स्रोत पर कटौती
10. मान्यताप्राप्त भविष्य निधि में न्यासी या कोर्इ ऐसा व्यक्ति जो निधि के विनियमों द्वारा कर्मचारियों को देय संचित अतिशेषों का संदाय करने के लिए प्राधिकृत है उन दशाओं में जहां नियम 9 का उपनियम (1) लागू होता है, उस समय जब कर्मचारी को देय संचित अतिशेष का संदाय किया जाता है उसमें से उस नियम के अधीन संदेय रकम की कटौती कर लेगा और अध्याय 17ख के सभी उपबंध ऐसे लागू होंगे मानो संचित अतिशेष ''वेतन'' शीर्ष के अधीन प्रभार्य आय हों।
नर्इ मान्यताप्राप्त भविष्य निधि में अतिशेष के बारे में कार्यवाही
11. (1) जहां विद्यमान अतिशेषों वाली किसी भविष्य निधि को मान्यता दी जाती है, वहां उस दिन के जिस दिन मान्यता प्रभावी होती है, ठीक पूर्व दिन तक की निधि का लेखा तैयार किया जाएगा जिसमें ऐसे दिन प्रत्येक कर्मचारी के खाते में अतिशेष दर्शित होगा और ऐसा अतिरिक्त विवरण भी अंतर्विष्ट होगा जो बोर्ड विहित करे।
(2) प्रत्येक कर्मचारी के जमा खाते में अतिशेषों संबंधी लेखा में उसकी वह रकम भी दर्शित की जाएगी जो मान्यताप्राप्त भविष्य निधि में उस कर्मचारी के खाते में अंतरित की जानी है और ऐसी रकम (जिसे इसमें इसके पश्चात् उसका अन्तरित अतिशेष कहा गया है) उसके जमा खाते में अतिशेष के रूप में दर्शित की जाएगी, और इस नियम का उपनियम (4) और नियम 5 का उपनियम (5) उस पर लागू होगा।
(3) विद्यमान निधि में कर्मचारी के जमा खाते में अतिशेष का कोर्इ भाग जिसको मान्यताप्राप्त निधि में अंतरित नहीं किया जाता है, मान्यताप्राप्त निधि के लेखाओं से अपवर्जित किया जाएगा और इस अधिनियम के इस भाग से भिन्न उपबंधों के अनुसार उस पर आय-कर प्रभारित किया जाएगा।
(4) ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए जो बोर्ड इस निमित्त बनाए निर्धारण अधिकारी अन्तरित अतिशेष में समाविष्ट सब राशियों के, जिनपर आय-कर प्रभारित किया जाता यदि निधि की संस्थापना की तारीख से यह भाग प्रवृत्त होता, योग का परिकलन किसी ऐसे कर को गणना में लिए बिना करेगा जिसका किसी राशि पर संदाय किया गया हो और ऐसे योग को (यदि कोर्इ हो) कर्मचारी द्वारा उस पूर्ववर्ष की प्राप्त की गर्इ आय समझा जाएगा, जिसमें निधि की मान्यता प्रभावी होती है और उसे पूर्ववर्ष के लिए कर्मचारी की कुल आय में सम्मिलित किया जाएगा, और अन्तरित अतिशेष की बकाया को निर्धारण के प्रयोजनों के लिए हिसाब में नहीं लिया जाएगा किंतु प्रतिदाय या किसी अन्य रूप में कोर्इ अन्य छूट या राहत ऐसे अन्तरित अतिशेष में समाविष्ट किसी राशि की बाबत नहीं दी जाएगी :
परन्तु लेखा संबंधी गम्भीर कठिनार्इ के मामलों में प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त उक्त नियमों के अध्यधीन रहते हुए ऐसे योग का संक्षिप्त परिकलन कर सकेगा।
