प्रतिदायों पर ब्याज
प्रतिदायों पर ब्याज
244क. (1) जहां इस अधिनियम के अधीन किसी रकम का प्रतिदाय निर्धारिती को देय हो जाता है, वहां वह इस धारा के उपबंधों के अधीन रहते हुए, उक्त रकम के अतिरिक्त उस पर साधारण ब्याज प्राप्त करने का हकदार होगा जो निम्नलिखित रीति से संगणित किया जाएगा, अर्थात् :–
(क) जहां प्रतिदाय, निर्धारण वर्ष के ठीक पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष के दौरान धारा 206ग के अधीन स्रोत पर संगृहीत किया जाता है या धारा 199 के अधीन अग्रिम के रूप में संदत्त या संदत्त किया गया समझा जाता है, वहां ऐसा ब्याज निम्नलिखित अवधि में सम्मिलित प्रत्येक मास या उसके किसी भाग के लिए आधे प्रतिशत की दर से संगणित किया जाएगा:–
(i) यदि आय की विवरणी धारा 139 की उपधारा (1) के अधीन नियत तारीख को या उसके पूर्व प्रस्तुत की जाती है तो निर्धारण वर्ष के 1 अप्रैल से उस तारीख तक जब प्रतिदाय अनुदत्त किया जाता है; या
(ii) उपखंड (1) के अंतर्गत न आने वाली दशा में आय की विवरणी प्रस्तुत किए जाने की तारीख से उस तारीख तक जब प्रतिदाय अनुदत्त किया जाता है;
1[परंतु जहां निर्धारिती द्वारा धारा 155 की उपधारा (20) के अधीन किए गए आवेदन के परिणामस्वरूप, निर्धारण अधिकारी द्वारा पारित किसी आदेश के परिणामस्वरूप प्रतिदाय उद्भूत होता है, वहां ऐसे ब्याज को, ऐसे आवेदन की तारीख से उस तारीख तक, जिसको प्रतिदाय प्रदान किया जाता है, की अवधि में समाविष्ट प्रत्येक मास या मास के किसी भाग के लिए आधा प्रतिशत की दर से संगणित किया जाएगा।; ]
(कक) जहां प्रतिदाय धारा 140क के अधीन संदत्त किसी कर में से है, वहां ऐसा ब्याज, आय की विवरणी देने या कर के संदाय की तारीख, जो भी पश्चात्वर्ती हो, से उस तारीख तक, जिसको प्रतिदाय मंजूर किया गया है, अवधि में समाविष्ट प्रत्येक मास या मास के किसी भाग के लिए, आधे प्रतिशत की दर से परिकलित किया जाएगा:
परंतु यदि प्रतिदाय की रकम धारा 143 की उपधारा (1) के अधीन या नियमित निर्धारण पर यथा अवधारित कर के दस प्रतिशत से कम है तो खंड (क) या खंड (कक) के अधीन कोई ब्याज संदेय नहीं होगा;
(ख) किसी अन्य दशा में, ऐसा ब्याज, कर या शास्ति देने की, यथास्थिति तारीख या तारीखों से उस तारीख तक की जिसको प्रतिदाय मंजूर किया जाता है, अवधि या अवधियों में समाविष्ट प्रत्येक मास या मास के भाग के लिए आधा प्रतिशत की दर से संगणित किया जाएगा।
स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए ''कर या शास्ति के संदाय की तारीख'' से अभिप्रेत है वह तारीख जिसको और जिससे धारा 156 के अधीन जारी की गई मांग सूचना में विनिर्दिष्ट कर या शास्ति की रकम ऐसी मांग से अधिक दी जाती है।
(1क) उस दशा में जहां प्रतिदाय नया निर्धारण या पुनर्निर्धारण करने से अन्यथा पूर्णत: या भागत: धारा 250 या धारा 254 या धारा 260 या धारा 262 या धारा 263 या धारा 264 के अधीन किसी आदेश को प्रभावी करने के परिणामस्वरूप उद्भूत होता है, वहां निर्धारिती उपधारा (1) के अधीन संदेय ब्याज के अतिरिक्त, धारा 153 की उपधारा (5) के अधीन अनुज्ञात अवधि के अवसान की तारीख की पश्चात्वर्ती तारीख से, उस तारीख तक जिसको प्रतिदाय मंजूर किया जाता है, आरंभ होने वाली अवधि के लिए तीन प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर पर परिकलित ऐसे प्रतिदाय की रकम पर अतिरिक्त ब्याज प्राप्त करने का हकदार होगा।
