आयकर विभाग

वित्त मंत्रालय, भारत सरकार

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धारा 11

पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए धारित सम्पत्ति से आय

धारा

धारा संख्या

11

अध्याय शीर्षक

अध्याय III - आय जो कुल आय का हिस्सा नहीं है

अधिनियम

आय-कर अधिनियम, 1961

वर्ष

2023

पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए धारित सम्पत्ति से आय

पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए धारित सम्पत्ति से आय

पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए धारित सम्पत्ति से आय

11. (1) धारा 60 से 63 तक के उपबंधों के अधीन रहते हुए निम्नलिखित आय, आय प्राप्त करने वाले व्यक्ति की पूर्ववर्ष की कुल आय में सम्मिलित नहीं की जाएगी–

(क) ऐसी सम्पत्ति से प्राप्त ऐसी आय जो पूर्णत: पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए न्यास के अधीन धारित है, उस परिमाण तक जिस तक ऐसी आय भारत में ऐसे प्रयोजनों में प्रयोग की जाती है और जहां ऐसी आय भारत में ऐसे प्रयोजनों में प्रयोग किए जाने के लिए संचित की जाती है या अलग रखी जाती है वहां उस परिमाण तक जिस तक इस प्रकार संचित की गई या अलग रखी गई आय उस सम्पत्ति से होने वाली आय के पंद्रह प्रतिशत से अधिक नहीं है;

(ख) ऐसी सम्पत्ति से प्राप्त आय जो केवल भागत: ऐसे प्रयोजनों के लिए न्यास के अधीन धारित है और ऐसा न्यास इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व सृष्ट किया गया है, उस परिमाण तक जिस तक ऐसी आय भारत में ऐसे प्रयोजनों में प्रयोग की जाती है और जहां ऐसी आय भारत में ऐसे प्रयोजनों में प्रयोग किए जाने के लिए अन्तिम रूप से अलग रखी जाती है, वहां उस परिमाण तक, जिस तक इस प्रकार अलग रखी गई आय उस संपत्ति से होने वाली आय के पंद्रह प्रतिशत से अधिक नहीं है;

(ग) ऐसे न्यास के अधीन धारित सम्पत्ति से प्राप्त आय–

(i) जो किसी ऐसे पूर्त प्रयोजन के लिए, जो अन्तर्राष्ट्रीय कल्याण को, जिसमें भारत की अभिरुचि है, प्रोन्नत करने में साधक होता है, 1 अप्रैल, 1952 को या उसके पश्चात् सृष्ट किया गया है, उस परिमाण तक जिस तक ऐसी आय भारत के बाहर ऐसे प्रयोजनों में प्रयुक्त की जाती है, और

(ii) जो पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए 1 अप्रैल, 1952 के पूर्व सृष्ट किया गया है, उस परिमाण तक जिस तक ऐसी आय भारत के बाहर ऐसे प्रयोजनों में प्रयुक्त की जाती है :

परन्तु यह कि बोर्ड ने, साधारण या विशेष आदेश द्वारा दोनों में से किसी भी दशा में यह निर्देश दिया है कि वह ऐसी आय प्राप्त करने वाले व्यक्ति की कुल आय में सम्मिलित नहीं की जाएगी;

(घ) स्वैच्छिक अभिदायों के रूप में आय जो इस विशिष्ट निर्देश के साथ किए गए हैं कि वे समग्र न्यास या 20कक[संस्था, जिसे ऐसे स्वैच्छिक अभिदाय प्रदान किए गए हैं, का ऐसे समग्र निधि के लिए विशिष्ट रूप से रखे गए उपधारा (5) में विनिर्दिष्ट एक या अधिक प्ररूपों या ढंगों से विनिधान किया जाता है या जमा किया जाता है] का भाग होंगे।

21[स्पष्टीकरण 1.]–खंड (क) और (ख) के प्रयोजनों के लिए–

(1) उस आय के पंद्रह प्रतिशत की संगणना करने में जो संचित की जा सकती है या अलग रखी जा सकती है, धारा 12 में निर्दिष्ट ऐसे स्वैच्छिक अभिदाय आय के भाग रूप में समझे जाएंगे।

(2) यदि भारत में पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए किसी पूर्ववर्ष में प्रयुक्त आय, यथास्थिति, न्यास के अधीन धारित या भागत: न्यास के अधीन धारित सम्पत्ति से उस वर्ष के दौरान प्राप्त आय के पचासी प्रतिशत से कम पड़ती है, चाहे रकम कुछ भी हो–

(i) इस कारण से कि वह आय पूर्णत: या भागत: उस वर्ष के दौरान प्राप्त नहीं की गई है; या

