737 : परिपत्र: सं 737, 23-02-1996 दिनांकित
परिपत्र सं.
737
परिपत्र की तिथि
23/02/1996
दस्तावेज़ अपलोड की तिथि
23/02/1996
| परिपत्र संख्या | 737 |
| जारी करने का दिनांक | 23:02:1996 |
| धारा | 44 एडी, 44 एर्इ |
| कानून | आयकर अधिनियम |
विषय: धारा 44 एडीतथा 44 एर्इ के अंतर्गत आय के अनुमान को चुनने वाली फर्म के साझेदारों के लिए वेतन/ब्याज के खातों पर कटौती की स्वीकार्यता
1. धारा 44 एडीतथा 44 एर्इ को आयकर अधिनियम में वित्त अधिनियम द्वारा सम्मिलित किया गया था। धारा 44 डी सिविल निर्माण के व्यापार या सिविल निर्माण कार्य के लिए श्रम की आपूर्ति से आय के अनुमान की पद्धति प्रदान करती है जहां पर व्यापार से कुल प्राप्ति 40 लाख रूपए से अधिक न हो। धारा 44 एर्इ उन व्यापारों से आय के अनुमान को बताती है जो प्लाइंग, या ट्रकों को किराए पर देने का काम करती है। दोनों ही योजनाएं वैकल्पिक है।
2. धारा 44 एडीतथा 44 एर्इ की उपधारा ( 1 ) स्पष्ट रूप सेबातती है कि आय का अनुमान वर्णित प्रतिशतों /आधार पर किया जाता है जो कि अधिनियम की धारा 28 से 43 सी से अलग होता है। अन्य शब्दों में धारा 44 एडीतथा 44 एर्इ कर्इ प्रकार कटौतियों की देखभाल करता है।
3. एक संदेह उत्पन्न हुआ है कि क्या किसी फर्म के साझेदारों के लिए आय/ब्याज को अधिनियम की धारा 44 कग तथा कच के अनुपालन में अनुमानित आय से प्रवेश योग्य माना गया है। यह कानून इस मुद्दे पर स्पष्ट है तथा इन मामलों में धारा 40 (ख) के मामलों में कोर्इ भी अलग से कटौती नहीं की गर्इ है। इस मामले में इस लिए संदेह उत्पन्न होता है कि वित्त अधिनियम 1994 के प्रावधानों पर व्याख्या नोट के 31.3 तथा 32.2 अनुच्छेदों में स्पष्ट स्पष्टीकरण प्रदान किए गए है (परिपत्र सं. 684, दिनांक 10.06.1994) देखें संस्करण 4। व्याख्या नोट के प्रासंगिक हिस्से को निम्नानुसार पढ़ा जा सकता है:
'फर्म के मामले में, धारा 40 के खंड (ख) के अंतर्गत सीमाओं के अनुसार सामान्य कटौतियों की अनुमति होगी।
4. धारा 40 का क्लॉज (ख), साझेदारों के वेतन तथा ब्याज के आधार पर अनुमत कटौतियों पर प्रतिबंध को बताता है तथा कटौतियों का दावा करने के लिए एक सक्षम खंड नहीं है। प्रवेश योग्य कटौतियों को स्पष्ट रूप से आयकर अधिनियम की धारा 30 से 38 तक धाराओं के अंतर्गत बताया गया है। इस प्रकार धारा 44कघ (2) तथा कच (3) केवल स्पष्टीकरण के द्वारा उचित स्थिति को बताती है। हालांकि धारा 44 कघ तथा 44 कच की उपधारा (1) में कोर्इ भी गैर आवश्यक क्लॉज के दृष्टिकोण से इस मामले में कानून की मंशा के बारे में कोर्इ भी दुविधापूर्ण स्थिति नहीं है तथा इस अधिनियम के प्रावधान एकदम स्पष्ट है। जैसा कि कहा गया है कि ये संदेह केवल वित्त अधिनियम 1994 के व्याख्या नोट्स के कारण उत्पन्न हुए है। इस लिए स्पष्टता के लिए तथा इस संबंध में संदेहों को हटाने के लिए निम्न पंक्तियों को परिपत्र सं. दिनांक 684 दिनांक 10 जून 1994 के अनुच्छेद 31.3 तथा 37.2 से हटा दी गर्इ हैं।
फर्म के मामले में सामान्य कटौतियां जो कि धारा 40 के क्लॉज (ख) के अंतर्गत अनुमत हैं, उन्ही की अनुमति दी जाएगी।
हस्ताक्षर
अनिरुद्ध कुमार
सेके्रटरी, भारत सरकार
[एफसं. 149/200/95 टीपीआर्इ दिनांक 23.02.1996 सीबीडीटी से, नर्इ दिल्ली]
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