परिपत्र सं. 03/2016 : आयकर अधिनियम, 1961 के अंतर्गत शेयर की पुन: खरीद संबंधी लेनदेन के रूप से संबंधित स्पष्टीकरण
परिपत्र सं.
परिपत्र सं. 03/2016
परिपत्र की तिथि
26/02/2016
दस्तावेज़ अपलोड की तिथि
26/02/2016
परिपत्र सं. 03/2016
भारत सरकार
वित्त मंत्रालय
राजस्व विभाग
केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड
नार्थ ब्लॉक, नर्इ दिल्ली, 26 फरवरी, 2016
विषय : आयकर अधिनियम, 1961 के अंतर्गत शेयर की पुन: खरीद संबंधी लेनदेन के रूप से संबंधित स्पष्टीकरण - संबंधी
आयकर अधिनियम, 1961 ('अधिनियम') की धारा 46क के प्रावधानों के अनुसार, प्रभावी तिथि 01.04.2000 से लागू, अपने स्वयं के शेयरों/अन्य निर्दिष्ट प्रतिभूतियों की खरीद पर किसी कंपनी द्वारा शेयरधारक अथवा अन्य निर्दिष्ट प्रतिभूतियों के धारक द्वारा प्राप्त कोर्इ प्रतिफल, धारा 48 में शामिल प्रावधानों के अनुसार, को पूंजीगत प्राप्ति के तौर पर समझा जाएगा। आगे, अधिनियम की धारा 2 के वाक्यांश (22) के उप-वाक्यांश (iv) 'लाभांश' की सीमा से कंपनी अधिनियम की धारा 77क में शामिल प्रावधानों के अनुसार अपने स्वयं के शेयरों की खरीद पर कंपनी द्वारा किए गए किसी भुगतान को अलग करता है। वित्त अधिनियम, 2013 को तत्पश्चात् यह मुहैया कराने के लिए धारा 115थक (प्रभावी तिथि 01.06.2013) से प्रारंभ किया हैं कि असूचीबद्ध शेयरों की पुन: खरीद पर कंपनी द्वारा वितरित आय की कोर्इ राशि कर हेतु प्रभार्य होगी तथा अपनी आय का वितरण करने वाली ऐसी कंपनी वितरित आय के बीस प्रतिशत की दर पर अतिरिक्त आयकर हेतु उत्तरदायी होगा।
2. बोर्ड के नोटिस में लाया गया है कि प्रभावी तिथि 01.04.2003 से 31.05.2013 तक अधिनियम की धारा 115ण के अंतर्गत लाभांश वितरित कर ('डीडीटी') के आंरभ से इसे कर प्राधिकारियों तथा करदाताओं द्वारा विरोधात्मक रूप से वर्णित किया जा रहा है, जिसके चलते इस मुद्दे पर विवाद को बढ़ावा मिलता रहा। यह दलील दी गर्इ है कि अधिनियम में धारा 115थक के प्रारंभ के बाद से तथा अग्रिम निर्णय (2010 की एएआर सं. पी) के लिए प्राधिकारी के निर्णय पर भरोसे को प्रतिष्ठापित करके, आयकर प्राधिकारी, कुछ मामलों में शेयरों की पुन: खरीद के कारण प्राप्त क्रय प्रतिफल के पुर्नवर्णन की मांग की है, 01.06.2013 से पूर्व निवर्हन, लाभांश के तौर पर तथा तद्नुसार, डीडीटी को कंपनियों द्वारा ऐसी वितरित आय के अनुसार।
3. मामले की जांच की गर्इ है। 01.04.2000 से 31.05.2013 की अवधि के बीच जैसा उक्त पैरा 1 में निर्दिष्ट है, अधिनियम की धारा 2(22)(iv) के साथ पठित स्पष्ट रूप से मुहैया कराता है कि शेयरों की पुन: खरीद पर शेयरधारकों को उत्पन्न आय को पूंजीगत प्राप्ति से आय के तौर पर समझा गया था नाकि लाभांश आय के तौर पर। आगे, इस मुद्दे पर केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के परिपत्र सं. 779 दिनांक 14.09.1999 के अवलोकन पर प्रकट हुर्इ है, जिसका पैरा 28 में कानून में धारा 46क को प्रारंभ के लिए निम्नलिखित कारण निर्दिष्ट किया गया है।
28. कंपनियों द्वारा शेयरों की पुनः खरीद हेतु प्रावधान में से उत्पन्न कर संबंधी मुद्दों का स्पष्टीकरण
28.1 कंपनी (संशोधन) अध्यादेश, 1998 (कंपनी (संशोधन) अधिनियम, 1999 के तौर पर तत्पश्चात् अधिनियमित), कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 77क में समाविष्ट की गर्इ है, जो कुछ शर्तों के अनुसार अपने शेयरों की खरीद के लिए कंपनी को अनुमति देता है। पुन खरीदे गए शेयर समाप्त किए जाने चाहिए तथा वास्तविक रूप से समाप्त किए जाने चाहिए तथा कंपनी ऐसे पुन खरीद से 24 महीनों की अवधि के भीतर प्रतिभूतियों के किसी अग्रिम निगर्मन से वंचित है।