(ii) किसी अन्य कारण से,

तब–

(क) उपखंड (i) में निर्दिष्ट दशा में, उस पूर्ववर्ष के, जिसमें ऐसी आय प्राप्त होती है या उसके ठीक बाद के पूर्ववर्ष के दौरान भारत में ऐसे प्रयोजनों में प्रयुक्त आय का उतना भाग जो उक्त रकम से अधिक नहीं है; और

(ख) उपखंड (ii) में निर्दिष्ट दशा में, पूर्ववर्ष के ठीक बाद के उस पूर्ववर्ष के दौरान जिसमें ऐसी आय प्राप्त हुई थी, भारत में ऐसे प्रयोजनों में प्रयुक्त आय का उतना भाग जो उक्त रकम से अधिक नहीं है,

आय प्राप्त करने वाले व्यक्ति के विकल्प पर (ऐसे विकल्प का प्रयोग धारा 139 की उपधारा (1) के अधीन ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, आय की विवरणी देने के लिए 21कक[नियत विनिर्दिष्ट तारीख से कम से कम दो मास पूर्व] किया जाएगा) उस पूर्ववर्ष के दौरान जिसमें ऐसी आय प्राप्त हुई थी ऐसे प्रयोजनों में प्रयुक्त आय समझी जाएगी और इस प्रकार प्राप्त समझी गई आय, उपखंड (i) में निर्दिष्ट दशा में, यथास्थिति, उस पूर्ववर्ष के दौरान जिसमें ऐसी आय प्राप्त होती है या उसके ठीक बाद के पूर्ववर्ष के दौरान और उपखंड (ii) में निर्दिष्ट दशा में उस पूर्ववर्ष के ठीक बाद के पूर्ववर्ष के दौरान जिसमें ऐसी आय प्राप्त हुई थी, ऐसे प्रयोजनों में प्रयुक्त आय की रकम की संगणना करने में हिसाब में नहीं ली जाएगी।]

22[स्पष्टीकरण 2– 22क[धारा 10 के खंड (23ग) के उपखंड (iv) या उपखंड (v) या उपखंड (vi) या उपखंड (viक) में निर्दिष्ट किसी निधि या न्यास या संस्था या किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सा संस्था या 22कक[यथास्थिति, धारा 12कक या धारा 12कख] के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी अन्य न्यास या संस्था, इस विनिर्दिष्ट निदेश के साथ कि वह न्यास या संस्था की समग्र निधि का भाग बनेगा, के पास स्पष्टीकरण 1 के साथ पठित खंड (क) या खंड (ख) में निर्दिष्ट आय में से जमा की गई या संदत्त किसी रकम को, जो ऐसा अभिदाय है], पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के प्रति आय के उपयोग के रूप में नहीं समझा जाएगा।]

22ख[स्पष्टीकरण 3–खंड (क) या खंड (ख) के अधीन आवेदन की रकम का अवधारण करने के प्रयोजनों के लिए धारा 40 के खंड (क) के उपखंड (iक) और धारा 40क की उपधारा (3) और उपधारा (3क) के उपबंध, आवश्यक परिवर्तनों सहित ऐसे लागू होंगे जैसे वे ''कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ'' शीर्ष के अधीन प्रभार्य आय की संगणना करने में लागू होते हैं।]

22खखकक [स्पष्टीकरण 3क- इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, जहां किसी न्यास या संस्था के अधीन धारित संपत्ति के अंतर्गत कोई मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च या धारा 80छ की उपधारा (2) के खंड (ख) के अधीन अधिसूचित कोई अन्य स्थान है, ऐसे न्यास या संस्था द्वारा ऐसे मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च या अन्य स्थान के नवीकरण या मरम्मत के किसी विनिर्दिष्ट प्रयोजन के लिए स्वैच्छिक अंशदान के रूप में प्राप्त किसी राशि को ऐसे न्यास या संस्था द्वारा निम्नलिखित शर्त के अधीन रहते हुए न्यास या संस्था के काय का एक भाग समझा जा सकेगा कि न्यास या संस्था,-

(क) ऐसे काय का केवल उस प्रयोजन के लिए अनुप्रयोग करती है, जिसके लिए स्वैच्छिक अंशदान किया गया था;

(ख) ऐसा काय का किसी व्यक्ति को अंशदान या संदान करने के लिए अनुप्रयोग नहीं करती है;

(ग) ऐसे काय का पृथक् रूप से पहचान योग्य के रूप में अनुरक्षण करती है; और

(घ) ऐसे काय का धारा 11 की उपधारा (5) के अधीन विनिर्दिष्ट प्ररूप और ढंग से विनिधान या निक्षेप करती है।

स्पष्टीकरण 3ख- स्पष्टीकरण 3क के प्रयोजनों के लिए जहां किसी न्यास या संस्था ने, उसके द्वारा प्राप्त किसी राशि को, काय का भाग माना गया है और तत्पश्चात् उक्त स्पष्टीकरण के खंड (क) या खंड (ख) या खंड (ग) या खंड (घ) में विनिर्दिष्ट किन्हीं शर्तों का उल्लंघन किया है, तो ऐसी राशि को पूर्ववर्ष, जिसके दौरान उल्लंघन होता है, ऐसे न्यास या संस्था की आय समझा जाएगा। ]

