रजिस्ट्रीकरण के लिए प्रक्रिया
79[रजिस्ट्रीकरण के लिए प्रक्रिया
12कक. (1) 80[* * *] आयुक्त, किसी न्यास/संस्था के रजिस्ट्रीकरण के लिए 81[धारा 12 क की उपधारा (1) के खंड (क) या खंड (कक)] के अधीन किए गए आवेदन की प्राप्ति पर,–
(क) न्यास या संस्था से ऐसे दस्तावेज या जानकारी प्रस्तुत करने के लिए कहेगा जो वह न्यास या संस्था के क्रियाकलापों की यथार्थता के संबंध में अपना समाधान करने के लिए आवश्यक समझे और ऐसी जांच भी करेगा जो वह इस निमित्त आवश्यक समझे; और
(ख) न्यास या संस्था के उद्देश्यों और उसके क्रियाकलापों की बाबत अपना समाधान हो जाने के पश्चात्–
(i) न्यास या संस्था को रजिस्ट्रीकृत करने के लिए लिखित में आदेश पारित करेगा;
(ii) न्यास या संस्था को रजिस्ट्रीकृत करने से इन्कार करने के लिए लिखित में आदेश पारित करेगा यदि उसका समाधान नहीं होता है,
और ऐसे आदेश की एक प्रति आवेदक को भेजी जाएगी :
परन्तु उपखंड (ii) के अधीन ऐसा आदेश तब तक पारित नहीं किया जाएगा जब तक कि आवेदक को सुने जाने का युक्तियुक्त अवसर प्रदान न कर दिया गया हो।
82[(1क) मुख्य आयुक्त के समक्ष लंबित ऐसे सभी आवेदन, जिन पर 1 जून, 1999 के पूर्व उपधारा (1) के खंड (ख) के अधीन कोर्इ आदेश पारित नहीं किया गया है, उस दिन को आयुक्त को अंतरित हो जाएंगे और आयुक्त उस उपधारा के अधीन ऐसे आवेदनों पर ऐसे प्रक्रम से आगे कार्यवाही कर सकेगा जिस पर वे उस दिन को थे।]
(2) उपधारा (1) के खंड (ख) के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रदान करने या उससे इन्कार करने वाला प्रत्येक आदेश 83[धारा 12 क की उपधारा (1) के खंड (क) या खंड (कक)] के अधीन आवेदन प्राप्त करने वाले मास के अंत से छह मास के अवसान के पूर्व पारित किया जाएगा।]
84[(3) जहां किसी न्यास या किसी संस्था को उपधारा (1) के खंड (ख) के अंतर्गत रजिस्ट्रीकरण मंजूर किया गया है 84क[या धारा 12 क [जैसी वह वित्त (संख्यांक 2) अधिनियम, 1996 (1996 का 33) द्वारा इसका संशोधन किए जाने से पूर्व विद्यमान थी] के अधीन किसी समय रजिस्ट्रीकरण अभिप्राप्त किया गया है] और तत्पश्चात् आयुक्त का यह समाधान हो जाता है कि, यथास्थिति, ऐसे न्यास या संस्था के कार्यकलाप प्रामाणिक नहीं हैं या वे न्यास या संस्था के उद्देश्यों के अनुसार नहीं किए जा रहे हैं तो वह ऐसे न्यास या संस्था के रजिस्ट्रीकरण को रद्द करने संबंधी आदेश लिखित रूप में पारित करेगा:
परंतु इस उपधारा के अधीन कोर्इ आदेश तब तक पारित नहीं किया जाएगा जब तक कि ऐसे न्यास या संस्था को सुनवार्इ का युक्तियुक्त अवसर प्रदान न कर दिया गया हो।]
79. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1996 द्वारा 1.4.1997 से अंत:स्थापित।
80. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.6.1999 से "मुख्य आयुक्त या" शब्दों का लोप किया गया। इससे पूर्व, कोट किए गए शब्द वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1996 द्वारा 1.4.1997 से अंत:स्थापित किए गए थे।
81. वित्त अधिनियम, 2007 द्वारा 1.6.2007 से "धारा 12क के खंड (क)" के स्थान पर प्रतिस्थापित।
82. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.6.1999 से अंत:स्थापित।
83. वित्त अधिनियम, 2007 द्वारा 1.6.2007 से "धारा 12 के खंड (क)" के स्थान पर प्रतिस्थापित।
84. वित्त (सं.2) अधिनियम, 2004 द्वारा 1.10.2004 से अंत:स्थापित।
84क. वित्त अधिनियम, 2010 द्वारा 1.6.2010 से अंत:स्थापित।
[वित्त अधिनियम, 2012 द्वारा संशोधित रूप में]

