आयकर विभाग

वित्त मंत्रालय, भारत सरकार

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रिलीज़ दिनांक

14/07/2008

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सर्कुलर

आयकर अधिनियम

आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 139 के साथ आय-कर अधिनियम की धारा 125 पढ़ी जाए- इनकम रिटर्न- करों का अनिवार्य ई-भुगतान

सर्कुलर नंबर 5/ 2008, दिनांक 14-7-2008

केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड अधिसूचना एस ओ नंबर 493(ई) दिनांक 138-3-2008 के जरिए उस श्रेणी के करदाता, जिन्हें 1-4-2008 तक या बाद में इलेक्ट्रानिक माध्यम से अनिवार्य तौर पर टैक्स का भुगतान करना है, सूचना जारी कर चुका है। उन करदाताओं को, जिन्हें इन निर्धारित माध्यमों (i) एक कंपनी, और (ii) एक व्यक्ति (कंपनी के अलावा ) द्वारा भुगतान करने की जरूरत है, उनके लिए आय-कर अधिनियम, 1961 की धारा 44ख के प्रावधान लागू हैं।

2. इसी तरह, इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से टैक्स का भुगतान को टैक्स के भुगतान के (i) किसी मान्यता प्राप्त बैंक की इंटरनेट बैंकिंग सुविधा, या (ii) क्रेडिट या डेबिट कार्ड के जरिए किया या भुगतान के अर्थ में उसकी व्याख्या की गई है।

3. इस संदर्भ में, टैक्स के ई-भुगतान करने की प्रक्रिया में किए गए प्रावधानों के चलते कुछ विदेशी करदाताओं को प्रतिनिधित्व संबंधी दिक्कतें होने की बातें सामने आई हैं। कुछ इस तरह के विदेशी करदाताओं की ओर से यह समस्या इंगित की गई है कि चूंकि वे भारत में मौजूद नहीं हैं और इसलिए वे बैंकों के 'ग्राहकों को जानें' की प्रक्रिया को पूरा करने में सक्षम नहीं हैं। परिणामस्वरूप, वे बैंक में अपना खाता खोल पाने में और इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से टैक्स का भुगतान करने में सक्षम नहीं हैं। स्थानीय करदाताओं के प्रतिनिधियों को भी मान्यता प्राप्त बैंकों की इंटरनेट बैंकिंग सुविधा का उपयोग करने में कई तरह की मुसीबतें सामने आई हैं। इस संबंध में एक स्पष्टीकरण भी दिया गया है कि किन मामलों में टैक्स का भुगतान किस तरह से किया जाएगा, ताकि किसी भी श्रेणी के करदाता को किसी तरह की दिक्कत न हो।

4. विभिन्न श्रेणी के करदाताओं द्वारा टैक्स के इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भुगतान की सुविधा के तहत, यहां यह स्पष्ट किया जाता है कि एक करदाता किसी अन्य व्यक्ति के बैंक खाते का उपयोग करते हुए भी टैक्स का इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भुगतान कर सकता है। हालांकि, ऐसे भुगतानों के लिए चालान बनाने हेतु स्थायी खाता संख्या यानी परमानेंट एकाउंट नंबर को निश्चित रूप से इंगित करना होगा। करदाता के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह किसी मान्यता प्राप्त बैंक के अपने ही खाते से कर की राशि का भुगतान करे। इसी तरह, इस तथ्य को भी स्पष्ट किया जाता है कि करदाता की ओर से किया जाने वाला किसी भी तरह के कर का भुगतान आयकर अधिनियम, 1962 के नियम 125 के मकसद के लिए टैक्स का अर्थ इसी संदर्भ में समझा जाएगा।

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