22खख[स्पष्टीकरण 4- खंड (क) या खंड (ख) के अधीन उपयोजन की रकम का अवधारण करने के प्रयोजनों के लिए,—

  (i) इस उपधारा के खंड (घ) में यथा निर्दिष्ट समग्र निधि से पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए उपयोजन को पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए आय का उपयोजन नहीं माना जाएगा:

परन्तु इस प्रकार उपयोजन के रूप में न समझी गई रकम या उसके भाग को पूर्ववर्ष में, जिसमें रकम या उसके भाग को ऐसी समग्र निधि के लिए विनिर्दिष्ट रूप से अनुरक्षित उपधारा (5) में विनिर्दिष्ट एक या अधिक प्रारूपों या ढंगों में उस वर्ष की आय से ऐसे निवेश या जमा किया जाता है, पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए उपयोजन के रूप में 22खखख[माना जायेगा:]

22गगग [परंतु यह और कि पहले परंतुक के उपबंध केवल तभी लागू होंगे,—

(क) जब इस उपधारा के, खंड (ग) में ;

(ख) इस उपधारा के स्पष्टीकरण 2, स्पष्टीकरण 3 और स्पष्टीकरण 5 में ;

(ग) इस धारा के स्पष्टीकरण में ; और

(घ) धारा 13 की उपधारा (1) के खंड (ग) में,

समग्र निधि से उपयोजन किए जाने के समय यदि विनिर्दिष्ट शर्तों का कोई अतिक्रमण नहीं किया गया था :

परंतु यह भी कि विनिधान की गई या पुन: जमा की गई रकम को पहले परंतुक के अधीन पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए उपयोजन के रूप में तब तक नहीं माना जाएगा जब तक ऐसा विनिधान या जमा उस पूर्ववर्ष, जिसमें समग्र निधि से ऐसा उपयोजन किया गया था, के अंत से पांच वर्ष की अवधि के भीतर किया जाता है :

परंतु यह भी कि पहले परंतुक में अंतर्विष्ट कोई बात वहां लागू नहीं होगी, जहां समग्र निधि से उपयोजन 31 मार्च, 2021 को या उससे पूर्व किया जाता है :]

 (ii) किसी ऋण या उधार से पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए उपयोजन को पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए आय का उपयोजन नहीं माना जाएगा:

परन्तु इस प्रकार उपयोजन के रूप में न समझी गई रकम या उसके भाग को उस पूर्ववर्ष में पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए, जिसमें ऋण या उधार या उसके भाग को उस वर्ष की आय से पुन: संदत्त किया गया है, ऐसे पुनर्संदाय के विस्तार तक, उपयोजन के रूप में अनुज्ञात किया जाएगा।

22गगग[परंतु यह और कि पहले परंतुक के उपबंध केवल तभी लागू होंगे,—

(क) जब इस उपधारा के खंड (ग) में ;

(ख) इस उपधारा के स्पष्टीकरण 2, स्पष्टीकरण 3 और स्पष्टीकरण 5 में ;

(ग) इस धारा के स्पष्टीकरण में ; और

(घ) धारा 13 की उपधारा (1) के खंड (ग) में,

ऋण या उधार से उपयोजन किए जाने के समय यदि विनिर्दिष्ट शर्तों का कोई अतिक्रमण नहीं किया गया था :

परंतु यह भी कि प्रतिसंदत्त रकम को पहले परंतुक के अधीन पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए उपयोजन के रूप में तब तक नहीं माना जाएगा, जब तक ऐसा प्रतिसंदाय उस पूर्ववर्ष, जिसमें ऋण या उधार से ऐसा उपयोजन किया गया था, के अंत से पांच वर्ष की अवधि के भीतर किया जाता है :

परंतु यह भी कि पहले परंतुक में अंतर्विष्ट कोई बात वहां लागू नहीं होगी, जहां कोई ऋण या उधार से उपयोजन 31 मार्च, 2021 को या उससे पूर्व किया जाता है ; और

वित्त अधिनियम, 2023 द्वारा 1.4.2024 से धारा 11 की उपधारा (1) के स्पष्टीकरण 4 के खंड (ii) के पश्चात् खंड (iii) अंत:स्थापित किया जाएगा

(iii) यथास्थिति, धारा 10 के खंड (23ग) के उपखंड (iv) या उपखंड (v) या उपखंड (vi) या उपखंड (viक) में निर्दिष्ट किसी निधि या न्यास या संस्था या किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या अन्य आयुर्विज्ञान संस्था या धारा 12कख के अधीन रजिस्ट्रीकृत अन्य न्यास या संस्था में, स्पष्टीकरण 2 में निर्दिष्ट रकम से भिन्न, जमा या संदत्त किसी रकम को ऐसी जमा की गई या संदत्त रकम के पचासी प्रतिशत की सीमा तक ही पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए उपयोजन के रूप में माना जाएगा

