आयकर विभाग

वित्त मंत्रालय, भारत सरकार

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रिलीज़ दिनांक

19/12/2008

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सर्कुलर

आयकर -अधिनियम

आयकर -अधिनियम , 1961 की धारा 2(15) - धर्मार्थ उद्देश्य - जहाँ औद्योगिक अथवा व्यापारिक संस्थाएं दोनो ही - धर्मार्थ तथा पारस्परिकता की संस्था होने का दावा करती है और उनकी गतिविधियाँ उनके सदस्यों के योगदान एवं हिस्सेदारी तक सीमित है , उनको पारस्परिकता के सिद्धांत के आधार पर धारा 2(15) के अन्तर्गत आने वाले प्रतिबन्ध लागू नहीं होंगे।

सर्कुलर संख्या . 11/2008, दिनांक 19-12-2008

1. आयकर -अधिनियम , 1961 की धारा 2(15) के अनुसार धर्मार्थ उद्देश्य में निम्नलिखित शामिल है :

  (i) गरीबो के लिए राहत कार्य

 (ii) शिक्षा

(iii) चिकित्सा सहायता , तथा

(iv) सार्वजानिक उपयोग के किसी उद्देश्य को उन्नत करना

धर्मार्थ उद्देश्य का कोई भी उद्देश्य यदि उपरोक्त प्रकृति का है तो उसे धारा 11 या अधिनियम की धारा 10(23ग) के अन्तर्गत छूट है ।

वैसे यह देखा गया है कि कई संस्थाएं , जो व्यापारिक गतिविधियों में शामिल है , इस आधार पर छूट का दावा करती है कि वे धर्मार्थ उद्देश्य की परिभाषा के अन्तर्गत आने वाले चौथे लिंब यानि कि सार्वजनिक उपयोग के उद्देश्य के विकास हेतु ऐसा कार्ये कर रहे है । अतः वित्त अधिनियम (2008) के अन्तर्गत धारा 2(15) को संशोधित कर यह शर्त जोड़ी गई कि सार्वजानिक उपयोग के उद्देश्य के विकास को धर्मार्थ उद्देश्य नहीं माना जा सकता यदि

  (i) कोई गतिविधि व्यापारिक प्रकृति की हो , अथवा

 (ii) यदि किसी व्यापारी अथवा वाणिज्य संस्था की तरफ से ऐसे सेवा प्रदान की गयी हो ,

2. इस संशोधन के निम्नलिखित अभिप्राय है :

2.1 धारा 2(15) में जोड़ी गयी नयी शर्त इस धारा के पहले तीन हिस्सों के सन्दर्भ में लागू नहीं मानी जाएगी । जिसका मतलब है कि गरीबों को राहत , शिक्षा अथवा चिकित्सा सहायता के लिए यह शर्त लागू नहीं है , जिसके फलस्वरूप यदि किसी ट्रस्ट अथवा संस्था का उद्देशय गरीबो को राहत , शिक्षा अथवा चिकित्सा सहायता प्रदान करना है , तब यह व्यापारिक गतिविधियों में संयोगवश सम्मिलित होने के बावजूद 'धर्माथ उद्देश्य ' कहलायेगा ।

2.2 इस प्रकार इसके विस्तृत क्षेत्र में 'गरीबो को राहत' का क्षेत्र आर्थिक तथा सामाजिक रूप से कमजोर अथवा जरुरतमंदो की भलाई के लिए व्यापक है । इस प्रकार इसके क्षेत्र में निर्धनो , अनाथो , विकलांगो , असहाय महिला एवं बच्चे , छोटे एवं अत्यल्प किसान , दरिद्र कारीगर अथवा वरिष्ठ नागरिको की सहायता शामिल है । जिन संस्थाओ के उद्देश्य ऐसे है वे संयोगवश व्यापारिक गतिविधि के बावजूद छूट के लिए योग्य माने जायेंगे , यदि वे धारा 11(4क) अथवा धारा 10(23ग) की सातवीं शर्त के अंर्तगत आते हों जो इस प्रकार है :

