सहदायिक संपत्ति में हित का हस्तांतरण
[सहदायिक संपत्ति में हित का हस्तांतरण I
6. (1) हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के प्रारंभ से, मिताक्षरा कानून द्वारा शासित संयुक्त हिंदू परिवार में, सहदायिक की पुत्री, -
| (क) | जन्म से ही वह पुत्र के समान ही अपने अधिकार से सहदायिक बन जाती है; | |
| (ख) | सहदायिक संपत्ति में उसे वही अधिकार प्राप्त होंगे जो पुत्र होने पर उसे प्राप्त होते; | |
| (ग) | उक्त सहदायिक संपत्ति के संबंध में पुत्र के समान ही दायित्वों के अधीन होगा, |
और हिंदू मिताक्षरा सहदायिक के प्रति किसी संदर्भ में सहदायिक की पुत्री के प्रति संदर्भ सम्मिलित माना जाएगा:
बशर्ते कि इस उपधारा में अंतर्विष्ट कोई बात 20 दिसंबर, 2004 से पूर्व हुए संपत्ति के विभाजन या वसीयती निपटान सहित किसी निपटान या अन्य संक्रामण को प्रभावित या अवैध नहीं करेगी।
(2) कोई संपत्ति, जिस पर कोई हिन्दू स्त्री उपधारा (1) के आधार पर हकदार हो जाती है, उसके द्वारा सहदायिकी स्वामित्व के साथ धारित की जाएगी और इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, ऐसी संपत्ति मानी जाएगी जिसका उसके द्वारा वसीयती व्ययन द्वारा व्ययन किया जा सकता है।
(3) जहां हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के प्रारंभ के पश्चात किसी हिंदू की मृत्यु हो जाती है, वहां मिताक्षरा कानून द्वारा शासित संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति में उसका हित, इस अधिनियम के अधीन, यथास्थिति, वसीयतनामा या निर्वसीयत उत्तराधिकार द्वारा हस्तांतरित होगा, न कि उत्तरजीविता द्वारा, और सहदायिक संपत्ति इस प्रकार विभाजित मानी जाएगी मानो विभाजन हो चुका हो और,—
| (क) | बेटी को बेटे के समान ही हिस्सा आवंटित किया जाता है; | |
| (ख) | पूर्व-मृत पुत्र या पूर्व-मृत पुत्री का हिस्सा, जैसा कि उन्हें मिलता यदि वे विभाजन के समय जीवित होते, ऐसे पूर्व-मृत पुत्र या ऐसी पूर्व-मृत पुत्री की जीवित संतान को आवंटित किया जाएगा; तथा | |
| (ग) | पूर्व मृत पुत्र या पूर्व मृत पुत्री की पूर्व मृत संतान का हिस्सा, जो उस संतान को मिलता यदि वह विभाजन के समय जीवित होती, पूर्व मृत पुत्र या पूर्व मृत पुत्री की पूर्व मृत संतान को, जैसा भी मामला हो, आवंटित किया जाएगा। |
स्पष्टीकरण-- इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, किसी हिंदू मिताक्षरा सहदायिक का हित संपत्ति में वह हिस्सा समझा जाएगा जो उसे आबंटित किया गया होता यदि संपत्ति का विभाजन उसकी मृत्यु से ठीक पहले हुआ होता, भले ही वह विभाजन का दावा करने का हकदार था या नहीं।
(4) हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के लागू होने के पश्चात् कोई भी न्यायालय किसी पुत्र, पौत्र या प्रपौत्र के विरुद्ध उसके पिता, दादा या परदादा से बकाया किसी ऋण की वसूली के लिए केवल इस आधार पर कार्यवाही करने के किसी अधिकार को मान्यता नहीं देगा कि ऐसे पुत्र, पौत्र या प्रपौत्र का हिंदू विधि के अंतर्गत ऐसे किसी ऋण का भुगतान करने का पवित्र दायित्व है:
बशर्ते कि हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के प्रारंभ से पहले अनुबंधित किसी भी ऋण के मामले में, इस उप-धारा में निहित कुछ भी प्रभावित नहीं होगा -
| (क) | किसी भी ऋणदाता को पुत्र, पौत्र या प्रपौत्र के विरुद्ध कार्यवाही करने का अधिकार, जैसा भी मामला हो; या | |
| (ख) | किसी ऐसे ऋण के संबंध में या उसकी संतुष्टि में किया गया कोई भी हस्तांतरण, और ऐसा कोई अधिकार या हस्तांतरण पवित्र दायित्व के नियम के तहत उसी तरह और उसी सीमा तक लागू किया जा सकेगा जैसे वह हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के अधिनियमित न होने पर लागू होता। |
स्पष्टीकरण.- खंड ( क ) के प्रयोजनों के लिए, "पुत्र", "पौत्र" या "प्रपौत्र" पद से, यथास्थिति, उस पुत्र, पौत्र या प्रपौत्र का उल्लेख समझा जाएगा, जो हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के प्रारंभ से पूर्व पैदा हुआ था या गोद लिया गया था।
(5) इस धारा में निहित कोई भी बात उस विभाजन पर लागू नहीं होगी जो 20 दिसम्बर, 2004 से पहले किया गया हो।
स्पष्टीकरण.- इस धारा के प्रयोजनों के लिए "विभाजन" का तात्पर्य पंजीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) के अधीन विधिवत् पंजीकृत विभाजन विलेख के निष्पादन द्वारा किया गया कोई विभाजन या न्यायालय की डिक्री द्वारा किया गया विभाजन है । ]