स्पष्टीकरण 5- इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, यह स्पष्ट किया जाता है कि पूर्ववर्ष के दौरान उपयोजित या संचित किए जाने के लिए अपेक्षित आय की संगणना पूर्ववर्ष के पूर्ववर्ती किसी भी वर्ष में किसी आधिक्य उपयोजन के किसी मुजरा या कटौती या मोक के बिना की जाएगी।

(1क) उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए–

(क) जहां पूंजी आस्ति, जो पूर्णत: पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए न्यास के अधीन धारित सम्पत्ति है, अन्तरित की जाती है और संपूर्ण शुद्ध प्रतिफल या उसका कोई भाग इस प्रकार धारित की जाने वाली किसी अन्य पूंजी के अर्जन के लिए उपयोग किया जाता वहां, अंतरण से प्राप्त होने वाला पूंजी अभिलाभ इसके नीचे निर्दिष्ट परिमाण तक पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त किया गया समझा जाएगा, अर्थात् :–

(i) जहां नई पूंजी आस्ति के अर्जन में पूर्ण शुद्ध प्रतिफल उपयोग में लाया जाता है वहां ऐसा संपूर्ण पूंजी अभिलाभ;

(ii) जहां नई पूंजी आस्ति के अर्जन में शुद्ध प्रतिफल उपयोग में लाया जाता है वहां पूंजी अभिलाभ का उतना भाग जो उस रकम के, यदि कोई हो, बराबर है, जिससे इस प्रकार उपयोग की गई रकम अंतरित आस्ति के मूल्य से अधिक है;

(ख) जहां कोई पूंजी आस्ति, जो भागत: ऐसे प्रयोजनों के लिए न्यास के अधीन धारित सम्पत्ति है, अंतरित की जाती है और संपूर्ण शुद्ध प्रतिफल या उसका कोई भाग इस प्रकार धारित की जाने वाली किसी अन्य पूंजी आस्ति के अर्जन के लिए उपयोग किया जाता है वहां अंतरण से प्राप्त होने वाले पूंजी अभिलाभ का समुचित भिन्नांश इसके नीचे विनिर्दिष्ट परिमाण तक पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए लगाया गया समझा जाएगा, अर्थात् :–

(i) जहां पूंजी आस्ति के अर्जन में सम्पूर्ण शुद्ध प्रतिफल उपयोग में लाया जाता है वहां ऐसे पूंजी अभिलाभ का सम्पूर्ण समुचित भिन्नांश;

(ii) किसी अन्य दशा में पूंजी अभिलाभ के समुचित भिन्नांश का वह भाग जो उस रकम के, यदि कोई हो, बराबर है जिससे नई आस्ति के अर्जन में उपयोग में लाई गई रकम का समुचित भिन्नांश अंतरित आस्ति की लागत के समुचित भिन्नांश से अधिक है।

स्पष्टीकरण.–इस उपधारा में–

(i) ''समुचित भिन्नांश'' से यह दर्शाने वाला भिन्नांश अभिप्रेत है कि किस सीमा तक अंतरित पूंजी आस्ति से प्राप्त आय ऐसे अंतरण के ठीक पहले पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए उपयोजनीय थी;

(ii) ''अंतरित आस्तियों की लागत'' से उस पूंजी आस्ति के, जो अंतरण का विषय है, अर्जन की लागत (धारा 48 और 49 के प्रयोजनों के लिए यथा अभिनिश्चित) और धारा 55 के खंड (1) के उपखंड (ख) में उस पद को दिए गए अर्थ के अंतर्गत उसके सुधार की लागत का योग अभिप्रेत है;

(iii) ''शुद्ध प्रतिफल'' से पूंजी आस्ति के अन्तरण के फलस्वरूप प्राप्त या उद्भूत प्रतिफल का पूर्ण मूल्य अभिप्रेत है जिसमें से अंतरण के संबंध में पूर्णत: और अनन्यत: उपगत खर्चे घटा दिए गए हैं।

(1ख) जहां कोई आय, जिसकी बाबत उपधारा (1) के स्पष्टीकरण के खंड (2) के अधीन विकल्प का प्रयोग किया जाता है, उक्त खंड के, यथास्थिति, उपखंड (क) या उपखंड (ख) में निर्दिष्ट कालावधि के दौरान भारत में पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों में प्रयुक्त नहीं की जाती है वहां ऐसी आय, उसे प्राप्त करने वाले व्यक्ति की–