  (i) यह व्यापार संस्था के उद्देश्यों की प्राप्ति से जुड़ी हुई हो तथा

 (ii) इस व्यापार से सम्बंधित सभी बही खातों का उचित रूप से रख रखाव हो रहा हो ।

इसी प्रकार वे संस्थाएं जिनके उद्देश्य शिक्षा अथवा चिकित्सा राहत हैं, वे संयोगवश व्यापारिक गतिविधियों के बावजूद कर में छूट के योग्य चैरिटेबल संथाओ के रूप में बनी रहेंगी, यदि वे उपरोक्त शर्तो को पूरी करती है।

3. धारा 2(15) में शामिल की गई नए शर्त उन संस्थाओ पर लागू होंगी, जिनके उद्देश्य सार्वजानिक उपयोग के किसी दूसरे उद्देश्यों को बढ़ावा देना है ,अर्थात धारा 2(15) में निहित चैरिटेबल उद्देश्य की परिभाषा का चौथा भाग अतः यह संस्थाए यदि वणिज्यिक गतिविधियों में शामिल है तो धारा 11 अथवा अधिनियम की धारा 10(23ख) के अन्तर्गत कर में छूट के लिए अयोग्य माने जायेंगे। यह संस्था व्यापार, वणिज्य अथवा व्यवसाय की प्रकृति की है ,इसका निर्धारण इनकी गतिविधि की प्रकृति, कार्यक्षेत्र, सीमा तथा आवृत्ति से होगा।

3.1 बहुत सारे उद्योग तथा व्यापार संस्थाएं ऐसी है जो धारा 11 के अन्तर्गत अपना धर्माथ उद्देश्य बता कर कर में छूट का दावा करती है क्योंकि इसमें सार्वजानिक उपयोग केउद्देश्य का प्रावधान भी है जिसका फायदा वो लेना चाहते है। पारस्परिकता के सिद्धांत के अन्तर्गत यदि व्यापार ऐसे व्यक्तियों के द्वारा चलाया जा रहा है जो किसी विशेष उद्देश्य के लिए बनाये गए आम निधि में योगदान करते है तथा इस सम्बन्ध में उनका किसी बाह्य संस्था के साथ किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं है तब कोई भी ऐसे संघों के गठन करने वाले व्यक्तियों को कोई भी अधिशेष वापिस नहीं किया जायेगा । ऐसे मामलो में अनुदानकर्ताओ तथा कार्यकर्ताओ की पूरी पहचान आवश्यक होगी । अतः जहाँ कहीं उद्योग अथवा व्यापारिक संस्थाऐं स्वयं को धर्माथ संस्था के साथ साथ आपसी संगठन होने का दावा करती हैं और उनकी गतिविधियाँ सिर्फ अनुदानों तथा अपने सदस्यों की योगदान तक सीमित है, इनपर पारस्परिकता के सिद्धांत के अनुसार धारा 2(15) की शर्त लागू नहीं होगी। वैसे यदि इन संस्थाओ का गैर सदस्यों के साथ कोई लेन देन हो तब उनके चैरिटेबल संस्था होने का दावा धारा 2(15) में निहित शर्तो की अतिरिक्त शर्तो से निर्धारित होगा।

3.2 अंतिम विश्लेषण में वैसे करदाता का उद्देश्य सार्वजानिक उपयोग के लक्ष्य को बढ़ावा देना है, यह एक प्रश्न है। यदि ऐसे करदाता किसी व्यापार, वणिज्य अथवा व्यवसाय की प्रकृति के किसी गतिविधि में लगे हुए है अथवा ऐसे कार्यो में अपनी सेवा प्रदान कर रहें है ,तब इनका धर्माथ उद्देश्य का दावा सही नहीं होगा। ऐसे मामले में "सार्वजानिक उपयोगिता को बढ़ावा देने का उद्देश्य" सिर्फ एक व्यापार, वणिज्य अथवा व्यवसाय के असली उद्देश्य को छुपाने का साधन माना जायेगा । इस प्रकार प्रत्येक मामले को उससे सम्बंधित विशेष तथ्यों के आधार पर निर्धारित किया जायेगा और इसका साधारणीकरण संभव नहीं होगा। जो करदाता धारा 2(15) के अन्तर्गत चैरिटेबल उद्देश्य का दावा करते है उन्हें यह सलाह दी जाएगी कि वे व्यापार, वाणिज्य अथवा व्यवसाय की प्रकृति वाली या उन्हें सेवा देने वाली गतिविधि का त्याग करें।

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