(5) इस नियम में की कोर्इ बात उन व्यक्तियों के अधिकारों को प्रभावित नहीं करेगी जो किसी ऐसी भविष्य निधि का जिसे मान्यताप्राप्त न हो मान्यता दिए जाने से पूर्व प्रशासन या उससे अथवा किसी कर्मचारी विशेष के निजी जमा खाते में अतिशेष से संबंधित संव्यवहार ऐसी रीति से कर रहे हैं जो विधिपूर्ण है।
मान्यताप्राप्त भविष्य निधियों के लेखा
12. (1) मान्यताप्राप्त निधि के लेखा निधि के न्यासियों द्वारा रखे जाएंगे और ऐसे प्ररूप में और ऐसी अवधियों के लिए होंगे और उनमें ऐसी विशिष्टियां होंगी जो बोर्ड विहित करे।
(2) लेखा आय-कर प्राधिकारियों द्वारा सभी युक्तियुक्त समयों पर निरीक्षण के लिए खुले रहेंगे और न्यासी निर्धारण अधिकारी को उनके ऐसे सार प्रस्तुत करेंगे जो बोर्ड विहित करे।
अपीलें
13. (1) ऐसा नियोजक जो प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त के किसी भविष्य निधि को मान्यता देने से इन्कार करने वाले आदेश या उसकी मान्यता वापस लेने वाले आदेश पर आपत्ति करता है, ऐसे आदेश के साठ दिन के भीतर बोर्ड को अपील कर सकेगा।
(2) अपील ऐसे प्ररूप में होगी और ऐसी रीति से सत्यापित होगी और ऐसी फीस के साथ होगी जो बोर्ड विहित करे।
नियोजक द्वारा न्यासी को अन्तरित निधि पर कार्यवाही
14. (1) जहां कोर्इ ऐसा नियोजक, जो अपने कर्मचारियों के फायदे के लिए भविष्य निधि (चाहे वह मान्यताप्राप्त है या नहीं) रखता है, और उसने निधि या उसके किसी भाग का अन्तरण नहीं किया है, ऐसी निधि या भाग को निधि में भाग लेने वाले कर्मचारियों के लिए विश्वास में न्यासियों को अन्तरित करता है, वहां इस प्रकार अन्तरित रकम पूंजीगत व्यय की प्रकृति की समझी जाएगी।
(2) जब ऐसी निधि में भाग लेने वाले कर्मचारी को वह संचित अतिशेष दिया जाता है जो उसे उसमें से देय है तब ऐसे अतिशेष के किसी भाग के बारे में, जो न्यासियों को इस प्रकार अन्तरित की गर्इ रकम में (ब्याज को जोड़े बिना, और कर्मचारी के अभिदायों और उन पर ब्याज छोड़कर) उसके अंश के रूप में है, उस दशा में जिसमें नियोजक ने यह सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी प्रबंध कर लिए हैं कि ऐसे अंश की रकम से जब इसका कर्मचारी को संदाय किया जाएगा, स्रोत पर कर की कटौती कर ली जाएगी, यह समझा जाएगा कि वह धारा 37 के अर्थ में नियोजक द्वारा ऐसे पूर्ववर्ष में किया गया व्यय है जिसमें कर्मचारी को देय संचित अतिशेष का संदाय किया जाता है।
नियमों के बारे में उपबंध
15. (1) इस भाग द्वारा प्रदत्त किसी शक्ति के अतिरिक्त, बोर्ड निम्नलिखित के लिए नियम बना सकेगा–
(क) मान्यता के लिए आवेदन के साथ प्रस्तुत किए जाने वाले विवरण और अन्य जानकारी विहित करना;
(ख) किसी मान्यताप्राप्त भविष्य निधि में किसी कंपनी के कर्मचारियों जो कंपनी में शेयरधारक हैं के अभिदायों को सीमित करना;
(खख) किसी मान्यताप्राप्त भविष्य निधि के धन विनिधान या निक्षेप का विनियमन करना:
परन्तु इस खंड के अधीन बनाए गए किसी नियम द्वारा लोक ऋण अधिनियम, 1944 (1944 का 18) की धारा 2 में यथा परिभाषित सरकारी प्रतिभूति में ऐसी निधि के धन के पचास प्रतिशत से अधिक विनिधान की अपेक्षा नहीं की जाएगी;
(ग) किसी मान्यताप्राप्त भविष्य निधि में अपने फायदा हित के समनुदेशन या उस पर प्रभार का सृजन करने के फलस्वरूप किसी कर्मचारी द्वारा प्राप्त किसी प्रतिफल के शास्ति के रूप में निर्धारण के लिए उपबंध करना;
(घ) वह सीमा जिस तक और वह रीति जिसमें कर देने से छूट ऐसे अभिदायों और ब्याज से संबंधित दी जा सकेगी, जो किसी ऐसी भविष्य निधि में जिसकी मान्यता वापस ले ली गर्इ है, कर्मचारियों के खातों में जमा है, तय करना; और
(ड़) साधारणत: इस भाग के प्रयोजनों को कार्यान्वित करना और भविष्य निधियों को मान्यता देने और मान्यताप्राप्त भविष्य निधियों के प्रशासन पर ऐसा अतिरिक्त नियंत्रण, जैसा वह आवश्यक समझे, सुनिश्चित करना।
(2) इस भाग के अधीन बनाए गए सब नियम धारा 296 के उपबंधों के अधीन होंगे।
भाग ख
अनुमोदित अधिवार्षिकी निधियां
[धारा 2(6), 10(13), 10(25)(iii), 36(1)(iv), 87(1)(ड़), 192(5) 206 देखिए]
परिभाषाएं
1. इस भाग में, जब तब कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, अधिवार्षिकी निधियों के संबंध में ''नियोजक'', ''कर्मचारी'', ''अभिदाय'' और ''वेतन'' का वही अर्थ है जो भविष्य निधियों के संबंध में भाग क के नियम 2 में है।
अनुमोदन देना और अनुमोदन वापस लेना
2. (1) प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त किसी ऐसी अधिवार्षिकी निधि या अधिवार्षिकी निधि के किसी भाग को, जो उसकी राय में नियम 3 की अपेक्षाओं का पूरा करती है, अनुमोदन दे सकेगा और ऐसे अनुमोदन को किसी भी समय वापस ले सकेगा, यदि उसकी राय में, उस निधि या उसके भाग की परिस्थितियों में अनुमोदन जारी रखना आवश्यक नहीं है।
(2) प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त अनुमोदन देने की, उस तारीख को जिसको अनुमोदन प्रभावी होना है तथा जहां अनुमोदन शर्तों के अधीन रहते हुए दिया जाता है, वहां उन शर्तों सहित, संसूचना निधि के न्यासियों को लिखित रूप में देगा।
(3) प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त, अनुमोदन की वापसी की, ऐसी वापसी के कारणों की और उस तारीख के सहित जिसको वापसी प्रभावी होनी है, संसूचना निधि के न्यासियों को लिखित रूप में देगा।
(4) प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त किसी अधिवार्षिकी निधि या अधिवार्षिकी निधि के भाग को अनुमोदन करने से तब तक न तो इन्कार करेगा और न उसे वापस लेगा जब तक कि उसने उस निधि के न्यासियों को उस विषय में सुने जाने का युक्तियुक्त अवसर न दे दिया हो।
अनुमोदन के लिए शर्तें
3. इस दृष्टि से कि अधिवार्षिकी निधि को अनुमोदन प्राप्त हो और वह उसे रख सके वह नीचे वर्णित शर्तें और ऐसी कोर्इ अन्य शर्तें, जो बोर्ड नियमों द्वारा विहित करे, पूरी करेगी–