(क) उक्त खंड के उपखंड (i) में निर्दिष्ट दशा में, उस पूर्ववर्ष के, जिसमें ऐसी आय प्राप्त हुई थी, ठीक बाद के पूर्ववर्ष की आय समझी जाएगी; या

(ख) उक्त खंड के उपखंड (ii) में निर्दिष्ट दशा में, उस पूर्ववर्ष के, जिसमें ऐसी आय प्राप्त हुई थी, ठीक बाद के पूर्ववर्ष की आय समझी जाएगी।

(2) जहां उपधारा (1) के स्पष्टीकरण के साथ पठित उस उपधारा के खंड (क) या खंड (ख) में निर्दिष्ट आय का पचासी प्रतिशत पूर्ववर्ष के दौरान भारत में पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों में प्रयुक्त न हो या प्रयुक्त न समझी जाए किंतु भारत में ऐसे प्रयोजनों में प्रयुक्त किए जाने के लिए पूर्णत: या भागत: संचित की जाए या अलग रखी जाए, वहां ऐसी आय जो इस प्रकार संचित या अलग रखी गई हो, उसे प्राप्त करने वाले व्यक्ति की पूर्ववर्ष की कुल आय में सम्मिलित नहीं की जाएगी, परन्तु यह तब जबकि निम्नलिखित शर्तों का पालन किया जाए, अर्थात् :–

(क) ऐसा व्यक्ति निर्धारण अधिकारी को विहित रीति से विहित प्ररूप में, उस प्रयोजन का कथन करते हुए जिसके लिए आय संचित की जा रही है या अलग रखी जा रही है और वह कालावधि जिसके लिए आय संचित की जानी है या अलग रखी जानी है जो किसी भी दशा में पांच वर्ष से अधिक नहीं होगी, एक विवरण दे दें;

(ख) इस प्रकार संचित किया गया या अलग रखा गया धन उपधारा (5) में विनिर्दिष्ट स्वरूप या पद्धतियों में विनिहित या निक्षिप्त कर दिया जाए;

(ग) खंड (क) में निर्दिष्ट विवरण पूर्ववर्ष के लिए आय की विवरणी देने के लिए धारा 139 की उपधारा (1) के अधीन विनिर्दिष्ट देय तारीख 22घघ[से कम से कम दो मास पूर्व] दे दिया जाए:

परंतु खंड (क) में निर्दिष्ट पांच वर्ष की कालावधि की संगणना करने में वह कालावधि जिसके दौरान आय उस प्रयोजन के लिए जिसके लिए आय इस प्रकार संचित की गई है या अलग रखी गई है किसी न्यायालय के किसी आदेश या व्यादेश के कारण प्रयुक्त नहीं की जा सकी है, अपवर्जित कर दी जाएगी।

स्पष्टीकरण–उपधारा (1) के स्पष्टीकरण के साथ पठित उस उपधारा के खंड (क) या खंड (ख) में निर्दिष्ट आय में से धारा 12कक 22कख[या धारा 12कख] के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी न्यास या संस्था को या धारा 10 के खंड (23ग) के उपखंड (iv) या उपखंड (v) या उपखंड (vi) या उपखंड (viक) में निर्दिष्ट किसी निधि या संस्था या न्यास या किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सा संस्था के पास जमा की गई या उसे संदत की गई ऐसी रकम को, जिसका उपयोग नहीं किया गया है बल्कि उसको संचित किया गया है या अलग रखा गया है, संचयन की अवधि के दौरान या उसके पश्चात् पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए आय का उपयोग किया जाना नहीं समझा जाएगा।

(3) उपधारा (2) में निर्दिष्ट कोई आय, जो–

(क) उपरोक्तानुसार पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों से भिन्न प्रयोजनों में प्रयुक्त की जाए या उनमें प्रयुक्त किए जाने के लिए संचित या अलग रखी न रह जाए, या

(ख) उपधारा (5) में विनिर्दिष्ट किसी स्वरूप या पद्धति में विनिहित या निक्षिप्त न रह जाए, या

(ग) उस उपधारा के खंड (ग) में निर्दिष्ट कालावधि के दौरान 22गग[***]  उस प्रयोजन में प्रयुक्त न की जाए जिसके लिए वह इस प्रकार संचित की गई या अलग रखी गई है,

(घ) धारा 12कक 22कख[या धारा 12कख] के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी न्यास या संस्था अथवा धारा 10 के खंड (23ग) के उपखंड (iv) या उपखंड (v) या उपखंड (vi) या उपखंड (viक) में निर्दिष्ट किसी निधि या संस्था या न्यास या किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सा संस्था के पास जमा की गई है या उसे संदत्त की गई है,

22गगक[पूर्व वर्ष में ऐसे व्यक्ति की आय समझी जाएगी -

(i) जिसमें खंड (क) के अधीन इसका अनुप्रयोग किया जाता है या उसका इस प्रकार संचित करना या पृथक् करना समाप्त हो जाता है; या