2[परंतु किसी निर्धारिती की दशा में, जहां निर्धारण या पुनर्निर्धारण के लिए कार्यवाहियां लंबित हैं, वहां इस उपधारा के अधीन ऐसे निर्धारिती को संदेय अतिरिक्त ब्याज का अवधारण करने के लिए अवधि की संगणना करने में उस तारीख से आरंभ होने वाली अवधि, जिसको धारा 245 की उपधारा (2) के उपबंधों के अनुसार और उसके अधीन रहते हुए, उस तारीख तक ऐसे प्रतिदाय को निर्धारण अधिकारी द्वारा रोक कर रखा जाता है, जिसको ऐसे मामले में ऐसा निर्धारण या पुनर्निर्धारण किया जाता है, अपवर्जित की जाएगी।]
22[(1ख) जहां अध्याय 17ख के अधीन केंद्रीय सरकार के खाते में संदत्त किसी रकम के संबंध में किसी रकम का प्रतिदाय कटौतीकर्ता को देय हो जाता है, वहां ऐसा कटौतीकर्ता, उस तारीख से, जिसको,–
(क) प्रतिदाय के लिए दावा विहित प्ररूप में किया जाता है; या
(ख) कर संदत्त किया जाता है, जहां धारा 250 या धारा 254 या धारा 260 या धारा 262 के अधीन किसी आदेश को प्रभावी करने के मद्दे प्रतिदाय उद्भूत होता है,
उस तारीख तक, जिसको प्रतिदाय अनुदत्त किया जाता है, की अवधि में समाविष्ट प्रत्येक मास या मास के किसी भाग के लिए उक्त रकम के अतिरिक्त उस पर आधा प्रतिशत की दर से परिकलित साधारण ब्याज प्राप्त करने का हकदार होगा।]
(2) यदि ऐसी कार्यवाहियों में जिनका परिणाम प्रतिदाय है, विलंब, चाहे पूर्णत: या भागत: 23[यथास्थिति, निर्धारिती या कटौतीकर्ता] के कारण हुआ माना जाता है, तो ऐसे विलम्ब की अवधि को, जिसे उसके कारण इस प्रकार हुआ माना जा सकता है, उस अवधि में से निकाल दिया जाएगा जिसके लिए उपधारा (1) या उपधारा (1क) 22[या उपधारा (1ख)] के अधीन ब्याज संदेय है, और जहां निकाली जाने वाली अवधि के बारे में कोई प्रश्न उठता है, वहां उसका विनिश्चय प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा किया जाएगा और उस पर उसका विनिश्चय अंतिम होगा।
(3) जहां धारा 115बड़ की उपधारा (3) या धारा 115बच या धारा 115बछ या धारा 143 की उपधारा (3) या धारा 144 या धारा 147 या धारा 154 या धारा 155 या धारा 250 या धारा 254 या धारा 260 या धारा 262 या धारा 263 या धारा 264 के अधीन किसी आदेश के अथवा धारा 245घ की उपधारा (4) के अधीन समझौता आयोग के किसी आदेश के परिणामस्वरूप ऐसी रकम जिस पर उपधारा (1) के अधीन ब्याज संदेय था, यथास्थिति, बढ़ाई गई है, या घटाई गई है, वहां ब्याज तदनुसार बढ़ा दिया जाएगा या घटा दिया जाएगा और किसी ऐसी दशा में जहां ब्याज घटाया जाता है, वहां निर्धारण अधिकारी, अधिक दी गई ब्याज की रकम को विनिर्दिष्ट करते हुए और ऐसी रकम देने की निर्धारिती से अपेक्षा करते हुए विहित प्ररूप में मांग सूचना की तामील उस पर करेगा और ऐसी मांग सूचना को, धारा 156 के अधीन सूचना समझा जाएगा और इस अधिनियम के उपबंध तदनुसार लागू होंगे।
(4) इस धारा के उपबंध 1 अप्रैल, 1989 को प्रारम्भ होने वाले निर्धारण वर्ष और पश्चात्वर्ती निर्धारण वर्षों के निर्धारणों की बाबत लागू होंगे।
परंतु अनुषंगी फायदों के निर्धारण के संबंध में, इस उपधारा के उपबंधों का वैसे ही प्रभाव होगा, मानों "1989" अंकों के स्थान पर "2006" अंक रखे गए हों।
[वित्त अधिनियम, 2024 द्वारा संशोधित रूप में]