(क) निधि ऐसी होगी जो भारत में चलाए जाने वाले व्यापार या उपक्रम के संबंध में अप्रतिसंहरणीय (इररेवोकेबल) न्यास के अधीन स्थापित की गर्इ हो और कम से कम नब्बे प्रतिशत कर्मचारी भारत में नियोजित हों;
(ख) निधि का एकमात्र प्रयोजन, व्यापार या उपक्रम में लगे कर्मचारियों के लिए उनकी विनिर्दिष्ट आयु पर या उसके पश्चात् सेवानिवृत्त होने पर या उनके ऐसी सेवानिवृति के पूर्व अशक्त हो जाने पर, या उन व्यक्तियों की जो ऐसे कर्मचारी हैं, या रह चुके हैं, मृत्यु पर, उनकी विधवाओं, सन्तानों या आश्रितों के लिए वार्षिकियों की व्यवस्था करना होगा;
(ग) व्यापार या उपक्रम का नियोजक निधि में अभिदायी होगा; और
(घ) निधि में से मंजूर सब वार्षिकियां, पेंशन और अन्य फायदे भारत में ही देने होंगे।
अनुमोदन के लिए आवेदन
4. (1) किसी अधिवार्षिकी निधि या अधिवार्षिकी निधि के भाग के अनुमोदन के लिए आवेदन निधि के न्यासियों द्वारा उस निर्धारण अधिकारी को, जिसके द्वारा नियोजक निर्धारणीय है, लिखित रूप में किया जाएगा और उसके साथ उस लिखत की एक प्रति जिसके अधीन ऐसी निधि स्थापित की गर्इ हो और नियमों की दो प्रतियां देनी होंगी तथा जहां निधि उस वित्तीय वर्ष के पूर्ववर्ती ऐसे किसी वर्ष या किन्हीं वर्षों के दौरान अस्तित्व में रही है, जिसमें अनुमोदन के लिए आवेदन किया जाता है, वहां निधि के लेखाओं की दो प्रतियां भी देनी होंगी जो ऐसे पूर्ववर्ती वर्ष या वर्षों से (जो उक्त आवेदन किए जाने के वर्ष के ठीक पूर्ववर्ती तीन वर्षों से अधिक न हो) संबंधित है जिनके लिए ऐसे लेखे तैयार कर लिए गए हैं किंतु प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त ऐसी अतिरिक्त जानकारी देने की अपेक्षा कर सकेगा जैसी वह उचित समझे।
(2) यदि अनुमोदन के आवेदन की तारीख के पश्चात् किसी समय निधि के नियमों, उसकी रचना, उद्देश्यों या शर्तों में कोर्इ परिवर्तन किया जाता है, तो निधि के न्यासी उपनियम (1) में वर्णित निर्धारण अधिकारी को ऐसे परिवर्तन की तुरन्त सूचना देंगे और ऐसी संसूचना के व्यतिक्रम में, दिए गए अनुमोदन के बारे में, जब तक कि प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त अन्यथा आदेश न करें, यह समझा जाएगा कि उसे उस तारीख से जिसको ऐसा परिवर्तन प्रभावी हुआ था वापस ले लिया गया है।
नियोजक द्वारा अभिदाय कब नियोजक की आय समझे जाएंगे
5. जब किसी नियोजक द्वारा कोर्इ अभिदाय (जिसके अन्तर्गत उन पर ब्याज, यदि कोर्इ हो, भी है) नियोजक को प्रतिसंदाय किए जाते हैं तब इस प्रकार वापस दी गर्इ रकम के बारे में आय-कर के प्रयोजनों के लिए यह समझा जाएगा कि वह नियोजक की उस पूर्ववर्ष की आय है, जिसमें उसे इस प्रकार प्रतिसंदाय किया गया है।
कर्मचारी को दिए गए अभिदायों पर कर की कटौती