(ii) जिसमें खंड (ख) के अधीन उसका इस प्रकार किया गया विनिधान या जमा समाप्त हो जाता है; या

(iii) जो उस कालावधि का अंतिम पूर्ववर्ष है, जिसके लिए खंड (ग) के अधीन आय संचित की जाती है या पृथक् रखी जाती है, किन्तु उस प्रयोजन के लिए, जिसके लिए खंड (ग) में यथा विनिर्दिष्ट उसको इस प्रकार संचित किया गया था या पृथक् रखा गया था, उसका उपयोग नहीं किया जाता है; या

(iv) जिसमें उसको खंड (घ) के अधीन किसी निधि या संस्था या न्यास या किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या अन्य आयुर्विज्ञान संस्था, में प्रत्यय या संदत्त किया जाता है।]

(3क) उपधारा (3) में किसी बात के होते हुए भी जहां ऐसी आय प्राप्त करने वाले व्यक्ति के नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियों के कारण कोई ऐसी आय जो उपधारा (2) के खंड (ख) के उपबंधों के अनुसार विनिहित या निक्षिप्त की गई हो, उस प्रयोजन के लिए प्रयुक्त नहीं की जा सकती, जिसके लिए वह संचित की गई थी या अलग रखी गई थी, वहां निर्धारण अधिकारी इस निमित्त उसे किए गए आवेदन पर, ऐसे व्यक्ति को ऐसी आय को भारत में ऐसे अन्य पूर्त या धार्मिक प्रयोजन के लिए प्रयोग करने को अनुज्ञात कर सकेगा जो वह व्यक्ति आवेदन में निर्दिष्ट करे और जो न्यास के उद्देश्य के अनुरूप हो और तब उपधारा (3) के उपबंध ऐसे लागू होंगे मानो इस उपधारा के अधीन निर्धारण अधिकारी को दी गई सूचना में विनिर्दिष्ट प्रयोजन हो:

परन्तु निर्धारण अधिकारी धारा 11 की उपधारा (3) के खंड (घ) के प्रयोजनों के लिए किए गए संदाय या जमा के रूप में ऐसे आय का उपयोग करने की अनुज्ञा नहीं देगा:

परंतु यह और कि यदि ऐसा न्यास या संस्था, जिसने उपधारा (2) के खंड (ख) के उपबंधों के अनुसार अपनी आय विनिहित या निक्षिप्त की है, विघटित हो जाता या जाती है तो निर्धारण अधिकारी, उस वर्ष में, जिसमें ऐसा न्यास या संस्था विघटित हुआ या हुई थी, उपधारा (3) के खंड (घ) में निर्दिष्ट प्रयोजनों के लिए ऐसी आय के उपयोग की अनुज्ञा दे सकेगा।

(4) इस धारा के प्रयोजनों के लिए ''न्यास के अधीन धारित सम्पत्ति'' के अंतर्गत इस प्रकार धारित उपक्रम भी है और जहां यह दावा किया जाता है कि किसी ऐसे उपक्रम की आय, उसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों की कुल आय में सम्मिलित नहीं की जाएगी वहां निर्धारण अधिकारी को इस अधिनियम के निर्धारण संबंधी उपबंधों के अनुसार ऐसे उपक्रम की आय अवधारित करने की शक्ति होगी, और जहां इस प्रकार अवधारित कोई आय उपक्रम के लेखाओं में यथादर्शित आय से अधिक है वहां ऐसे आधिक्य के बारे में यह समझा जाएगा कि वह पूर्त या धार्मिक प्रयोजन से भिन्न प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त किया गया है।

(4क) उपधारा (1) या उपधारा (2) या उपधारा (3) या उपधारा (3क) किसी न्यास या संस्था की किसी ऐसी आय की बाबत, जो कारबार का लाभ और अभिलाभ है, लागू नहीं होगी जब तक कि वह कारबार, यथास्थिति, न्यास या संस्था के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए आनुषंगिक नहीं है और ऐसे न्यास या संस्था द्वारा ऐसे कारबार की बाबत पृथक् लेखा-बहियां नहीं रखी जाती हों।

(5) उपधारा (2) के खंड (ख) में निर्दिष्ट धन विनिहित या निक्षिप्त करने के स्वरूप और पद्धतियां निम्नलिखित होंगी, अर्थात् :–

(i) सरकारी बचत पत्र अधिनियम, 1959 (1959 का 46) की धारा 2 के खंड (ग) में यथा परिभाषित बचतपत्रों में तथा केन्द्रीय सरकार की अल्प बचत स्कीमों के अधीन उस सरकार द्वारा जारी की गई किन्हीं अन्य प्रतिभूतियों या प्रमाणपत्रों में विनिधान;

(ii) डाकघर बचत बैंक में किसी खाते में निक्षेप;