28.2 शेयरों की पुन : खरीद के उक्त नए प्रारंभ प्रावधान आयकर अधिनियम के मौजूदा प्रावधानों के संबंध में कुछ निगर्मन को उलटता है। दो जारी सिद्धांत हैं कि या तो आयकर अधिनियम की धारा 2(22) के अंतर्गत लाभांश के तौर पर समझे जाने को वृद्धि देता है तथा या तो कोर्इ पूंजीगत प्राप्ति शेयरधारकों के हाथों वृद्धिशील होती है। दोनों मुद्दों पर कानूनी स्थिति स्पष्टीकरण तथा स्थिरता से दूर था तथा यह संदेह था कि अनावश्यक मुकद्मेबाजी होगी जबतक मुद्दा परिसमाप्ति के साथ स्पष्ट नहीं होता।
28.3 इसलिए, अधिनियम यह मुहैया कराने के लिए नए वाक्यांश को समाविष्ट कर आयकर अधिनियम की धारा 2 के वाक्यांश (22) को संशोधित करता है कि लाभांश कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 77क में शामिल प्रावधानों के अनुसार अपने स्वयं के शेयरों की खरीद पर कंपनी द्वारा किसी भुगतान को शामिल नहीं करता। इसमें यह मुहैया कराने के लिए आयकर अधिनियम की धारा 46क नामक नर्इ धारा को भी शामिल किया गया है कि अपने स्वयं के शेयरों अथवा अन्य निर्दिष्ट प्रतिभूतियों की खरीद पर किसी कंपनी से अन्य निर्दिष्ट प्रतिभूतियों के शेयरधारकों अथवा अन्य निर्दिष्ट प्रतिभूतियों के धारकों द्वारा प्राप्त कोर्इ प्रतिफल धारा 48 में शामिल प्रावधानों के अनुसार पूंजीगत प्राप्ति के तौर पर समझा जाना है।
(महत्वपूर्ण आपूर्ति)
4. तद्नुसार, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड एतद्द्वारा स्पष्ट करता है कि 01.04.2000 से 31.05.2013 की अवधि के बीच शेयरों की पुन: खरीद पर प्राप्त प्रतिफल अधिनियम की धारा 46क के अनुसार प्राप्तकर्ता के हाथों पूंजीगत प्राप्ति के तौर पर करारोपित होगा तथा ऐसी कोर्इ राशि धारा 2(22)(iv) के विचार से लाभांश के तौर पर होनी समझी जाएगी।
5. गैर-विरोधात्मक कर व्यवस्था की ओर कदम के तौर पर इस मुद्दे पर अग्रिम स्पष्टीकरण को लाने को देखते हुए, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड एतद्द्वारा निर्देशन करते हैं कि सामान्य सिद्धांतों के मामले के तौर पर, स्रोत पर मूल्यांकन/पुर्नमूल्यांकन/गैर-कटौती के लिए कोर्इ नर्इ सूचना जारी नहीं की जाएगी जहां शेयरों की पुन: खरीद 01.06.2013 से पूर्व होती है तथा मामला अधिनियम की धारा 2(22)(iv) के साथ पठित धारा 46क के अंतर्गत अंतनिर्विष्ट हैं। उन मामलों में जहां सूचना को पहले ही जारी किया गया है तथा मूल्यांकन कार्यवाही लंबित है तो कर प्राधिकारी उक्त कानूनी स्थिति को देखते हुए मूल्यांकन को पूर्ण करेगा।
6. उक्त को अनिवार्य अनुपालन के लिए सूचना में लाया जा सकता है।
7. हिन्दी संस्करण अनुसरित होगा
(रोहित गर्ग)
अवर सचिव, भारत सरकार
(एफ. सं. 225/19/2016/आर्इटीए.II)
निम्न को प्रति :
1) अध्यक्ष, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड तथा समस्त सदस्य, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड
2) समस्त प्रधान मुख्य आयकर आयुक्त/प्रधान आयकर महानिदेशक
3) समस्त संयुक्त सचिव/आयकर आयुक्त, केद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड
4) विभाग के आधिकारिक हेंडल पर चस्पा करने के प्रतिवेदन के साथ अतिरिक्त महानिदेशक (पीआर, पीपी एंड ओएल)
5) अतिरिक्त आयकर आयुक्त, विभागीय वेबसाइट पर अपलोडिंग के लिए डाटा बेस प्रकोष्ठ
6) incometaxindia.gov.in पर अपलोडिंग के लिए व पब्लिक डोमेन पर चस्पा करने के लिए वेब मैनेजर
7) आर्इटीसीसी, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (3 प्रतियां)
8) गार्ड फाइल