6. जहां किसी नियोजक द्वारा किए गए किन्हीं अभिदायों की, जिनके अन्तर्गत अभिदायों पर ब्याज यदि कोर्इ हो, भी है किसी कर्मचारी को उसके जीवनकाल के दौरान संदाय धारा 10 के खंड (13) में उल्लिखित परिस्थितियों से भिन्न परिस्थितियों में किया जाता है, वहां ऐसे दी गर्इ रकम पर कर की कटौती कर की ऐसी औसत दर पर की जाएगी जिस पर कर के दायित्वाधीन वह कर्मचारी पूर्ववर्ती तीन वर्ष के दौरान था, यदि तीन वर्ष से कम हों तो उस अवधि के दौरान जब वह निधि का सदस्य था और उसे न्यासियों द्वारा विहित समय के भीतर और रीति में जैसी बोर्ड निर्दिष्ट करे केन्द्रीय सरकार के खाते में जमा कर दिया जाएगा।
कर्मचारी के वेतन और उसकी ओर से किए गए अभिदायों में से की गर्इ कटौती का विवरणी में सम्मिलित किया जाना
7. जहां कोर्इ नियोजक, अनुमोदित अधिवार्षिकी निधि में किसी कर्मचारी के किन्हीं अभिदायों को उस कर्मचारी को दी गर्इ उपलब्धियों में से काटता है, या उसकी ओर से संदाय करता है, वहां वह ऐसी सब कटौती या संदायों को उस विवरणी में सम्मिलित करेगा जिसे प्रस्तुत करना उसके लिए धारा 206 द्वारा अपेक्षित है।
अपीलें
8. (1) ऐसा नियोजक जो प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त के किसी अधिवार्षिकी निधि का अनुमोदन करने से इन्कार करने वाले आदेश या ऐसे अनुमोदन के वापस लेने वाले आदेश पर आपत्ति करता है, ऐसे आदेश के साठ दिन के भीतर, बोर्ड में अपील कर सकेगा।
(2) अपील ऐसे प्ररूप में होगी और ऐसी रीति से सत्यापित होगी और ऐसी फीस के साथ होगी जो विहित की जाए।
अनुमोदन की समाप्ति पर न्यासियों का दायित्व
9. यदि कोर्इ निधि या निधि का भाग किसी कारण अनुमोदित अधिवार्षिकी निधि नहीं रह जाता है, तो भी उस निधि के न्यासी के वापस किए गए अभिदायों (जिनके अंतर्गत अभिदायों पर ब्याज, यदि कोर्इ हो, भी है) के कारण संदत्त किसी राशि पर कर के दायित्वाधीन रहेंगे जहां तक कि इस प्रकार संदत्त राशि इस भाग के उपबंधों के अधीन निधि या निधि के भाग के अनुमोदित अधिवार्षिकी निधि न रह जाने के पूर्व किए गए अभिदायों की बाबत है।
अधिवार्षिकी निधियों की बाबत दी जाने वाली विशिष्टियां
10. किसी अनुमोदित अधिवार्षिकी निधि के न्यासी और कोर्इ ऐसा नियोजक जो अनुमोदित अधिवार्षिकी निधि में अभिदाय करता है निर्धारण अधिकारी से सूचना द्वारा अपेक्षा किए जाने पर इस नोटिस की तारीख से इक्कीस दिन से कम न होने वाली ऐसी अवधि के भीतर जो सूचना में बतार्इ जाए, ऐसी विवरणियां, विवरण, विशिष्टियां या जानकारी देंगे जो निर्धारण अधिकारी अपेक्षा करे।
नियमों से संबंधित उपबंध
11. (1) इस भाग द्वारा प्रदत्त किसी शक्ति के अतिरिक्त, बोर्ड निम्नलिखित के लिए नियम बना सकेगा–
(क) अनुमोदन के आवेदन के साथ प्रस्तुत किए जाने वाले विवरण और अन्य जानकारी विहित करना;
(ख) ऐसी विवरणियां, विवरण, विशिष्टियां या जानकारी, जिनकी अपेक्षा निर्धारण अधिकारी किसी अनुमोदित अधिवार्षिकी निधि के न्यासियों से या नियोजक से करे विहित करना;