(iii) किसी अनुसूचित बैंक या बैंककारी का कारबार करने वाली सहकारी सोसाइटी (जिसके अंतर्गत सहकारी भूमि बंधक बैंक या सहकारी भूमि विकास बैंक भी है) के किसी खाते में निक्षेप।

स्पष्टीकरण.–इस खंड में ''अनुसूचित बैंक'' से भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम, 1955 (1955 का 23) के अधीन गठित भारतीय स्टेट बैंक, भारतीय स्टेट बैंक (समनुषंगी बैंक) अधिनियम, 1959 (1959 का 38) में यथा परिभाषित समनुषंगी बैंक, बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) की धारा 3 के अधीन अथवा बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1980 (1980 का 40) की धारा 3 के अधीन गठित तत्स्थानी नया बैंक अथवा कोई अन्य बैंक जो भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की द्वितीय अनुसूची में सम्मिलित बैंक है, अभिप्रेत है;

(iv) भारतीय यूनिट ट्रस्ट अधिनियम, 1963 (1963 का 52) के अधीन स्थापित भारतीय यूनिट ट्रस्ट के यूनिटों में विनिधान;

(v) केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार द्वारा सृष्ट और पुरोधृत किसी धन प्रतिभूति में विनिधान;

(vi) किसी कंपनी या निगम द्वारा उसकी ओर से पुरोधृत डिबेंचरों में विनिधान, जिसके मूलधन और उस पर ब्याज दोनों को केन्द्रीय सरकार द्वारा या किसी राज्य सरकार द्वारा पूर्णत: और अंशत: प्रत्याभूत किया गया है;

(vii) किसी पब्लिक सेक्टर कंपनी में विनिधान या निक्षेप :

परन्तु यह कि जहां कोई विनिधान या निक्षेप किसी पब्लिक सेक्टर कंपनी में किया गया है और ऐसी पब्लिक सेक्टर कंपनी, पब्लिक सेक्टर कंपनी नहीं रह गई है, वहां,–

(अ) ऐसी कंपनी के शेयरों में किया गया विनिधान, ऐसी पब्लिक सेक्टर कंपनी के पब्लिक सेक्टर कंपनी न रह जाने की तारीख से तीन वर्ष की अवधि के लिए इस खंड के अधीन किया गया विनिधान माना जाएगा;

(आ) ऐसा अन्य विनिधान या निक्षेप उस तारीख को ऐसी अवधि के लिए इस खंड के अधीन किया गया विनिधान या निक्षेप समझा जाएगा जिस पर ऐसा विनिधान या निक्षेप ऐसी कंपनी द्वारा प्रतिसंदेय हो जाता है;

(viii) ऐसे वित्त निगम में निक्षेप या उसके द्वारा पुरोधृत किन्हीं बंधपत्रों में विनिधान, जो भारत में औद्योगिक विकास के लिए दीर्घकालीन वित्त उपलब्ध कराने में लगा है और जो धारा 36 की उपधारा (1) के खंड (viii) के अधीन कटौती के लिए पात्र है;

(ix) भारत में बनाई गई और रजिस्ट्रीकृत किसी ऐसी पब्लिक कंपनी में निक्षेप या उसके द्वारा पुरोधृत किन्हीं बंधपत्रों में विनिधान, जिसका मुख्य उद्देश्य भारत में आवासिक प्रयोजनों के लिए गृहों के निर्माण या क्रय के लिए दीर्घकालीन वित्त उपलब्ध कराने का कारबार करना है जो धारा 36 की उपधारा (1) के खंड (viii) के अधीन कटौती के लिए पात्र है;

(ixक) भारत में बनाई गई और रजिस्ट्रीकृत किसी ऐसी पब्लिक कंपनी द्वारा पुरोधृत किसी बंधपत्र में निक्षेप या विनिधान, जिसका मुख्य उद्देश्य भारत में शहरी अवसंरचना के लिए दीर्घकालिक वित्त उपलब्ध कराने का कारबार करना है।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए–

(क) ''दीर्घकालिक वित्त" से ऐसा कोई उधार या अग्रिम अभिप्रेत है जहां उन निबंधनों में जिनके अधीन धन उधार या अग्रिम दिया गया हो, पांच वर्ष से अन्यून अवधि के दौरान उसके ब्याज सहित वापस करने का उपबंध है;

(ख) ''पब्लिक कंपनी'' का वही अर्थ है जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 3 में उसका है;

(ग) ''शहरी अवसंरचना'' से पेयजल आपूर्ति, स्वच्छता और मल व्ययन, जल निकास, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, सड़क, पुल और ऊपरोगामी पुल या शहरी परिवहन की व्यवस्था के लिए कोई परियोजना अभिप्रेत है;