(ग) किसी अनुमोदित अधिवार्षिकी निधि में मामूली वार्षिक अभिदाय और नियोजक द्वारा कोर्इ अन्य अभिदाय परिसीमित करना;
(गग) किसी अनुमोदित अधिवार्षिकी निधि के धन के विनिधान या निक्षेप का विनियमन करना :
परन्तु इस खंड के अधीन बनाए गए किसी नियम द्वारा लोक ऋण अधिनियम, 1944 (1944 का 18) की धारा 2 में यथापरिभाषित सरकारी प्रतिभूति में ऐसी निधि के धनों के पचास प्रतिशत से अधिक विनिधान की अपेक्षा नहीं की जाएगी;
(घ) किसी अनुमोदित अधिवार्षिकी निधि में अपने फायदाप्रद हित के समनुदेशन या उस पर प्रभार का सृजन करने के फलस्वरूप किसी कर्मचारी द्वारा प्राप्त किसी प्रतिफल के शास्ति के रूप में निर्धारण के लिए उपबंध करना;
(ड़) वह सीमा जिस तक और वह रीति जिसमें कर के संदाय से छूट किसी ऐसे संदाय की बाबत दी जा सकेगी जो किसी ऐसी अधिवार्षिकी निधि में से जिसका अनुमोदन वापस ले लिया गया हो, किया गया हो, तय करना;
(च) किसी ऐसी निधि की दशा में, जो इस भाग या उसके अधीन बनाए गए नियमों की अपेक्षाओं की पूर्ति नहीं करती, अनुमोदन वापस लेने के लिए उपबंध करना; और
(छ) साधारणतया इस भाग के प्रयोजनों को कार्यान्वित करना और अधिवार्षिकी निधियों के अनुमोदन और अनुमोदित अधिवार्षिकी निधियों के प्रशासन पर ऐसा अतिरिक्त नियंत्रण, जैसा वह आवश्यक समझे, सुनिश्चित करना।
(2) इस भाग के अधीन बनाए गए सब नियम धारा 296 के उपबंधों के अधीन होंगे।
भाग ग
अनुमोदित उपदान निधियां
[धारा 2(5) 10(25)(iv), 17(1)(iii) और 36(1)(v) देखिए]
परिभाषाएं
1. इस भाग में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, उपदान निधियों के संबंध में ''नियोजक'', ''कर्मचारी'', ''अभिदाय'' और ''वेतन'' के वे ही अर्थ हैं जो उन पदों का भविष्य निधियों से संबंधित भाग 'क' के नियम 2 में है।
अनुमोदन देना और अनुमोदन वापस लेना
2. (1) प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त किसी ऐसी उपदान निधि को, जो उसकी राय में नियम 3 की अपेक्षाओं को पूरी करती है, अनुमोदन दे सकेगा और ऐसे अनुमोदन को किसी भी समय वापस ले सकेगा, यदि उसकी राय में, उस निधि की परिस्थितियों में अनुमोदन जारी रखने का आधार नहीं रहा।
(2) प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त अनुमोदन देने की, उस तारीख को जिसको अनुमोदन प्रभावी होना है तथा जहां अनुमोदन शर्तों के अध्यधीन दिया जाता है वहां उन शर्तों को बताते हुए, संसूचना निधि के न्यासियों को लिखित रूप में देगा।
(3) प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त अनुमोदन वापस लेने की, ऐसी वापसी के कारणों को और उस तारीख को बताते हुए, जिसको वापसी प्रभावी होनी हो, संसूचना निधि के न्यासियों को लिखित रूप में देगा।
(4) प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त किसी उपदान निधि को अनुमोदन देने से तब तक न तो इंकार करेगा और न उसे वापस लेगा जब तक कि उसने उस निधि के न्यासियों को उस विषय में सुने जाने का उचित अवसर न दे दिया हो।