(x) स्थावर सम्पत्ति में विनिधान।

स्पष्टीकरण.–''स्थावर सम्पत्ति'' के अंतर्गत कोई मशीनरी या संयंत्र (जो ऐसी मशीनरी या संयंत्र से भिन्न है जो किसी भवन में उस भवन के सुविधापूर्ण अधिभोग के लिए लगाया गया है) नहीं है चाहे वे भूमि में लगे हों या उससे संलग्न किसी वस्तु से स्थायी रूप से बद्ध हों;

(xi) भारतीय औद्योगिक विकास बैंक अधिनियम, 1964 (1964 का 18) के अधीन स्थापित भारतीय औद्योगिक विकास बैंक में निक्षेप;

(xii) किसी अन्य रूप या रीति में विनिधान या निक्षेप, जो विहित की जाए।

(6) इस धारा में जहां किसी आय का उपयोजन या संचित किया जाना या उपयोजन के लिए अलग रखा जाना अपेक्षित है, वहां ऐसे प्रयोजनों के लिए, आय, ऐसी किसी आस्ति के संबंध में, जिसके अर्जन का दावा उसी या किसी अन्य पूर्ववर्ष में इस धारा के अधीन आय के उपयोजन के रूप में किया गया है, किसी कटौती या मोक के बिना अवक्षयण के रूप में या अन्यथा अवधारित की जाएगी।

(7) जहां किसी न्यास या संस्था को 22ग[धारा 12कक या धारा 12कख के अधीन] की उपधारा (1) के खंड (ख) के अधीन रजिस्ट्रीकरण मंजूर किया गया है या उसने धारा 12क [जैसी वह वित्त (संख्यांक 2) अधिनियम, 1996 (1996 का 33) द्वारा उसके संशोधन के पूर्व विद्यमान थी] के अधीन किसी समय रजिस्ट्रीकरण अभिप्राप्त किया है और उक्त रजिस्ट्रीकरण किसी पूर्ववर्ष के लिए प्रवृत्त है तो धारा 10 में अंतर्विष्ट कोई बात [उसके 22गख[ 22गगखख[खंड (1), खंड (23ग) और खंड (46)] से भिन्न]] न्यास के अधीन धारित संपत्ति से व्युत्पन्न किसी आय को उस पूर्ववर्ष के लिए उसे प्राप्त करने वाले व्यक्ति की कुल आय से अपवर्जित करने के लिए प्रवर्तित होगी।

22घ[परंतु ऐसा रजिस्ट्रीकरण उस तारीख से, जिसको यथास्थिति, न्यास या संस्था, धारा 10 के खंड (23ग) के अधीन अनुमोदित किया जाता है या उक्त धारा के 22घघख[खंड (46) के अधीन] अधिसूचित किया जाता है या वह तारीख जिसको यह परंतुक प्रवृत्त हुआ है, जो भी पश्चात्वर्ती हो, प्रवर्तित नहीं रहेगा:

परंतु यह और कि ऐसे न्यास या ऐसी संस्था जिसका रजिस्ट्रीकरण पहले पंरतुक के अधीन प्रवर्तित नहीं हुआ है, 22घक[धारा 12कक के अधीन 22घख[या धारा 12कख]] अपने रजिस्ट्रीकरण को प्रवर्तित कराने के लिए इस शर्त के अधीन रहते हुए आवेदन कर सकेगा कि ऐसा करने पर, धारा 10 के खंड (23ग) या उक्त धारा के 41क[खंड (46) के अधीन] यथास्थिति, ऐसे न्यास या संस्था को अनुमोदन उस तारीख से प्रभावहीन हो जाएगी जिस पर उक्त रजिस्ट्रशन प्रवर्तित हो जाता है और तत्पश्चात् वह सम्बंधित खंड के अधीन छूट का हक़दार नहीं होगा |

22घखख[स्पष्टीकरण - इस धारा के प्रयोजनो के लिए, किसी न्यास या संस्था द्वारा संदेय किसी राशि को उस पूर्व वर्ष के दौरान आय के उपयोजन के रूप में समझा जाएगा, जिसमें उसके द्वारा वस्तुत: ऐसी राशि का संदाय किया गया है (उस पूर्ववर्ष पर ध्यान न देते हुए, जिसमें न्यास या संस्था द्वारा, उसके द्वारा नियमित रूप से उपयोग में लाई जा रही लेखांकन पद्धति के अनुसार ऐसी राशि का संदाय करने का दायित्व उपगत हुआ था):

परंतु जहां किसी पूर्ववर्ष के दौरान किसी राशि के संबंध में यह दावा किया गया है कि उसे न्यास या संस्था द्वारा उपयोजित किया गया है, वहां ऐसी राशि को पश्चातवर्ती पूर्ववर्ष में उपयोजित राशि के रूप में अनुज्ञात नहीं किया जाएगा]

 

 

 

[वित्त अधिनियम, 2023 द्वारा संशोधित रूप मेंें]

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