अनुमोदन की शर्तें
3. इस दृष्टि से कि उपदान निधि को अनुमोदन प्राप्त हो जाए और वह उसे कायम रख सके, वह नीचे वर्णित शर्तें और ऐसी कोर्इ अन्य शर्तें, जो बोर्ड नियमों द्वारा विहित की जाएं, पूरी करेगी–
(क) निधि ऐसी निधि होगी जो भारत में चलाए जाने वाले किसी व्यापार या उपक्रम के संबंध में अप्रतिसंहरणीय न्यास के अधीन स्थापित की गर्इ हो और कम से कम नब्बे प्रतिशत कर्मचारी भारत में नियोजित किए जाएंगे;
(ख) निधि का एकमात्र प्रयोजन व्यापार या उपक्रम में लगे कर्मचारियों के लिए उनकी एक विनिर्दिष्ट आयु पर या उसके पश्चात् सेवा-निवृत्त होने पर या ऐसी सेवानिवृत्ति के पूर्व उनके असमर्थ हो जाने पर या निधि के नियमों में विनिर्दिष्ट सेवा की न्यूनतम अवधि के पश्चात् उनके नियोजन के समाप्त हो जाने पर या ऐसे कर्मचारियों की मृत्यु पर उनकी विधवाओं, संतानों या आश्रितों के लिए उपदान का उपबंध करना होगा;
(ग) व्यापार या उपक्रम में का नियोजक निधि में अभिदायकर्ता होगा; और
(घ) निधि द्वारा अनुदत्त सब फायदे भारत में ही संदेय होंगे।
अनुमोदन के लिए आवेदन
4. (1) किसी उपदान निधि के अनुमोदन के लिए आवेदन निधि के न्यासियों द्वारा उस निर्धारण अधिकारी को जिसके द्वारा नियोजक निर्धारणीय है, लिखित रूप में किया जाएगा और उसके साथ उस लिखत की एक प्रति, जिसके अधीन ऐसी निधि स्थापित की गर्इ हो और नियमों की दो प्रतियां देनी होंगी तथा जहां निधि उस वित्तीय वर्ष के पूर्ववर्ती ऐसे किसी वर्ष या किन्हीं वर्षों के दौरान अस्तित्व में रही है, जिसमें अनुमोदन के लिए आवेदन किया जाता है, वहां निधि के लेखाओं की दो प्रतियां भी देनी होंगी जो ऐसे पूर्ववर्ती वर्ष या वर्षों से (जो उक्त आवेदन किए जाने के वर्ष के ठीक पूर्ववर्ती तीन वर्षों से अधिक न हो) संबंधित है, जिनके लिए ऐसे लेखे तैयार कर लिए गए हैं किन्तु प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त ऐसी अतिरिक्त जानकारी देने की अपेक्षा कर सकेगा जैसी वह उचित समझे।
(2) यदि अनुमोदन के लिए आवेदन की तारीख के पश्चात् किसी समय निधि के नियमों, उसके गठन, उद्देश्यों या शर्तों में कोर्इ परिवर्तन किया जाता है, तो निधि के न्यासी उपनियम (1) में वर्णित निर्धारण अधिकारी को ऐसे परिवर्तनों की तुरंत संसूचना देंगे, और ऐसी संसूचना न दिए जाने की दशा में दिए गए किसी अनुमोदन के बारे में, जब तक कि प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त अन्यथा आदेश न करे, यह समझा जाएगा कि उसे उस तारीख से जिसको ऐसा परिवर्तन प्रभावी हुआ था वापस ले लिया गया है।
उपदान को वेतन समझा जाना
5. जहां कोर्इ उपदान, किसी कर्मचारी को उसके जीवन काल में दिया जाता है, वहां वह उपदान इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, कर्मचारी को दिया गया वेतन माना जाएगा।
अनुमोदन की समाप्ति पर न्यासियों का दायित्व
6. यदि कोर्इ उपदान निधि किसी कारण से अनुमोदित उपदान निधि नहीं रह जाती है, तो भी निधि के न्यासी किसी कर्मचारी को दिए गए किसी उपदान पर कर के दायी रहेंगे।
नियोजक द्वारा अभिदाय कब नियोजक की आय समझे जाएंगे
7. जब किसी नियोजक द्वारा कोर्इ अभिदाय (जिनके अंतर्गत उन पर ब्याज, यदि कोर्इ हो, भी है) नियोजक को प्रतिसंदत्त किए जाते हैं, तब इस प्रकार प्रतिसंदत्त रकम के बारे में आय-कर के प्रयोजनों के लिए यह समझा जाएगा कि वह नियोजक की उस पूर्ववर्ष की आय है, जिसमें उन्हें इस प्रकार प्रतिसंदत्त किया गया है।
अपीलें
8. (1) ऐसा नियोजक जो प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त के किसी उपदान निधि को अनुमोदन देने से इन्कार करने वाले आदेश या ऐसे अनुमोदन को वापस लेने वाले आदेश पर आक्षेप करता है, ऐसे आदेश के साठ दिन के भीतर बोर्ड में अपील कर सकेगा।
(2) अपील ऐसे प्ररूप में होगी और ऐसी रीति से सत्यापित होगी और ऐसी फीस के साथ होगी जो विहित की जाए।
उपदान निधियों की बाबत दी जाने वाली विशिष्टियां
8क. अनुमोदित उपदान निधि के न्यासी और कोर्इ भी नियोजक जो अनुमोदित निधि के लिए अभिदाय करता है निर्धारण अधिकारी द्वारा सूचना द्वारा अपेक्षा किए जाने पर ऐसी अवधि के भीतर जो सूचना में बतार्इ जाए, और जो सूचना की तारीख से इक्कीस दिन से कम न होगी, ऐसी विवरणी, विवरण, विशिष्टियां या जानकारी देगा जिसकी निर्धारण अधिकारी अपेक्षा करे।
नियमों के बारे में उपबंध
9. (1) इस भाग द्वारा प्रदत्त किसी शक्ति के अतिरिक्त, बोर्ड निम्नलिखित के लिए नियम बना सकेगा–
(क) अनुमोदन के आवेदन के साथ प्रस्तुत किए जाने वाले विवरण और अन्य जानकारी विहित करना;
(ख) किसी निधि में, साधारण वार्षिक और नियोजक के अन्य अभिदाय सीमित करना;
(खख) किसी अनुमोदित उपदान निधि के धन के विनिधान या निक्षेप का विनियमन करना :
परन्तु इस खंड के अधीन बनाए गए किसी नियम में लोक ऋण अधिनियम, 1944 (1944 का 18) की धारा 2 में परिभाषित सरकारी प्रतिभूति में ऐसी निधि की राशि के पचास प्रतिशत से अधिक विनिधान की अपेक्षा नहीं की जाएगी;
(ग) किसी अनुमोदित उपदान निधि में अपने फायदाप्रद हित के समनुदेशन या उस पर भार का सृजन करने के फलस्वरूप, किसी कर्मचारी द्वारा प्राप्त किसी प्रतिफल का शास्ति के रूप में कर-निर्धारण के लिए उपबंध करना;
(घ) किसी ऐसी निधि की दशा में, जो इस भाग की या इसके अधीन बनाए गए नियमों की अपेक्षाओं की पूर्ति नहीं करती, अनुमोदन वापस लेने के लिए उपबंध करना; और
(ड़) साधारणतया इस भाग के प्रयोजनों को पूरा करना और उपदान निधियों के अनुमोदन और उपदान निधियों के प्रशासन पर ऐसा अतिरिक्त नियंत्रण, जो वह आवश्यक समझे, सुनिश्चित करना।
(2) इस भाग के अधीन बनाए गए सब नियम, धारा 296 के उपबंधों के अधीन होंगे।
[वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2019 द्वारा संशोधित रूप में]

